हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

बुधवार, 8 जून 2011

नयी कहानी - मोहन बाबू

मित्रों,

लम्बे अंतराल के बाद आना हुआ। कुछ संयोग ही ऐसा बन पड़ा कि कोलकाता यात्रा का फल अधर में अटक गया और हमारी ब्लॉगरी भी मद्धम पड़ गयी। फिल्म अभिनेता उत्तम कुमार जी की पत्नी सुप्रिया जी का जो मकान हम क्षेत्रीय केंद्र के लिए पसन्द कर आये थे उसे ज्यादा किराया देकर किसी बैंक ने हथिया लिया। हमारी मेहनत व्यर्थ हो गयी।

पिछली पोस्ट में जो चित्र पहेली पूछी गयी थी उसका सही जवाब कोलकाता वासी मनोज कुमार जी ने दे दिया था। उम्मीद के मुताबिक ही कुछ लोग गलत लेकिन बेहद रोचक जवाब के साथ भी आये। वैसे तो हम गर्मियों में काले पके हुए जामुन का फल सीधे पेड़ से तोड़कर खाने का मजा ले चुके हैं लेकिन मुझे यह फल इस रूप में पहली बार कोलकाता में ही देखने को मिला। कौतूहलवश मैने इसे सौ रूपये किलो की दर से खरीद तो लिया लेकिन इसे मेज पर सजाने और फोटू खींचने में ही अच्छा लगा। खाने में तो यह बिल्कुल बेस्वाद और फीका ही था। अलबत्ता इसमें बीज नहीं होने से इसे बुजुर्गों और बिना दाँत वालों को आसानी से खिलाया जा सकता है।

080520111145जी हाँ, यह जामुन का फल है जो मुझे कोलकाता में मिला 080520111146इसमें कोई बीज नहीं है, न ही कोई स्वाद या मिठास ही

 

पिछली रामकहानी को यहीं विराम देते हुए आज पेश कर रहा हूँ बिल्कुल ताजी लिखी कहानी। इतना बताता चलूँ कि इस कहानी के पात्र मेरी कल्पना की उपज हैं। यदि कोई वास्तविक घटना या किसी व्यक्ति की कहानी इससे मिलती-जुलती पायी जाय तो इसे मात्र संयोग समझा जाय।

कहानी
मोहन बाबू

राम मोहन सक्सेना के भाग्य को सराहने वालों की कमी नहीं थी। वे थे तो राज्य सरकार के आबकारी महकमें के एक अदने से मुलाजिम लेकिन इस छोटी सी नौकरी से उन्होंने काफी अच्छी हैसियत बना ली थी। उनके दोनो बेटे अपनी पढ़ाई में अव्वल रहे और इन्जीनियरिंग कॉलेज से निकलकर बड़ी कंपनियों में मोटा पैकेज पा चुके थे। बड़े बेटे ने तो अमेरिका जाकर एम.बी.ए. कोर्स पूरा किया और अपनी कंपनी का सी.ई.ओ. हो गया था। बेटियों ने मेडिकल की पढ़ाई की। एम.बी.बी.एस. पूरा कराने के बाद मोहन बाबू ने उनकी पसंद की शादी कर दी। बड़ा दामाद जर्मनी में सरकारी मेडिकल रिसर्च इन्स्टीट्यूट में ज्वाइंट डाइरेक्टर था और छोटा दामाद आस्ट्रेलिया में सिविल सर्जन था।

जब छोटे बेटे प्रशांत ने विदेशी नौकरी के बजाय भारत में ही विप्रो की नौकरी चुनी तो पूरे स्टाफ ने मोहन बाबू को बधाई दी। माँ-बाप की देख-भाल के लिए बेटे द्वारा किये गये इस त्याग की सर्वत्र सराहना हुई।

आबकारी दफ़्तर में मोहन बाबू बड़ा से बड़ा काम भी अपनी लगन और सूझ-बू्झ से आसान बना देते। उन्होंने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया। सबसे बड़ी विनम्रता से मिलते, उच्चाधिकारियों के आगे हाथ जोड़े रहते।  दफ़्तर में चारो ओर उनकी पूछ थी। मंत्री जी का दौरा हो या कलेक्टर साहब के घर होली की पार्टी हो, बड़े साहब लोगों के घर शादी-ब्याह में रंग जमाने का इन्तजाम करना हो या विभागीय समीक्षा बैठक में लक्ष्यों की पूर्ति का आँकड़ा तैयार करना हो, मोहन बाबू को ऐसा कोई भी काम सौंपकर अधिकारी आश्वस्त हो जाते कि विभाग की इज्जत रह जाएगी। वे हर काम इतनी चतुराई से करते कि विभाग की धाक तो जमती ही, खर्चा-पानी में से काफी कुछ बचा भी लेते। हर ठेकेदार मोहन बाबू के इशारे की ताक में रहता। रहे भी क्यों न, साहब लोग किसी भी फाइल का निपटारा उनकी राय के बिना नहीं करते थे। विभाग में नियुक्त आबकारी इन्स्पेक्टर मनचाहा हल्का पाने के लिए मोहन बाबू को ही खुश करने की जुगत भिड़ाते रहते। उनकी व्यवहार कुशलता और काबिलियत के कारण मंत्री जी भी उन्हें बखूबी पहचानने लगे थे। मोहन बाबू इस नजदीकी का फायदा भी मौके-बेमौके उठा लेते।

इन्ही जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए मोहन बाबू ने राजधानी के सबसे विकसित (पौश) इलाके में एक आलीशान महलनुमा घर खड़ा कर लिया था। शहर और गाँव में अनेक जमीनें खरीद डालीं। कितनों को नौकरी दिलवायी, ठेके में लगवाया। समृद्धि के सभी साधन जुटा लिए। जब मोहन बाबू की पत्नी कैंसर का शिकार होकर असमय चल बसीं तो उनके अंतिम संस्कार में पूरा शहर उमड़ पड़ा। जाने कितने मंत्री, विधायक, आइ.ए.एस. और पी.सी.एस. अफसर उनकी मातमपुर्सी में आये। बारह-तेरह दिन तक लाल-नीली बत्ती वाली गाड़ियों का आना-जाना लगा रहा। मोहन बाबू का संपर्क कितना विस्तृत और कितना प्रभावशाली था यह पहली बार सबके सामने प्रकट हो रहा था। विदेश से बड़ा बेटा सपरिवार आया था। अमेरिकन बहू और उसके सफ़ेद बालों वाले बच्चे सबकी विस्मृत निगाहों के केंद्र में थे। दोनो बेटियाँ भी अपने-अपने पति व बच्चों के साथ आयीं थीं। इन सबकी आव-भगत में दफ़्तर का अमला और छोटा बेटा प्रशांत लगा रहा। पहली बार पूरा घर भरा हुआ था। सबने खूब तस्वीरें खींचीं, वीडियो बनायी और तेरहवीं बीत जाने के बाद सभी अपने-अपने देश काम पर लौट गये।

मोहन बाबू ने भौतिक संसार की सभी सहूलियतें अपनी मेहनत और चतुराई से अर्जित कर ली थीं। यद्यपि मधुमेह, रक्तचाप और हृदयरोग की परेशानी नौकरी के अंतिम वर्षों में शुरू हो गयी थी, फिर भी वे सफलतापूर्वक सेवारत रहने के बाद अपनी अधिवर्षता आयु पूरी करके धूमधाम से सेवानिवृत्त हुए।

mohan babuविदाई समारोह में विभागीय सहकर्मियों ने मोहन बाबू को गुलाब और गेंदें की फूलमालाओं से लाद दिया। अधिकारियों ने इन्हें खूब सराहा और भविष्य का जीवन सुखमय और सानंद होने की शुभकामनाएँ दीं। जब सभी बोल चुके तो अंत में कार्यक्रम के संचालक और कर्मचारी संघ के अध्यक्ष ने मोहन बाबू से आशीर्वाद स्वरूप दो शब्द बोलने और अपने अनुभव के आधार पर छोटे भाइयों का मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। माइक पर मोहन बाबू ने भावुक भाषण दिया। सरकारी सेवा में अनुशासन, कर्तव्यपरायणता, सच्चाई, ईमानदारी, और विनम्रता के महत्व पर प्रकाश डाला और यह कहते हुए लगभग रो पड़े कि कल से जब मैं दफ़्तर आने के बजाय घर पर अकेला बैठ रहूँगा तो जीवन शायद बहुत कठिन हो जाएगा। लोगों ने उन्हें ढाँढस बँधाया और जरूरत पड़ने पर किसी को भी याद कर लेने की सलाह दी। मन बहलाने के लिए जब जी चाहे दफ़्तर आ जाने को कहा। चलते-चलते भेंट स्वरूप लाल कपड़े में लपेटकर गीता की पुस्तक व नक्काशीदार पॉलिश की हुई चमचमाती छड़ी दी गयी और रेशमी शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। उन्हें विभागीय कार से घर तक छोड़ा गया। कार के बोनट पर सैकड़ों फूलमालाएँ लाद दी गयीं थी।

पिता की सेवानिवृत्ति की खबर पाकर बेटियों ने फोन पर ‘विश’ किया। बड़े बेटे को वीक-एंड में फुर्सत मिली तो अमेरिका से एक घंटे तक बात करता रहा। उसने अपनी पत्नी और बच्चों से भी बात कराया। सबने ‘कांग्रेट्स’ और ‘टेक-केयर’ कहा। प्रशांत ने भी बंगलुरू से लखनऊ का बिजनेस टूर बनाया और पिता को अपनी सेहत का ख्याल रखने और फोन पर बात करते रहने की ताकीद कर गया। कंपनी में रिसेसन की वजह से छँटनी की कार्यवाही की संभावना की चर्चा की और जल्दी ही इस बारे में डिटेल में बात करने का वादा करके वापस चला गया। मोहन बाबू अपने आलीशान बंगले में अकेले रह गये।

नौकरानी समय से आती और झाड़ू-बुहारू करके व खाना बनाकर ढककर चली जाती। मोहन बाबू सुबह उठकर पार्क में टहलने जाते और दिनभर बेटे-बेटियों के फोन का इन्तजार करते और अखबार पढ़ते। समय के साथ फोन काल्स की आवृत्ति घटती जाती। सबकी अपनी-अपनी व्यस्तता थी जो लगातार बढ़ती जा रही थी। इसी बीच एक दिन प्रशांत ने फोन पर बताया कि उसकी विप्रो से छुट्टी हो गयी है और वह कनाडा की एक कंपनी में सीनियर सॉफ़्टवेयर एनलिस्ट के बड़े पैकेज पर ज्वाइन करने के लिए टोरंटो की फ्लाइट पकड़ने जा रहा है। सबकुछ इतना जल्दी हुआ कि उसे सोचने और बताने का मौका ही नहीं मिला। अभी वह अकेले जा रहा है। सब कुछ ठीक रहा तो तीन महीने बाद पत्नी और बच्चे को भी ले जाएगा। तबतक वे बंगलुरू में कंपनी के फ़्लैट में ही रह लेंगे।

तीन महीने बाद प्रशांत एक दिन के लिए अपनी पत्नी और दो साल के बच्चे के साथ आया और पिता को ढाढस बँधाकर कनाडा चला गया। उसने यह कहा कि जब भी कोई जरूरत हो वे निस्संकोच उसे फोन करके बता दें। वह हर संभव कोशिश करके उनकी मदद करेगा। उधर प्रशांत कनाडा पहुँचा और इधर मोहन बाबू बीमार रहने लगे। इनके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी इसलिए इलाज कराते रहे। बेटों को इसकी खबर नहीं होने दी। फोन पर बातचीत का सिलसिला दैनिक से साप्ताहिक और फिर पाक्षिक स्तर पर चला गया। आत्मीयता का स्थान औपचारिकता लेती गयी। बड़े बेटे से तो महीने में एकाध बार ही बात हो पाती।

इसी बीच एक घटना ने मोहन बाबू को हिला दिया। उनके पड़ोस में अकेले रह रहे एक सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी की रहस्यमय मौत घर के भीतर हो गयी थी और इसका पता तब चला जब उनकी लाश की बदबू अड़ोस-पड़ोस तक फैलने लगी। इस बात की आशंका जतायी गयी कि उनकी हत्या घर के नौकर ने ही कर दी थी। विदेश में रह रहे बेटों को अपने पिता के अंतिम दर्शन का अवसर भी नहीं मिला था। एक एन.जी.ओ. द्वारा उनका अंतिम क्रिया-कर्म किया गया। बेटे उनका अस्थि-कलश लेने के लिए ही पहुँच सके थे। मोहन बाबू ने जब दबी जुबान से इस घटना की जानकारी अपने छोटे बेटे को दी तो उसने फौरन इंटरनेट से शहर में उपलब्ध ‘ओल्ड-एज-होम’ सर्च किया और ऑनलाइन बुकिंग करते हुए सबसे मंहगी सुविधाओं से लैस वृद्धाश्रम में मोहन बाबू को शिफ़्ट करा दिया।

अब मोहन बाबू की देखभाल प्रशिक्षित नर्सों के हाथ से होने लगी। विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ.मिश्रा रुटीन चेक-अप करते और खान-पान की व्यवस्था भी विशेषज्ञ परामर्श के अनुसार की जाने लगी। इन सबके बावजूद मोहन बाबू की सेहत सुधरने का नाम नहीं ले रही थी। वे फोन पर प्रशांत से अपनी तकलीफ़ बताने से परहेज करते। प्रशांत की कम्पनी पहले मुश्किल दौर से गुजर रही थी लेकिन इसके काम सम्भालने के बाद उसकी स्थिति सुधरने लगी थी। प्रबंध-तंत्र उसपर बहुत प्रसन्न था और तरक्की की लालच देकर उससे दोगुनी मेहनत करा रहा था। उसने दिन-रात मेहनत कर अपनी स्थिति मजबूत करने की धुन में पिता की बातों में छिपे दर्द को अनसुना कर दिया। उनकी देखभाल कर रहे डॉ.मिश्रा से पूछकर अच्छी से अच्छी दवाएँ चलाते रहने का अनुरोध करता और पैसे की चिन्ता न करने की बात कहता। पैसे की कमी तो वहाँ वैसे भी नहीं थी।

अंततः मोहन बाबू ने बिस्तर पकड़ लिया। साँस मद्धम पड़ने लगी। जीवन रक्षक उपकरण लगा दिए गये। वेन्टीलेटर लग गया। कृत्रिम ऑक्सीजन दी जाने लगी। नियमित डायलिसिस होती रही। प्रशांत लगातार डॉ.मिश्रा से हाल-चाल लेता रहा। एक दिन डॉ.मिश्रा ने बताया कि अब आखिरी समय नजदीक आ गया है। सभी उपाय आजमाये जा चुके हैं लेकिन सुधार नहीं हो रहा है। सभी इंद्रियाँ शिथिल पड़ गयी हैं। मोहन बाबू अधिक से अधिक दो सप्ताह के मेहमान हैं। प्रशांत ने अपने कंपनी मालिकों से बताया- पिता के जीवन के आखिरी पंद्रह दिन उनके साथ रहने के लिए और अगले पंद्रह दिन अंतिम क्रिया-कर्म के लिए चाहिए थे। प्रबंधन ने एक महीने की छुट्टी मंजूर कर दी। प्रशांत स्वदेश पिता को देखने चल दिए।

जूते बाहर निकाल आई.सी.यू. का दरवाजा खोलकर प्रशांत ने भीतर प्रवेश किया तो मोहन बाबू आँखें बंद किए बेसुध पड़े थे। इन्होंने धीरे से ‘पापा’ ‘पापा’ की आवाज लगायी। मोहन बाबू के हाथों में हरकत हुई। फिर उन्होंने धीरे से आँखे खोली। सामने बेटे को देखकर आँखों में अजीब चमक लौट आयी। उन्होंने आशीर्वाद में हाथ उठाने की चेष्टा की लेकिन ज्यादा सफल नहीं हुए। हाथ जरा सा उठने के बाद एक ओर लुढ़क गया। बेटे ने उनका हाथ थाम लिया। थोड़ी ही देर में उन्होंने इशारे से बैठने की इच्छा व्यक्त की। नर्स की मदद से प्रशांत ने बिस्तर में लगे हाइड्रॉलिक सिस्टम का प्रयोगकर बिस्तर एक ओर से उठा दिया। अब मोहन बाबू के शरीर में हरकत लौट आयी थी। वे बोल नहीं पा रहे थे लेकिन उनकी सजल आँखे चिल्ला-चिल्लाकर बता रही थीं कि बेटे के पास बैठना उनके लिए सबसे बड़ी दवा थी। डॉ. मिश्रा ने खिड़की से जब यह चमत्कार देखा तो सामने टंगे कैलेंडर पर सिर झुकाए बिना न रह सके।

एक सप्ताह बाद मोहन बाबू उठ खड़े हुए और दूसरे सप्ताह का अंत आते-आते बेटे के साथ पार्क तक टहलने लगे। दवाएँ अब अपना असर दिखाने लगीं थीं। प्रशांत को आये पच्चीस दिन हो गये थे। शाम को दोनो टहलने के बाद पार्क में लगी बेंच पर बैठकर आपस में बातें कर रहे थे। तभी मोबाइल की घंटी बजी। कनाडा से प्रशांत के बॉस का फोन था-

हेलो सर… गुड मॉर्निंग टु यू…

नो सर, हियर इट्ज़ इवनिंग, …वेरी गुड वेथर इन डीड

नो सर, दैट्स नॉट द केस… थिंग्स अर नॉट गोइंग माइ वे…

नो सर, आई मे नॉट बी फ्री बाई दिस वीक एन्ड… आई ऐम एक्ट्रीम्ली सॉरी सर…

नो, नो, ही इज़ स्टिल एलाइव सर, आइ कांट हेल्प… आइ ऐम सॉरी

येस सर, इ्ट हैज़ सरप्राइज़्ड मी टू सर… डॉ.मिश्रा इज़ आलसो परटर्ब्ड, ही सेड इट वाज़ ए गॉन केस बट…

येस सर, इट्ज़ अनफॉर्चुनेट फ़ॉर मी टू. आइ एम इक्वली कन्सर्न्ड विथ आवर कम्पनीज़ इन्टरेस्ट्स सर…

इसके बाद प्रशांत बेंच पर से उठकर थोड़ी दूर चला गया। अपने बॉस को समझाता रहा कि कैसे उसकी योजना फेल हो गयी। पिता के रोग ने उसे ‘धोखा’ दे दिया। यह भी कि वह उन्हें समझाने की कोशिश करेगा कि वह एक महीने से ज्यादा कतई नहीं रुक सकता। उसका हाव-भाव यह बता रहा था कि बॉस बेहद नाराज है और प्रशांत उससे गिड़गिड़ा रहा है।

बार-बार ‘सॉरी’ और ‘आइ विल ट्राई’ की आवाज मोहन बाबू के कानों तक पड़ती रही। अचानक उन्हें सीने में दर्द महसूस हुआ और जोर की हिचकी आयी। प्रशांत जब आधे घंटे बाद माथे पर पसीना पोंछते बेंच की ओर वापस लौटा तो मोहन बाबू का सिर एक ओर लुढक गया था और शरीर ठंडा पड़ चुका था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

रविवार, 15 मई 2011

कोलकाता यात्रा का फल

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के लिए एक किराये का मकान खोजने के लिए हम कोलकाता गये थे। जी हाँ, वर्धा (महाराष्ट्र) में खुले इस विश्वविद्यालय का एक क्षेत्रीय केंद्र इलाहाबाद में तथा एक कोलकाता में खोले जाने हेतु केंद्र सरकार की ओर से इस साल अनुदान की घोषणा वित्त मंत्री के बजट भाषण में की गयी थी। इस स्वीकृति की प्रत्याशा में इलाहाबाद केंद्र तो दो साल पहले ही प्रारंभ कर दिया गया था; लेकिन इस साल अब कोलकाता में  भी वर्धा ने दस्तक दे दी है।

कोलकाता जाने पर हमें सबसे पहले इस बात की खुशी हुई कि शिव कुमार मिश्र जी से भेंट होने वाली थी। सूचना पाते ही वे ढाकुरिया ब्रिज के पास स्थित आइ.सी.एस.आर. के गेस्ट हाउस आ गये। यूँ तो इंटरनेट पर ब्‍लॉगजगत में उनका जो ऊँचा कद दिखायी देता है वह उनकी  जोरदार लेखनी से संबंध रखता है। लेकिन कोलकाता में मेरे प्रत्यक्ष जब वे आये तो मुझे उनका शारीरिक कद देखकर अपने मन में बनी उनकी तस्वीर को रिवाइज़ करना पड़ा। मैने पता नहीं कैसे उनकी जो तस्वीर मन में बना रखी थी वह एक शानदार व्यंग्यकार ब्‍लॉगर की तो थी लेकिन एक लंबे कद वाले आदमी की नहीं थी।

हम देर तक बातें करते रहे। गेस्ट हाउस वालों ने चाय की आपूर्ति में पर्याप्त विलम्ब किया लेकिन हम उससे परेशान दिखते हुए भी मन ही मन खुश हुए जा रहे थे कि इसी बहाने कुछ देर तक साथ बैठने को मिलेगा।

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अंततः हमें बताया गया कि एक मकान देखने जाने के लिए गाड़ी आ गयी है और 'खोजी समिति' के बाकी सदस्य तैयार हो चुके हैं तो हम इस वादे के साथ उठे कि अगले दिन गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर पर आयोजित सेमिनार के उद्‌घाटन में फिर मिलेंगे। अगले दिन हम मिले और दिनभर उस विलक्षण सेमिनार में विद्वान वक्ताओं को सुनते रहे। सबकुछ इतना रोचक था कि शिव जी  को अपने ऑफिस जाने का कार्यक्रम रद्द करना पड़ा। वे तो प्रो.गंगा प्रसाद विमल को सुनने के लिए अगले दिन भी आने का वादा करके गये लेकिन शायद कुछ लिखने-पढ़ने में व्यस्त हो गये।

हमने कोलकाता में आने से पहले ही यहाँ के दो अखबारों में इस आशय का विज्ञापन प्रकाशित कराया था  कि क्षेत्रीय केंद्र खोलने के लिए किराये के भवन की आवश्यकता है। इच्छुक भवन स्वामी संपर्क करें। इसके नतीजे में चार लोगों ने पत्र भेजकर मकान देने का प्रस्ताव दिया था। जब हम इन लोगों से मिले तो पता चला कि असली भवन स्वामी को पता ही नहीं है कि उनके भवन को किराये पर दिये जाने की बात हमसे चल रही है। जिनलोगों ने हमसे सम्पर्क किया था वे सभी कमीशन एजेंट निकले जिसे आमतौर पर दलाल या ब्रोकर के रूप में ख्याति प्राप्त है। इन सबने मिलकर हमें खूब टहलाया। एक से एक विशाल भवनों में ले गये और खाली हिस्सों को दिखाया। एक नौ मंजिला भवन तो ऐसा था जिसमें एक लाख साठ हजार वर्गफीट कार्पेट एरिया होना बताया गया। एक-एक फ्लोर इतना बड़ा था कि 20-T मैच हो जाये। लेकिन किराया सुनकर हम भाग खड़े हुए।  उस बिल्डिंग से  इस बिल्डिंग और इस मंजिल से उस मंजिल जाते-आते हमारा थकान से बुरा हाल हो गया; लेकिन काम    लायक जगह नहीं मिली। कोलकाता में किरायेदारी इतनी महंगी होगी इसका हमें अंदाज  ही नहीं था।

अगले दिन हमारे खोजी दल के एक सदस्य और कोलकाता केंद्र  के प्रभारी पद पर तैनात किये गये डॉ. कृपाशंकर चौबे जी ने हमें महाश्वेता देवी से मिलवाया। आदिवासियों की सेवा और संरक्षण में अपना जीवन तपा देने वाली महाश्वेता जी को देखकर हमारे लिए समय थोड़ीदेर के लिए रुक सा गया। इतने बड़े-बड़े पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित जिस व्यक्ति से हम मिल रहे थे वे सादगी व सरलता की प्रतिमूर्ति बनी एक टेबल लैंप की रोशनी में किताबों के बीच डूबी हुई मिलीं और हम उन्हें अपनी नंगी आँखों से प्रत्यक्ष देख रहे थे। कोई बनावटीपन नहीं था उस घर में। कृपा जी उनके मुँहलगे से जान पड़े।  दूध वाली चाय मांगने लगे; बल्कि जिद करने लगे लेकिन मिली काली चाय ही। उतनी देर को दूध भला कहाँ से आता! कृपा जी बताने लगे कि कैसे एक बार दिल्ली में महाश्वेता जी से मिलने एक्सप्रेस समूह में सम्पादक बने अरुण शौरी और राजेन्द्र माथुर के साथ वे उनके घरपर गये। वहाँ आदिवासियों को बाँटने  के लिए बोरों में तमाम जीवनोपयोगी सामग्री  भरी जा रही  थी। सामान अधिक था और भरने वाले आदमी कम थे। दीदी ने इन लोगों को भी बोरा भरने पर लगा दिया। कुछ ही देर में जब ये पसीना-पसीना हो गये तो बोले-दीदी काम पूरा हो गया। इसपर दीदी ने कुछ और बोरे और सामान मंगा दिये। थोड़ी देर बाद बताया गया कि इन पत्रकार सम्पादकों को वापस फ्लाइट पकड़ने जाना है तो दीदी ने उनकी वहीं से छुट्टी कर दी। मतलब  आदिवासियों के लिए बोरा भरे जाने से अधिक महत्वपूर्ण कोई काम ही नहीं सूझा था इन्हें।

कोलकाता केंद्र के लिए किराये के मकान की समस्या महाश्वेता जी से बतायी गयी। उन्होंने तत्काल फोन उठाया और एक-दो जगह बात की। अगले दिन साढ़े दस बजे एक फ़्लैट देखने का कार्यक्रम तय हो गया।

अगले दिन हम जहाँ गये वह फिल्म अभिनेता स्व. उत्तम कुमार का घर था। बांग्ला फिल्मों के सुपर स्टार जिन्होंने हिंदी में भी  कुछ यादगार फ़िल्में   की थी; जैसे-अमानुष। उनकी पत्नी भी बांग्‍ला फिल्मों की मशहूर हिरोइन हुआ करती थीं। नाम था सुप्रिया मुखर्जी। इन्हीं सुप्रिया जी से हमारी भेंट हुई वहाँ। उत्तम कुमार जी के   भांजे और स्वयं एक अभिनेता जय मुखर्जी भी हमें मिले। उनसे बात हुई तो लगा कि इस शानदार अपार्टमेंट में हमारा केंद्र स्थापित हो सकता है। शर्त बस यह है कि कोलकाता नगर निगम इस रिहायशी मकान का प्रयोग  शैक्षणिक गतिविधियों के लिए करने का लाइसेन्स दे दे। भारतीय भाषा परिषद के भवन से सटा हुआ यह भवन निश्चित रूप से हिंदी विश्वविद्यालय की गतिविधियों के लिए सर्वथा अनुकूल है। सुप्रिया जी की अवस्था अस्सी से ऊपर की हो चुकी है लेकिन उनके चेहरे पर वह स्मित मुस्कान अभी भी पहचानी जा सकती थी जो उनके ड्राइंग रूम में लगी पुरानी फिल्मी तस्वीरों   में उनके चेहरे पर फब रही थी। हमने वहाँ जा कर अपने को धन्य महसूस किया। अलबत्ता संकोच के  मारे हम उनकी तस्वीरें नहीं ले सके जिसकी इच्छा हमें लगातार होती रही।

कोलकाता यात्रा में हमें ऐसा फल प्राप्त होगा इसकी तो हमने कल्पना तक नहीं की थी। जब चले थे तो बहुत कुछ देखने और घूमने का मंसूबा बनाया था लेकिन एक अदद मकान की खोज और सेमिनार में शिरकत के अलावा कहीं आने जाने का मौका ही नहीं मिला। फिर भी हम खुशी-खुशी लौट आये। जितना मिला वह भी कम नहीं है।

लगे हाथों एक चित्र पहेली भी पूछ लेता हूँ। इसके बारे में मैं भी कुछ खास नहीं जानता हूँ। आप में से कोई जानता होगा तो जरूर बतायेगा यही उम्मीद है। तो बताइए यह क्या है जो एक खड़ा और एक औंधा पड़ा है-

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यदि कोई इतना भी नहीं बता पाया जितना मैं जानता हूँ तो अगली पोस्ट में उतना मैं बता दूंगा। धन्यवाद।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

शनिवार, 7 मई 2011

कविता बहुत कठिन कर्म है : आलोकधन्वा

alokdhanwa-jiकवि आलोकधन्वा वर्धा विश्वविद्यालय में जब ‘राइटर इन रेजीडेन्स’ के रूप में आये तो सबको उम्मीद हुई कि अब ‘दद्दा’ अपनी वर्षों से बंद पड़ी कलम में नयी स्याही डालेंगे। कुछ और सादे कागजों में अपनी कविता का रंग भरकर उन्हें हमेशा के लिए सहेजकर रखने लायक बना देंगे। विश्वविद्यालय के फादर कामिल बुल्के अंतरराष्ट्रीय छात्रावास (गेस्ट हाउस) में उनके साहचर्य का सुख भोग रहे शिक्षकों व अन्य अंतर्वासियों को जब ख्यातिलब्ध कवि जी अपने तरह-तरह के अनुभव अत्यंत रोचक शैली में सुनाते; अपने प्रेम के बारे में, अपने विलक्षण विवाह के बारे में और फिर उससे उत्पन्न विछोह के बारे में बताते हुए जब वे अपने से दूर चली गयी पत्नी की तस्वीर अपने पर्स से निकालकर दिखाते; और परिसर की सड़कों पर चहलकदमी करते हुए देर रात तक देश-दुनिया की तमाम बातों की चर्चा करते रहते तो यह सहज ही था कि हम सभी उनसे यह उम्मीद लगा बैठते कि वे हिंदी साहित्य जगत को नये सिरे से कुछ अनमोल भेंट देने वाले हैं।

अपनी एक मात्र काव्य पुस्तक में छपी कुल जमा इकतालीस (41) कविताओं से ही आलोकधन्वा ने गम्भीर काव्यप्रेमियों के बीच ऐसा स्थान बना लिया जो बिरलों को ही नसीब होता है। पूरी दुनिया में चर्चित और अनेक भाषाओं में अनूदित उनकी कविताएँ एक दौर में देश के पढ़े-लिखे नौजवानों के दिलो-दिमाग पर छायी रहती थीं और व्यवस्था के प्रति रोष से उत्पन्न आंदोलनों में प्रेरक क्रांतिगीत के रूप में समूहों द्वारा पढ़ी जाती थीं।  आज भी इन कविताओं का महत्व कम नहीं हुआ है।

alokdhanwa-happyइस दौरान विश्वविद्यालय द्वारा अनेक राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियाँ आयोजित होती रहीं और उनमें इन्होंने लगातार अपनी ओजस्वी और बेलाग बातें प्रभावी ढंग से रखी। सभागारों में आलोकधन्वा के वक्तव्य खूब तालियाँ बटोरते रहे। लोग उनकी बातों पर बहस-मुबाहिसा करते रहे। कंप्यूटर और इंटरनेट की एबीसीडी से भी अनभिज्ञ रहने वाले कवि आलोकधन्वा ने जब ‘चिठ्ठाकारी की आचारसंहिता’ विषयक राष्ट्रीय सेमीनार में अपनी बात रखी तो सबसे अधिक तालियाँ उनके हिस्से में ही आयीं। सभी भौचक होकर देख रहे थे- जब उन्होंने इस माध्यम की तुलना रेलगाड़ी के ईजाद से कर डाली और बोले कि जब पहली बार रेल चलना शुरू हुई तो लोग उसपर बैठने से डरते थे- इस आशंका में कि पता नहीं एक बार चल पड़ने के बाद यह रुक भी पाएगी या नहीं। तमाम डरावनी बातें इस सवारी को लेकर उठती रहीं। लेकिन समय के साथ इसका उपयोग बढ़ा और आज हम इसके बिना सामान्य जीवन की कल्पना नहीं कर सकते।

लेकिन कवि आलोकधन्वा की पहचान तो उनकी कविता है न! सभी उनसे कुछ नये प्रतिमान गढ़ती कविता की आस लगाये रहे। फरमाइशें बढ़ती रहीं और फिर ‘तगादे’ का रूप लेती गयीं।

आखिरकार उन्होंने बड़े मनोयोग से लिखी चार कविताएँ विश्वविद्यालय की साहित्यिक पत्रिका ‘बहुवचन’ को प्रकाशन के लिए उपलब्ध करायीं। पत्रिका छपकर आयी तो चारो ओर इन कविताओं की ही चर्चा होने लगी। सभी अपनी-अपनी राय देने लगे। सबको अलग-अलग कविताएँ पसन्द आयीं। एक समय में `गोली दागो पोस्टर’, `ब्रूनो की बेटियाँ’, ‘भागी हुई लड़कियाँ’ और `जनता का आदमी’ सरीखी कालजयी क्रांतिकारी कविताएँ लिखकर मशहूर होने वाले कवि ने जब नये समय में दूरस्थ प्रेयसी से मुलाकात की आतुरता बयान करती, गाय व बछड़े के ऊपर भावुक बातें करती और आम के बाग़ पर लुभावनी रसपान कराती कविता लिखी हैं तो आभास होता है कि समय के साथ व्यक्ति का कैनवास कैसे बदल जाता है। मानव मन कैसे-कैसे करवट लेता है और उसके निजी अनुभव उसकी वैचारिक प्राथमिकताओं को कैसे बदल देते हैं। कविमन की स्वतंत्रता और उदात्तता दोनो ही के दर्शन इनकी इन कविताओं में होते हैं।

alok-dhanwaमैने अनुरोध किया कि इन चारो कविताओं को इंटरनेट के पाठकों के लिए उपलब्ध कराने की अनुमति दीजिए। वे सहर्ष तैयार हो गये- इस शर्त पर कि उन्हें हूबहू किताब जैसे फॉर्मैट में देना होगा। मैने उन्हें विश्वास दिलाना चाहा तो भी उन्हें संतोष न हुआ। स्वयं ‘बहुबचन’ लेकर मेरे लैपटॉप के सामने बैठ गये। एक-एक हिज्जे को लाइन दर लाइन पत्रिका से मिलाते रहे। उसमें प्रकाशित कविता की कुछ पंक्तियों को  बदलवा दिया, एक-दो नयी पंक्तियाँ भी जोड़ डालीं। रात काफी बीत चुकी थी; लेकिन जबतक वे संतुष्ट नहीं हो गये कि सभी शब्द पूर्णतः शुद्ध और पंक्तियाँ दुरुस्त हो चुकी हैं तबतक बैठे रहे। स्क्रीन पर अपनी कविता को अपलक निहारते रहे- जैसे कोई माँ अपनी नवजात संतान को निहारती है। बार-बार पढ़ते रहे और मुग्ध होते रहे।

मैने कहा- आदरणीय, अब इसे पब्लिक डोमेन में जाने दीजिए, कबतक सीने से चिपकाए रहेंगे!

उन्होंने जवाब दिया- कविता बहुत कठिन कर्म है त्रिपाठी जी, एक-एक लाइन प्रसव वेदना देती है...

आखिर उन्होंने ओ.के. कहा और मैने पब्लिश बटन दबाया। चारों कविताएँ यहाँ नमूदार हो गयीं। हिंदी-समय पर आलोक धन्वा की सभी कविताएँ उपलब्ध हैं। चार नयी कविताओं में से एक आपके लिए यहाँ प्रस्तुत करता हूँ-

 

मुलाक़ातें


अचानक तुम आ जाओ


इतनी रेलें चलती हैं
भारत में
कभी
कहीं से भी आ सकती हो
मेरे पास


कुछ दिन रहना इस घर में
जो उतना ही तुम्हारा भी है
तुम्हें देखने की प्यास है गहरी
तुम्हें सुनने की


कुछ दिन रहना
जैसे तुम गई नहीं कहीं


मेरे पास समय कम
होता जा रहा है
मेरी प्यारी दोस्त


घनी आबादी का देश मेरा
कितनी औरतें लौटती हैं
शाम होते ही
अपने-अपने घर
कई बार सचमुच लगता है
तुम उनमें ही कहीं
आ रही हो
वही दुबली देह
बारीक चारखाने की
सूती साड़ी
कंधे से झूलता
झालर वाला झोला
और पैरों में चप्पलें
मैं कहता जूते पहनो खिलाड़ियों वाले
भाग दौड़ में भरोसे के लायक


तुम्हें भी अपने काम में
ज़्यादा मन लगेगा
मुझसे फिर एक बार मिलकर
लौटने पर


दुख-सुख तो
आते जाते रहेंगे
सब कुछ पार्थिव है यहाँ
लेकिन मुलाक़ातें नहीं हैं
पार्थिव
इनकी ताज़गी
रहेगी यहीं
हवा में !
इनसे बनती हैं नयी जगहें
एक बार और मिलने के बाद भी
एक बार और मिलने की इच्छा
पृथ्वी पर कभी ख़त्म नहीं होगी

-आलोकधन्वा

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)