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Saturday, November 15, 2014

जिन्दगी अपनी बनाते हैं बनाने वाले (तरही ग़जल)

उस्ताद ने इस बार जब मिसरा दिया था तो मैं उपस्थित नहीं था। किसी और ने जब फोन पर बताकर नोट कराया तो इसकी बहर गलत समझ ली गयी और पूरी ग़जल गलत बहर में कह दी गयी। बाद में ऐन वक्त पर नशिस्त से पहले गलती का पता चला तो काट-छांट करके और कुछ मलहम पट्टी लगाकर शेर खड़े किये गये। अब यहाँ ब्लॉग पर तो अपनी मिल्कियत है। सो इस अनगढ़ को भी ठेल देता हूँ। साथ में एक कठिन बहर की रुबाई भी बनाने को दी गयी थी जिसे मैंने डरते-डरते आजमाया। 

रुबाई

हरगिज न करूँ कभी कहीं ऊल जुलूल
अब बाँध लिया गिरह तिरा पाक उसूल
हर रोज किया करूँ मैं सजदा तेरा
कर ले तू खुदा मेरी इबादत को कुबूल

ग़जल

बदगुमाँ होते हैं क्यूँ हार के जाने वाले
जिंदगी अपनी बनाते हैं बनाने वाले

मत करें प्यार का इजहार गरज़मंदी में
बेगरज़ होके रहें प्यार जताने वाले

गुल खिलाती है हवा धूप की गर्मी लेकर
प्यार के जश्न हुए दिल को खिलाने वाले

प्यार गहरा हो तो बढ़ जाती है ताकत दिल की
साहसी होते बहुत दिल से निभाने वाले

चूम लेने का हुनर आया अदा में कुछ यूँ
लब बिना बोले बहुत कुछ हैं बताने वाले

प्यार के रंग बने जैसे कि ये शेरो सुखन
यकबयक बनते नहीं बनने बनाने वाले

एक मुस्कान से शुरुआत भली होती है
प्यार की राह यही लब हैं बताने वाले

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सत्यार्थमित्र
www.satyarthmitra.com

6 comments:

  1. ग़ज़ल बढ़िया बन पड़ी है।

    रुबाई का रुबाब भी ठीक है।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (17-11-2014) को "वक़्त की नफ़ासत" {चर्चामंच अंक-1800} पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत खूब !
    अच्छा लगा आपके ब्लॉग पर आकर !
    मैं आपके ब्लॉग को फॉलो कर रहा हूँ ताकि नियमित रूप से आपका ब्लॉग पढ़ सकू मेरे ब्लॉग पर आप सारद आमत्रित हैं आशा करता हूँ क़ि आपे सुझाव और मार्गदर्शन मुझे मिलता रहेगा

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