हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Monday, September 19, 2016

यही समय है आँखें खोलो (गीत)

एक अंग्रेजी व्हाट्सएप सन्देश से प्रेरित ताज़ी रचना
यही समय है आँखें खोलो
जब इस दुनिया से चल दूंगा, तुम रोओगे नहीं सुनूंगा
व्यर्थ तुम्हारे आँसू होंगे, तब उनको ना पोछ सकूंगा
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मेरी खातिर जी भर रो लो
यही समय है आँखें खोलो
मेरे पीछे तुम भेजोगे गुलदस्तों में फूल सजाकर
उनकी महक व्यर्थ जाएगी, छू न सकूंगा हाथ बढ़ाकर
बेहतर है तुम अभी यहीं पर फूलों वाली खुशबू घोलो
यही समय है आँखें खोलो

जब न रहूँगा इस दुनिया में मुझपर अच्छी बात करोगे
वह सराहना सुन न सकूंगा चाहे जितने भाव भरोगे
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मुझे सराहो मुझे भिगो लो
यही समय है आँखें खोलो

प्राण पखेरू उड़ जाने पर सारी गलती माफ़ करोगे
जान नहीं पाऊंगा वह सब जैसा भी इंसाफ करोगे
बेहतर है तुम अभी यहीं पर पाप मेरे निज मन से धो लो
यही समय है आँखें खोलो

जब न मिलूंगा आसपास तो कमी खलेगी तुमको मेरी
पर महसूस कहाँ होगा तब ढँक लेगी जब नींद घनेरी
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मिस करते हो खुलकर बोलो
यही समय है आँखें खोलो

इस दुनिया से लेकर हमको चल देगा जब काल हमारा
पछताओगे कितना कम था मेरे संग जो समय गुजारा
बेहतर है तुम अभी यहीं पर साथ-साथ जीवन में हो लो
यही समय है आँखें खोलो

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
ये है मूल रचना
*"When I'll be dead.....,*
*Your tears will flow,..*
*But I won't know...*
*Cry for me now instead !*

*You will send flowers,..*
*But I won't see...*
*Send them now instead !*

*You'll say words of praise,..*
*But I won't hear..*
*Praise me now instead !*

*You'll forget my faults,..*
*But I won't know...*
*Forget them now, Instead !*

*You'll miss me then,...*
*But I won't feel...*
*Miss me now, instead*

*You'll wish...*
*You could have spent more time with me,...*
*Spend it now instead !!"*
Moral......
Spend time with every person you love,
Every one you care for.
Make them feel special,
For you never know when time will take them away from you......

(भावानुवाद : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Friday, August 26, 2016

हरित दर्शन और पढ़ाई की कठिन राह

#साइकिल_से_सैर

तीन-चार दिन लगातार बारिश होने के बाद कल धूप खिली तो बाहर सड़क पर आवाजाही बढ़ गयी। सुबह बिस्तर पर पड़ा-पड़ा पहले तो मैं आलस्य रस का भोग करता रहा लेकिन अचानक उठ बैठा। मानो मेरी साइकिल ने जोर से घंटी बजाकर जगा दिया हो। बरामदे में खड़ी साइकिल ने दिखाया कि आँगन में बिछी धूप अमरुद के पेड़ की हरियाली के साथ ताल मिला रही है। मैंने फ़ौरन तैयारी की और साइकिल के साथ इंदिरा उद्यान के गेट का चक्कर लगाते हुए गोरा बाजार चौराहे तक जाकर परसदेपुर मार्ग पर निकल पड़ा।
सात बज चुके थे और स्कूली बच्चे घरों से निकलने लगे थे। साइकिल, स्कूटी, स्कूटर, रिक्शा, ठेला, ऑटो, वैन, जीप और बसों में सवार होकर अधिकांश बच्चे आज रंगीन टी-शर्ट्स में जा रहे थे। लाल, पीली, हरी और नीली टी-शर्ट शनिवार की यूनीफॉर्म होती है। इन चार रंगो से स्कूल के बच्चों के चार हॉउस बनते हैं। आशा, एकता, प्रेम और शांति (Hope, Unity, love & Peace) का सन्देश देते ये चार रंग प्राइवेट स्कूलों के बच्चों के ऊपर खिल रहे थे। सरकारी स्कूल सभी दिनों में प्रायः एक ही ड्रेस चलाते हैं। इसलिए सफ़ेद और खाकी वाले बच्चे भी दिखायी दे रहे थे।

लेकिन शहर से बाहर निकलने पर एक ही रंग का साम्राज्य चारो ओर फैला हुआ दिखा। धरती का इंच-इंच हरे और धानी परिधान से ढका हुआ था। पेड़ों की पत्तियां बारिश से धुलकर चमक रही थी। खेतों में धान और कुछ दूसरी फसलें भी और सड़क किनारे की खाली जमीन में उग आये खर पतवार और घासें भी, सभी एक ही ड्रेस-कोड का पालन कर रहे थे।

मैं भुएमऊ गेस्ट-हाउस के गेट के पास एक चाय की दुकान पर रुका। फूस की मड़ई के भीतर एक तख़्त पर बैठकर चाय पीते हुए मैं सड़क के उसपार पसरी हुई हरियाली और सड़क पर आती-जाती सवारियों को देखता रहा। देहात से शहर की ओर जाते साइकिल सवार मजदूर और स्कूली बच्चे व कोचिंग करने वाले विद्यार्थी निकलते जा रहे थे। मोबाइल कैमरे से सबकुछ समेट लेने का जी कर रहा था। नीले आसमान में यत्र-तंत्र सफ़ेद बादल लटके हुए थे जिनपर पड़ने वाली सूरज की तेज किरणें आकर्षक छटा बना रही थीं।
वहाँ से लौटते हुए एक जोड़ी सूखे पेड़ों ने रोक लिया। हरी-भरी धरती पर नीले आसमान में चमकते सूरज की किरणों से सराबोर ये तरुकंकाल ग़जब की कन्ट्रास्ट छवि प्रस्तुत कर रहे थे। इनके तने पर किसी उभरते कांग्रेसी नेता ने एक बोर्ड टंगवा रखा था जिसपर राहुल गांधी के जन्मदिन और रमजान व ईद की मुबारकबाद का सन्देश लिखा था। शायद गेस्ट हॉउस जाने वाले बड़े नेताओं और सोनिया जी के काफ़िले की नज़रे इनायत की उम्मीद से।

कुछ फोटो खींचकर आगे बढ़ा तो शहर की ओर साइकिल भगाते हुए अनुराग जायसवाल मिल गये। कॉमर्स की बारहवीं कक्षा के विद्यार्थी थे। अपनी साइकिल उनके बगल में लाकर मैंने बात शुरू की। उन्होंने सिविल लाइन्स तक आते-आते जो बातें बतायी वह एक सामाजिक अध्ययन का विषय है। महात्मा गांधी इंटर कालेज से उनका घर 10 किमी. दूर अयासपुर डीही गाँव में है। घर में छोटी बहन और माँ है, बाबा-दादी हैं। पिताजी राजस्थान में किसी मोज़े बनाने वाली फैक्ट्री में काम करते हैं। इन्हें स्कूल की पढ़ाई और कोचिंग करने के लिए रोज दो बार रायबरेली आना-जाना पड़ता है। यानि रोज 40 किलोमीटर साइकिल चलाते हैं।

मैंने सुझाया कि सुबह स्कूल के लिए निकलें तो टिफिन लेकर आया करें और शाम की कोचिंग निपटा के ही वापस जाया करें। बीच के तीन-चार घंटे किसी लाइब्रेरी में बैठकर उसका सदुपयोग करें। इसपर वे बोले कि घरपर कुछ जानवर हैं जिनकी देखभाल भी करनी पड़ती है। मैंने फिर समझाने की कोशिश की। दोपहर का ज्यादा समय आने-जाने में बर्बाद करना ठीक नहीं। थकान भी ज्यादा होती होगी और शाम को जल्दी नींद भी आती होगी। ऐसे में सी.ए. बनने का सपना बहुत कठिन हो जाएगा।

मेरी बात उन्हें कुछ-कुछ समझ में आती प्रतीत हुई क्योंकि जब हमारा रास्ता अलग होने को आया तो उन्होंने रुककर एक फोटो खिंचवाने के मेरे अनुरोध को सहर्ष स्वीकार कर लिया था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 


Wednesday, June 29, 2016

साइकिल के साथ तैराकी का लुत्फ़

रायबरेली के नेहरू स्टेडियम में स्विमिंग पूल चालू हुआ तो मैंने अपनी साइकिल से सैर का कार्यक्रम इस तरण-ताल से जोड़ दिया। पिछले महीने भर से मेरी रायबरेली में सुबह की चर्या प्रायः एक जैसी हो गयी है। अब साइकिल से इधर-उधर घूमने के बजाय मैं तैराकी की तैयारी से निकलता हूँ, जेलरोड से चलकर स्टेडियम तक साइकिल से जाता हूँ। रास्ते में रोज ही वही चेहरे दिखायी देते हैं। बुजुर्ग और प्रौढ़ टहलते हुए, सड़क किनारे बने झोंपड़ों की औरतें घर के सामने झाड़ू-बुहारू और बर्तन मांजते हुए, घोषियों के बाड़े में गायों और भैंसों की सेवा में लगी लड़कियाँ और औरतें गोबर निकालती हुई और पुरुष दूध दुहते हुए, अपने डिब्बों के साथ कुछ लोग दूध नपवाने की प्रतीक्षा करते हुए और चाय की दुकान वाले भठ्ठी में कोयला भरते और आग सुलगाते हुए मिलते हैं।
सड़क की पटरी पर कुछ छोटी झोपड़ियां ऐसी भी हैं जिनके बाहर पड़ी खटिया पर कुछ बच्चे-बच्चियां और मर्द गहरी नींद में सोये मिलते हैं जैसे रात में गर्मी और ऊमस ने सोने न दिया हो और भोर की ठंडी हवा मिलने के बाद चैन की नींद आयी हो। खटिया के पास ही घर की औरत जमीन पर बैठकर सब्जी काटती या खाना बनाने की तैयारी करती दिख जाती है। एक दो तांगे भी मुंह ऊपर किए खड़े नज़र आते हैं जिनमें जुतने वाले घोड़े या घोड़ियां छुट्टा घूमते और जेल के सामने वाली खाली जमीन में घास चरते दिख जाते हैं। इन्हीं झोपड़ियों के सामने कुछ ठेले भी खड़े मिलते हैं जिनपर चमकदार सजावट और रंगीन बोतलें देखकर लगता है कि ये शहर के अलग अलग नुक्कड़ों पर रंगीन बर्फ़ वाला पानी, शर्बत और दूसरी चीजें बेचने के लिए जाते होंगे।
पेट्रोल पंप से आगे बढ़ने पर साई के स्पोर्ट्स हॉस्टल के प्रांगण में बने चबूतरे पर कुछ बुजुर्ग योग और प्राणायाम करते दिख जाते हैं तो स्टेडियम के गेट से लडके-लड़कियाँ, औरतें और मर्द अपने-अपने स्वास्थ्य की जरूरतों व पसंद के हिसाब से दौड़ने, टहलने, गप्पें लड़ाने, टाइम पास करने, हवा खाने या क्रिकेट, बैडमिंटन, वॉलीबॉल, फुटबॉल, हॉकी आदि खेलने के लिए आते या वापस जाते मिल जाते हैं। मैं अपनी साइकिल लेकर जब भी गेट के भीतर घुसता हूँ तो बैडमिंटन कोर्ट के सामने कोई न कोई साथी मिल जाता है। 
मुस्कान और अभिवादन के बाद सीधे स्विमिंग पूल के चैनेल गेट की और बढ़ जाता हूँ- रोज यह सोचता हुआ कि स्टेडियम के भीतर की यह सड़क जो अब गढ्ढों में बिखरे कंकड़-पत्थर के ढेर में तब्दील हो चुकी है वह कब किसी विकास योजना की कृपा प्राप्त करेगी। इस सड़क की दोनो तरफ अशोक के पेड़ जो बत्तीस साल पहले यहाँ के चौकीदार/चपरासी/माली रामनरेश ने लगाये थे वे बढ़कर आसमान से बातें करने लगे हैं, लेकिन सड़क का निरंतर ह्रास होता गया है। प्रकृति की देखभाल पाकर पेड़ों ने तो आसमान छू लिया लेकिन मनुष्य के भरोसे रहने वाली सड़क उसका भार ही ढोती रही और दुर्दशा से ग्रस्त हो गयी।

तरण ताल का निर्धारित समय साढ़े-पाँच से साढ़े-छः का है लेकिन मैं पन्द्रह-बीस मिनट देर से ही पहुँचता हूँ। वहाँ पहले से शुरू कर चुके ढेर सारे किशोरों और बड़ी उम्र के शौकिया तैराकों के बीच डाइव लगाकर पहुँचता हूँ और हरे पानी से भरे ताल में तैरने का अभ्यास करता हूँ। कोच की सीटी बजने के बाद सभी बाहर निकलते हैं। सबसे अंत में मैं निकलता हूँ ताकि बाथरूम में धक्का-मुक्की से बचा रहूँ।
आज-कल मानसून की पहली बारिश के बाद मौसम सुहाना लगने लगा है। धूल, गर्मी और पसीने से राहत मिल गयी है और घर से बाहर निकलना अच्छा लग रहा है। आज जब हमलोग तैर रहे थे तो आसमान में अचानक काले बादलों का एक पहाड़ ऊपर से गुजरा। लगभग अँधेरा छा गया। कुछ बच्चे तो चिल्ला-चिल्लाकर कहने लगे- कोच अंकल, लाइट जलवा दीजिए। लेकिन दो-तीन मिनट में ही हवा ने बादलों को परे धकेल दिया और रोशनी बढ़ गयी। एक बच्चे का जन्मदिन भी मनाया जा रहा था। बेचारे को पूल में सभी तंग कर रहे थे। फिर फोटुएं भी खींची गयीं।

आज जब मैं तैराकी के बाद बाथरूम में घुसा तो अगले बैच के बच्चे तैराकी के लिए जमा हो चुके थे। कोच द्वारा उनसे तैराकी के पहले कुछ वार्मअप एक्सरसाइज करायी जा रही थी। लेकिन दो तीन बच्चे बाथरूम एरिया में छिपे हुए कानाफूसी कर रहे थे। उनका आशय यह था कि अभी कसरत से बचा रहा जाय और जब पानी में उतरने की बारी आये तब बाहर निकला जाय। मैं यह हरकत भी प्रायः रोज देखता रहा हूँ। आज मैंने कोच को बता दिया। कोच ने उन बच्चों को डांटा और पूल का चक्कर तो लगवाया ही, मुझे बताया कि उनमें से एक के पापा यह शिकायत भी कर रहे थे कि दो महीने से तैरने के बावजूद उसका वजन क्यों नहीं घट रहा है।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com

Saturday, June 11, 2016

कुकरैल जंगल की सैर के बहाने...

इंदिरानगर मुंशीपुलिया के सेक्टर 16 के अपने अपार्टमेंट की छत से जब उत्तर की ओर देखता था तो कंक्रीट के जंगल के पीछे मीलों दूर प्राकृतिक हरियाली वाले असली जंगल की स्काइलाइन दिखायी देती थी। जब मेरी साइकिल कुछ दिनों के लिए लखनऊ पहुंची तो मैंने उस हरियाली को नजदीक से देखने का मन बनाया। 
रविवार की सुबह जल्दी उठकर मैं तैयार हुआ और धूप का चश्मा खोल सहित कैरियर में दबाकर निकल पड़ा इन्दिरानगर के उत्तरी छोर की थाह लगाने। सेक्टर 17 की पुरानी सब्जी मण्डी के पास से गुजरते हुए मानस सिटी की ओर जाने वाली सड़क पर बढ़ा तो 'गहरी सीवर की खुदाई का काम प्रगति पर' होने के कारण 'कष्ट के लिए खेद' प्रकट करने वाले बोर्ड ने रास्ता रोक लिया। लेकिन ऐसे छोटे अवरोध से न मैं डिगने वाला था न मेरी साइकिल रुकने वाली थी। बगल की एक पतली गली पर टेढ़े-मेढ़े चलते हुए एक कच्चे रास्ते से होकर मैं चांदन होते हुए सुगामऊ जाने वाली पक्की सड़क पर पहुँच गया।
यह इलाका मेरे लिए बिल्कुल अनजान था। मैं तो बस दिशाओं को पहचान कर शहर से बाहर की ओर जाने वाली सड़क पर आगे बढ़ते जाना चाहता था ताकि शहरी प्रदूषण से दूर गाँव की साफ-सुथरी हवा में साइकिल चला सकूँ।
चाँदन में एक बड़ी सी सुन्दर मस्जिद मिली और एक बड़ा सा मैरेज हॉउस भी। सड़क पर साफ-सफाई की कोई व्यवस्था नहीं दिखी। यहाँ न तो नगर निगम के स्वीपर आते होंगे और न ही ग्राम पंचायत के सफाई कर्मी। यहीं पर मुझे एक विचित्र नजारा देखने को मिला।
मुझे एक के बाद एक बीस-पच्चीस लड़के मिले जिनकी उम्र सोलह से बाइस वर्ष के बीच रही होगी। वे सभी एक हाथ में गाइड बुक और नोट्स की कॉपी, जीन्स की जेब में कलम और मोबाइल तथा दूसरे हाथ में जमीन पर बैठने के लिए प्लास्टिक वाली सीमेंट की बोरियाँ तह करके पकड़े हुए चले जा रहे थे। आगे एक आवासीय दड़बानुमा मकान मिला जिसमें ये परीक्षार्थी प्रवेश कर रहे थे। मैं रुके बिना आगे बढ़ा तो दूसरी और से भी वैसे ही विद्यार्थी आते मिले। जरूर यहाँ कोई सस्ती डिग्री बनवाने का कारखाना लगा होगा। मन तो हुआ कि मोबाइल कैमरे से इस गतिविधि का स्टिंग ऑपरेशन कर लूँ लेकिन सुरक्षा की कोई गारंटी न होने के कारण इस विचार को फ़ौरन मटिया कर आगे बढ़ गया।

इसके आगे बायीं ओर एक बड़ा सा खाली मैदान था जिसके पीछे मानस ग्रीन सिटी बस रही थी। खाली मैदान असमतल था, कूड़े-कचरे का आश्रय था और इसमें आवारा झाड़ियों के झुरमुट भी थे। आसपास जिनके घरों में शौचालय नहीं उनके लिए भी यहाँ सुबह का सुभीता था। कुछ लोग हाथ में पानी की बोतल लटकाये उस ओर तेजी से जाते और आराम से वापस आते दिखाई दिये। यह सब अपनी आँखों से लाइव देखता हुआ मैं चलता रहा।
आगे बढ़ा तो एक बड़ी सी झोपड़पट्टी दाहिनी ओर फैली हुई दिखाई दी। टिन के पत्तरों और टाट से घेरकर बने इन असंख्य झोपड़ों की छत पर इतने चीथड़े कहाँ से आते हैं यह समझ में नहीं आया। इनमें रहने वाले पुरुष मुख्य रूप से घर-घर घूमकर कबाड़ खरीदने का काम करते जान पड़ते थे। वहाँ खड़े ठेले और जमा कबाड़ तो यही बता रहे थे। औरतें भी शहरी मुहल्लों में जाकर कामवाली बाई का काम ही करती होंगी। वहीं एक कूड़ा बीनने वाली युवती अपने काम पर निकल चुकी दिखायी दी। सड़क के दूसरी ओर एक पब्लिक स्कूल मिला जो तीन-मंजिला था। नाम था तथागत पब्लिक स्कूल और तथागत टेक्निकल इंस्टीट्यूट। खूब रंगा-पुता यह संस्थान कई प्रकार के कोर्स चलाने की सूचना दे रहा था। 
आगे सुगामऊ का उपनगरीय बाजार मिला जो शहर और देहात के बीच की कड़ी बना हुआ है। इसकी दुकानों पर लगे बोर्ड बता रहे थे कि यहाँ के लोग भी अपने को इंदिरानगर का ही बताते है। इसे पार करने पर पक्के मकानों की सृंखला टूटने लगी और सड़क किनारे की जमीन चारदीवारी वाले खाली प्लॉट्स में बंटती हुई मिलने लगी। बीच-बीच में इक्का-दुक्का परचून की दुकानें थीं जहाँ मोबाइल रिचार्ज की सुविधा भी उपलब्ध थी। बिल्डिंग मटेरियल वाली बिना छत की अनेक दुकानें भी थीं जो गाँव की ओर पाँव पसारते शहर की जरुरी खुराक मुहैया कराती हैं। ट्रेक्टर-ट्रॉली या छोटे ट्रकों पर ढोयी जाती ईंट और बालू तथा बड़े ट्रकों पर बाहर से आती गिट्टी, मोरंग और सरिया की खेप इन लगातार खड़े होते मकानों और बनते हुए मुहल्लों में खप रही है और खप रहे हैं आम के असंख्य बाग भी जिनके कारण कभी यहाँ एक गाँव का नाम पड़ा था अमराई।
इसी सड़क पर एक मकान के आगे फुटपाथ पर खाना बनाते-खाते मजदूर मिले। ईंटो को तीन तरफ से जमाकर बनाये गए लकड़ी के कामचलाऊ चूल्हों पर सब्जी और चावल या रोटी बनाकर एल्युमिनियम की थाली में परोसकर हरी मिर्च और नमक के साथ खाकर ये श्रमजीवी नया शहर खड़ा करने के काम पर निकल जाएंगे। मैंने रुककर पूछा तो पता चला कि उन्होंने सात सौ रूपये मासिक किराये पर एक कमरा ले रखा है जिसमें बिजली का कनेक्शन नहीं है। इसमें चार-पाँच मजदूर एक साथ रहते हैं। रहते क्या हैं, अपने कुछ कपड़े, बर्तन और राशन रखते हैं। रात में सोने के लिए मकान की छत है और सुबह दिशा-मैदान के लिए खाली जमीने हैं जिनकी बाउंड्री से आड़ भी मिल जाती है। मकान मालिक ने एक नल जरूर लगवा दिया है जिसमें एक-दो घंटे पानी भी आता है जिसे वे पी सकते हैं। फतेहपुर, मऊ, इटावा, सीतापुर और हरदोई जिले से आकर ये दिहाड़ी मजदूर जैसी कठिन दशा में जी रहे हैं वह मार्क्स के सर्वहारा की याद दिलाती है।
आगे सड़क एक तिराहे पर जाकर खत्म हो गयी जिसका नाम था बजरंग चौराहा। इसके आसपास के गाँव हैं मोहम्मदपुर और रसूलपुर। इस तिराहे पर एक दुकान की भठ्ठी जल रही थी जिसपर आलू उबाला जा रहा था। मैंने साइकिल खड़ी करते हुए पूछा- चाय पिला दोगे क्या? दस बारह साल के लड़के ने हाँ में सिर हिलाया और प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठने का इशारा किया। मैंने पहले से बनी रखी चाय लेने से मना कर दिया और अदरक वाली स्पेशल चाय बनाने को कहा वह भी पैन को धुलकर और ताजी पत्ती डालकर।
उस छोटू ने अब मुझे ध्यान से स्कैन करते हुए देखा और समझ गया कि मैं उसका रेगुलर ग्राहक नहीं बल्कि शहर से भटका हुआ नया आदमी हूँ। मैंने बात-बात में उसका अता-पता जानने की कोशिश की। नाम था रामशंकर यादव जो एक साल पहले फतेहपुर के अपने घर से भागकर लखनऊ कमाने आया था। छठी क्लास में फेल हो जाने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी क्योंकि स्कूल में पढ़ाई नहीं होती थी, केवल खिचड़ी खिलाते थे, वह भी बहुत ख़राब। उसने यह तंज भी कसा कि जब इम्तहान में कोई फेल ही नहीं हो सकता तो पढ़ाई क्या घंटा होगी...?
उसने बताया कि इस दुकान का मालिक ही यहाँ का मेन कारीगर था जो अभी आया नहीं था। आठ बजे आता है। तबतक वह आलू उबालकर छील लेगा। सब्जी की तैयारी कर लेगा। छोला के लिए चना भी उबाल देगा और चावल भी बना देगा।
इस ढाबे के मुख्य ग्राहक आसपास काम करने वाले प्रवासी मजदूर थे। एक थाली खाना 30 रूपये में मिलता था। चार रोटियाँ, सब्जी, दाल और क्वाटर चावल। मैंने पूछा- इतने में मजदूर का पेट भर जाता है क्या? लड़का चुप रहा लेकिन इस प्रश्न का उत्तर दिया भीतर बेंच पर बैठे एक मजदूर ने जो हमारी बात ध्यान से सुन रहा था। बोला- कभी नहीं साहब। पचास रूपये से कम नहीं लगता है। चार रोटी इस्टरा लो तब कुछ बुझाता है। कुछ भी इस्टरा लेने पर पैसा लेता है। बहुत चालू है यह लौंडा।

चालू कहे जाने पर रामशंकर की बाछें खिल गयीं। मैंने पूछा- घर की याद आती है?
बोला- अभी तो गये थे। आठ की मार्कशीट भी बनवा लाये हैं।
-पढ़ने का मन करता है क्या?
-क्या पढ़ें, पैसा भी कमाना जरूरी है।
-कितना कमा लेते हो?
-अभी तक तो काम सीख रहा था। अब सब सीख गया हूँ तो मालिक तनख्वाह बढ़ाएंगे।
-फिर भी ढाई-तीन हजार तो मिलता ही होगा?
इसपर वह हँसने लगा जैसे इतने रुपयों की कल्पना करके ही उसे ख़ुशी मिल गयी हो। मैंने और कुरेदना ठीक नहीं समझा। इतना जरूर बता दिया कि ठीक से पढ़ लेते तो अच्छी नौकरी मिलती और सुन्दर छोकरी भी। छोकरी शब्द सुनते ही उसकी बत्तीसी फिर चमक उठी।

इस बीच चावल का पानी उबलने लगा था और वह छनौटे से चावल के दाने निकालकर उनके पक जाने का पता लगाने लगा। मैंने पूछा कि चावल में पानी ज्यादा तो नहीं है। उसने बताया कि पक जाने के बाद चावल पानी से छानकर निकाल लिया जाएगा। पानी में छोड़ देने पर तो यह गीला होकर चिपक जाएगा। कोई खाएगा ही नहीं। लेबर को 'फरहर' चावल पसंद है।

इतना ज्ञान पाते-पाते मेरी चाय खत्म हो गयी। मैंने उसे यह नहीं बताया कि छानकर बनाये गये चावल से कुछ कार्बोहाइड्रेट निकलकर पानी में चला जाता है और बर्बाद हो जाता है। उसे चाय के पाँच रूपये थमाते हुए मैंने जंगल की ओर जाने का रास्ता पूछा और इस बजरंग चौराहे से मोहम्मदपुर होकर कुर्सी रोड की ओर जाने वाली सड़क पर चल पड़ा।
आगे एक पतली नहर मिली जिसमें पानी भी भरा हुआ था। वहीं आम के पेड़ पर लटके हुए टिकोरे मेरी साइकिल को फिर से रोकने में सफल हो गये। एक चारदीवारी के भीतर मक्के की हरीभरी फसल लहलहा रही थी।
इस बीच धूप चढ़ आयी थी तो मैंने काला चश्मा चढ़ा लिया। सुरम्य वातावरण के आनंद को लंबी और गहरी साँसों में महसूस करने के बाद मैं आगे बढ़ा तो जरहरा गाँव को पार करके कुकरैल के जंगल में बनायीं गयी पक्की सड़क पर आ गया जो जंगल को पार करके शहर में चली जाती है। रास्ते में एक कम उम्र का छुट्टा साँड़ आता दिखा तो मेरा कलेजा धकधक करने लगा। लेकिन मुझे देखकर साँड़ की हवा भी ख़राब हो गयी शायद। उसने सड़क छोड़कर पेड़ों के पीछे की राह ली और मैंने राहत की साँस। 

वहीं दूसरी ओर एक ईंट भट्ठे की चिमनी धुँवा उगल रही थी। मैंने तेजी से साइकिल दबाते हुए घने जंगल की ओर रुख किया। करीब छः किलोमीटर जंगल के भीतर साइकिल से चलने का आनंद अद्भुत था। पहले बबूल, बाँस, नीम, चिलबिला और फिर सागौन, साखू, यूकेलिप्टस, सेमल, और दूसरे अज्ञातनाम पेड़-पौधों से लबरेज इस जंगल में शहर से लगे सिरे पर वन विभाग द्वारा एक पार्क (पिकनिक स्पॉट) विकसित किया गया है जहाँ मगरमच्छों का विशेष आकर्षण है।
जब मैं काफी चल लेने के बाद थकान महसूस करने लगा तब एक मील के पत्थर ने बताया कि फरीदीनगर 5 किमी दूर है। इसका मतलब था कि मुझे अभी घर पहुँचने के लिए आठ-नौ किलोमीटर और चलना पड़ेगा। मैंने सोच लिया कि अब बिना कहीं रुके घर चलना चाहिए।लेकिन रास्ते में मुझे तीन जगह रुकना पड़ा। एक, जहाँ की हरियाली पेड़ों में आग लगने के कारण मिट गयी थी और सड़क किनारे पेड़ों के काले कंकाल दिखायी दे रहे थे। दूसरे, जहाँ एक ग्रामीण अपने खेत में पैदा हुए बिल्कुल ताजा नेनुआ और परवल रखकर मेरे जैसे किसी शहरी ग्राहक की प्रतीक्षा कर रहा था; और तीसरा जब मैं पिकनिक स्पॉट के गेट से अपने घर जाने के मुख्य रास्ते के अवरुद्ध हो जाने के कारण वैकल्पिक रास्ता नहीं समझ पा रहा था। 
अस्तु, मैंने पर्णविहीन पेड़ों के साथ अपनी तस्वीरें खींचने, सस्ती-ताज़ी-हरी सब्जी खरीदकर साइकिल के कॅरियर में दबाने के बाद फरीदीनगर से मुंशी पुलिया के बीच टेढ़ी-मेढ़ी गलियों के बीच भटकते-पूछते हुए रास्ता तय किया और दुबारा ऐसी सैर पर जाने का खुद से वादा करके घर लौट आया।
(सत्यार्थमित्र)
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Tuesday, May 24, 2016

सी.एम.के साथ साइकिल यात्रा

#साइकिल_से_सैर, लखनऊ में


पिछले शनिवार को बुद्ध पूर्णिमा और अगले दिन रविवार की छुट्टी तो थी ही, शुक्रवार को एनपीएस पर परिचर्चा के लिए मुख्यालय से सभी कोषाधिकारियों को बुलावा आ गया तो मुझे लगातार चार रातें और तीन दिन लखनऊ में गुजारने का मौका मिल गया। वृहस्पतिवार की शाम ऑफिस से लौटकर लखनऊ के लिए चलने को हुआ तो मेरी पार्टनर भी साथ चलने को मचल उठी। इतने दिनों रायबरेली में अकेले गुजारना इसे गँवारा नहीं था। मैंने भी इसके साथ लंबे ब्रेक को टालने के लिए इसे साथ ले चलना ही ठीक समझा। इस तरह मेरी सरकारी गाड़ी पर सवार होकर मेरी हमसफ़र साइकिल नवाबों की नगरी में नमूदार हो गयी।
लखनऊ में अगली सुबह स्पेशल हो गयी। मेरी बेटी वागीशा साइकिल चलाने के लिए बहुत उत्साहित थी। दरअसल मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी ने उस दिन पर्यावरण को प्रदूषण मुक्त रखने में साइकिल के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए स्कूली बच्चों के साथ साइकिल चलाने का कार्यक्रम बनाया था। टाइम्स ऑफ़ इण्डिया के Go Green Campaign का हिस्सा बने इस कार्यक्रम में शहर के प्रत्येक स्कूल से एक बच्चा बुलाया गया था। वागीशा को उसके स्कूल से इसके लिए चुना गया था। बच्चे के साथ अभिभावक भी 'सादर' आमंत्रित थे। फिर क्या था। मैंने अपनी साइकिल से ही मुंशी पुलिया से मुख्य मंत्री आवास की दूरी तय करने की ठानी। अलबत्ता बेटी को उसकी साइकिल सहित गाड़ी पर बिठाकर 5-कालिदास मार्ग के लिए रवाना कर दिया।

मेरी साइकिल का उत्साह देखते ही बनता था। हम मुंशी पुलिया से पॉलिटेक्निक चौराहा तक सर्विस लेन पकड़कर कतारबद्ध हरे-भरे पेड़ों से बात करते हुए पहुँचे। गोमतीनगर के विभूतिखंड में 'वेव मॉल' को पार करके फ्लाईओवर की चढ़ाई चढ़ने में अच्छी कसरत हो गयी लेकिन उसकी ढलान पर बिना पैडल चलाये तेजी से उतरते हुए ठंडी हवा खाकर थकान छू-मंतर भी हो गयी। लोहिया पार्क चौराहे को पार करते ही मैं सड़क के बायीं ओर थोड़ा ऊँचा बनाये गये पैदल पथ पर चढ़ गया। 

लाल टाइल्स लगे इस चिकने ट्रैक पर साइकिल चलाने में थोड़ी सावधानी तो जरुरी थी लेकिन मुख्य सड़क पर फर्राटा भरती गाड़ियों से सुरक्षित दूरी और बायीं ओर घने पेड़ों से घिरे लोहिया पार्क से निकटता के कारण मन प्रफुल्लित हुआ। इस पैदल पथ पर साइकिल चलाने का आनंद जल्दी ही जाता रहा क्यों कि आगे इसके निर्माण का कार्य 'प्रगति पर' हो गया था। मिट्टी के ढूहे में घुसकर बिला गयी थी यह पगडंडी। यहाँ साइकिल खड़ी कर एक दो तस्वीरें लेने के बाद मैं मुख्य सड़क पर आ गया और फन रिपब्लिक मॉल को पार करते हुए उस ओर बढ़ गया जिसे लखनऊ की शान समझा जाता है।

संगमरमर से बनी हाथियों के अलावा अनेक (दलित) महापुरुषों की विशालकाय प्रतिमाओं से सजे सामाजिक परिवर्तन स्थल की शोभा देखते ही बनती है। बाबासाहब की महिमा इस स्थान पर खूब मुखरित हुई है। इस समय यहाँ धूप निकल आयी थी लेकिन इससे बेखबर एक आदमी यहीं पैदल पथ पर गहरी नींद में सो रहा था। जैसे पूरी रात गर्मी में जागकर ठंडी सुबह की प्रतीक्षा में गुजारी हो। यह बात दीगर है कि अच्छे दिनों की आस पर महंगाई की मार की तरह इसकी शीतल कामना पर भी सूरजदेव अग्नि के कोड़े बरसाने की तैयारी करने लगे थे।


इस मंजर को पीछे छोड़ मैं गोमती नदी के पुल पर पहुँच गया। नदी के किनारों को पक्का करके उसे आकर्षक रूप देने का काम प्रगति पर है। मिट्टी के पहाड़ काटे जा रहे हैं, कंक्रीट की मोटी दीवारें खड़ी की जा रही हैं जिनपर पत्थर की सीढ़िया जमायी जा रही हैं। सुन्दर नारियल के पेड़ सीधी कतार में लगाये जा रहे हैं। सुना है कि शहर में गुजरती गोमती को लन्दन की टेम्स नदी का रूप दिया जाने वाला है।
पहली बार मैंने रुककर देखा तो नदी का पानी काफी साफ-सुथरा और हरा-भरा दिखा। मुझे तो वहीं ठहर जाने का मन हो रहा था, लेकिन सात बजने में कुछ ही मिनट बाकी थे और मुख्यमंत्री का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। मैंने पैडल पर दबाव तेज़ किया और पूरी शक्ति लगाकर तेजी से कालिदास मार्ग चौराहे पर पहुँच गया जहाँ वागीशा अपनी साइकिल के साथ मुख्यमंत्री आवास तक चलने के लिए मेरी प्रतीक्षा कर रही थी। सुरक्षा कर्मियों ने हमारा हुलिया देखकर सहर्ष गेट के अंदर जाने दिया। मैंने अपनी साइकिल अगले सुरक्षा बूथ के किनारे खड़ी कर लॉक किया और मुख्यमंत्री आवास के सामने उस स्थान पर चला गया जहाँ से कार्यक्रम की शुरुआत होनी थी।


रंगी-पुती चौड़ी सड़क की बायीं पटरी पर लोहे की रेलिंग से घेरकर साइकिल ट्रैक बनाया गया था जिसके ऊपर आकर्षक साइनबोर्ड लगाकर पर्यावरण की रक्षा और साइक्लिंग के महत्व को दर्शाते नारे लिखे गये थे। वहाँ एक-एक कर इकट्ठा होते बच्चों और उनकी साइकिलों को पंक्तिबद्ध खड़ा कराने के लिए सुरक्षा कर्मी और कुछ वरिष्ठ अधिकारी मुस्तैद थे। एक सिपाही खोजी कुत्ते की बागडोर थामें चारो ओर घुमा रहा था। कुत्ते ने जब इंच-इंच को सूंघकर सिक्यूरिटी क्लीयरेंस दे दिया तब एक सुरक्षा अधिकारी ने वॉकी-टॉकी पर खबर भेजी। एक सफारी वाला लम्बा-तगड़ा आदमी सिपाहियों को समझा रहा था कि गार्जियन्स‍ को सी.एम. से कितनी दूरी पर रोकना है।
लाइन लगाकर खड़े बच्चों की तस्वीरें खींची जा रही थीं। मीडिया वालों का एंगल अलग था और अभिभावकों का अलग। वे अपने बच्चे को फोकस कर रहे थे। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का जमावड़ा बढ़ता गया और उनके रिपोर्टर अपनी स्टोरी तैयार करने लगे। बच्चों को अब अपनी-अपनी साइकिल के साथ ट्रैक में खड़ा कर दिया गया ताकि फ़ोटो अच्छी आ सके। अंग्रेजी अखबारों की रिपोर्टर प्रायः नयी उम्र की लड़कियाँ थी जो एक-एक बच्चे से सवाल पूछकर नोट बना रही थीं और अपने मोबाइल कैमरे से जरूरी फोटोग्राफ लेती जा रही थीं।


टाइम्स ऑफ़ इण्डिया की रिपोर्टर मेरे पास भी आयी और मुझसे वागीशा के बारे में पूछा। यह भी पूछा कि साइकिल से स्कूल क्यों नहीं जाती। लखनऊ की बेतरतीब ट्रैफिक में सुरक्षा की चिंता और स्कूल की दूरी, ये दो वजहें मैंने बतायी। उसने कहा कि आप बड़े उत्साह से बेटी की तस्वीरें ले रहे थे। प्लीज़ एक बार और ऐसा कीजिए ताकि मैं आपकी फोटो ले सकूँ। मैंने ख़ुशी-ख़ुशी आईपैड का कैमरा ऑन किया और बच्चों की ओर फोकस करने लगा। मोहतरमा ने मुझे थैंक्यू बोला तो लगा जैसे कल अख़बार में मुझे जरूर छापेंगी। 

लेकिन अगले दिन फ़ोटो खींचते हुए जिस अभिभावक की फ़ोटो छपी वो एक मॉम की थी जिन्होंने यहाँ आने से पहले जरूर किसी ब्यूटी पार्लर में अच्छा समय और पैसा खर्च किया होगा। खैर जो हुआ अच्छा हुआ। सम्पादक का सौंदर्यबोध उम्दा था। उसने मेरे बारे में लिखित रिपोर्ट जरूर छापी लेकिन वह थी विशुद्ध कल्पना पर आधारित; ऐसी बात जो मुझसे मेल नहीं खाती।


इतने में हूटर बजाती गाड़ियों का काफिला आ पहुँचा। मैं अचकचा कर सोचने लगा कि सामने के ही आवास से आने के लिए सी.एम. को इतनी गाड़ियों की जरूरत क्यों पड़ी। लेकिन कुछ समझ पाता इससे पहले ही श्री अखिलेश जी सामने आ चुके थे। साथ में उनकी बेटी भी थी। मीडिया वालों ने उन्हें ऐसे घेर लिया कि बच्चे उनसे ओझल हो गये। सुरक्षा कर्मियों ने रेलिंग से एक मोटा रस्सा बांधकर उसके भीतर कैमरामेन और रिपोर्टर्स को सीमित करने की कोशिश की लेकिन सब बेकार साबित हुआ। थोड़ी देर तक मीडिया वाले एक दूसरे पर चढ़ते हुए फ़ोटो और बाईट लेते रहे।


आखिर मुख्यमंत्री जी को ही बच्चों की सुध आयी। उन्होंने मीडिया वालों को परे धकेलते हुए बच्चों से परिचय लेना शुरू किया और धक्का-मुक्की के बीच अपनी स्पोर्ट्स साइकिल पर बैठकर ट्रैक में घुस गये। उनके ब्लैक कैट कमांडो भी सुरक्षा घेरा नहीं बना पा रहे थे। मीडिया वाले इस कदर हावी थे कि मुख्यमंत्री जी साइकिल के पैडल का प्रयोग अंत तक नहीं कर सके। पैरों से ठेलते हुए और पोज़ देते हुए करीब पचास मीटर की साइकिल यात्रा पूरी हुई। स्कूली बच्चों ने भी साइकिल घसीटते हुए उनका साथ दिया। 

आगे सुरक्षा बूथ पर रुककर उन्होंने बाकायदा प्रेस को संबोधित किया। इस बीच सभी गाड़ियाँ उनके प्रस्थान के लिए वहीं पर लगा दी गयीं। लेकिन उन्होंने अपनी बात खत्म करने के बाद सभी बच्चों को अपने निवास के प्रांगण में साथ चलने का इशारा किया और साइकिल से ही चल दिये। बाकी सबको वहीं रुकने का आदेश दिया।

जब बच्चों के साथ मुख्यमंत्री जी गेट के भीतर चले गये तब अभिभावक गण गेट पर इकठ्ठा हो गये। तभी भीतर से आदेश हुआ की पेरेंट्स को भी अंदर बुला लिया जाय। इस प्रकार मुख्यमंत्री आवास के विशाल और भव्य प्रांगण में जाने का सुअवसर हमें भी मिला। खूब घने और छायादार वृक्ष परिसर की शोभा बढ़ा रहे थे। फूलों की क्यारियाँ अलग छटा बिखेर रही थीं। वहाँ सबकुछ सलीके से हुआ। बच्चों और अभिभावकों के साथ विधिवत् फोटो सेशन भी हुआ और सबको मिठाई के साथ ठंडा पानी भी पिलाया गया।

बेहद प्रसन्न बेटी के साथ जब हम बाहर आये तो प्रायः सभी साइकिलें अलग-अलग चार-पहिया वाहनों पर लादी जा रही थीं जिनकी व्यवस्था अभिभावकों ने की थी। हमने भी वागीशा को साइकिल सहित गाड़ी में बिठाकर उसके स्कूल छोड़ने को भेज दिया और अपनी साइकिल पर सवार होकर मुंशी पुलिया इंदिरानगर चला आया।
नौ बज चुके थे और तैयार होकर राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (NPS) पर आयोजित परिचर्चा में भाग लेने वित्तीय प्रबंध प्रशिक्षण और शोध संस्थान (IFMTR) के सभागार में पहुँचना था। सरकारी नौकरी में समझौता भी बहुत करना पड़ता है। इसी वजह से यह वृतांत लिखने में इतना विलम्ब तो होना ही था।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com

Monday, May 16, 2016

पेंशन तो देना बनता है...!

शत्रुघ्न सिंह चौहान गुजरात राज्य सरकार के सिंचाई विभाग में नौकरी करते थे। उनकी 1976 में छंटनी हो गयी। फिर किसी सरकारी निगम में पुनः सेवायोजित होकर 1991 में सेवानिवृत्त हुए। सरकार इन्हें पेंशन मंजूर करती इसके पहले ही 08 अगस्त 1992 को मृत्यु हो गयी। उनकी विधवा पत्नी अपने पुत्र के साथ गुजरात से अपने गाँव मूल निवास स्थान रायबरेली वापस आ गयी। विभाग ने पति की मृत्यु के बाद 1994 में पेंशन स्वीकृत भी की तो उसमें पत्नी के नाम पारिवारिक पेंशन नदारद थी। पति के जीवनकालीन पेंशन का भुगतान 1994 में ही पत्नी और पुत्र को बराबर-बराबर करने के बाद कोषागार ने पत्रावली बंद कर दाखिल दफ़्तर कर दी।
अब 22 साल बाद गुजरात सरकार ने पारिवारिक पेंशन स्वीकृत कर आदेश ए.जी. के माध्यम से कोषागार रायबरेली को भेज दिया है जिसमें पिछले आदेश का सन्दर्भ देते हुए उसके आगे का भुगतान एरियर सहित करने का प्राधिकार दिया गया है। इधर बाइस साल से बंद हुई फ़ाइल मिल नहीं रही है और न ही उसका किसी इंडेक्स रजिस्टर में कोई उल्लेख मिल रहा है। ऑफिस का लगभग पूरा स्टाफ इसकी तलाश के लिए एक-एक इंच खंगाल चुका है। उस समय जिस लेखाकार ने अंतिम भुगतान किया था वे सेवानिवृत्त होकर हाल ही में स्वर्गीय हो चुके हैं। उनका हस्ताक्षर पेंशनर द्वारा दिखाई जा रही उसके पास सुरक्षित पुरानी कॉपी में दिख रहा है।
अस्सी की उम्र पार कर चुकी अपनी माँ की पेंशन के लिए अहर्निष भाग-दौड़ कर रहे रामहर्ष जी ने बताया कि गुजरात के सैकड़ों चक्कर लगाने के बाद भी जब विभाग ने अम्मा की पेंशन नहीं दी तो मैं तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके जनता दरबार में मिला। उन्होंने पूरी बात सुनने के बाद जाँच बैठा दी। जाँच में पता चला कि कर्मचारी द्वारा भरे गए पेंशन प्रपत्र में पत्नी का नाम मौजूद होने के बावजूद विभाग द्वारा उनके नाम से पारिवारिक पेंशन स्वीकृत नहीं की गयी थी। इस चूक के लिए जिम्मेदार कर्मचारी और उसका उच्चाधिकारी दोनो निलंबित कर दिये गये हैं। उनकी बहाली तबतक नहीं हो सकेगी जबतक वे यह प्रमाणपत्र न प्रस्तुत कर दें कि पीड़ित विधवा को समस्त बकाया पेंशन का भुगतान कर दिया गया है। रामहर्ष ने कहा कि मुझे अपनी माँ की पेंशन से ज्यादा उन दो परिवारों की फिक्र हो रही है जहाँ कई महीनों से वेतन नहीं जा रहा है।
अब मुझे कार्यालय के पुराने अभिलेख की अनुपलब्धता की स्थिति में भी यह भुगतान ताजे प्राधिकार पत्र के आधार पर करना है। मुझे इतने लंबे संघर्ष की कहानी झूठी नहीं लग रही है। भगवान का नाम लेकर विश्वास करने का जी चाहता है।
अस्तु, मैंने आज यह निर्णय सुनाया कि आप अपनी माँ को लेकर आइए, वैयक्तिक पहचान दो पक्के गवाहों (पेंशनर) के माध्यम से कराइए और यह पूरी कहानी एक शपथ-पत्र के माध्यम से प्रस्तुत कराइए। बैंक खाते का विवरण भी साथ लाइए ताकि भुगतान की कार्यवाही पूरी कर प्रमाणपत्र निर्गत किया जा सके।
अब आगे जो होगा देखा जाएगा।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Saturday, May 14, 2016

अभियानों से बेखबर गाँव और सूखती नदी

सूखती नदी पर पसरी हरियाली
14 मई 2016
इब्राहिमपुर, रायबरेली
‪#‎साइकिल_से_सैर‬
आज साइकिल लेकर सीधे स्टेडियम पहुँचा जहाँ का तरणताल हाल ही में तैराकी के शौक़ीन शहरियों के लिए फिर से खोल दिया गया है। साइक्लिंग के साथ-साथ स्विमिंग का आनंद लेते हुए मुझे तीन दिन ही हुए थे, लेकिन आज चौथे दिन बाधा आ गयी। बंद चैनेल गेट पर सूचना चस्पा थी कि पानी बदलने और सफाई के लिए पूल दो दिन बंद रहेगा।
उल्टे पाँव वापस लौटने के बजाय मैंने सोचा कि आज फिर से कानपुर रोड से दरीबा तिराहा मोड़ होते हुए उस गाँव तक हो आऊँ जहाँ वह छोटा सा कटहल से लदा हुआ पेड़ मिला था। मैंने उधर साइकिल मोड़ भी ली थी लेकिन पुलिस लाइन्स मोड़ आते ही विचार बदल गया। एक तो भारी भरकम ट्रकों की आवाजाही का विकर्षण और दूसरे किसी नयी राह को जानने का आकर्षण - मेरी साइकिल ने पश्चिम के बजाय दक्षिण की राह पकड़ ली। मुझे बस यह पता था कि पुलिस का परेड ग्राउंड इसी ओर है।
सूचना पट्ट से सूचना नदारद
पुलिस परिसर से पहले ही एक सड़क बायीं और निकलती दिखी जिसके किनारे की दुकानों के बोर्ड बता रहे थे की यह मटिहा रोड है। मैं दक्षिणाभिमुख होकर इसी रोड पर चल पड़ा। मन में एक अनुमान था कि शहर के पश्चिम से बहती हुई सई नदी दक्षिण की ओर होकर ही पूरब चली जाती है तो आगे यह सड़क सई से जरूर मिलती होगी। मुझे देखना यह था कि यह मिलाप कितनी दूरी पर था और कैसा था।
पुलिस लाइन्स परिसर की चारदीवारी से सटी हुई यह सड़क जल्दी ही शहर से बाहर आ गयी। बाहर आते ही सबसे पहले दिखा कि इसके दोनो ओर के खेतों को छोटे छोटे टुकड़ों में घेरकर आवासीय प्लॉट बना दिये गए हैं। कुछ बिक चुके प्लॉटों में बाउंड्री बनाकर गेट में ताले भी लगे दिखे। मतलब यह कि शहर अपने पाँव इस ओर भी पसार रहा है।
आगे बढ़ा तो ग्राम पंचायत अकबरपुर कछवाह की 'सार्वजनिक वितरण प्रणाली उचित मूल्य की दुकान' का सूचना पट दिखायी दिया जिसपर सभी जरुरी सूचनाएँ नदारद थीं। इससे आगे बढ़ा तो एक खूब रंगा-पुता सरकारी पूर्व माध्यमिक विद्यालय 'गोंड़ियन के पुरवा' में मिला जो अभी खुला नहीं था क्यों कि साढ़े छः ही बज रहे थे। शहर से सटा लबे-सड़क होने के कारण इस स्कूल की व्यवस्था जरूर चाक-चौबंद होगी यह सोचता हुआ मैं आगे बढ़ गया। सड़क आगे ही बढ़ती जा रही थी और सई नदी का कोई सुराग नहीं था।
अब भी खरे हैं तालाब
जिलाधिकारी के अभियान से लबालब भरा तालाब
मैंने अगले गाँव में प्रवेश किया तो नुक्कड़ पर एक छोटा सा तालाब मिला जिसके किनारे आम के पेड़ पर टिकोरे चमक रहे थे। तालाब का पानी हाल ही में भरा गया था जो जिलाधिकारी के हालिया अभियान की कहानी कह रहा था। डीएम साहब ने जिले के प्रायः सभी अधिकारियों को देहात में दौड़ा रखा है जिन्हें यह सुनिश्चित करने को कहा गया है कि गर्मी के आतप से बचाव के लिए जिले के सभी जलाशय पानी से भरे रहें। मुझे आगे भी एक तालाब दिखा जो आश्चर्य जनक रूप से लबालब भरा हुआ था। एक लड़का उनींदी आँखों से घर के बाहर निकल कर हाथ में लोटा लटकाये सड़क पर आता दिखायी दिया। पूछने पर उसने बताया कि तीन दिन पहले किसी ट्यूबवैल का पानी इसमें डाला गया था। आगे एक बड़ा सा स्कूल परिसर दिखा जिसमें प्राथमिक शिक्षा विभाग के कई भवन बने हुए थे। एक ही परिसर में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालय तथा इसके अनेक अतिरिक्त कक्षा-कक्ष रहे होंगे। परिसर में आम और नीम के विशाल पेड़ बता रहे थे कि विद्यालय बहुत पुराना है। यहाँ भी अभी सन्नाटा पसरा हुआ था।
पठन-पाठन की प्रतीक्षा में खड़ा स्कूल परिसर
इधर सड़क किनारे एक बड़ा सा कब्रिस्तान भी दिखा। इसका अगला गाँव था कोलवा और उसके आगे मिला इब्राहिमपुर। दोनों पुरवे लगभग सटे हुए हैं। बबूल का जंगल इन्हें घेरे हुए है जिनसे निकली हुई पगडंडियाँ गाँव वालों को सड़क की दूसरी ओर खेतों में ले जाती हैं। गेहूं की फसल कट जाने के बाद ये खेत प्रायः खाली थे। इन्हीं खेतों में बकरियों का एक झुंड दिखा जिसके पीछे आठ दस-साल की एक लड़की थी और उससे छोटा एक लड़का था। दोनों 'स्कूल चलो' की पुकार से बेखबर चरवाही कर रहे थे। इन्हें सर्व शिक्षा अभियान ने बरी कर रखा है शायद।
भेड़-बकरी के संग जीवन
स्कूल से कोसों दूर
गेंहू से खाली खेतों के बीच-बीच में बाड़ लगे हुए सब्जी के खेत मिले और इक्का-दुक्का झुरमुट भी जिनकी आड़ में गाँव वाले प्रातःकाल के नित्य कर्म से निपटने का काम लेते होंगे। हाथ में पानी की बोतल, कोई डिब्बा या लोटा लिए मर्दों के अलावा मुझे गाँव से निकलती लड़कियाँ और औरतें भी दिखीं जो बता रही थीं कि ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम का सन्देश रायबरेली शहर से तीन-चार किलोमीटर दूर पक्की सड़क पर बसे इस गाँव तक अभी नहीं पहुँच सका है। लौटते समय एक लड़का बगल से गुजरा तो मैंने पूछ लिया। उसने बताया कि सरकारी पैसे से एक-दो घरों में शौचालय बने हैं लेकिन ज्यादा लोग अभी बाहर खुले में ही जाते हैं।
इब्राहिमपुर के बगल से गुजरती हुई सड़क क्रमशः ऊँची होती गयी तो मैं समझ गया कि आगे सई नदी है जिसपर पुल भी है। पुल पर पहुँचने के लिए मुझे अतिरिक्त दम लगाना पड़ा क्यों कि चढ़ाई कुछ ज्यादा तीव्र हो गयी थी। लोहे की रेलिंग वाला पुल सड़क की तुलना में खासा चौड़ा है। इसपर एक बाइक खड़ी थी और एक साइकिल वाला रेलिंग से सिर लटकाकर नीचे के पानी को गौर से देख रहा था।
सूखते पानी में तड़पती मछलियाँ
मैंने भी अपनी गाड़ी खड़ी की और उसके बगल में जाकर नीचे झांकने लगा। यहाँ पानी में कोई बहाव नहीं था, बल्कि जमे हुए पानी से एक पोखर की आकृति बन गयी थी जिसके चारो ओर शैवाल, जलकुम्भी और दूसरी वनस्पतियों का जाल बिछा हुआ था। नदी के दोनो किनारों की ढाल पर किसी ने नेनुआ, तरोई, लौकी आदि की लताएँ उगा रखी थीं जिनकी रखवाली के लिए वहीं एक मड़ई भी डाल ली थी। पुल के नीचे जमा पानी में कुछ मछलियों को उछलते देखकर मैंने उस आदमी के कौतूहल का रहस्य समझा। उसने बताया कि पानी रोज कम हो रहा है, बहाव खत्म हो गया है इसलिए ये मछलियाँ बेचैन हैं। मैं पूछ ही रहा था कि इन्हें कोई मछुआरा पकड़कर क्यों नहीं ले जाता तबतक दो मानव आकृतियां उस जलराशि के किनारे आकर उकड़ू बैठ गयीं। मैंने लजाकर नीचे झांकना बंद कर दिया ताकि वे निर्द्वन्द्व होकर शौच-प्रक्षालन कर सकें। मैंने दूसरी तरफ की रेलिंग पर जाकर लगभग सूख चुकी नदी के साथ सेल्फ़ी लिया और गर्मी से मुरझाई प्रकृति को देखता रहा।
तटबन्ध पर सब्जी की खेती
तभी वहाँ खड़ी मोटरसाइकिल के स्वामी आ गए और उनके स्टार्ट करते ही उसके पीछे बैठने वाले सज्जन भी पहुँच गए। अब समझ में आया कि ये वही दो लोग थे जो कहीं पास के गाँव से नदी पर निपटान करने आये थे। मैंने भी अपनी साइकिल स्टार्ट कर वापसी यात्रा प्रारम्भ कर दी।
वापस लौटते हुए रास्ते में पैदल, साईकिल और ऑटो रिक्शा से स्कूल जाते बच्चे दिखे। एक खड़खड़िया साइकिल हांकते अंशू कुमार मिले जो रायबरेली पब्लिक स्कूल में सातवीं के छात्र थे। अपने मामा के गाँव कोड़र से रोज शहर के स्कूल पढ़ने आते हैं जो छः किलोमीटर दूर है। एक साइकिल सवार नौवीं के बालक से भी बात हुई जो गोपाल सरस्वती में पढ़ता है। पहले स्कूल-बस से जाता था लेकिन भाड़ा पाँच सौ से ज्यादा हो गया तो पुरानी साइकिल खरीद ली।
गोड़ियन का पुरवा स्कूल पर लौटा तो करीब दर्जन भर बच्चों द्वारा प्रार्थना के बाद राष्ट्रगान गाया जा रहा था। गेट पर कुछ विद्यार्थी रुके हुए थे जो लेट हो गए थे। ये तब अंदर गए होंगे जब राष्ट्रगान के बाद 'भारतमाता की जय' का गगनभेदी नारा पूरा हो गया होगा। मैंने दूर निकल आने के बाद भी उस जयकारे की आवाज सुनी। रास्ते में शहर की ओर से देहात की ओर जाती नख-सिख ढंककर स्कूटी चलाती या बाइक के पीछे बैठी अध्यापिकाएँ दिखीं जो प्रायः वीरान पड़े सरकारी प्राथमिक स्कूलों में हाज़िरी बनाने जा रही थीं।
स्कूल चलें हम
इधर जेल रोड पर गाय-भैंस पालकर दूध का व्यवसाय करने वाली खोली से एक तेरह-चौदह साल की लड़की सिर पर गोबर से भरा तसला लेकर निकली और सड़क पार करने लगी। लंबी छरहरी काया और गोरा-चिट्टा रंग लिए वह धूल और पसीने से सराबोर थी जो दूसरी तरफ इकठ्ठा गोबर के ढेर तक जा रही थी। यह ढेर जो धीरे-धीरे खाद में बदल जाएगा और किसी फसल को पोषित भी करेगा; वह इस लड़की के बाप को कुछ पैसे भले ही दिला दे लेकिन इसके जीवन के अंधकार में शिक्षा का उजाला फैलने से रोकता रहेगा।
इसी चिंतन में मामा चौराहे की क्रासिंग पार हो गयी और चौराहे पर सवारी की प्रतीक्षा में अभी भी बदस्तूर खड़ी शिक्षिकाओं को देखते हुए घर आ गया। ये अपने स्कूल कब पहुंचेंगी भला। सात तो कबका बज चुका है...!
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) www.satyarthmitra.com