हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

सुधार की जरूरत है क्या?

हमारा समाज बेईमानी, भ्रष्टाचार व अकर्मण्यता के प्रति उदासीन क्यों है?

चार साल पहले लिखी एक पोस्ट में मैंने पूछा था कि यह सरकारी ‘असरकारी’ क्यों नहीं है? तब मैंने जिलों में अपनी तैनाती के अनुभव के आधार पर यह प्रश्न रखा था। पिछले चार साल में इस निराशाजनक स्थिति से उबरने का कोई रास्ता तो मुझे नहीं दिखायी दिया लेकिन सरकारी तंत्र में मुख्यालय स्तर पर कार्य करने के बाद मुझे यह विश्वास हो गया है कि मेरी वह चिन्ता ही बेकार थी। यहाँ तो सरकारी तंत्र को असरकारी बनाने की कोई खास आवश्यकता ही नहीं महसूस की जा रही है। फिर तो कोई गंभीर कोशिश किये जाने का प्रश्न ही बेमानी है। इस स्थिति में कोई सकारात्मक सुधार होने की सम्भावना तो मृग मरीचिका सी हो गयी है।

मैंने फील्ड स्तर पर देखा था कि गाँव-गाँव में खोले गये प्राथमिक स्तर के सरकारी स्कूलों की तुलना गली-गली में उग आये प्राईवेट नर्सरी स्कूलों या तथाकथित साधारण ‘कान्वेन्ट स्कूलों’ से भी करने पर भारी अंतर मिलता है। महानगरों में संचालित उत्कृष्ट पब्लिक स्कूलों की तो बात ही अलग है। एक सरकारी प्राथमिक स्कूल के अध्यापक को जो वेतन और भत्ते (२० से ४० हजार) सरकार दे रही है उसमें किसी साधारण निजी नर्सरी स्कूल के आठ-दस अध्यापक रखे जा सकते हैं। लेकिन एक सरकारी प्राथमिक शिक्षक एक माह में कुल जितने घंटे वास्तविक शिक्षण का कार्य करता है, प्राईवेट शिक्षक को उससे आठ से दस गुना अधिक समय पढ़ाना होता है। विडम्बना यह है कि सरकारी स्कूलों में उन्ही की नियुक्ति होती है जो निर्धारित मानक के अनुसार शैक्षिक और प्रशिक्षण की उचित योग्यता रखते हैं; कहने को मेरिट के आधार पर चयन होता है; लेकिन उनका ‘आउटपुट’ प्राइवेट स्कूलों के अपेक्षाकृत कम योग्यताधारी शिक्षकों से कम होता है। ऐसा क्यों?
उच्च प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के जिन निजी विद्यालयों के वेतन बिल का भुगतान सरकारी अनुदान से होने लगता है, वहाँ शैक्षणिक गतिविधियों में गिरावट दर्ज होने लगती है। स्कूल के निजी श्रोतों से वेतन पाने वाले और निजी प्रबन्धन के अधीन कार्य करने वाले जो शिक्षक पूरे अनुशासन (या मजबूरी) के साथ अपनी ड्यूटी किया करते थे, सुबह से शाम तक स्कूल में छात्र-संख्या बढ़ाने के लिए जी-तोड़ मेहनत किया करते थे; वे ही सहसा बदल जाते हैं। सरकार द्वारा अनुदान स्वीकृत हो जाने के बाद सरकारी तनख्वाह मिलते ही उनकी मौज आ जाती है। पठन-पाठन गौण हो जाता है। उसके बाद संघ बनाकर अपनी सुविधाओं को बढ़ाने और बात-बात में हड़ताल और आन्दोलन करने की कवायद शुरू हो जाती है। मुझे हैरत होती है कि एक ही व्यक्ति प्राइवेट के बाद ‘सरकारी’ होते ही इतना बदल कैसे जाता है। उसकी दक्षता कहाँ चली जाती है?
इनकी तुलना में, या कहें इनके कारण ही निजी क्षेत्र के संस्थान जबर्दस्त प्रगति कर रहे हैं। यह प्रगति शैक्षणिक गुणवत्ता की दृष्टि से चाहे जैसी हो लेकिन मोटी फीस और दूसरे चन्दों की वसूली से मुनाफ़ा का ग्राफ ऊपर ही चढ़ता रहता है। बढ़ती जनसंख्या और शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ने के साथ-साथ प्राइवेट स्कूल-कॉलेज का धन्धा बहुत चोखा तो हो ही गया है; लेकिन सरकारी तन्त्र में जगह बना चुके चन्द ‘भाग्यशाली’ (?!) लोगों की अकर्मण्यता और मक्कारी ने इस समानान्तर व्यवस्था को एक अलग रंग और उज्ज्वल भविष्य दे दिया है।
आई.आई.टी., आई.आई.एम. और कुछ अन्य प्रतिष्ठित केन्द्रीय संस्थानों को छोड़ दिया जाय तो सरकारी रोटी तोड़ रहे अधिकांश शिक्षक और कर्मचारी-अधिकारी अपनी कर्तव्यनिष्ठा, परिश्रम, और ईमानदारी को ताख पर रखकर मात्र सुविधाभोगी जीवन जी रहे हैं। इनके भ्रष्टाचार और कर्तव्य से पलायन के नित नये कीर्तिमान सामने आ रहे हैं। जो नयी पीढ़ी जुगाड़ और सिफारिश के बल पर यहाँ नियुक्ति पाकर दाखिल हो रही है, वह इसे किस रसातल में ले जाएगी उसकी सहज कल्पना की जा सकती है।
corruption in vote
(India Against Corruption से साभार)
इस माहौल को नजदीक से देखते हुए भी मैं यह समझ नहीं पाता कि वह कौन सा तत्व है जो एक ही व्यक्ति की मानसिकता को दो अलग-अलग प्रास्थितियों (status) में बिलकुल उलट देता है। अभावग्रस्त आदमी जिस रोजी-रोटी की तलाश में कोई भी कार्य करने को तैयार रहता है, उसी को वेतन की गारण्टी मिल जाने के बाद वह क्यों कार्य के प्रति दृष्टिकोण में यू-टर्न ले लेता है?
प्रशासनिक तंत्र के उच्च सोपानों पर स्थिति और भी दहलाने वाली है। जनता का वोट और विश्वास पाकर सत्ता में केबिनेट मंत्री बनने के बाद अथवा लोक सेवा आयोग की कठिन परीक्षा में उत्कृष्ट प्रदर्शन से चयनित होने के बाद ब्यूरोक्रेसी के तमाम बड़े ओहदेदार अपने अधिकार को धन कमाने के अवसर के रूप में प्रयोग करते देखे जा रहे हैं। जनसेवा को प्रेरित करने वाली संवेदना और पिछड़े तबके का विकास करने की इच्छाशक्ति जैसी बातें अब खोखली और हास्यास्पद सी लगने लगी हैं। राष्ट्रीय सामाचारों में ऐसे लोग लगातार अपनी जगह बना रहे हैं जो उच्च पदो पर रहते हुए सीधे जेल चले जा रहे हैं। केबिनेट मंत्री के स्टेटस से सीधे फरार अपराधी के स्टेटस में परिवर्तन फेसबुक स्टेटस से भी तेज होने लगा है। राज्य अल्पसंख्यक आयोग का अध्यक्ष रहते हुए हत्या की वारदात में धरा जाना कितना शर्मनाक है? राष्ट्रीय समाचार चैनेल के संपादकों का एक उद्योगपति से  कथित डील करने के चक्कर में जेल चले जाना क्या बताता है? यह हमारी पॉलिटी के बारे में बहुत ही खतरनाक संकेत देता है।
सी.ए.जी. जैसी संस्थाओं द्वारा गलती पकड़े जाने पर गलती का सुधार करने के बजाय सी.ए.जी. को घेरने की ही कोशिश की जाती है। खतरे का संदेश समझने और सही राह चुनने के बजाय संदेशवाहक को ही चुप करा देने की कुटिल चाल (shooting the messenger) पूरे राजनीतिक तंत्र की शैली हो गयी है। अरविन्द केजरीवाल जैसे उत्साही नायक कुछ करना भी चाहते हैं तो पूरा तंत्र अपनी पार्टी लाइन छोड़कर एकजुट हमलावर हो जाता है। अन्ना हजारे समस्याएँ तो गिनाते हैं लेकिन समाधान की राह पर चलने में संकोच करते हैं और भ्रष्टाचार की लड़ाई बीच में ही अटक कर रह जाती है।
राज्य सरकारों की नीतियों पर पोन्टी चढ्ढा जैसे कुटिल कारोबारियों का प्रभाव तो आम जनश्रुति हो गयी है लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर जो नीतियाँ बनायी जा रही हैं उनका छिछलापन भी सहज ही उजागर हो जाता है। गरीबों को नगद सब्सिडी देने की योजना के पीछे जो तर्क दिये जा रहे हैं उनका व्यावहारिक धरातल पर कोई दर्शन नहीं होने वाला। लोगों का मानना है कि तमाम गरीबोन्मुखी सरकारी योजनाओं की तरह हमारा भ्रष्ट तंत्र इसपर भी डाका डालने से बाज नहीं आएगा। आखिर ऐसा क्यों है?
क्या हम मान चुके हैं कि हम जैसे हैं वैसे ही रहेंगे? हमें सुधरने की कोई जरूरत नहीं है। यह प्रकृति-प्रदत्त तो नहीं है। फिर क्या हम अभिशप्त हैं, एंवेई…?
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

अपनी फ़िक्र पहले…

एक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना में सरकारी तंत्र की प्रमुख जिम्मेदारी आम जनता की सुख-सुविधाओं का ध्यान रखना और गरीब व वंचित वर्ग को सहारा देना होता है। ऐसे कार्यों में व्यावसायिक लाभ कमाने का उद्देश्य बहुत पीछे छूट जाता है। जनहित के कार्यों का निष्पादन करने वाले अधिकारी व कर्मचारी यदि इसे अपना पुनीत कर्तव्य मानकर पूरे मनोयोग व निष्ठा से कार्य करें और उन्हें ऐसा वास्तव में करने दिया जाय, तो हमारे समाज के प्रायः सभी दोष थोड़े समय में ही मिट जाँय; लेकिन दुर्भाग्य से वास्तविकता इसके विपरीत है।
मुझे ऐसा महसूस होता है कि सरकारी तंत्र को चलाने के लिए जो नियामक सिद्धान्त लागू किये गये हैं और इसको नियन्त्रित करने की शक्तियों को लोकतंत्र या सामाजिक रीति के नाम पर जिस प्रकार विनियमित किया गया है उससे उनके भीतर ही ऐसे तत्व उत्पन्न हो गये हैं जो एक संवेदनशील व दक्ष प्रशासन की संभावनाओं को हतोत्साहित करते है। इसे हाल ही में सुर्खिया बटोरने वाली एक घटना के माध्यम से समझा जा सकता है।
एक राज्य सरकार ने यह निर्णय लिया कि शहर से लेकर गाँवों तक फैले सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की कमी दूर करने के लिए अभियान चलाकर जल्द से जल्द चिकित्सा उपाधि धारण करने वाले अभ्यर्थियों को सीधी संविदा के आधार पर नियुक्त कर दिया जाय। लोक सेवा आयोग के माध्यम से पर्याप्त चिकित्सकों की भर्ती न हो पाने, सीमित अवधि के प्रोजेक्ट/ मिशन के  अंतर्गत सृजित अस्थायी पदों को भरने की आवश्यकता होने, स्थायी पदों पर नियमित चिकित्सकों की भर्ती में कठिनाई आने या ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करने में उनकी अरुचि को देखते हुए शायद यह विकल्प चुना गया होगा। इस व्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्र के अस्पतालों में कार्य करने के लिए ही  डाक्टरों से अनुबन्ध किया जाता और कदाचित्‌  बेरोजगारी काट रहे अभ्यर्थी संविदा से बँधकर उन दूर-दराज़ के अस्पतालों पर रुककर मरीजों की चिकित्सा के लिए उपलब्ध हो जाते। इन्हें भर्ती करने का दायित्व जनपद के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को दिया गया। जनपद के प्रशासनिक अधिकारी इस भर्ती प्रक्रिया में सहयोगी की भूमिका निभाने वाले थे। लेकिन जो हुआ वह इस तंत्र के भीतर झाँकने के लिए एक खिड़की खोलने वाला था।
(www.parkhill.org.uk से साभार)
स्थानीय विधायक और मन्त्री ने चयनित डाक्टरों की सूची देखी तो आग बबूला हो गये। बताते हैं कि अपने ‘कैन्डीडेटों’ का नाम नदारद देखकर उन्हें इतना गुस्सा आया कि सीएमओ साहब के पीछे गुंडे भिजवा दिये। अभी तो यह जाँच में स्पष्ट होगा कि सीएमओ साहब के साथ मारपीट हुई कि नहीं लेकिन कुछ तो ऐसी बात थी कि उन्हें अपना ऑफिस और सरकारी आवास छोड़कर भूमिगत होना पड़ा। मीडिया ने मामले को उछाल दिया तो कहानी में मोड़ आ गया। मुख्य मंत्री जी को मन्त्री जी से इस्तीफा लेना पड़ा। मन्त्रीजी उसके बाद भी मीडिया से पूछ रहे थे कि सीएमओ को मुझसे इतना ही डर था तो उन्होंने मेरे क्षेत्र में पोस्टिंग ही क्यों करायी। फिलहाल अंतिम सूचना यह है कि डॉक्टरों की भर्ती प्रक्रिया स्थगित कर दी गयी है और वहाँ के सभी महत्वपूर्ण अधिकारी, डीएम, एसएसपी, सीडीओ, सीएमओ आदि हटा दिये गये हैं।
सरकार जो नियम बनाती है उसका पालन करना कार्यपालिका यानि प्रशासनिक विभाग का काम है लेकिन नियमों का उल्लंघन होता रहता है। ब्यूरोक्रेसी के भीतर राजनीतिक फाँट देखी जा सकती है। माननीय मन्त्रीगण और उनके अनुयायियों द्वारा सरकारी तंत्र का उपयोग जनहित के बजाय निजी हित में किये जाने की चर्चा आम हो गयी है। अपने लोगों को सरकारी ठेके या अन्य लाभ के पद दिलाने के लिए अधिकारियों को डराना धमकाना अब सामान्य बात है। अधिकारीगण माननीयों को प्रसन्न रखने में हलकान हुए जा रहे हैं। जो चतुर हैं वे इसी राजनीतिक आड़ में अपना उल्लू सीधा करने में प्रवीण हो चुके हैं।
किसी संस्था का अंग होकर कार्य करने के लिए हमें संस्था द्वारा वेतन भत्तों के अलावा अनेक सुविधाएँ दी जाती हैं। इसके बदले संस्था हमसे यह अपेक्षा करती है कि हम संस्था के उद्देश्यों व लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए ईमानदारी से प्रयास करें। प्रबंधन या अधिकारी वर्ग से ऐसे निर्णयों की अपेक्षा की जाती है जो इन लक्ष्यों और उद्देश्यों की प्राप्ति की राह आसान बनायें, कार्मिकों की कार्यक्षमता का सही उपयोग हो सके, न्यूनतम आर्थिक लागत पर अधिकतम उत्पादन या सेवा प्राप्त हो सके और दक्षता में वृद्धि हो। सरकारी प्रतिष्ठानों में मितव्ययिता के साथ-साथ जनहित के उद्देश्य को भी बहुत महत्व दिया जाता है; भले ही इसपर व्यय कुछ अधिक हो जाय।
निजी संस्थाओं के बारे में तो मुझे ज्यादा नहीं पता लेकिन सरकारी विभागों में जो स्थिति है वह प्रो-एक्टिव होकर कार्य करने लायक नहीं रह गयी है। साथी अधिकारियों या सीनियर्स द्वारा कई बार  सकारात्मक सक्रियता को पागलपन या बेवकूफ़ी का नाम देकर ऐसा करने वाले अधिकारी को अपनी फिक्र करने की सलाह दी जाती है। बताया जाता है कि होम करने में हाथ जला बैठोगे। जो भी करो अपने को बचाकर करो। ऐसा कुछ भी मत करो जिसकी जिम्मेदारी तुम्हारे सिर पर डाली जा सके। अच्छा काम हो या बुरा काम इससे फ़र्क नहीं पड़ता। यदि एक बार इसकी जिम्मेदारी आपके सिर पर डाल दी गयी तो आगे चलकर आपको जाँच प्रक्रिया से गुजरना ही पड़ेगा और आप लाख सफाई देते रहोगे कुछ न कुछ छींटे आपके दामन पर पड़ ही जाएंगे। सरकारी कामकाज के बारे में आम छवि इतनी दूषित हो चुकी है कि कोई मुद्दा उठने पर सहज ही यह मान लिया जाता है कि गड़बड़ और धाँधली तो जरूर हुई होगी। 
काजल की कोठरी में कैसोहू सयानो जाय एक लीक काजल की लागिहें पै लागिहैं 
अब यह सयानापन दिखाने की प्रवृत्ति इस कदर बलवती हो गयी है कि जिन अधिकारियों को अपना दामन साफ रखने की चिन्ता है वे यथासंभव अपने को किसी भी निर्णय से दूर रखने की कोशिश करते हैं। प्रकरण की महत्ता, अनिवार्यता और और उसमें निहित जनहित के तत्व से ज्यादा वे इस बात पर ध्यान लगाते हैं कि कैसे इसपर कोई भी निर्णय लेने से बचा जा सकता है। भले ही यह निर्णय लेना उनकी ड्यूटी का अविभाज्य अंग हो; लेकिन यदि इससे बचने की कोई सूरत मौजूद है तो उसे जरूर अपनाएंगे। 
कभी कभी तो ऐसी हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि कोई बड़ा निर्णय लेने के लिए फाइल मेज पर आते ही साहब की तबियत बिगड़ जाती है और वे छुट्टी पर चले जाते हैं। यह स्थिति तब शर्मनाक हद पार कर जाती है जब यह छुट्टी तबतक बढ़ायी जाती है जबतक कोई जूनियर इन्चार्ज अधिकारी उसपर दस्तखत करके फाइल निस्तारित न कर दे। कभी-कभी ऐसी फाइलें महीनों धूल खाती रहती है। भले ही सरकार का या किसी और का लाखों का नुकसान हो जाय, लेकिन अपनी बचत पुख़्ता रखने के लिए जरूरी निर्णय भी नहीं लेने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है।
सरकारी नौकरियों के लिए चयन की प्रक्रिया तो इतनी जोखिम वाली हो गयी है कि कोई साफ-सुथरा अधिकारी इस प्रक्रिया से कत्तई जुड़ना नहीं चाहता है। इस काम में इतना दबाव झेलना पड़ता है कि सामान्य ढंग से जीना मुश्किल हो जाता है। मोबाइल बन्द रखना पड़ता है, भूमिगत होना पड़ता है, सुरक्षा बढ़ानी पड़ती है। यदि यह सब करते हुए चयन का परिणाम घोषित करने में सफल हो गये तो असंख्य लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। नेता, मंत्री, उच्चाधिकारी, नातेदार, रिश्तेदार, सहयोगी, मित्र आदि में से कौन आपकी बखिया उधेड़ने को तैयार हो जाय यह कहा नहीं जा सकता। इस सारी मशक्कत से बचने का आसान उपाय यह है कि यह जिम्मेदारी अपने सिर पर लो ही मत। टालते जाओ, टालते जाओ और किसी मजबूर के सिर पर दे मारो जो इससे भाग न सके; या कोई ऐसा जबरदस्त फन्ने खाँ मिल जाय जो पूरी दबंगई से काम निपटाने, सारी चुनौतियों का सामना करने व उनका परिणाम भुगतने को तैयार हो। सच्चाई यह है कि ऐसा कलेजा बहुत कम लोगों के भीतर पाया जाता है। 
अलबत्ता कुछ बहादुर अधिकारी ऐसा बड़ा जिगरा लेकर अभी भी काम कर रहे हैं जो आये दिन अखबारों की सुर्खियाँ बनते हैं। कभी मार-पीट, कभी गुंडागर्दी, कभी ट्रैपिंग, कभी ट्रान्सफर, कभी एफ़.आई.आर. तो कभी विजिलेन्स जाँच के केन्द्र  में होकर भी वे बिन्दास आगे बढ़ रहे हैं। मुझे तो कभी-कभी उनके हौसले को सलाम करने का मन करता है।
(सत्यार्थमित्र)

रविवार, 30 सितंबर 2012

भ्रष्टाचार की संजीवनी तो जरूरी है

Corruptionलखनऊ से इलाहाबाद के लिए गंगा-गोमती एक्सप्रेस की यात्रा इस बार बहुत रोचक रही। लम्बी प्रतीक्षा के बाद पदोन्नति मिली तो उत्साह वश अपनी सेवा पुस्तिका पूरी कराकर मुख्यालय से संबंधित उस दफ़्तर तक इसे स्वयं पहुँचाने चल पड़ा था जहाँ से मेरी सेवा के क्लास-वन ऑफीसर्स की वेतन पर्ची जारी होती है। इसी बहाने इलाहाबाद के अपने कुछ मित्रों व सहकर्मियों से मिलने-जुलने की इच्छा भी पूरी हो जाती।

संयोग से अगले दिन इलाहाबाद में प्रदेश के सरकारी डिग्री कालेजों में प्रवक्ता पद की कोई परीक्षा होनी थी इसलिए पूरी गाड़ी के साथ-साथ उस ए.सी. चेयरकार में बहुत से परीक्षार्थी भी बैठे हुए थे। इनमें अधिकांश पी-एच.डी. कर चुके होंगे या कर रहे होंगे। यू.जी.सी. की नेट परीक्षा (National Eligibility Test)  तो सबने पास की ही होगी। ये बड़ी उम्र के लड़के-लड़कियाँ उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने का सपना लिये एक स्क्रीनिंग टेस्ट देने जा रहे थे। अधिकांश के हाथ में नोटबुक या कोई गाइडबुक थी जिसे वे अंतिम समय तक पढ़ने वाले थे। कुछ शादी-शुदा लड़कियाँ अपने पति, भाई या पिता के साथ जा रहीं थीं। इस टेस्ट में जो पास हो जाएंगे उनका साक्षात्कार होगा। साक्षात्कार में सफलता का जो मंत्र इन लोगों की चर्चा में सुनने को आया वह एक ऐसे तंत्र के बारे में था जो अभ्यर्थी की मेरिट और विषय में योग्यता के बजाय दूसरी क्षमताओं को चयन का आधार बनाता था। पैसा और पहुँच के बिना सफलता की आशा करने वाले न के बराबर थे। मुझे झटका लगा। चकित भाव से मैंने उन्हें अपने अनुभव के बारे में बताया कि कैसे एक साधारण परिवार से आकर बगैर किसी उत्कोच या सिफारिश के लोक सेवा आयोग द्वारा मैं एक राजपत्रित सेवा के लिए चयनित कर लिया गया था। इसपर उन्होंने यह माना कि आयोग में पी.सी.एस. की मुख्य परीक्षा तो लिखित होती है और साक्षात्कार पर सबकुछ निर्भर नहीं होता। इसलिए वहाँ अभी गनीमत है, लेकिन जहाँ सबकुछ इण्टरव्यू पर निर्भर है वहाँ हालत बहुत खराब है।

मैंने अशासकीय विद्यालयों के शिक्षकों के चयन के लिए माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड और  उच्च शिक्षा सेवा आयोग में धाँधली की बातें सुन रखी थीं लेकिन लोक सेवा आयोग में भी इस बीमारी ने पैर पसार रखे हैं यह सुनकर चिन्ता हुई। मैं सोचने लगा कि क्या इस संवैधानिक संस्था से भी अब मेहनतकश होनहार अभ्यर्थियों को निराशा ही हाथ लगेगी। आयोग के माननीय सदस्य क्या हमारे पतनोन्मुख समाज की प्रतिच्छाया बनते जा रहे हैं?

एक तरफ कुछ सरकारी महकमें के लोग बैठे थे जो सरकारी अफसरों की अलग-अलग श्रेणियों का बखान कर रहे थे। वे इन परीक्षार्थियों को यह समझा रहे थे कि केजरीवाल जैसे लोगों के बहकावे में मत आयें। सरकारी नौकरी करनी है तो प्रैक्टिकल एप्रोच अपनाएँ। नौकरी पाने के लिए आपको जो रास्ता अपनाना पड़ रहा है वही आगे भी काम आएगा। अन्तर यह है कि अभी आप बेरोजगार हो और मजबूर हो। नौकरी पाने के बाद आप प्रिविलेज्ड क्लास में शामिल हो जाओगे। …अन्ना जी आन्दोलन तो कर सकते हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना भी  उभार सकते हैं लेकिन जब इसको मिटाने के लिए सही आदमी तलाशने जाओगे तो कोई नहीं मिलेगा।  …सरकारी सिस्टम में रहते हुए जो ईमानदारी की कोशिश करता है उसको इतनी अधिक समस्याएँ झेलनी पड़ती हैं कि वह अन्ततः टूटकर सरेन्डर कर देता है या समाज में उपेक्षित होकर डिप्रेसन का शिकार हो जाता है। कुछ नौजवान इस बात पर अविश्वास में सिर हिला रहे थे।

इसपर मुझे पिछले दिनों लखनऊ की एक घटना याद आ गयी जिसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अचानक अपने ऑफिस में मीडिया को बुलाकर कैमरे के सामने अपनी दर्द भरी दास्ताँ सुना दी थी कि कैसे उनके ऊपर उच्चाधिकारियों द्वारा गलत काम करने का दबाव बनाया जा रहा है और इन्कार करने पर भयंकर उत्पीड़न किया जा रहा है। मीडिया ने जब उस उच्चाधिकारी से दरियाफ़्त की तो पता चला कि उन्होंने इन्हें मानसिक अवसाद का शिकार बता दिया और उनको अस्पताल भेजने की सलाह दे डाली।

“भाई साहब यह प्रैक्टिकल एप्रोच क्या होता है?” पीछे से एक उम्रदराज दढ़ियल अभ्यर्थी ने अपनी कॉपी में से सिर उठाकर पूछा। महौल में ठहाके की आवाजें भर गयीं।

रिटायरमेन्ट के करीब लग रहे एक बुजुर्गवार ने अपने अनुभव की टोपी उतारते हुए मुड़कर देखा और बताने लगे- देखो भाई जब सरकारी नौकरी करोगे तो इसकी हर रोज जरूरत पड़ेगी। इसके बिना नौकरी कर ही नहीं पाओगे। प्रैक्टिकल एप्रोच नहीं रखोगे तो चारो ओर से परेशान रहोगे।

प्रश्नकर्ता अपनी सीट से उठकर इनके पास आ गया। इन्होंने आगे समझाया- एक सरकारी कर्मचारी को लोकसेवक कहा जाता है और उसके आचरण की एक नियमावली बनायी गयी है। इस नियमावली का पालन नहीं करने पर आपको चेतावनी से लेकर निन्दा प्रविष्टि तक दी जा सकती है और डिमोशन से लेकर बर्खास्तगी तक की जा सकती है। इससे बचने के लिए आपको आदर्श आचरण का पालन करना होता है; लेकिन केवल कागज में, क्योंकि असल व्यवहार में तो यह संभव ही नहीं है। जो असल में कोशिश करता है वह असल में ‘सस्पेन्ड’ हो जाता है। कारण यह है कि नियम से काम करने पर और अपने पद की सारी जिम्मेदारी पूरा करने पर आप बाकी सबलोगों के लिए परेशानी खड़ी कर देते हैं। दूसरों की लूट-खसोट पर ब्रेक लगाकर आप ज्यादा समय तक टिक नहीं सकते। इनका तगड़ा गिरोह आपको हिला देगा…।

इस प्रवचन के श्रोताओं की संख्या बढ़ती जा रही थी।

…आप बहुत अच्छा काम करेंगे तो बाकी नक्कारों की कलई खुलने लगेगी और वे आप के ऊपर नाराज हो जाएंगे। आपके ईमानदार होने से सिस्टम में थोड़ी बहुत हलचल तो हो सकती है लेकिन कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हो पाएगा। …यह समाज भ्रष्टाचार का इतना आदती हो चुका है कि आपको ‘एलियन’ समझकर किनारे कर देगा। …आप जिनका खेल बिगाड़ेंगे वे आपको यूँही नहीं छोड़ देंगे। आपकी कुर्बानी ले ली जाएगी। …आपके बीबी-बच्चे आपको नकारा समझेंगे। आप उनके लिए महंगे खिलौने, कीमती कपड़े और भारी गहने नहीं खरीद पाएंगे तो आपको वे आदर्श पिता या पति नहीं समझेंगे। दूसरे रिश्तेदार भी आपको किसी काम लायक नहीं देखेंगे तो मुँह मोड़ लेंगे। …मैं यह नहीं कह रहा कि आप आकंठ भ्रष्टाचार में डूब जाएँ। लेकिन इससे बचकर रहना बहुत मुश्किल है। इसलिए आप भले ही किसी का गला न काटें, गबन और घोटाला न करें, गरीबों का हक न छीनें लेकिन सिस्टम के खिलाफ उल्टी धारा बहाने की कोशिश भी न करें। आपको चोरी नहीं करनी है तो न करें लेकिन दूसरों की राह का रोड़ा भी न बनें।

लेकिन प्रैक्टिकल एप्रोच क्या है श्रीमन्‍, यह तो क्लीयर कीजिए…! एक किशोर ने चुहल की।

आप अभी भी नहीं समझे? तो साफ-साफ जान लीजिए कि प्रैक्टिकल एप्रोच इस बात में विश्वास करना है कि बिना भ्रष्टाचार के यह वास्तविक दुनिया चलने वाली नहीं है। व्यावहारिक रूप से किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार को स्वीकारना पड़ेगा। इसके बिना जीवन चलाना असम्भव है। यह एक ऐसी संजीवनी है जो आदमी को जीने की राह दिखाती है, निराश व्यक्ति को सफलता के सूत्र पकड़ाती है, बेमौत मरने वाले को नया जीवन देती है और साधारण को असाधारण बना देती है। आप देखिए न एक साधारण सी कुरूप दलित स्त्री को महल की महारानी बनाकर तमाम ऐश्वर्य और सुख साधन की स्वामिनी बना दिया इस शक्ति ने।

वहाँ की चर्चा रोचक होती जा रही थी। एक विशेषज्ञ ने तो यहाँ तक कह दिया कि जो अधिकारी सुविधा शुल्क लेकर समय से सही काम कर दे वह उस कथित ईमानदार से बेहतर है जो पैसा तो नहीं लेता है लेकिन काम का निपटारा करने में भी कोई रुचि नहीं लेता है। इसपर लगभग एक राय बनती दिखी। इसपर एक गणित के विद्यार्थी ने अधिकारियों की ग्रेडिंग के लिए एक चार्ट बनाना शुरू कर दिया। पैसा लेने वाले, पैसा न लेने वाले, सही काम करने वाले या न करने वाले तथा गलत काम करने वाले या न करने वाले अधिकारियों के क्रमचय-संचय (permutation-combination) के द्वारा निम्न श्रेणियाँ निकलकर आयीं :

क्र.

पैसा लेना

सही काम करना

गलत काम करना

श्रेणी

1

N

Y

N

उत्कृष्ट

2

Y

Y

N

उत्तम

3

Y

Y

Y

भ्रष्ट/लोभी

4

Y

N

N

धुर्त/लतखोर

5

Y

N

Y

महाभ्रष्ट

6

N

Y

Y

मूर्ख

7

N

N

Y

महामूर्ख

8

N

N

N

निकृष्ट

इस प्रकार श्रेणियों की चर्चा में प्रत्येक श्रेणी के अधिकारियों के उदाहरण पेश किये जाने लगे। मैं सहमा सा चुपचाप सुनता रहा; और अपने आसपास के अधिकारियों में भी ऐसे उदाहरण खोजता रहा। मेरे पन्द्रह साल के सरकारी अनुभव में लगभग सभी प्रकार के अधिकारी और कर्मचारी देखने-सुनने को मिले हैं। इसी विचार मंथन में डूबा था कि अचानक प्रयाग स्टेशन पर गाड़ी रुकी और मैंने हड़बड़ाकर अपना बैग उठा लिया और बोगी से बाहर आ गया…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)