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Tuesday, May 18, 2010

परदुःखकातर… :(

 

वैशाख की दुपहरी में सूर्य देवता आग बरसा रहे हैं… ऑफ़िस की बिजली बार-बार आ-जा रही है। जनरेटर से कूलर/ए.सी. नहीं चलता…। अपनी बूढ़ी उम्र पाकर खटर-खटर करता पंखा शोर अधिक करता है और हवा कम देता है। मन और शरीर में बेचैनी होती है…। कलेक्ट्रेट परिसर में ही दो ‘मीटिंग्स’ में शामिल होना है। कार्यालय से निकलकर पैदल ही चल पड़ता हूँ। गलियारे में कुछ लोग छाया तलाशते जमा हो गये हैं। बरामदे की सीलिंग में लगे पंखे  से लू जैसी गर्म हवा निकल रही है। लेकिन बाहर की तेज धूप से बचकर यहाँ खड़े लोग अपना पसीना सुखाकर ही सुकून पा रहे हैं। …काले बुरके में ढकी-छुपी एक बूढ़ी औरत फर्श पर ही पसर कर बैठी है। शायद अकेली आयी है। ….बाहर गेट पर लगी चाय की दुकान से पॉलीथिन में चाय लेकर एक महिला चपरासी कलेक्ट्रेट की ओर जा रही है। पसीने से भींगी उसकी पीठ पर पड़ती तीखी धूप से भाप उड़ती जान पड़ रही है…। बाबू लोगों की चाय लाना ही इस विधवा की ड्यूटी है। पति की अकाल मृत्यु के बाद उसे अनुकम्पा की नौकरी मिली है…। उसे देखकर मुझे अपने कमरे का माहौल बेहतर लगने लगता है…।

चुनाव आयोग ने ईवीएम (Electronic Voting Machine) के उचित रखरखाव के लिए कुछ सख़्त आदेश जारी किए हैं। उसी के अनुपालन के लिए डी.एम. साहब ने कमेटी बनाकर बैठक बुलायी है। डबल लॉक स्ट्रोंग रूम सिस्टम (द्वितालक दृढ़कक्ष) में इन मशीनों को रखकर उनकी लॉगबुक बनानी है। एक-एक मशीन का सत्यापन होना है। चार-पाँच बड़े अधिकारी जमा हो गये हैं। आयोग के निर्देश के अनुसार कमेटी के गठन का जो आदेश ए.डी.एम. के हस्ताक्षर से जारी हुआ है वह त्रुटिपूर्ण हो गया है। उस ओर ध्यान दिलाने पर ए.डी.एम. साहब बाबू को बुलाकर जोर से बिगड़ते हैं। “क्या गलत-सलत दस्तख़त करा लेते हो? कुछ भी अक़्ल नहीं है क्या?” …बाबू पलटकर सफाई देता है “साहब आदेश टाइप करके आपके सामने ही तो रखा था। आपने पढ़कर ही साइन किया था…”

“दरअसल कल शाम को बिजली चली गयी थी, उसी समय अन्धेरे में इसने उल्टा-सीधा साइन करा लिया” साहब की कैफ़ियत पर सभी मुस्कराते हैं, भीषण गर्मी और उससे उत्पन्न बिजली संकट की चर्चा होती है, लस्सी मंगायी जाती है, एक बेहतरीन स्वाद का चरपरा नमकीन खाया जाता है और नया आदेश बनाने की सलाह के साथ बैठक समाप्त होती है… सभी सदस्यों को किसी न किसी अगली बैठक में जाने की जल्दी है। मैं भी जिला सैनिक बन्धु की मासिक बैठक में शामिल होने चल देता हूँ।

परिसर में गुजरते हुए उधर देखता हूँ जहाँ एक तरफ़ पेशी पर लाये गये बन्दियों को दिन में ठहराने का लॉक-अप है। जेल की गाड़ी उन्हें यहाँ सुबह ले आती है और सुनवायी के बाद शाम को गिनती करके ले जाती है। गाड़ी से उतरकर लॉक-अप में घुसते, अपनी बारी आने पर लॉक-अप से निकलकर कोर्ट तक जाते फिर लौटते और दुबारा जेल वापसी के लिए गाड़ी में जानवरों की तरह भरे जाते समय उन कैदियों की एक झलक पाने के लिए और उनसे दो शब्द बात कर लेने के लिए सुबह से शाम तक टकटकी लगाये धूप में खड़ी उनकी बूढ़ी माँ, पत्नी, बेटे-बेटियाँ या बुजुर्ग बाप दिनभर अवसर की तलाश करते रहते हैं। बड़ी संख्या में पुलिस वाले उन्हें पास फटकने नहीं देते। हट्ट-हट्ट की दुत्कार के बीच वे जैसे-तैसे अपनी बातों के साथ कुछ खाने पीने के सामान की गठरी अपने स्वजन को थमा ही देते हैं। अधिकांश कैदी गरीब, कमजोर और फटेहाल से हैं। उनके मुलाकाती भी दीन-हीन, लज्जित और म्लानमुख…। यह सब टीवी पर दिखाये जाने वाले हाई-प्रोफाइल कैदियों से बिल्कुल अलग सा है। image

चित्रांकन- सिद्धार्थ ‘सत्यार्थमित्र’

जिस दिन कोई अमीर और मजबूत कैदी आता है उस दिन सुरक्षा और बढ़ा दी जाती है। वे इस ‘कैटिल क्लास’ की गाड़ी में ठूस कर नहीं लाये जाते। …घण्टों से धूप में खड़ी मासूम औरतों और बच्चों को देखकर मुझे गर्मी का एहसास कम होने लगता है। फौजियों की बैठक में समय की पाबन्दी जरूरी है…। मैं तेज कदमों से मीटिंग हॉल में प्रवेश करता हूँ।

एक सेवा निवृत्त कर्नल साहब ने जब से जिला सैनिक कल्याण और पुनर्वास अधिकारी का पद सम्हाला है तबसे यह बैठक माह के प्रत्येक तीसरे शनिवार को नियमित रूप से होने लगी है। जिलाधिकारी द्वारा आहूत इस बैठक में पूरे जिले से सेवानिवृत्त फौजी स्वयं अथवा अपने ब्लॉक प्रतिनिधि के माध्यम से अपनी समस्याओं के निपटारे के लिए यहाँ इकठ्ठा होते हैं। औपचारिक परिचय और उपस्थिति पंजिका पर हस्ताक्षर का काम जल्दी से निपटाकर कार्यवाही शुरू होती है। देश की सेना में जवान, सिपाही, सूबेदार हवलदार आदि पदों पर सेवा कर चुके ये लोग अब ‘सिविलियन’ हो गये हैं और अपनी जिन्दगी को नये सिरे से बसाने की कोशिश में लगे हैं। सरकार ने इन्हें सहारा देने के लिए तमाम इन्तजाम किये हैं, लेकिन इस बैठक को देखने के बाद लगता है कि सेवा निवृत्ति के बाद इन फौजियों के ऊपर मुसीबत का अन्तहीन सिलसिला शुरू हो गया है…।

इनकी जमीन पर अवैध कब्जा, माफ़िया और गुण्डों द्वारा धमकी, शस्त्र लाइसेन्स मिलने या उसके नवीनीकरण में लालफीताशाही, सरकारी दफ़्तरों में धक्के खाने और न पहचाने जाने का संकट इन फौजियों के मुंह से ज्वार की तरह फूट पड़ा। पुलिस और प्रशासन के अधिकारी उन्हें समझाने-बुझाने और जाँच का आश्वासन देकर चुप कराने की कोशिश कर रहे थे।

एक फौजी की बेटी को शरेआम उठा लिया गया था। उसने अपनी बात कहनी शुरू की। वह वास्तव में हकला रहा था कि उसकी पीड़ा उसकी जुबान को लड़खड़ाने पर मजबूर कर रही थी यह मैं अन्त तक नहीं समझ पाया। साहब… मैं सबको जानता हूँ। उन लोगों ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा… पुलिस भी उनको जानती है… दरोगा जी उन लोगों से कहाँ मिलते हैं यह भी जानता हूँ… महीने भर से परेशान हूँ लेकिन मेरी लड़की को मेरे सामने नहीं ला रहे हैं… जब जाता हूँ तो मुझे ही उल्टा समझाने लगते हैं… कहते हैं कि लड़की अठ्ठारह साल की है… अपनी मर्जी से गयी है… मैं कहता हूँ कि एक बार मेरी लड़की को मेरे सामने लाकर दिखा दो तो मैं मान जाऊँगा। लेकिन वे कुछ नहीं कर रहे हैं। डिप्टी एस.पी. साहब मोबाइल पर थानेदार से बात करके दरियाफ़्त करते हैं और बताते हैं कि लड़की ने उस मुस्लिम लड़के के साथ कोर्ट मैरिज कर लिया है… फौजी के चेहरे पर दर्द और घना हो जाता है। साहब, मैं तो बस चाहता हूँ कि एक बार मेरी बच्ची को मेरे सामने ला दो… मैं उसे देख लूंगा तो संतोष कर लूंगा… वह ऐसी नहीं है…. हमारी बच्ची को जबरिया उठाया गया है… मुझे सब मालूम है… वह ऐसा कर ही नहीं सकती… कोई मुझे समझ नहीं रहा है…

पुलिस अधिकारी समझाने की कोशिश करते हैं… देखिए जब आपकी लड़की बालिग हो चुकी है तो वह अपनी मर्जी से जहाँ चाहे वहाँ रह सकती है। हम इसमें कुछ नहीं कर सकते…. नहीं साहब, मेरी समझ में यह नहीं आ रहा है कि वह ऐसा कैसे कर सकती है… मैं यह नहीं मान सकता… फौजी की आवाज काँप रही है। …असल में आपने अपनी बेटी को तालीम ठीक नहीं दी है। उसने आपको छोड़कर उस लड़के के साथ रहने का निर्णय ले लिया है… इसमें हम क्या कर सकते हैं… ठीक है, तो आपभी मुझे वही समझा रहे हैं जो दरोगा जी समझा रहे थे। हार कर अब मैं अपनी जान दे दूंगा… लेकिन उसके पहले उन दुश्मनों से बदला लेकर रहूंगा… अब मैं खुद ही कुछ करूंगा… मेरी कोई सुनने वाला नहीं है… मेरी बेटी को उन लोगों ने अगवा कर लिया है…। बार-बार यह सब दुहराता है। उसे अपनी सीट पर बैठ जाने का हुक्म होता है। अगला केस बताया जाय…

दूसरा फौजी खड़ा होता है। मेरी बेटी तो सिर्फ़ पन्द्रह साल की है। मैं दो महीने से भटक रहा हूँ। दरोगा जी केवल दौड़ा रहे हैं। मैने नामजद रिपोर्ट लिखवायी है। उन लोगों ने ‘अरेस्ट स्टे’ ले रखा था। मैने हाईकोर्ट से उसे खारिज करवा दिया है… फिर भी पुलिस उन्हें गिरफ़्तार नहीं कर रही है। वे बहुत बड़े माफ़िया हैं। मुझे डर है कि मेरी बेटी को उन लोगों ने कहीं बाहर भेंज दिया है या उसके साथ कोई गलत काम हो रहा है…। वे लोग रोज हाईकोर्ट आ-जा रहे हैं। मैं उन्हें रोज देखता हूँ लेकिन पुलिस को दिखायी नहीं पड़ते। दरोगा जी कह रहे थे कि आई.जी. साहब ने गिरफ़्तार करने से मना किया है…। डिप्टी एस.पी. तुरन्त प्रतिवाद करते हैं। यह सब गलत बात है। आप कप्तान साहब (डी.आई.जी.) से मिलकर अपनी बात कहिए। गिरफ़्तारी तो अब हो जानी चाहिए। लेकिन उनकी बात में विश्वास कम और सान्त्वना अधिक देखकर फौजी विफ़र पड़ते हैं। साहब, थानेदार को तलब कर लिया जाय… मोबाइल पर बात होती है। थानेदार किसी कोर्ट में चल रही बहस में व्यस्त हैं। अभी नहीं आ सकते…। उनसे बात करके बाद में आपको सूचना दे दी जाएगी…। आश्वासन मिलता है।

आगे समोसा, मिठाई, नमकीन की प्लेटें लगायी जा चुकी हैं। फ्रिज का ठण्डा पानी गिलासों में भरकर रखा जा चुका है, जिनकी बाहरी सतह पर छोटी-छोटी बूँदें उभर आयी हैं। सबके सामने कपों में चाय रखी जा रही है। …किसी और की कोई समस्या हो तो बताये। कोषागार से या वित्त सम्बन्धी कोई परेशानी हो तो इन्हें नोट करा दें। यह बात नाश्ता प्रारम्भ होने की भुनभुनाहट में दब जाती है। कोई शिकायत नहीं आती है। कर्नल साहब सबको धन्यवाद देते हैं। बैठक ‘सकुशल’ समाप्त होती है…

मेरा मन ए.सी. की ठण्डी हवा में भी उद्विग्न होकर गर्मी महसूस करने लगता है। सीने पर कुछ बोझ सा महसूस होता है। एक लोक कल्याणकारी राज्य का यह सारा शासन प्रशासन किसकी सेवा में लगा हुआ है…?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

23 comments:

  1. एक लोक कल्याणकारी राज्य का यह सारा शासन प्रशासन किसकी सेवा में लगा हुआ है…?

    -इसी प्रश्न के जबाब की तो तलाश है. इन बैठकों की और व्यवस्था की यही हकीकत है, आपने खुल कर वर्णन किया.

    एक संवेदनशील हृदय इसे कब तक बर्दाश्त करे? कौन जाने कब हमारी बारी हो!

    उम्दा आलेख अनेक प्रश्न खड़े करता.

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  2. मौसम की गर्मी के तो दो चार दिन बचे हैं ,यह आतप बीत जायेगा ..मगर यह सामाजिक दुसहता ? आज सरस्वती लोक कल्याणकारी स्टेट की बखिया उधेड़ने में कामयाब हो गयी हैं .....आला अफसर बेहया हो गए हैं मजबूर ?

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  3. हालात ये ही हैं शहर और निजाम के,
    कौन देखता है दुखड़े अवाम के?

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  4. एक संवेदनशील पोस्ट!

    स्टेट गवर्नमेंट में बाबू बड़ा जानदार होता है -कहीं भी दस्तखत करा लेता है। अफ़सर दस्त्खत करते नहीं, बाबू करा लेता है।

    चित्र अच्छा बनाया।

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  5. ...एक लोक कल्याणकारी राज्य का यह सारा शासन प्रशासन किसकी सेवा में लगा हुआ है…?
    ...यह यक्ष प्रश्न तो नहीं है मगर न जाने क्यों इसका उत्तर बताने में युधिष्ठिर भी बेहोश हो जाते हैं..!

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  6. चित्रकारी बहुत जमी। मानुख छायाओं पर थोड़ी और मेहनत कर दो, बढ़िया प्रभाव आ जाएगा।

    भाई, आप लोग हाकिम हुक्काम, माई बाप हैं, आगे क्या कहूँ? ..जनता के उपर एहसान ही है जो उसकी देखभाल हो रही है। वैसे जनता कुपात्र है नहीं तो ऐसी व्यवस्था आग लगा कर भस्म कर देने लायक है।

    मियाँ को तो कई हजों का पुण्य मिल गया। क़ानून भी अजीब है। एक बार लड़की को महीने भर के लिए 'मायके' तो लाया ही जा सकता है। निशा उर्फ मेहर्रुनिशा की हक़ीकत पता चल जाएगी। पुलिस भी क्या करे? किसकी किसकी फटी सिलती फिरे ?
    बेहतर है कि अपना घर सँभाले रखा जाय और उसके बाद कोई आँख उठाए तो काट डाला जाय। बाद में तो तारीख पर तारीख - दुनिया से रिटायर होने के बाद फाँसी का फैसला आएगा। ... मैं भी क्या उलूलजुलूल बकते जा रहा हूँ !

    @ कुल प्रविष्ठियां: 163
    कुल टिप्पणियां: 269
    इस बेहूदे विजेट को हटाओ। हमने तो अटका चटका, ब्लागवाणी, चिट्ठाजगत सब हटा दिया। फालतू की पॉलिटिक्स है।
    ढूँढ़ रहा हूँ कि कैसे इनसे रजिस्ट्रेशन भी हटाया जाय। अपने मन से आए थे अपने मन से जाएँगे, अनुरोध क्या करना? लेकिन जाने की राह ही नहीं मिल रही। मदद करो भाई, राह बताओ।

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  7. क्या कहा जाय।
    पोस्ट सोचने पर मजबूर कर देती है बस सेकंड के किसी हिस्से भर के लिए...और फिर वह सोच आगे कुछ और सोचने लगती है।
    अधिकारी वर्ग, माया, मोह...दिलासा...न जाने क्या क्या ...

    और गिरिजेश महराज...क्या एकदम से सन्यास लेने के मुड में तो नहीं आ गए हो। बाबा बाबी मठ भूल गए क्या...चलो मिलकर खोला जाय एकाध आश्रम और रमाया जाय धूनी :)

    अपनी वह बकाया पोस्ट अब रहने दो....अब मूड नहीं रहा :)

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  8. मेरा मन ए.सी. की ठण्डी हवा में भी उद्विग्न होकर गर्मी महसूस करने लगता है। सीने पर कुछ बोझ सा महसूस होता है। एक लोक कल्याणकारी राज्य का यह सारा शासन प्रशासन किसकी सेवा में लगा हुआ है…?--सही कह रहे हैं ,संवेदनशीलता खत्म हो गयी है.यह समाज का विकृत रूप है.

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  9. बहुत बढ़िया पोस्ट.

    पढ़कर लगा कितना कुछ सहना पड़ता होगा पुलिस वालों और अधिकारियों को भी. अपने मन से काम न करने का दुःख तो उन्हें भी होता होगा. वे किसे बताएं बेचारे?

    और ये आपके जिले में लड़कियाँ क्यों उठा ली जा रही हैं इतनी? सामजिक न्याय का ये कोई नया है क्या?

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  10. मन उदिग्न और निशब्दता की स्थिति में है....क्या कहूँ....

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  11. सरकारी महकमे में जब एक कार्य को दूसरे पर ठेलना बन्द हो जायेगा, इतनी बैठकों की आवश्यकता ही न पड़े संभवतः ।

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  12. मन दुखी हो जाता है, अगर यह फ़ोजी कभी खुद ही फ़ेसला करने लग गये तो यह दोशी ही कहलायेगे, ओर जो दुसरे कुते इन की बेटियो को ले कर बेठे है वो समाननिया कहलायेगे, वाह रे मेरे देश ओर मेरे देश के कानून

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  13. अब साहब, सरकार तो अपना काम बखूबी कर ही रही है। हर विषय पर, हर रोज मीटिंग रखी जाती हैं, लोगों की समस्यायें सुनी जा रही हैं और क्या चाहिये?
    चमड़ी मोटी करवा लो त्रिपाठी साहब, सुखी रहोगे।
    हमारे एक अधिकारी महोदय ने हमें भी ये दिव्य ज्ञान दिया था, "सत्ता एक मदमस्त हाथी है, इसके सामने मत पड़ो, सवारी करो इसकी।" जो ज्ञानी लोग सत्ता के साथ तातरम्य बिठा लेते हैं, उन्हें कैसा भी दुख, कैसी भी व्याधि नहीं व्यापती।
    जंगल का कानून अपने वर्तमान कानून से शायद ज्यादा सही है, हरेक के पास सामर्थ्यानुसार प्रतिकार करने की छूट तो होती है, कम से कम। यहां तो जो जितना बड़ा गुंडा है, उसके लिये कानून उतना ही सहायक और जो व्यवस्था में विश्वास रखे, उसकी राह में पग पग पर कांटे बिखेरने वाला।

    @ गिरिजेश राव:
    किसी मुगालते में मत रहना महाराज, ये फ़ास्ट ट्रैक अदालतें आप हम जैसों के लिये ही बनी हैं, कहीं अपनी तुलना अफ़जल, कसाब जैसी विभूतियों से कर बैठो। ये तारीख पर तारीख, अपील पर अपील वाला फ़ार्मूला सब के लिये नहीं है।

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  14. मन को झकझोर दिया आपकी इस पोस्ट ने। सब कुछ छिपा हुआ तो देख लेती हैं आप नजरें। भासा पर एकाधिकार आपकी संवेदन्शीलता को और बढाता है। आपको डायरीनुमा ऎसी पोस्ट और लिख्ननी चाहिये।

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  15. गर्मी की विभीषिक तो हम भी देख रहे है, काफी दिनों से बहुत से काम छोड़ रखा है गर्मी और घूप के कारण आज सोच रहा हूँ वो कर ही लूँ अन्‍यथा काफी विलम्‍ब हो जायेगा।

    सरकारी अफसर होना और जिम्मेदारी निभाना बहुत कठिन काम है। हम देखते है कि किसी काम को करवा पाना बहुत कठिन होता है, अधिकारियों पर राजनेताओ का दवाब होने के जनसामन्य का काम भी विलम्‍बित हो जाता है।

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  16. आपका चित्र बहुत अच्‍छा बना है, एक-दो और बना लीजिए आता हूँ देखने किसी दिन गर्मी/धूप कम होने पर :)

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  17. कई बार हमें लगता है कि जिन्हें आराम ही आराम है उनकी पीड़ा भी होती है !
    खैर दस्खत करा भी ली जाती है ये भी आज ही पता चला.

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  18. ओह! वातानुकूलित कमरे में बैठकर संवेदना व्यक्त भी करूं तो उसका क्या मोल?

    बहुत सशक्त पोस्ट!

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  19. ...एक लोक कल्याणकारी राज्य का यह सारा शासन प्रशासन किसकी सेवा में लगा हुआ है…?
    ...यह यक्ष प्रश्न तो नहीं है मगर न जाने क्यों इसका उत्तर बताने में युधिष्ठिर भी बेहोश हो जाते हैं..!

    Bechain aatma ji se sehmat hun....

    Mindblowing post !....kuchh to sudhar hoga.

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  20. पसीने से भींगी उसकी पीठ पर पड़ती तीखी धूप से भाप उड़ती जान पड़ रही है…।
    सीने पर कुछ बोझ सा महसूस होता है। एक लोक कल्याणकारी राज्य का यह सारा शासन प्रशासन किसकी सेवा में लगा हुआ है…?
    ....मेरा मन ए.सी. की ठण्डी हवा में भी उद्विग्न होकर गर्मी महसूस करने लगता है।...
    समय के साथ-साथ शासन के लोग भी संवेदन्हीन हो गये हैं भाया। आज कितने अफ़्सर जनता का दर्द मह्सूस करते हैं। समय की यही विडम्बना है भाया।

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  21. बहुत बढ़िया पोस्ट पढ़ते पढ़ते ही पसीने छूट गए. सरकारी तंत्र ढुल- मूल रवैया. कौड़ियों में आंकी जाती हमारी भावनाएं,हम फिर भी खामोश !!!! सब कुछ सुनने और सहने को मजबूर.

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  22. देश की व्यवस्था की अव्यवस्था पर खेद जताने के सिवा कर भी क्या सकते हैं । बहुत अच्छा लगा आलेख ।

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  23. जिन्दा लोगों की तलाश! मर्जी आपकी, आग्रह हमारा!!

    काले अंग्रेजों के विरुद्ध जारी संघर्ष को आगे बढाने के लिये, यह टिप्पणी प्रदर्शित होती रहे, आपका इतना सहयोग मिल सके तो भी कम नहीं होगा।
    ============

    उक्त शीर्षक पढकर अटपटा जरूर लग रहा होगा, लेकिन सच में इस देश को कुछ जिन्दा लोगों की तलाश है। सागर की तलाश में हम सिर्फ सिर्फ बूंद मात्र हैं, लेकिन सागर बूंद को नकार नहीं सकता। बूंद के बिना सागर को कोई फर्क नहीं पडता हो, लेकिन बूंद का सागर के बिना कोई अस्तित्व नहीं है।

    आग्रह है कि बूंद से सागर में मिलन की दुरूह राह में आप सहित प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति का सहयोग जरूरी है। यदि यह टिप्पणी प्रदर्शित होगी तो निश्चय ही विचार की यात्रा में आप भी सारथी बन जायेंगे।

    हम ऐसे कुछ जिन्दा लोगों की तलाश में हैं, जिनके दिल में भगत सिंह जैसा जज्बा तो हो, लेकिन इस जज्बे की आग से अपने आपको जलने से बचाने की समझ भी हो, क्योंकि जोश में भगत सिंह ने यही नासमझी की थी। जिसका दुःख आने वाली पीढियों को सदैव सताता रहेगा। गौरे अंग्रेजों के खिलाफ भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, असफाकउल्लाह खाँ, चन्द्र शेखर आजाद जैसे असंख्य आजादी के दीवानों की भांति अलख जगाने वाले समर्पित और जिन्दादिल लोगों की आज के काले अंग्रेजों के आतंक के खिलाफ बुद्धिमतापूर्ण तरीके से लडने हेतु तलाश है।

    इस देश में कानून का संरक्षण प्राप्त गुण्डों का राज कायम हो चुका है। सरकार द्वारा देश का विकास एवं उत्थान करने व जवाबदेह प्रशासनिक ढांचा खडा करने के लिये, हमसे हजारों तरीकों से टेक्स वूसला जाता है, लेकिन राजनेताओं के साथ-साथ अफसरशाही ने इस देश को खोखला और लोकतन्त्र को पंगु बना दिया गया है।

    अफसर, जिन्हें संविधान में लोक सेवक (जनता के नौकर) कहा गया है, हकीकत में जनता के स्वामी बन बैठे हैं। सरकारी धन को डकारना और जनता पर अत्याचार करना इन्होंने कानूनी अधिकार समझ लिया है। कुछ स्वार्थी लोग इनका साथ देकर देश की अस्सी प्रतिशत जनता का कदम-कदम पर शोषण एवं तिरस्कार कर रहे हैं।

    अतः हमें समझना होगा कि आज देश में भूख, चोरी, डकैती, मिलावट, जासूसी, नक्सलवाद, कालाबाजारी, मंहगाई आदि जो कुछ भी गैर-कानूनी ताण्डव हो रहा है, उसका सबसे बडा कारण है, भ्रष्ट एवं बेलगाम अफसरशाही द्वारा सत्ता का मनमाना दुरुपयोग करके भी कानून के शिकंजे बच निकलना।

    शहीद-ए-आजम भगत सिंह के आदर्शों को सामने रखकर 1993 में स्थापित-ष्भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थानष् (बास)-के 17 राज्यों में सेवारत 4300 से अधिक रजिस्टर्ड आजीवन सदस्यों की ओर से दूसरा सवाल-

    सरकारी कुर्सी पर बैठकर, भेदभाव, मनमानी, भ्रष्टाचार, अत्याचार, शोषण और गैर-कानूनी काम करने वाले लोक सेवकों को भारतीय दण्ड विधानों के तहत कठोर सजा नहीं मिलने के कारण आम व्यक्ति की प्रगति में रुकावट एवं देश की एकता, शान्ति, सम्प्रभुता और धर्म-निरपेक्षता को लगातार खतरा पैदा हो रहा है! हम हमारे इन नौकरों (लोक सेवकों) को यों हीं कब तक सहते रहेंगे?

    जो भी व्यक्ति स्वेच्छा से इस जनान्दोलन से जुडना चाहें, उसका स्वागत है और निःशुल्क सदस्यता फार्म प्राप्ति हेतु लिखें :-
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा, राष्ट्रीय अध्यक्ष
    भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास)
    राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यालय
    7, तँवर कॉलोनी, खातीपुरा रोड, जयपुर-302006 (राजस्थान)
    फोन : 0141-2222225 (सायं : 7 से 8) मो. 098285-02666
    E-mail : dr.purushottammeena@yahoo.in

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