पिछले सप्ताह हाई कोर्ट में एक व्यक्तिगत शपथपत्र प्रस्तुत करने के लिए अचानक प्रयागराज जाना हुआ। विशुद्ध सरकारी काम था। कोई चिंता वाली बात नहीं थी। सहारनपुर से प्रयाग जाने और वापस आने के लिए नौचंदी एक्सप्रेस में लगातार दो रातों में 16-16 घंटे की यात्रा करनी पड़ी। इलाहाबाद में पढ़ाई, नौकरी की तैयारी और दो बार की तैनाती पाने के बाद भी मुझे वहां जाने से मन नहीं भरता है। इस बार तो इस शहर में कुल 7-8 घंटे ही बिताने को मिले। वह भी हाईकोर्ट के अंदर-बाहर काले कोट की अपार भीड़ के बीच। संयोग से उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के चुनाव के लिए नामांकन हो रहे थे। पूरे प्रदेश के वकील प्रत्याशी अपने दलबल के साथ इलाहाबाद में पहुंचे हुए थे। अपना काम निपटाने के बाद वापस गेस्ट हाउस जाने के बजाय मुझे बेहतर यह लगा कि रेलवे स्टेशन के पास ही अपने एक अभिन्न मित्र स्कन्द शुक्ल से उनके ऑफिस में जाकर मिल लूँ। बोनस में वहाँ अच्छी कॉफी भी मिली।
उसके बाद प्रयाग स्टेशन पर पहुंचते
हुए मुझे यह चिंता हुई कि फॉर्मल कोट-पैंट और जूतों में 16 घंटे की यात्रा में
असुविधा होगी। ट्रेन आने में बस 5-7 मिनट ही बचे थे जब मैं प्लेटफॉर्म पर पहुँचा।
मैंने अपने अनुज तुल्य हितेश कुमार सिंह को फोन लगाया तो संयोग से वे वहीं ड्यूटी
पर मिल गए। उन्होंने तत्काल मेरी समस्या का समाधान कर दिया। एक कमरे में जाकर
मैंने चेंज करके आरामदायक कपड़े पहने। हवाई चप्पल डाली और वापस प्लेटफॉर्म पर
पहुंचा तो रेलगाड़ी आकर खड़ी हो चुकी थी।
लेकिन इस सारी भागदौड़ के बीच भी
मुझे प्रिय हितेश की साहित्यिक मेधा का मूर्तरूप देखने और पाने का अवसर नहीं
छोड़ना था। साहित्य, कला और संस्कृति का संचयन करने का उनका
अनथक प्रयास 'प्रयाग-पथ' के रूप में
पिछले 11 वर्षों से प्रकाशित हो रहा है। उन्होंने मुझे इसका नवीनतम अंक भेंट किया
जो मोहन राकेश की जन्मशती पर केंद्रित है। मोहन राकेश के जीवन-प्रसंग के रोचक
संस्मरण और उनके नाटकों, कहानियों, एकांकियों,
डायरी और उपन्यास पर गहन समीक्षाओं का अद्भुत संकलन इस अंक में बहुत
सुरुचिपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया गया है। इसके अतिरिक्त उत्तम कोटि की अन्य
कहानियां, कविताएं, संस्मरण, पुस्तक समीक्षा इत्यादि भी सदा की भांति प्रयाग-पथ के इस अंक में सजी हुई
हैं। निश्चित ही यह एक सुंदर संग्रहणीय अंक बन पड़ा है।
अत्यंत जिम्मेदारी और व्यस्तता से
भरी हुई रेलवे की नौकरी करने के साथ साथ इतने बड़े साहित्यिक अनुष्ठान का संपादन करना बहुत जीवट
का काम है। डिजिटल क्रांति के युग में ऐसे प्रकाशन का काम व्यावसायिक दृष्टि से
बहुत लाभदायक तो नहीं ही होगा। लेकिन साहित्य की साधना को अपने जीवन का ड्राइविंग
फोर्स मानने वाले हितेश कहते हैं कि यदि वे यह काम नहीं करते तो उनका जीवन ही
निरर्थक हो जाता। प्रिय हितेश, आप वास्तव में बहुत सार्थक काम कर रहे
हैं।






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