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शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

एक भयावह आशंका को मिटाता चुनाव परिणाम

आजतक चैनल पर सांसद मनोज तिवारी के मुँह से आज यह गीत सुनते हुए अनायास मेरी आंखों से आंसू निकलने लगे। खुद ही हतप्रभ सा हो गया मैं। ऐसा कमजोर कैसे हो गया मैं? पत्नी ने पूछा - इतना भावुक क्यों हो रहे हैं?

क्या बताता मैं? बिहार के जंगल राज की व्यक्तिगत पीड़ा मुझे याद आ रही थी जिसकी पुनरावृत्ति की संभावना अब फिलहाल पांच साल के लिए टल गई है। स्कूल हेडमास्टर रहे मेरे एक बुजुर्ग नाना जी का अपहरण हुआ था जिन्हें महीनों नारायणी के दियारा क्षेत्र में गन्ने के खेतों और पटेर के जंगल में जिंदगी की जंग लड़नी पड़ी थी। फिर एक मामा जी के साथ भी यही हुआ। मेरे सगे चाचा जी जो एक शिक्षक थे उन्हें प्रायः जंगल सरकार के रंगदार गुंडे वसूली की नोटिस भेजते रहते थे जिसपर कारतूस की मुहर चस्पा रहती थी। अपनी आंखों से देखा था मैने एक पत्र जिसमें आटा, चावल, दाल, आलू, प्याज, तेल, मसाला, बकरा, मुर्गा, लुंगी, कुर्ता, जांघिया, बनियान, गमछा आदि की मांग करते हुए उसे अमुक स्थान पर पहुंचाने की समय सीमा बतायी गई थी जिसका उल्लंघन होने पर गोली की गारंटी लिखी हुई थी। ये रंगदार सरेराह उनके साथ मारपीट कर चुके थे। यह सबकुछ पुलिस के संरक्षण में चल रहा था। रिटायर होने के बाद चाचाजी बिहार छोड़कर उत्तर प्रदेश वाले हमारे घर आ गए।

आज जब चुनाव के परिणाम आए तो मन में जो एक आशंका घर बना रही थी वह टूटकर बाहर आ गई और आंसुओं के साथ वह सारा अनकहा भय जाता रहा। मुझे विश्वास है कि 40 की उम्र से ऊपर के बिहार के अधिकांश नागरिक आज ऐसा ही भावुक क्षण महसूस कर रहे होंगे। ईश्वर करे बिहार में आया यह परिवर्तन चिर स्थायी हो। 🙏🏻💐



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