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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

राष्ट्रीय सेमिनार लाइव... डेटलाइन- कल्याण (मुम्बई) भाग-II

भोजनावकाश के बाद प्रथम चर्चा सत्र प्रारम्भ हो चुका है। मंच पर विशिष्ट जन आसन जमा चुके हैं। इस सत्र में चर्चा का विषय है- हिंदी ब्लॉगिंग : सामान्य परिचय



इस विषय पर चर्चा हेतु गठित पैनेल इस प्रकार है :

अध्यक्ष : डॉ.आर.पी.त्रिवेदी (पूर्व प्राचार्य, बिड़ला कॉलेज)

विषय विशेषज्ञ : अविनाश वाचस्पति (दिल्ली), रवीन्द्र प्रभात (लखनऊ)

विशेष अतिथि : आलोक भट्टाचार्य (मुम्बई), डॉ. वी.के. मिश्रा (झाँसी)

प्रपत्र वाचक : डॉ. संगीता सहजवानी, डॉ. शशि मिश्रा (मुम्बई), डॉ. पवन अग्रवाल (लखनऊ), डॉ. संगीता सहजवानी (मुम्बई) नरेन्द्र नारायण प्रभू (मुम्बई)

सत्र संयोजक : डॉ.आर.बी.सिंह (उप प्राचार्य, के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय)

डॉ. संगीता सहजवानी जी अपना प्रपत्र पढ़ रही हैं। बहुत उम्दा प्रस्तुति है “अंतरराष्ट्रीय चौपाल पर आप सब आमन्त्रित हैं” बहुत अच्छी बातें। समेटना मुश्किल है। कह रही हैं अकेलेपन का दुश्मन है ब्लॉग। वाह!

***
पुनश्च,

अभी अभी डॉ. शशि मिश्रा जी ने अपना सुन्दर वक्तव्य समाप्त किया। बोलीं- मैने जब पहली बार मनीष से इस सेमिनार की चर्चा सुनी तो पूछा कि ‘यह ब्लॉगिंग किस चिड़िया का नाम है?’ लेकिन जब इस माध्यम के बारे में जानना चाहा तो बस डूबती चली गयी। उन्होंने बहुत साहित्यिक गाम्भीर्य से अपना अध्ययन पत्र रखा। अनेक ब्लॉग्स का उद्धरण दिया। इसी क्रम में उन्होंने रचना त्रिपाठी के ब्लॉग से यह उद्धरण भी दिया

हम और विरना खेले एक साथ,
खेले एक साथ अम्मा खायें एक साथ ।
विरना कलेवा अम्मा हँसी-हँसी देबो,
हमरा कलेवा तुम दीजो रिसियायी।

मैं खुश हो गया। कारण को बगल में बैठी अनिता कुमार जी ने सबसे जाहिर कर दिया। वक्ता को टोकते हुए बोलीं- रचना त्रिपाठी इनकी पत्नी हैं। शशि जी ने मंच से तुरन्त कहा - यही तो ब्लॉग की अद्‌भुत बात है, हम व्यक्ति को नहीं जानते लेकिन उसके विचारों से जुड़ जाते हैं। उन्होंने रचना जी को अपनी ओर से बधाई और धन्यवाद ज्ञापित करने का मुझसे अनुरोध किया। यह दायित्व मैं यहीं से पूरा करता हूँ।

अब डॉ. पवन अग्रवाल अपना शोध पत्र व्याख्यायित कर रहे हैं। कह रहे हैं कि ब्लॉग की तुलना पारम्परिक डायरी से मत करिए। यह उससे आगे की चीज है। ऐसी तुलना हमें दोयम दर्जे का बताती है। उन्होंने किसी विद्वान साहित्यकार का वक्तव्य दोहराया कि ब्लॉग का एक फायदा यह है कि प्रकाशन के योग्य न लिख पाने वालों की बातों से अब हंस जैसी पत्रिकाओं के संपादक को अपना कान नहीं खिलाना पड़ेगा। लेकिन अब स्थिति यह है कि हंस में ही यह प्रकरण पीछे हो गया है और ब्लॉग विषयक आलेख वहाँ प्रकाशित हो रहे हैं। वे आगे चलकर अनेक ख्यातिनाम ब्लॉग्स का परिचय करा रहे हैं।जैसे; अक्षरग्राम, मोहल्ला, वाटिका, गवाक्ष, शब्दों का सफर, प्रभाकर गोपालपुरिया का भोजपुरी ब्लॉग, रचनाकार, कबाड़खाना,पिताक्षरी कई रचनाएँ, अनुगूँज इत्त्यादि।

अब बस्ती से आये डॉ. बलजीत श्रीवास्तव जी भी ब्लॉगिंग के स्वरूप पर अपना पर्चा पढ़ना शुरू कर दिया है...

इस कार्यक्रम की लाइव स्ट्रीमिंग (वीडियो) भी हो रही है। यहाँ देखें

अब विषय विशेषज्ञ रवीन्द्र प्रभात बोल रहे हैं

ऊपर: रवीन्द्र प्रभात, नीचे (अगली पंक्ति में) अनिता कुमार, शैलेश भारतवासी, रवि रतलामी, केवलराम

पुनश्च,
रवीन्द्र प्रभात जी ने कुछ पूर्व वक्ताओं की बातों में संशोधन प्रस्तुत किया। जैसे ब्लॉग को दोयम दर्जे का कतई न मानें, ब्लॉगों की संख्या हिन्दुस्तान में कुल पाँच लाख हो सकती है किन्तु अकेले हिंदी में नहीं। कुछ तर्क-वितर्क भी हुए। रवि रतलामी जी ने बीच बचाव किया। अंतिम समाधान अभी नहीं निकला है।
इस मुद्दे को यहीं छोड़कर रवीन्द्र जी BLOG की व्याख्या कर रहे हैं

B= Brief, L=Logical, O=Operational, G=Genuine
(इस व्याख्या में जो नियम बताये गये हैं उनकी संख्या से ज्यादा उनके अपवाद दिखते हैं क्या ब्लॉगजगत में? मुझे नहीं पता...  :D)
इन्हीं शब्दों की विशद व्याख्या करते हुए रवीन्द्र जी ने अपनी बात पूरी की, अन्त में यह जोड़कर कि - शुरू-शुरू में मुझे भी ब्लॉग बनाना नहीं आता था। १९९५ में  २००५ में। मुझे बसन्त आर्य ने ब्लॉग बनाकर दे दिया था। लेकिन आज मेरी दो-किताबे और अलेक्सा रैंकिंग में १३वें स्थान का ब्लॉग परिकल्पना मेरे नाम से दर्ज है। आप मुझसे से भी बड़ा ब्लॉगर बन सकते हैं। शुरुआत छोटी ही होती है। धीरे-धीरे बड़ा काम अन्जाम दे दिया जाता है।

अब तेताला और नुक्कड़ वाले अविनाश जी बोल रहे हैं।
अविनाश जी चाहते हैं कि जितने लोगों के पास मोबाइल है कम से कम उतने लोगों के पास ब्लॉग भी होना चाहिए। (जिनके पास एक से ज्यादा मोबाइल है उनके पास एक से ज्यादा ब्लॉग भी होने चाहिए ) घर-घर में ब्लॉग होना चाहिए। प्राइमरी कक्षाओं के पाठ्यक्रम में इसको अनिवार्य रूप से शामिल किया जाय। सभी कॉलेजों में ऐसे सेमिनार आये दिन होने चाहिए, आदि-आदि। जय-जय ब्लॉगिंग।

उनके बाद अध्यक्षीय वक्तव्य मुम्बई के आलोक भट्टाचार्य जी द्वारा दिया जा रहा है। वे बोलने से ज्यादा मंत्रमुग्ध लग रहे हैं। बड़े खुश हैं। कह रहे हैं कि नये नये लोगों ने कितने नये और उत्तम विचार दिए हैं, यह देखकर मन आह्लादित है। लेकिन कुछ खतरे और कमजोरियाँ भी हैं। उन्होंने इशारे से बताया कि कैसे एक केंद्रीय मंत्री की इच्छा हो गयी तो बहुत सारे पेज रातो-रात फेसबुक से गायब हो गये। हमें स्वतंत्रता मिली है तो हमें अपना उत्तरदायित्व भी समझना चाहिए। उन्होंने ब्लॉग के लिए चिट्ठा शब्द के प्रयोग पर असहमति जतायी। बोले इससे भंडाफोड़ करने की बात इंगित होती है जो बहुत सीमित और नकारात्मक अवधारणा है।
उन्होंने मेरी लाइव रिपोर्टिंग पर भी आश्चर्य व्यक्त किया। अचम्भित थे।


अगला सत्र चाय विश्राम के बाद शुरू होगा जिसमें मुझे मंच पर बैठना होगा। इसलिए उसके बारे में बात में बात हो पाएगी। अभी इतना ही। नमस्कार धन्यवाद।

(...जारी)

राष्ट्रीय सेमिनार लाइव... डेटलाइन - कल्याण (मुम्बई)

आज हम मुम्बई पहुँच गये हैं। यह ब्लॉगरी जो न जगह दिखाए। जी हाँ, हम ब्लॉगरी की डोर पकड़कर अपने घर से करीब डेढ़ हजार किलोमीटर दूर महाराष्ट्र के ठाणे जिले के कल्याण इलाके में एक महाविद्यालय में अपने ब्लॉगर मित्रों के साथ कुछ खास चर्चा के लिए इकठ्ठा हो गये हैं। किस-किसका जुटान हो चुका है यह बाद में। उद्‌घाटन सत्र शुरू होने जा रहा है। उसके पहले पहली किश्त ये रही...


(बाएँ से (खड़े हुए) केवलराम, डॉ.अशोक कुमार मिश्र, अविनाश वाचस्पति, डॉ.हरीश अरोरा, चन्द्र प्रकाश मिश्र
बाएँ से (बैठे) सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, रवीन्द्र प्रभात, अनिता कुमार, रवि रतलामी)

पुनश्च :
के.एम.अग्रवाल कला, वाणिज्य एवम्‌ विज्ञान महाविद्यालय, कल्याण (प.) के हिंदी विभाग द्वारा यू.जी.सी. के संपोषण से  हिंदी ब्लॉगिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएँ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्री संगोष्ठी का उद्घाटन कार्यक्रम प्रगति पर है। संस्था की प्राचार्य डॉ.अनिता मन्ना ने अतिथियों का औपचारिक स्वागत किया। संयोजक मनीष मिश्र ‘मुन्तज़िर’ अतिथियों को पुष्पगुच्छ इत्यदि से स्वागत का संचालन कर रहे हैं।

मंचासीन (उद्‌घाटन सत्र) : डॉ. आर.बी. सिंह संस्था के अध्यक्ष, विजय नारायण पंडित- सचिव, दामोदर खडसे- अध्यक्ष- महाराष्ट्र साहित्य अकादमी, डॉ. विद्याबिन्दु सिंह पूर्व निदेशिका उ.प्र. हिंदी संस्थान, डॉ. रामजी तिवारी, अध्यक्ष हिंदी विभाग मुम्बई विश्वविद्यालय, राजमणि त्रिपाठी, उप संपादक, नवभारत टाइम्स, मुम्बई, रविरतलामी-भोपाल

पुस्तक लोकार्पण हो गया :
नाम: हिंदी ब्लॉगिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएँ
पृष्ठ २७०, मूल्य : अघोषित
प्रकाशक : के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण(प)
संपादक : डॉ. मनीष मिश्र ‘मुन्तज़िर’
यह पुस्तक इस विषय पर प्रकाशित तीसरी महत्वपूर्ण पुस्तक है। इसमें करीब ४० ब्लॉगर्स के आलेख और शोधपत्र संकलित हैं

संस्था द्वारा कुछ ब्लॉगर मित्रों को अपने मंच पर ‘ब्लॉगभूषण सम्मान’ से सम्मानित किया। सम्मान सवरूप इन्हें प्रशस्ति पत्र, पुष्पगुच्छ व शाल भेंट की गयी।

जो सम्मानित हुए उनके नाम हैं : रवि रतलामी, रवीन्द्र प्रभात, अविनाश वाचस्पति, सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, शैलेश भारतवासी, डॉ. हरीश अरोरा एवम्‌ डॉ. अशोक कुमार मिश्र।


अविनाश वाचस्पति

डॉ.हरीश अरोरा

रवि रतलामी

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

रवीन्द्र प्रभात

बीज वक्तव्य:
रवि रतलामी जी ने अपना पावर प्वाइंट प्रस्तुतिकरण दिया। ब्लॉगरी के इतिहास, भूगोल, और समाजशास्त्र के बारे में उनके विचार आप सभी इन पृष्ठों पर पढ़ चुके हैं लेकिन आज उन्होंने फिरसे बहुत ही अपडेटेड और गम्भीर जानकारी उपस्थित श्रोताओं को दी।

उद्‌घाटन सत्र में वक्ताओं ने जिस गहनता से अपनी बात रखी और श्रोताओं ने जिस तल्लीनता से उन्हें सुना उसका अन्दाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उद्‌घाटन सत्र के बाद का प्रथम चर्चा सत्र जो भोजनावकाश से पूर्व निर्धारित था उसका समय भोजनावकाश के बाद के लिए स्थगित करना पड़ा।




 भोजन बहुत ही जायकेदार था। सबने छक कर खाया। अशोक जी और रवीन्द्र जी ने अपना खाना खत्म करके सभागार (वाचनालय) के दरवाजे पर अगले सत्र के शुभारम्भ की प्रतीक्षा बेसब्री से करने लगे।


अगला सत्र जल्दी शुरू करो भाई। बहुत से प्रपत्र वाचन होने हैं।
(प्रथम भाग समाप्त)

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

अंततः हम गए, लेकिन…

पिछले दिनों क्वचिदन्यतोऽपि की अचानक गुमशुदगी की सूचना चारो ओर फैल गयी। हिंदी ब्लॉग जगत के सबसे सक्रिय ब्लॉग्स में से एक अचानक गायब हो गया। इंटरनेट के सागर में इतने बड़े ब्लॉग का टाइटेनिक डूब जाय तो हड़कंप मचनी ही थी। बड़े-बड़े गोताखोर लगाये गये। महाजालसागर को छाना गया। कुछ चमत्कार कहें कि डॉ. अरविंद मिश्रा की लम्बी साधना का पुण्य प्रताप जो बेड़ा गर्क होने से बच गया। सच मानिए उनकी पोस्ट पढ़कर मेरे पूरे शरीर में सुरसुरी दौड़ गयी थी। यह सोचकर कि ऐसी दुर्घटना यदि मेरे साथ हो गयी तो मैं इससे हुए नुकसान का सदमा कैसे बर्दाश्त करूंगा? गनीमत रही कि जल्दी ही निराशा के बादल छँट गये और ब्लॉग वापस आ गया।

इस घटना का प्रभाव हिंदी ब्लॉगजगत में कितना पड़ा यह तो मैं नहीं जान पाया लेकिन इतना जरूर देखने को मिला कि गिरिजेश जी जैसे सुजान ब्लॉगर ने आलसी चिठ्ठे का ठिकाना झटपट बदल कर नया प्लेटफॉर्म चुन लिया। कबीरदास की साखी याद आ गयी।

बूड़े थे परि ऊबरे, गुरु की लहरि चमंकि।
भेरा देख्या जरजरा,  ऊतरि पड़े फरंकि॥

मुझे ऐसा करने में थोड़ा समय लगा क्योंकि तकनीक के मामले में अपनी काबिलियत के प्रति थोड़ा शंकालु रहता हूँ। लेकिन मुख्य वजह रही मेरी ब्लॉगरी के प्रति कम होती सक्रियता। इस बात से दुखी हूँ कि इस प्रिय शौक को मैं पूरी शिद्दत से अंजाम नहीं दे पा रहा हूँ। आज मैंने थोड़ा समय निकालकर इस सुस्त पड़ी गाड़ी को आगे सरकाने की कोशिश की। वर्डप्रेस पर आसन जमाने का उपक्रम किया और यह पोस्ट लिखने बैठा।

इस पोस्ट को लिखने के बीच में जब मैने ‘आलसी का चिठ्ठा’ खोलकर उस स्थानान्तरण वाली पोस्ट का लिंक देना चाहा तो फिर से चकरा गया। महोदय वापस लौट आये हैं। पुराना पता फिर से आबाद हो गया है। वर्डप्रेस के पते पर एक लाइन का संदेश भर मिला है। पूरी कहानी उन्हीं की जुबानी सुनने के लिए अब फोन उठाना होगा।

फिलहाल जब इतनी मेहनत करके नये ठिकाने पर एक नया टेम्प्लेट बना ही लिया है तो इस राम कहानी को ठेल ही देता हूँ। इस नये पते को कम ही लोग जानते होंगे। जो लोग वहाँ तक चले जाएंगे उन्हें बता दूँ कि मेरा मूल ब्लॉग सत्यार्थमित्र ब्लॉगस्पॉट के इस मंच पर पिछले पौने-चार साल से बदलती परिस्थितियों के अनुसार मद्धम, द्रुत या सुस्त चाल से चल रहा है। अब लगता है कि फिलहाल यहीं चलता रहेगा। जानकारों की राय लेकर ही कोई बड़ा कदम उठाऊँगा। यह बात दीगर है कि आदरणीय अरविन्द जी की खोज -बी.पी.आई.- की गणित में अपना स्थान मिस हो गया है।Smile

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)