मकर संक्रांति, २०२६
प्रयागराज की पुण्यभूमि ने मेरे जीवन को
सवाँरने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रदेश में सबसे पूरब के जिले कुशीनगर
के अपने गाँव से निकलकर उच्च शिक्षा के लिए जब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में
पहुँचा था तो एक सुंदर सपना साकार होने की नींव पड़ी थी। मैंने यहीं से प्रतियोगी
परीक्षा की तैयारी की और एक सम्मानजनक सेवा में चयनित हुआ। कालांतर में मुझे यहाँ
कोषाधिकारी इलाहाबाद के पद पर कार्य करने का सौभाग्य मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना
नहीं रहा। उसी समय अपना एक हिन्दी ब्लॉग-सत्यार्थमित्र-बनाकर उसपर नियमित लेखन
करते हुए मैंने सरकारी नौकरी से इतर अपनी एक अलग पहचान बनाई। अनेक स्थानांतरण और
पदोन्नतियों के क्रम में मुझे दूसरी बार राजस्व परिषद प्रयागराज में अपर आयुक्त
वित्त के रूप में तैनाती मिली तो एक बार फिर मुझे इस शहर की उर्वरा भूमि पर जीवन
का सुख उठाने और गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम की समृद्ध परंपरा और संस्कृति का
रसपान करने का सुअवसर मिला।
प्रयाग में अपनी पुरानी यादों को दुबारा
जी लेने के लिए मैं अक्सर अपनी साइकिल से सैर करने निकल जाता था। सौ साल से कहीं
अधिक उम्र पार कर चुके पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय
परिसर के केंद्र में स्थित वह विशाल वटवृक्ष, उसके आसपास हरेभरे लॉन में बैठकर पढ़ते
हुए बच्चे, यहीं पर टहलते हुए अनेक प्रोफेसर और पुराने कर्मचारी मुझे अपने घर के जैसे
लगते थे। चंद्रशेखर आजाद उद्यान जो पहले अल्फ्रेड पार्क हुआ करता था वहाँ सुबह शाम
सैर करने वालों और योगासन, प्राणायाम, ध्यान और दूसरे व्यायाम करने वालों की भारी
भीड़ का एक अलग ही आकर्षण था। इसके अलावा सिविल लाइंस की रंगभरी शाम, अपने
विद्यार्थी जीवन की याद दिलाते कटरा के नेतराम चौराहे से गुजरते छात्र-छात्राओं की
मस्ती, संगम क्षेत्र की सुहानी सुबह, यमुना नदी का सरस्वती घाट और बड़े हनुमान जी
के दर्शन का क्या कहना।
यह सब आनंद दुबारा भोगने का अवसर मिले
कुछ ही महीने बीते थे कि मेरी अगली पदोन्नति हो गई और अचानक प्रदेश के सबसे
पश्चिमी जिले सहारनपुर में मेरी तैनाती का फरमान निकल गया। मुझे तभी पता चला कि
राज्य सरकार ने यहाँ एक नया विश्वविद्यालय खोला था। इसके पहले पूर्णकालिक वित्त
अधिकारी के रूप में पदस्थापन का आदेश मिला तो यह मेरे लिए किसी आघात से कम न था। मन
में एक तरफ प्यारा प्रयागराज छूटने का दुख था तो दूसरी तरफ अपने गाँव से लगभग एक
हजार किलोमीटर दूर आकर अपने परिजनों से बिछड़ जाने की आशंका थी। एक नितांत अपरिचित
क्षेत्र और बिल्कुल देहात में एक अविकसित स्थान पर बिना किसी साधन-सुविधा के कार्य
प्रारंभ करने की चुनौती तो थी ही। आगे की बात बताने से पहले यहाँ की यादों को सहेजने वाले कुछ चित्र दिखाता हूँ।
विश्वविद्यालय में प्रथम कुलपति और
कुलसचिव की नियुक्ति पहले ही हो चुकी थी। मैंने कुलपति जी से फोन पर बात की तो
उन्होंने अत्यंत हर्ष व्यक्त करते हुए मेरा स्वागत किया। उनसे पहली बातचीत में
जैसा अपनत्व मैंने महसूस किया वह आजतक इस प्रांगण के साथ एक स्थायी भाव के रूप में
बना हुआ है। स्थानांतरण रुकवाने की जब कोई युक्ति काम नहीं आई और पता चला कि
मुख्यमंत्री जी का विशेष निर्देश है तो मैंने झट अपना बोरिया बिस्तर बांधा और
रेलगाड़ी पकड़कर सहारनपुर आ गया। कुलपति जी ने मुझे ट्रेन से रीसीव करने और सर्किट
हाउस में स्थापित करने के लिए एक जिम्मेदार व्यक्ति को लगा दिया था।
जब मैंने माँ शाकुंभरी विश्वविद्यालय में
कार्यभार ग्रहण किया उस समय तक शहर से दस-पंद्रह किलोमीटर दूर पुंवारका गाँव में इसकी
स्थापना के लिए करीब पचास एकड़ जमीन खरीद ली गई थी। देश के गृहमंत्री और प्रदेश के
मुख्यमंत्री द्वारा एक भव्य कार्यक्रम में शिलान्यास किया जा चुका था। पैतृक
विश्वविद्यालय से सौ करोड़ रुपये मिल चुके थे और कार्यदायी संस्था पी.डबल्यू.डी. के
माध्यम से ठेकेदार ने निर्माण कार्य प्रारंभ करने के लिए अपना टीन-टप्पर गाड़ दिया
था। करीब सवा दो सौ सम्बद्ध महाविद्यालयों के प्रशासनिक और अकादमिक नियंत्रण का दायित्व
विश्वविद्यालय के अधिकारियों पर पहले ही आ चुका था। इन महाविद्यालयों में छात्रों
के पंजीकरण, प्रवेश और परीक्षा संबंधी कार्यों का संचालन प्रारंभ हो चुका था। ऑफिस
खोलकर तत्काल कार्य प्रारंभ करने के लिए राजकीय महाविद्यालय पुंवारका का अधिग्रहण
कर लिया गया था। इस पुराने कॉलेज की बिल्डिंग के पढ़ाने के कमरों में अधिकारियों के
कार्यालय बनाए जा रहे थे। ऑफिस स्टाफ के रूप में नजदीकी महाविद्यालयों के कर्मचारी
सम्बद्ध किए गए थे। पैतृक विश्वविद्यालय मेरठ से भी कुछ कर्मचारी सप्ताह में एक-दो
दिन के लिए आते थे। मुझे भी अपने लिए एक कक्षाकक्ष मिल गया जिसमें कुर्सी मेज
डालकर मैंने वित्त अधिकारी का काम शुरू कर दिया।
सर्किट हाउस में रुकने की एक सीमा थी
जिसके पूरा हो जाने से पहले मुझे एक किराये का मकान खोजना था। जिलाधिकारी महोदय ने
सरकारी आवास उपलब्ध होने पर आबंटन का आश्वासन तो दिया लेकिन पता चला कि वहाँ पहले
से ही प्रतीक्षा सूची लंबी थी। मेरी कोशिश थी कि शहर में विश्वविद्यालय से सबसे
नजदीक किसी मुहल्ले में सुविधाजनक ठिकाना खोज लूँ। लेकिन दर्जनों मकान देखने के
बाद अंततः मुझे ऐसी कॉलोनी में मकान मिला जो विश्वविद्यालय से लगभग बीस किलोमीटर
दूर शहर के दूसरे छोर पर थी। बहरहाल अगले ही सप्ताह मैंने प्रयागराज के सरकारी
आवास से अपना सामान ट्रक पर लदवाया और सहारनपुर लाकर लंबे अरसे बाद एक प्राइवेट किराये
के मकान में अपनी गृहस्थी बसा ली। यहाँ भी आसपास साइकिल से सैर और सार्वजनिक
उद्यानों में प्रातःकालीन योगासन प्राणायाम का सिलसिला चल निकला। प्रतिदिन पूरे
शहर की सघन ट्रैफिक पारकर विश्वविद्यालय आना और वापस जाना एक अतिरिक्त संघर्ष था। साथ
ही मुझे कुछ समय के लिए राजकीय मेडिकल कॉलेज सहारनपुर के वित्त नियंत्रक की
जिम्मेदारी अलग से सौंप दी गई जो शहर के तीसरे छोर पर था। लेकिन इस आपदा में मुझे एक
अवसर मिल गया। मेडिकल कॉलेज कैंपस में मुझे एक सरकारी आवास मिल गया।
विश्वविद्यालय परिसर के भवनों का निर्माण
मंथर गति से चलता रहा। तमाम तकनीकी और व्यावहारिक बाधाओं को पार करते हुए शिलान्यास
की तिथि से लगभग चार साल में प्रथम चरण के भवन बनाकर तैयार हुए और अंततः हम नए
नवेले कार्यालय में शिफ्ट कर गए हैं। परिसर में बने आवासों में सबसे पहले प्रवेश
करने का कीर्तिमान भी मेरे नाम रहा। बाद में माननीया कुलपति जी आयीं। फिर अन्य
अधिकारी भी आ गए। इस बीच विश्वविद्यालय से तीन शिक्षा सत्र पूर्ण करके विद्यार्थी
स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधियाँ प्राप्त कर चुके हैं। तीन बार दीक्षांत समारोह आयोजित
किए जा चुके हैं जिनकी अध्यक्षता महामहिम राज्यपाल द्वारा की जा चुकी है। ये तीनों
समारोह विश्वविद्यालय परिसर में प्रेक्षागृह के अभाव के कारण सहारनपुर नगर निगम के
प्रेक्षागृह ‘जनमंच’ में आयोजित हुए। इस अवसर पर विश्वविद्यालय की कार्य-परिषद के
सदस्यों के साथ एक ही रंग के बंद गले वाले सूट और उसके ऊपर विशिष्ट रंग का उत्तरीय
डालकर दीक्षांत समारोह की शोभा-यात्रा में सम्मिलित होना और मंच पर महामहिम की
छत्रछाया में बैठकर अत्यंत गरिमामय कार्यक्रम का साक्षी बनना एक अविस्मरणीय गौरव
की अनुभूति देकर जाता है।
विश्वविद्यालय में कार्यभार ग्रहण करने
से लेकर आजतक बिताया हुआ प्रत्येक दिन मेरे लिए अनेक खट्टे-मीठे अनुभवों से
सम्पन्न करने वाला रहा है। मुझे यहाँ बहुत कुछ नया सीखने का अवसर मिला। जीवन भर सहेजकर
रखने लायक अनेक अनमोल यादों की थाती मेरे पास जमा हो चुकी है।
वित्त एवं लेखा विभाग की कार्य पद्धति
प्रायः नीरस किस्म की होती है। अन्य विभागों को प्रायः शिकायत रहती है कि उनके
भुगतान बाधित या विलंबित होते रहते हैं। मैंने अपने पुराने अनुभव की पूँजी का
निवेश किया और इस पारंपरिक छवि को बदलने कि भरपूर कोशिश की है। मुझे लगता है कि
सीमित संसाधनों के बावजूद मुझे इसमें अच्छी सफलता मिली है। प्रसन्नता की बात यह है
कि यहाँ के वातावरण में मुझे कुछ भी तनावग्रस्त करने वाला नहीं मिला।
लेकिन यहाँ मेरी प्रसन्नता के दूसरे कारण
अधिक महत्वपूर्ण हैं। उच्च शिक्षा के एक नव-स्थापित संस्थान में खूब पढ़े-लिखे
लोगों के बीच कार्य करने का अवसर यहाँ मुझे दूसरी बार मिला। इससे पहले कुछ समय के
लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में रहकर देश-विदेश
के अनेक मूर्धन्य विद्वानों, लेखकों, कवियों और साहित्यकारों का सानिध्य मिल चुका
था। लेकिन सहारनपुर की बात ही अलग थी। यहाँ तो सबकुछ भविष्य की कोख में था।
वर्तमान तो एक गरिमापूर्ण विश्वविद्यालय रूपी विशाल वटवृक्ष के लिए बीजारोपण करने का
था। अबतक इस बीज के अंकुरण से लेकर पुष्पन-पल्लवन की प्रक्रिया में सहभागी होने का
दुर्लभ अनुभव मुझे बहुत समृद्ध कर गया है।
पिछले तीन-चार वर्ष में बहुत कुछ अच्छा
घटित हुआ है। विश्वविद्यालय में दूसरी कुलपति जी की नियुक्ति भी हो गई, कुल सचिव व
परीक्षा नियंत्रक भी बदल गए। लेकिन विश्वविद्यालय परिवार की कार्यप्रणाली में वही
निरन्तरता बनी हुई है। यहाँ कुलपति जी व अन्य अधिकारियों के साथ बैठकर प्रतिदिन की
चुनौतियों का समाधान खोजने की कोशिश, एक टीम के रूप में एक दूसरे का सहयोग करते
हुए सामूहिक प्रयास से नित नयी उपलब्धियों के लिए कदम बढ़ाते जाने, सीमित संसाधनों
के बावजूद अन्य स्थापित विश्वविद्यालयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने और नए-नए
बौद्धिक विमर्श में सम्मिलित होकर कुछ नया सीखने-सिखाने का गौरव प्रतिदिन महसूस
होता है।
प्रधानमंत्री जी की अनेक महत्वाकांक्षी योजनाओं
में से एक स्टार्ट-अप इंडिया को दृष्टि में रखते हुए हमारे विश्वविद्यालय में एक
इनक्यूबेटर की स्थापना की गई जो इस क्षेत्र के लिए बिल्कुल नई उपलब्धि है; और एक विशिष्ट
अवसर भी। इसके लिए सबसे पहले कंपनी अधिनियम के सेक्शन-8 के अंतर्गत एक गैर-लाभार्जनकारी
कंपनी बनी जिसका नाम हुआ- “एमएसयू एकेडेमिक फाउंडेशन”। इस कंपनी ने अंबिका (AMBIKA) नाम से एक इनक्यूबेटर की स्थापना की है। यह इनक्यूबेटर नव-उद्यमियों के
लिए उनके स्टार्ट-अप्स को एक सफल उद्यम के रूप में स्थापित करने में तकनीकी और
आर्थिक सहायता प्रदान करेगा। अनेक सरकारी व गैरसरकारी संस्थाओं, उद्यमों, निगमों व
मंत्रालयों से संपर्क साधा गया है, एम.ओ.यू. हस्ताक्षर किए गए हैं। कंपनी के सी.ई.ओ.
की नियुक्ति की जा चुकी है। इनके द्वारा ‘अंबिका’ की सफलता के लिए अथक प्रयास किए
जा रहे हैं। मुझे कंपनी के निदेशक मण्डल का सदस्य होने का सुअवसर भी यहीं मिला है।
इस उपक्रम की गतिविधियों में सम्मिलित रहकर मुझे भी बहुत कुछ नया सीखने-समझने को
मिल रहा है।
सहारनपुर की भौगोलिक स्थिति इतनी विशिष्ट
है कि यहाँ से उत्तरप्रदेश के मैदान में रहते हुए उत्तराखंड व हिमांचल प्रदेश के
सुरम्य पहाड़ी स्थलों के भ्रमण का आनंद अत्यंत सुलभ है, हरिद्वार, ऋषिकेश जैसे
तीर्थस्थलों का पुण्यलाभ बहुत सुगम है, गंगोत्री-यमुनोत्री और बद्रीनाथ-केदारनाथ
का तीर्थाटन भी कठिन नहीं है, और देहरादून, दिल्ली और चंडीगढ़ घूमकर आने का सुभीता भी
है। माँ शाकुंभरी मंदिर का शक्तिपीठ पूरे देश के तीर्थयात्रियों के लिए भले ही
दुर्गम हो, हमारे लिए तो यह घर के बगल जैसा ही है। मैंने तो दोपहर के बाद यहाँ से शिवालिक
की सुरम्य पहाड़ियों में जाकर चाय पी है और लौट आया हूँ। चकराता से ऊपर चिरमिरी टॉप
पर जमी बर्फ देखकर और देववन की जमी हुई झील और बर्फ से ढके पहाड़ी ढाल पर उछल-कूद करके
एक ही दिन में वापस आ गया हूँ। इतनी विविधता से भरे हुए अनुभव और कहाँ मिलने वाले
थे। यहाँ के कार्यकाल ने सच में जिंदगी बदल दी।
मेरे लिए यहाँ गौरव के अनेक क्षणों में एक था विश्वविद्यालय के लिए कुलगीत की रचना का सौभाग्य। तेजस्विनावधीतमस्तु के ध्येय-वाक्य के चयन से लेकर विश्वविद्यालय के प्रतीक चिह्न (Logo) की तैयारी में सक्रिय भाग लेना और उसके बाद माँ शाकुंभरी की कृपा से कुलगीत के शब्दों का संवाहक बन जाना एक अकथनीय आत्मीय आनंद का अनुभव दे गया। राग हंसध्वनि में स्वरबद्ध किए गए कुलगीत में विश्वविद्यालय के ध्येय-वाक्य, मूल संदेश, लोक-संस्कृति, और जन-आकांक्षाओं को समाहित करने का प्रयास किया गया है। विश्वविद्यालय के स्थापना-दिवस की प्रथम वर्षगांठ पर आयोजित समारोह में इसका लोकार्पण किया गया। महामहिम के हाथ से इसकी रचना के लिए प्रशस्ति-पत्र और पुरस्कार पाना मेरे लिए एक दैवीय अनुकंपा ही थी। इसके संगीतबद्ध गायन को सुनकर मेरा रोम-रोम माँ शाकुंभरी की कृपा और माँ सरस्वती के आशीर्वाद को महसूस करके खिल उठता है। अहोभाग्य मेरा।
सहारनपुर जिले के उत्तरी छोर पर पुंवारका
के ग्रामीण क्षेत्र में राजकीय विश्वविद्यालय की स्थापना और प्रथम चरण के निर्माण के
पूरा हो जाने के बाद यह परिसर अब मन को मोह ले रहा है। यद्यपि अभी चुनौतियाँ
समाप्त नहीं हुई हैं और इसे अभी लंबा सफर तय करना है लेकिन अब यहाँ के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी
और लोग-बाग जाने-पहचाने से लगने लगे हैं। अनेक विद्वान प्रोफेसर मेरे मित्र बन गए
हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात योगाचार्य, लोकप्रिय कवि, मूर्धन्य साहित्यकार,
उत्कृष्ट वैज्ञानिक, कर्मठ कृषि-विशेषज्ञ, प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, सफल उद्योगपति, राष्ट्रीय
पदक प्राप्त खिलाड़ी और संवेदनशील जन-प्रतिनिधि, इन सबसे मिलने-जुलने और आत्मीय
परिचय बढ़ाने का अवसर मुझे यहाँ मिला है। कृतज्ञ हूँ मैं इस धरती का। इस दैवीय भावभूमि
का। माँ शाकुंभरी की प्रेरणा और कृपा के बिना यह संभव नहीं था।
एक सरकारी नौकर के लिए स्थानांतरण एक सामान्य बात है जो असामान्य अनुभव देकर जाता है। मेरी पदोन्नति हो चुकी है इसलिए फिर से स्थानांतरण हो जाएगा। इस परिसर के शुद्ध ऑक्सीजन का लाभ कुछ ही दिनों तक ले पाऊँगा। फिर एक नई चुनौती होगी और उसके आनंद का अवसर भी। चरैवेति चरैवेति।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
वित्त अधिकारी














कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)