हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Friday, May 15, 2009

ब्लॉगिंग कार्यशाला: पाठ-२ (फुरसतिया उवाच)

 

“हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया” में प्रवेशोत्सुक नये कलमकारों को चिठ्ठाकारी के विविध पक्षों से परिचित कराने के लिए जो कार्यशाला आयोजित की गयी उसकी तस्वीरें देखने के बाद विषय-प्रवर्तन सम्बन्धी पहला पाठ और अखबारों में इस कार्यक्रम की चर्चा आप देख चुके हैं। इस कक्षा का दूसरा पीरियड कानपुर से इसी एक काम के लिए इलाहाबाद आये अनूप शुक्ल जी का था। हमें पता चला है कि निराला सभागार में पहुँचने से पहले इन्होंने अनेक खतरों का सामना किया था। लेकिन अपनी वार्ता में इन्होंने उनका कोई जिक्र नहीं किया। वह सब आप यहाँ और यहाँ देख सकते हैं।

हम यहाँ आपको यह बताते हैं कि संचालक इमरान ने इन्हें बुलाने से पहले यह बताया कि हमारे अगले मेहमान कानपुर से चलकर, बहुत कष्ट उठाकर, और अपनी घोर व्यस्तता के बावजूद समय निकालकर यहाँ आये हैं। उन्होने सोचा होगा कि इससे श्रोताओं पर भारी इम्प्रेशन पड़ेगा। लेकिन अनूप जी ने अपनी बात की शुरुआत ही इस भूमिका के खण्डन से की।

प्रमुदित अनूप जी... अनूप जी बोले, ”मित्रों सबसे पहले मैं बताना चाहता हूं कि मैंने इलाहाबाद में अपनी जिन्दगी के सबसे महत्वपूर्ण चार साल बिताये हैं। जब मैं यहां मोतीलाल नेहरू रीजनल इंजीनियरिंग कालेज में पढ़ता था। सन १९८१ से १९८५ तक। इसलिये इलाहाबाद आना मेरे लिये हमेशा घर आने जैसा लगता है। ...जैसे लड़कियां अपने मायके आती हैं और जी भर कर बतियाती हैं उसी तरह से मेरा अनुरोध है कि मुझे मेहमान न समझ कर घर का व्यक्ति समझा जाये ताकि मैं अनौपचारिक होकर बिना संकोच के जो याद आता है , समझ में आता है वह आपके साथ बांट सकूं।”

मैं यह भी कहना चाहता हूं कि मैं कोई ऐसा व्यस्त नहीं हूं। छुट्टी लेकर आया हूं। फ़ुरसतिया मेरा ब्लाग है तो मैं व्यस्त कैसे हो सकता हूं। मेरी समझ में व्यस्त तो वह होता है जिसके पास कोई काम नहीं होता है। मेरे पास ब्लागिंग के अलावा भी और तमाम काम हैं लिहाजा मुझे व्यस्त जैसा न मानकर फ़ुरसतिया ही माना जाये तो मैं ज्यादा सहज रह सकूंगा।

पूरा हाल ठहाकों से गूँज गया जब उन्होंने यह जुमला बोला -

“क्या बात है बहुत बिजी दिख रहे हो...? आज कल कोई काम-धाम नहीं है क्या?”

इतनी इधर-उधर की ठेलने के बाद वे सीधे मुद्दे पर आ गये। ब्लॉगिंग की कहानी का प्रारम्भ करते हुए बोले-

“मेरी जानकारी के अनुसार पहला ब्लाग सन १९९७ में अमेरिका में शुरू किया गया। हिन्दी में पहला ब्लाग लिखने वाले आलोक कुमार आदि चिट्ठाकार के रूप में जाने जाते हैं। सन २००३ में उन्होंने पहली बार हिन्दी ब्लाग शुरू किया। ब्लाग के लिये चिट्ठा शब्द भी उन्होंने ही सुझाया।”

अपनी ब्लॉग यात्रा के बारे में उन्होंने बताया, “मेरी ब्लाग-यात्रा की शुरुआत के पीछे भी अप्रत्यक्ष रूप से इलाहाबाद का ही हाथ है। डा. पूर्णिमा वर्मन इलाहाबाद  की छात्रा रहीं हैं और उन्होंने यहीं से संस्कृत में पी.एच.डी. की है। उनके द्वारा संचाचिल  साप्ताहि्क इंटरनेट पत्रिका अभिव्यक्ति  दुनिया के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी के अध्ययन के लिये मानक संदर्भ पत्रिका के रूप में देखी जाती है। मैं नेट से जुड़ने के बाद नियमित रूप से अभिव्यक्ति देखा करता था। इसी में मैंने रविरतलामी जी का लेख  अभिव्यक्ति का नया माध्यम:ब्लाग देखा, शायद १४-१५ अगस्त २००४ को।  इस लेख को पढ़ते ही हम भी अपना ब्लाग शुरू करने को छटपटाने लगे।

 फुरसतिया उवाच
अपना ब्लाग शुरू करने में सबसे बड़ी समस्या की-बोर्ड की थी। कहीं से की-बोर्ड मिल ही नहीं रहा था कि कैसे लिखना शुरू हो। खोजते-खोजते देबाशीष के ब्लाग नुक्ताचीनी पर मौजूद छहरी आन लाइन की-बोर्ड की सहायता से बड़ी मुश्किल से कुल जमा नौ शब्द लिखकर अपने ब्लाग की पहली पोस्ट लिखी। हिंदी ब्लाग जगत में मैं लम्बी पोस्टें लिखने के लिये इतना बदनाम हूं कि लोग लम्बी पोस्टों को फ़ुरसतिया टाइप पोस्ट कहते हैं। लेकिन शुरुआत में कुल नौ शब्द लिखकर की थी:

अब कब तक ई होगा ई कौन जानता है !

इसके बाद धीरे-धीरे लिखने लगे। उस समय कुल जमा पचीस-तीस ब्लागर थे। प्रमुख ब्लागरों में रविरतलामी, देबाशीष, जीतेन्द्र चौधरी, अतुल अरोरा आदि थे। पंकज नरूला जिनको हम लोग मिर्ची सेठ कहते थे अक्षरग्राम का संचालन करते थे। इस चौपाल पर सब लोग अपनी समस्यायें और सूचनाएं रखते थे।

उन दिनों WINDOWS 98 और डायल-अप नेट कनेक्शन का जमाना था। आज की तरह विण्डोज़-एक्सपी नहीं थे जिसमें हिंदी का यूनिकोड फ़ॉण्ट पहले से ही मौजूद रहता है और टाइपिंग में ज्यादा मेहनत नहीं उठानी पड़ती है। हमारे शुरुआती दिनों में WINDOWS 98 पर हिन्दी में टाइप करने के लिये तख्ती का प्रयोग किया जाता था। बजरंगबली के इस प्रसाद तख्ती के द्वारा हम अपने पी.सी. को हिन्दी समझने-बूझने लायक बनाते और फ़िर ‘आन लाइन’ हिन्दी की-बोर्ड छहरी की सहायता से कट-पेस्ट करते हुये पोस्ट लिखने लगे। टिपियाने के लिये भी कट-पेस्ट करते। तख्ती पर निर्भरता बहुत दिन तक रही। इसीलिये हम अपने को तख्ती के जमाने का ब्लागर कहते हैं।

पचीस-तीस लोगों के बीच ब्लाग-पोस्टें पढ़ीं जातीं। चिट्ठाविश्व संकलक देबाशीष चक्रवर्ती ने बनाया था। उसमें पोस्ट एक-दो दिन बाद दिखाई देतीं। हम उसी में खुश रहते। लोग एक-दूसरे की पोस्ट पर टिपियाते। ब्लाग संबंधी किसी भी परेशानी के लिये तकनीक के जानकार सदैव उपलब्ध रहते। उन दिनों ब्लागर जी-मेल से संबद्ध नहीं था। देबाशीष और जीतेन्द्र चौधरी के पास न जाने कितने ब्लागरों के पासवर्ड बने और मौजूद रहते थे। लोग ब्लाग लिखने में अपनी समस्या बताते और बाकी का काम ये और इनके अलावा दूसरे स्वयं-सेवक करते रहते। जीतेन्द्र तो  अपनी टिप्पणियों में लिखते भी  थे-

“आपसे केवल एक ई-मेल की दूरी पर हम हैं। कोई समस्या हो निस्संकोच बतायें।”

लोगों को लिखने के लिये उत्साहित करने के लिये कई उपाय किये गये। देबाशीष का इन गतिविधियों में खास योगदान रहा। बुनो कहानी के तहत एक कहानी को तीन लोगों ने मिलकर लिखने का काम शुरू किया। कहानी की शुरुआत कोई करता, उसका अगला भाग कोई लिखता और कहानी का समापन कोई तीसरा करता। हर लेखक को अपनी मर्जी से कहानी को कोई भी मोड़ देने की स्वतंत्रता थी। कुछ दिन में बुनो कहानी का सिलसिला टूट गया।उत्सुक श्रोता

अनुगूंज मेरी समझ में हिन्दी ब्लाग जगत के सबसे बेहतरीन अनुभवों  में से एक रहा। इसे देबाशीष ने शुरू करवाया। इसमें माहवार ब्लागर साथी किसी दिये विषय पर लेख लिखते और फ़िर जो साथी अनुगूंज का संचालन करता वह सभी लेखों की समीक्षा अक्षरग्राम चौपाल पर करता। मेरे ख्याल में हिन्दी ब्लागजगत के सबसे बेहतरीन लेखों का अगर संकलन किया जाये तो उनमें से काफ़ी कुछ अनुगूंज के दौरान लिखे गये होंगे। दिसंबर २००४ में हुये पहले अनुगूंज का विषय था- क्या देह ही है सब कुछ? संयोग कुछ ऐसा कि काफ़ी दिन चलने के बाद अनुगूंज का आयोजन भी बन्द हो गया।

उन दिनों की एक और याद है। अंग्रेजी ब्लाग वाले भारतीय ब्लाग मेला का आयोजन करते थे। उसमें वे लोग सप्ताह में चुनी हुई पोस्टों का जिक्र करते। हम हिंदी वाले ब्लागर भी वहां जाकर अपनी-अपनी पोस्टों का लिंक देने लगे। जो अंग्रेजी ब्लागर हिंदी समझ लेते थे उन लोगों ने हम लोगों की पोस्टों का जिक्र किया। लेकिन एक बार एक ब्लागर ने हमारी पोस्टों को क्षेत्रीय भाषा (हिन्दी) में  लिखी होने की बात कहकर उनका जिक्र करने से इन्कार कर दिया। फ़िर तो वो दे तेरे की, ले तेरे की हुई कि बेचारे को अपना कमेंट बक्सा बन्द करना पड़ा। इस घटना की  प्रतिक्रिया में २००५ के शुरू में चिट्ठा चर्चा प्रारम्भ किया गया जो संयोगवश अभी तक चल रहा है।

इसके बाद चिट्ठाविश्व के धीमा होने की बात कहकर फ़िर नारद की शुरुआत की गयी। इसे पंकज नरूला उर्फ़ मिर्ची सेठ ने शुरू किया था। बाद में इसका संचालन जीतेन्द्र चौधरी करने लगे। काफ़ी दिनों  तक  नारद हिन्दी ब्लाग जगत का सर्वप्रिय संकलक बना रहा। बीच में नारद पर ट्रैफ़िक बढ़ जाने के कारण इसके बंद होने की नौबत आयी तो ब्लागर साथियों ने चंदा करके इसको फ़िर से शुरू करवाया।

जून २००७ में हिंदी ब्लाग जगत के सबसे देरी तक चलने वाला नारद विवाद शुरू हुआ। एक ब्लागर ने बेंगाणी बंधुओं पर आपत्तिजनक व्यक्तिगत टिप्पणी कर दी थी। हमने आपसी सहमति से उस ब्लाग को नारद  पर  बैन कर दिया। इसके बाद तो शुरू हुआ विवाद बहुत दिन तक चला। सारे ब्लाग जगत के लोग दो खेमों में बंट गये। नारद-समर्थक और नारद-विरोधी। कुछ लोग सामंजस्य बिठाने की बात भी कर रहे थे लेकिन नारद विरोधी लोग हमें तानाशाह और अभिव्यक्ति का दुश्मन बताते हुये प्रतिबंध की तुलना आपातकाल से करते रहे। हम अपने कदम को जायज ठहरा रहे थे। मैंने भी इस पर एक पोस्ट लिखी- नारद पर ब्लाग का प्रतिबंध - अप्रिय हुआ लेकिन गलत नहीं हुआ

बहरहाल काफ़ी दिन विवाद चलने के बाद ब्लागवाणी संकलक भी शुरू हुआ। इसके बाद चिट्ठाजगत आया। अभी  नारद को मिलाकर यही तीन प्रमुख संकलक हैं।

आज की तारीख में हिंदी ब्लाग जगत में लगभग छह हजार से अधिक ब्लाग हैं। हर दिन कम से कम पन्द्रह-बीस ब्लाग नये जुड़ने की सूचना मिलती है। लेकिन जब हमारे ब्लागों की संख्या एक सौ होने वाली थी तो हम एक-एक ब्लाग की राह तकते रहते थे कि आंकड़ा सौ तक पहुंचे। पलक पांवड़े बिछाये हर नये ब्लाग का इंतजार करते। जैसे ही सौ ब्लाग हुये हम लोग बच्चों की तरह अस्सी, नब्बे पूरे सौ कहते हुये खुशी से उछल पड़े थे।

ब्लाग के बारे में अलग-अलग लोग अपने-अपने अनुसार धारणा बनाते हैं। पत्रकार इसे मीडिया के माध्यम के रूप में प्रचलित करना चाहते हैं और साहित्यिक रुचि के लोग इसका साहित्यिकीकरण करना चाहते हैं। मेरी समझ में ब्लाग अभिव्यक्ति का एक माध्यम है। अब यह आप पर है कि आप इसका उपयोग कैसे करते हैं। लेख, कविता, कहानी, डायरी, फोटो, वीडियो, पॉडकास्ट और अन्य तमाम तरीकों से आप ब्लाग की सहायता से अपने को अभिव्यक्त कर सकते हैं।

अभिव्यक्ति के इसी सिलसिले में ब्लाग में कबाड़ से लेकर कंचन तक तक सब कुछ मौजूद है। अगर अस्सी फ़ीसदी कचरा है तो बीस फ़ीसदी कंचन भी मौजूद है। अब यह हम पर है कि हम यहां कंचन की मात्रा कैसे बढ़ाते हैं।

ब्लाग शुरू करना बहुत आसान है। आपका एक जीमेल एकाउन्ट होना चाहिये। इसके बाद आप ब्लागर डाट काम पर जाकर तीन चरणों में अपना ब्लाग शुरू कर सकते हैं। किसी भी किस्म की परेशानी होने पर किसी भी  ब्लाग पर जाकर या मेल लिखकर अपनी परेशानी बतायें वह दूर हो जायेगी। हिंदी के ब्लागर हर जगह मौजूद हैं।

हिंदी ब्लागिंग के इतिहास पर चर्चा के लिये मुझे पन्द्रह मिनट मिले थे। न जाने कितने यादें हैं पिछले चार-साढ़े चार की। सबको पन्द्रह-बीस मिनट की बतकही में समेटना मुश्किल है और आपके साथ अन्याय भी। इसलिये मैं अपनी बात यहीं समाप्त करता हूं। आपने मुझे इतने धैर्य से सुना इसके लिये शुक्रिया।

[नोट: अनूप जी ने अपनी आदत के मुताबिक कानपुर लौटकर स्मरण के आधार पर अपनी वार्ता की स्क्रिप्ट फुरसत से लिखकर मुझे उपलब्ध करा दिया। इसलिए मुझे इस पाठ को ठेलने में प्रायः कुछ भी नहीं करना पड़ा। इसलिए इसे ‘फुरसतिया टाइप पोस्ट’ के बजाय हू-बहू फुरसतिया पोस्ट ही समझा जाय। ]

...जारी

अगला पाठ: डॉ. अरविन्द मिश्रा साइंस ब्लॉगिंग पर

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

LiveJournal Tags:

25 comments:

  1. हिन्‍दी चिट्टाकारी के आदि प्रराम्भिक समय को अनूप जी ने देखा है, वाकई सन् 2004 में चिट्ठाकारी के बारे सोचना और आज की भाति संवाद स्‍थापित करना बहुत कठिन था। आज की आधुनिकता में सुविधाओं में चिट्ठाकारी को सरल बना दिया है।

    ReplyDelete
  2. लगता है आज कल सोते ही नहीं हो. बहुत ही तथ्य परक पोस्ट है यह जिससे हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास पता चलता है. सबसे बड़ी बात - भाषा की सरल रवानी.

    रतजगिया सिद्धार्थ और फुरसतिया अनूप दोनों ही अनुपम हैं. धन्यवाद, तत्पर रिपोर्टिंग के लिए.

    ReplyDelete
  3. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  4. ब्लॉगरी की प्रारंभिक कठिनाइयों और उसकी यात्रा की जानकारी देती महत्वपूर्ण प्रविष्टि । आभार ।

    ReplyDelete
  5. वाह! हिंदी ब्लॉगजगत के बीते दिनों की खूब याद दिलाई आपने।

    अब हमें क्या पता था कि कभी हमारा ब्लॉग भी, गिनती में 102वाँ या 107वाँ गिना जायेगा क्योंकि हमारा ब्लॉग शुरू हुया था 17 सितम्बर 2005 को!

    अब तो कई और बातें भी याद आ रही हैं।

    बहुत बहुत धन्यवाद एक अच्छी, पुरानी यादों की ओर ले जाने वाली सारगर्भित रिपोर्ट के लिए

    ReplyDelete
  6. रिकैपिचुलेशन !

    ReplyDelete
  7. हिन्दी ब्लॉग जगत के शुरुआती दिनों की याद दिला कर अनूप जी नें हम सभी को पुनः उर्जामय कर दिया .

    ReplyDelete
  8. साईज़ और मैटर देखकर अंतिम खुलासा पहले ही खुल सा गया था कि खालिस फुरसतिया पोस्ट और सिद्धार्थ भाई ठेल रहे हैं..फिर सब स्पष्ट हो गया. अच्छा अभिभाषण रहा उनका!!

    ReplyDelete
  9. हिन्दी में ब्लाग के बारे में इतिहास पहली बार पढ़ा । यद्यपि एक दिन में 6000 ब्लाग कम नहीं होते, उनको और बढ़ाने की आवश्यकता है । हिन्दी ब्लाग में समाचार, कविता, कहानी व संस्मरण आदि सभी कुछ है ।
    ब्लाग ने सभी को लेखक व पाठक बना दिया है लेकिन अभी भी उसे लिखने व पढ़ने के लिये कम्प्यूटर के सामने बैठना पड़ता है जिससे विचारों का प्रवाह एक समय में सीमित हो जाता है । हर समय हर कोई लेखक में पाठक हो, भविष्य इसका आना है । विचार कहीं भी आते हैं और सबसे अधिक तब आते हैं जब आप बाहर होते हैं या खाली होते हैं ।
    मैं उद्यान में बैठकर अपने मोबाइल पर आपका ब्लाग पढ़ने के बाद उसी में टिप्पणी भी टाइप कर रहा हूँ लेकिन उसे भेजने के लिये मुझे किसी कम्प्यूटर के पास जाना पड़ेगा । कारण यह है कि टिप्पणी बाक्स में टिप्पणी ब्लाक जैसी दिखती है और यह मोबाइल से पोस्ट भी नहीं होती । मेरे सुझाव निम्नवत हैं
    1. ब्लागरों को अपनी ब्लागों का मोबाइल वर्ज़न भी उतारना चाहिये
    2. ब्लागरों को अधिक से अधिक ऐसे मोबाइल का उपयोग करना चाहिये जिसमें आप इन्टरनेट देख सकें और हिन्दी पढ़, लिख सकें । विन्डो मोबाइल में यह सुविधा है
    3. ईमेल के माध्यम से ब्लाग व टिप्पणी पोस्ट करने की व्यवस्था से मोबाइल का उपयोग इस क्षेत्र में बढ़ेगा(यदि हो तो बतायें)
    4. टिप्पणी बाक्स में हिन्दी टाइप करने की सुविधा हो मोबाइल में (डेक्सटाप में है)।
    मुझे लगता है कि 2004 में हिन्दी ब्लाग प्रारम्भ होने के बाद वर्तमान में सभी लेखकों/पाठकों की यह मूलभूत आवश्कता हो गयी है ।
    हाँ 15 मिनट में जो बतकही न हो पायी थी, उसे विस्तृत अपने ब्लाग में बताइये । उत्सुकता व प्रतीक्षा दोनो ही रहेगी ।

    ReplyDelete
  10. ब्लॉग्गिंग में, मेरे जैसे लेट आने वालों के लिए तो यह विरासत के परिचय सा है.
    धन्यवाद .

    ReplyDelete
  11. ब्लौगिंग कार्यशाला का आयोजन कर काफी अच्छा कार्य किया आपलोगों ने. बधाई. सारी पोस्ट्स काफी उत्सुकता से पढीं. अगली पोस्ट्स का इंतजार है.

    ReplyDelete
  12. हम जैसे नये ब्लागर की जानकारी बढाने के लिये आभार्।

    ReplyDelete
  13. बहुत शानदार विवरण. हिंदी ब्लागिंग के बारे शुरुआत से लेकर अभी तक, एक ही जगह पर अनूप जी का वक्तव्य पढना बहुत अच्छा लगा.

    सिद्धार्थ जी, इस पोस्ट के लिए साधुवाद.

    ReplyDelete
  14. मुझे पता था कि इस फुरसतिया प्रवचन में बहुत कुछ होगा. और वास्तव में है भी.

    ReplyDelete
  15. इतिहास संक्षिप्त ही सही पर पहुँचा तो सही सब तक। फुरसतिया जी को धन्यवाद।

    ReplyDelete
  16. यह टिप्पणी मैंने व्यक्तिगत समझ कर हटा दिया था लेकिन नई ब्लॉगी जनता के हित में फिर दे रहा हूँ :

    "
    तो भइ रतजगिया नहीँ, 'तकनीकी छलिया' हो. मैंने तो सोचा था कि ऐसी ट्रिक बाजी सिर्फ कॉर्पोरेट दुनिया में ही चलती है ! ब्लॉगरी की दुनिया तो पूरी प्रोफेशनल है ! भइ वाह !!

    आप के सूचनार्थ बता दूँ कि हमारे सिद्धार्थ भाई 'शेड्यूलिंग ऑप्शन' का प्रयोग करते हैं और मनचाहे समय पर पोस्टिंग हो जाती है जब कि ये ज़नाब उस समय खर्राटे ले रहे होते हैं."

    ReplyDelete
  17. वो ज्ञानवर्धक शाम फिर से ताज़ा हो गई । सिद्धार्थ जी इस बेहतरीन रिपोर्टिंग के लिए बधाई ।

    ReplyDelete
  18. बहुत अच्छी पोस्ट. हमने यहीं से सब देख सुन लिया. तख्ती से अपनी ब्लॉग्गिंग के शुरूआती दिन भी याद आ गए :)

    ReplyDelete
  19. हिन्दी ब्लोगिंग का इतिहास इतना समृद्ध नहीं रहा है मगर आने वाला कल अवश्य बड़ी उपलब्धियों का होगा ऐसी आशा है
    विवाद तो आज भी उठ जाते है पता नहीं कब इनसे छुटकारा मिलेगा
    जिस तरह ब्लोगिंग ने ओबामा को सर्वोच्च पद पर आसीन कर दिया काश कुछ ऐसा ही भारत में भी संभव हो पाता मगर ऐसा होगा जरूर आने वाले समय में.

    इस आशा के साथ
    आपका वीनस केसरी

    ((अगली ब्लॉगर मीट कब आयोजित कर रहे हैं ??))

    ReplyDelete
  20. डॉ.कविता वाचक्नवीSaturday, 16 May, 2009

    अनूप जी के अभिभाषण से साक्षात होने का वह अवसर स्मरणीय था।
    कार्यक्रम की स्मृतियाँ मन में रची हुई हैं।
    अब अगले वक्तव्य का लिखित पाठ प्रतीक्षित है।

    ReplyDelete
  21. महत्‍वपूर्ण पोस्‍ट के लिए आभार।

    ReplyDelete
  22. ये पोस्ट बहुत ही महत्त्वपूर्ण पोस्ट है। ब्लोगजगत के इतिहास के इतिहास के बारे में कई प्रश्न होते हैं नये ब्लोगरों के मन में उनमें से कुछ के जवाब यहां मौजूद हैं। आशा है फ़ुरसतिया जी इसके बारे में और भी जानकारी देगें।

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)