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सोमवार, 1 जनवरी 2024

कैसे नववर्ष मनायें

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कैसे नववर्ष मनायें

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सूर्य छिपा कोहरे के पीछे तनमन ठिठुरा जाए

बर्फीली सी सर्द जमीं कैसे नववर्ष मनायें

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चढ़ी रजाई, कंबल दुहरा फिर भी कांपें टांगें

रैन बसेरे भरे हुए लकड़ी अलाव की मांगें

जब गरीब की खोली कच्ची बच्चे भी अधनंगे

बाजारों की चकाचौंध में घूम रहे भिखमंगे

बदली है तारीख मगर कुछ नया नजर ना आए

बर्फीली सी सर्द जमीं कैसे नववर्ष मनायें

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संवत्सर का परिवर्तन मधुमास लिए आता है

पत्ता पत्ता बूटा बूटा हर्षित मुस्काता है

ऋतु वसंत से पुलकित धरती सँवर सँवर जाती है

नवलय नवगति ताल छंद नव गीत मधुर गाती है

सत्य सनातन चैत्र प्रतिपदा को नववर्ष बताए

बर्फीली सी सर्द जमीं कैसे नववर्ष मनायें

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पश्चिम की जो हवा चली सब डूबे उसके रस में

भौतिकता की भेड़चाल ले जाए इन्हें तमस में

केक काटते धुआँ उड़ाते भूले कुमकुम चंदन

माता-पिता और गुरुओं का भूल गए अभिनंदन

मांस और मदिरा की बोतल घर-घर खुलती जाए

बर्फीली सी सर्द जमीं कैसे नववर्ष मनायें

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सत्यार्थमित्र

मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

नयी शिक्षा नीति की जमीनी चुनौतियाँ

वर्ष 2020 में भारत सरकार ने नयी शिक्षा नीति घोषित की थी जिसे जमीन पर उतारने की कवायद जोर-शोर से चल रही हैं। मुझे भी एक नये नवेले विश्वविद्यालय में सेवा करने का अवसर मिला है। हाला कि मेरा काम शैक्षिक पक्ष के बजाय वित्तीय पक्ष से जुड़ा हुआ है, फिर भी एक जिज्ञासु प्रेक्षक के रूप में मुझे बहुत से ऐसे अनुभव हो रहे हैं जो धरातल पर उच्च शिक्षा की दयनीय दशा को ही इंगित कर रहे हैं।

नयी शिक्षा नीति में जिन उच्च आदर्शो को प्राप्त करने की परिकल्पना की गयी हैं उनका विवरण देने की न मेरी मंशा है और न ही जरुरत। जिज्ञासु जन इसे सहज ही ऑनलाइन पता कर सकते हैँ।
हम तो आजकल प्रायः रोज ही चौक जाते हैं जब विश्वविद्यालय के उच्च अधिकारी किसी न किसी धरना, प्रदर्शन, ज्ञापन, शिकायत, सिफारिश, सामूहिक मांग, सूचना-संकलन, शासन में सुनवाई इत्यादि से उत्पन्न किसी ना किसी चुनौती या समस्या से जूझते रहते हैं। इन चुनौतियों का कोई सम्बन्ध नयी शिक्षा नीति से मुझे नहीं दिखाई देता। कुछ उदाहरण :
# पाँचवे सेमेस्टर में दाखिल हो चुके अनेक विद्यार्थी हाल ही में घोषित दूसरे - तीसरे सेमेस्टर की बैक पेपर परीक्षा के परिणाम में फेल हो गए हैं। उनकी मांग है कि उन्हें हर हाल में पास कर दिया जाय नहीं तो प्रदर्शन करेंगे।
# कॉलेज ने आतंरिक मूल्यांकन में बहुत कम नंबर दिया। इसलिए फेल हो गये। यह हम छात्रों के साथ धोखा और अत्याचार हैं। सबको पास करो नहीं तो धरना देंगे।
# प्रैक्टिकल परीक्षा में फेल होने का तो कोई कारण ही नहीं हो सकता। इसमें अनुपस्थित रहने पर मिले जीरो को बढाकर चालीस कर दो नहीं तो घेराव करेंगे।
# पंद्रह बीस साल से जो फीस ली जा रही थी उसमें कोई भी वृद्धि मंजूर नहीं हैं। बढ़ी फीस वापस लो नहीं तो आत्मदाह करेंगे।
# ऑनलाइन फॉर्म भरने की अंतिम तिथि तीन बार बढ़ाई जा चुकी हैं फ़िरभी कुछ छात्र छूटे रह गये हैं। चौथी बार डेट बढ़ाओ नहीं तो बवाल होगा।
# परीक्षा में नकल करते पकड़े गये, नोट्स लिखे दुपट्टे को कॉपी के साथ सील किया गया। कॉपी में वही सब उतारा गया भी मिला। लेकिन आरोप है कि गलत फंसाया गया है। पास करो नहीं तो रो - रोकर बुरा हाल कर दूंगी।
 
करुण क्रन्दन से लेकर बवाल की धमकी भरी ऐसी अनेक मांगो से ठसाठस भरे कमरे में उनपर 'सहानुभूति पूर्वक' विचार करते हुए परीक्षा नियंत्रक, कुलसचिव और कुलपति जी के सामने नयी शिक्षा नीति को लागू करने का सवाल मुँह बाए दरवाजे पर ही "मे आई कम इन सर" बोलता हुआ खड़ा  है।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

गुरुवार, 16 नवंबर 2023

पुस्तक चर्चा : विपश्यना में प्रेम (उपन्यास)

दीपावली की छुट्टियों में एक रोचक उपन्यास पढ़ने का अवसर मिला तो इसके बारे में आप सबको बताने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं। लीक से हटकर चलती रोचक कथा का अंत भी अनूठा है। आइए आपको इसका कुछ परिचय कराते हैं।
मूलतः पत्रकार रहे आदरणीय दयानंद पांडेय जी ने अपने विशद साहित्यिक लेखन से अपने विशुद्ध पाठकों को अपना प्रशंसक तो बनाया ही है, लेकिन विशुद्ध साहित्यकार का चोला ओढ़े अनेक स्वनामधन्य लेखकों के पेट में दर्द भी पैदा कर दिया है। बेखटक और बेलाग लेखन ही इनकी पूंजी है। इसकी चोट किसी को पहुंचती हो तो वह जाने। 'अपने-अपने युद्ध' से मची खलबली तो बहुतों को याद होगी।

कोई नंगा सच जो इन्हें अपनी आंखों से दिखता है उसे वैसे का वैसा अपनी कलम से चित्रलिखित कर देना इन्हें बखूबी आता है। मन के भीतर विचारों व भावनाओं की श्रृंखला जैसी पैदा होती है उसे वैसे ही नैसर्गिक रूप में कागज पर उतार देना इनकी फितरत है। जिस सच्चाई को ये महसूस करते हैं उसे ऐसा शब्द देते हैं कि पढ़ने वाला भी सहज ही उस सच्चाई को खुद महसूस करने लगता है। न केवल भौतिक घटनाओं का विवरण बल्कि किसी चरित्र के मन में उमड़ते - घुमड़ते भाव विचार भी इनकी लेखनी से निकलकर पाठक के मन पर हुबहू वही छाप छोड़ देते हैं। इनकी बातें पानी की धार जैसी बहती हैं। मन को तर करती जाती हैं। किस्सागोई ऐसी कि बैठकर सुनने वाला आगे झुकता जाय। जिज्ञासा की धार टूटने का नाम न ले।

सहज लेखन की ऐसी ही शैली में पगा उपन्यास 'विपश्यना में प्रेम' पढ़ते हुए मन बार-बार मुस्करा देता है। एक विपश्यना केंद्र जिसे लेखक चुप की राजधानी कहता है वहां नायक विनय के साथ कुछ ऐसा घटित होता है जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की होगी। शांति की तलाश में मौन साधना का अभ्यास करने की राह में कुछ ऐसा क्षेपक आता है जिसका शोर उसे मतवाला कर देता है। लेखक के शब्दों में - विपश्यना शिविर में विनय भी अपने मौन के शोर को अब संभाल नहीं पा रहा था। मौन का बांध जैसे रिस-रिस कर टूटना चाहता था। शोर की नदी का प्रवाह तेज़ और तेज़ होता जाता था। देह का दर्द अब बर्दाश्त होने लगा था। ध्यान का कुछ आनंद भी आने लगा था। पर शोर का सुर ?
एक बानगी यह भी - लोग कहते हैं , मौन में बड़ी शक्ति होती है। तो मौन , मन के शोर को क्यों नहीं शांत कर पाता। किसी चट्टान से सागर की लहरों की तरह पछाड़ खाता यह शोर बढ़ता ही जाता है। विपश्यना के वश का भी नहीं लगता यह शोर।
उपन्यास की जो विषय वस्तु है वह आपको चकित कर सकती है। मुझे तो यह उपमा भी चकित करती है - जैसे किसी युवा होती लड़की के लिए उस का वक्ष ही भार हो जाता है, ठीक वैसे ही विनय के लिए यह साधना भी भार हो चली थी।
उपन्यास में किसी वातावरण का चित्रण पढ़कर लगता है जैसे पाठक स्वयं वहाँ पहुँच गया हो। साधना स्थल का माहौल महसूस कराती ये पंक्तियां देखिए - आचार्य के टेप की आवाज़ में वह डूब गया है। अजब आनंद है इस आवाज़ में भी। इतनी सतर्क, इतनी स्पष्ट और इतने व्यौरे में सनी, किसी नाव की तरह थपेड़े खाती, बलखाती आवाज़ से इस से पहले वह कभी नहीं मिला था। आरोह-अवरोह और श्रद्धा का ऐसा मेल, जैसे कानों में जलतरंग बज जाए, जैसे कोई मीठी सी हवा कानों में चुपके से स्पर्श कर जाए।
चुप की राजधानी में मन को आध्यात्मिक शांति के लिए एकाग्र करने में लगे विनय को चुपके से चिकोटी काटती मल्लिका की पूरी योजना का पता तो उपन्यास के अंत में चलता है, लेकिन पाठक को वहाँ तक पहुंचने की कोई जल्दी नहीं है। वह तो एक - एक पृष्ठ में बहती रसधार से सिक्त होता चलता है। कथा के बीच अचानक कोई अदभुत दृश्य उपस्थित हो जाय, कोई मनभावन दृष्टांत आ पड़े, कोई मन को छू जाने वाली खूबसूरत उक्ति मिल जाय, अकस्मात रोम - रोम पुलकित करने वाली कोई टिप्पणी मिल जाय या देह - संगीत का कोई नया टुकड़ा आ पड़े, इस संभावना से यह पूरा उपन्यास इस तरह लबरेज है कि आप इसे कूद - फांद कर नहीं पढ़ना चाहेंगे।
यहाँ तो प्रत्येक पृष्ठ आपको बांधकर रखता है। बिल्कुल जैसे गुलजार की कोई नज्म हो। दुबारा तिबारा सोचना भी अच्छा लगता है। बुद्ध और यशोधरा के बिलगाव का संदर्भ है तो मांसलता और कामुकता का चरम भी है। इसे सारंगी, गिटार और वीणा के मधुर संगीत सा पेश किया गया है। यहां माउथऑर्गन की धुन पर थिरकता नृत्य भी है और तबले की थाप पर उचकता जिस्म भी है। यह सब ऐसा दृश्य उपस्थित करता है और ऐसी अनुभूति देकर जाता है कि इसे केवल 'वयस्कों के लिए' उपयुक्त ठहराने का मन होता है। लेकिन यह इस उपन्यास की सीमा नहीं है बल्कि दयानंद जी की एक विलक्षण उपलब्धि है। 
पुस्तक : विपश्यना में प्रेम

लेखक : दयानंद पांडेय, प्रकाशक : वाणी प्रकाशन, 4695 , 21 - ए , दरियागंज , नई दिल्ली - 110002 आवरण पेंटिंग : अवधेश मिश्र

हार्ड बाऊंड : 499 रुपए पेपरबैक : 299 रुपए पृष्ठ : 106

अमेज़न (भारत) पर ऑर्डर करें हार्डकवर : https://amzn.eu/d/g20hNDl

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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