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गुरुवार, 23 जनवरी 2014

यूँ छोड़कर मत जाइए (तरही ग़जल-III)

यह तरही नसिश्त का सिलसिला भी बड़ा मजेदार है। देखते-देखते आप शायर बन जाते हैं, कुछ बातें तुकबन्दी में जोड़ते-जोड़ते पूरी ग़जल बन जाती है। मेरे साथ ऐसा तीसरी बार हुआ है| रायबरेली कलेक्ट्रेट के पास बने रैन बसेरा में जुटे शायरों के बीच मैं नौसिखिया भी पहुँच गया जहाँ उस्ताद नाज़ प्रतापगढ़ी ने ‘तरह के मिसरे’ पर आयी प्रविष्टियों को सुना और बारीकी से इनकी खूबियाँ और खामियाँ समझायी। मेरी रचना यह रही-
यूँ छोड़कर मत जाइए

जख़्मी है दिल बहलाइए
यूँ छोड़कर मत जाइए
यह चोट ताजा है अभी
कुछ देर तक सहलाइए
घर आपकी खातिर खुला
जब जी करे आ जाइए
है प्यार भी नफ़रत भी है
दिल की दुकाँ में आइए
कर ली सितम की इंतिहा
अब तो करम फरमाइए
रखते हैं हम भी दिल बड़ा
इक बार तो अजमाइए
इक आस थी तो चैन था
क्यूँ कह दिया घर जाइए
(2)
जो आम थे अब खास हैं
थोड़ा अदब दिखलाइए
मर जाएगा अनशन में वो
जैसे भी हो तुड़वाइए
अनशन से होंगे फैसले?
अब और मत भरमाइए
धरना प्रदर्शन कर चुके
अब काम भी निपटाइए
दिल्‍ली में कितना दम बचा
इक और सर्वे लाइए
लो टूटकर जाने लगे
इनको टिकट दिलवाइए
माना प्रवक्ता हो गये
फिर भी शरम दिखलाइए
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
www.satyarthmitra.com

14 टिप्‍पणियां:

  1. वाह, आप कविता कर ही डालिये, वर्धा में भी आपका रंग देख चुके हैं।

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  2. वाह लाजवाब ... अलग अलग मूड की दोनों ग़ज़लें ... दूसरी तो कमाल है ...

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  3. क्या खूबसूरत लिखते हैं ,
    आवृत्ति भी तो बढ़ाइए !

    कविता को खुल के आने दें
    जीवन में कुछ रस लाइए !

    लेखों को कुछ दिन परे कर
    कविता में रंगत लाइए !

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  4. पहले भाग के आखिरी शेर ने दरख़्वास्त की है असल बात बतायी जाय। यह कि आस टूट जानेपर चैन ही नहीं छिना था बल्कि साँस पर बन आयी थी।
    इसलिए थोड़ी तरमीम पेश है:

    इक आस थी तो साँस थी
    क्यूँ कह दिया घर जाइए

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  5. पूर्वार्ध तो फेसबुक पर और अब उत्तरार्ध यहाँ पढ़ लिया -आनंद आया!

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  6. जो आम थे अब खास हैं
    थोड़ा अदब दिखलाइए......nice

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  7. आम बस आम हैं
    गुठली मत बनाइये

    जब भरोसा है किया
    तो थोडा वेटियाईये

    गर सबर नहीं तो
    जम के पछताइए

    खुद कवि बन गए
    अब सबसे लिखवाइए :)

    बहुत बढ़िया !
    आभार !

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  8. अरे वाह.... बहुत खूब शायर निकले आप तो :) :)

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