आज सुबह आँख खुली तो खिड़की के बाहर से टपर-टपर की मधुर ध्वनि आ रही थी। मतलब यह कि सहारनपुर में झमाझम बारिश हो रही है। मोबाइल में मिस्ड कॉल पड़ी थी- हमारे जिम ट्रेनर की। जिसका मतलब था आज छुट्टी रहेगी। मैने दैनिक योगासन व प्राणायाम करते हुए यह मन बना लिया कि आज आउटडोर साइकिल चलाकर कार्डियो का अभ्यास पूरा कर लूँ। असली लालच तो हरे - भरे वातावरण में स्वच्छ फुहारों से भींगने का आनंद लेने का था।
तो हम घनघोर बारिश में निकल लिए
साइकिल चलाने। पक्की सड़क को काटने वाली नहर मिली तो उसकी कच्ची पटरी पर एक साहसिक
यात्रा के लिए आगे बढ़ गये। कच्ची पटरी की सड़क में छोटे-छोटे गढ्ढों में पानी भरा
हुआ था। उनसे बचते-बचाते बढ़ते रहे तो बड़ी नहर की पटरी मिली जिसपर टूटा-फूटा
खड़ंजा लगा था। पानी वाले छोटे गढ्ढे यहाँ भी थे लेकिन इसपर फिसलने का खतरा कम था।
थोड़ी दूर और चलने पर एक ग्रामीण पिच रोड मिल गयी। उस पक्की सड़क को पकड़कर आगे
बढ़े तो हमारी मुख्य सड़क मिल गई जो विश्वविद्यालय तक ले आई।
इस बारिश ने किसानों का काम आगे
बढ़ा दिया है। धान की रोपाई प्रगति पर है। रास्ते में कई किसान फावड़े से खेतों की
मेड़ ठीक करते दिखाई दिए जिससे बारिश का पानी बहकर दूसरी ओर न चला जाय। गन्ने की
फसल भी लहलहा रही थी। इसे अब अलग से सींचना नहीं पड़ेगा।
बारिश में भींगकर खराब न हो जाय इस
डर से मैने पॉलीथिन में लिपटे मोबाइल को बाहर नहीं निकाला। इसलिए इस बार तस्वीरें
नहीं ले पाया।
वापस लौटते समय आम के बाग में गया
जहाँ रखवाला चादर ताने सो रहा था। मैने आवाज दी - अब उठ जाइए सुबह हो गई है। वो
हड़बड़ाकर उठा। फिर मुझे साइकिल पर तरबतर भींगा देखकर मुस्कराने लगा।
मैने पूछा - अभी आम पके कि नहीं?
उसने कहा - पक रहे हैं।
इसके बाद उसने छोटे बच्चे से कहा
कि कैरेट में से छांटकर कुछ आम लाए। एक पॉलीथीन में आम रखकर देने लगा जो ऊपर से
बिल्कुल कच्चे लग रहे थे। दबाने पर भी कड़े थे।
मेरी प्रश्नवाचक दृष्टि का समाधान
करते हुए बोला - ले जाओ, छीलकर अभी खाओ। बहुत मीठे लगेंगे।
घर आकर मैने वही किया और वैसा ही
पाया। यह एकमात्र तस्वीर उन्हीं आमों की है। डाल के पके स्वादिष्ट ताजे आम।
उस भले आदमी ने इसका पैसा भी नहीं
लिया। बोला - जब सड़क पर दुकान लगाकर बेचूंगा तब पैसे लूंगा। यहां तो जितना खाना
चाहे सब फ्री रहेगा।




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