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Saturday, May 10, 2008

निकानोर पार्रा के नाम


ब्लॉगवाणी में ‘ज्यादा पढ़े गये’ चिठ्ठों की सूची में कल ०९ मई,२००८ को शीर्ष पर क्लिक किया तो ‘कबाड़खाना’में पहुँच गये। वहाँ अशोक पांडे जी ने निकानोर पार्रा (जन्म: 5 सितम्बर1914) की एक पुरानी कविता पोस्ट कर रखी थी। मुमकिन नहीं अड़े रहना इस टेक पर कि सिर्फ एक ही रास्ता सही है
बकौल अशोक जी, पाब्लो नेरुदा के बाद चिले के सबसे महत्वपूर्ण कवि माने जाते हैं निकानोर पार्रा। (कॉलेज के दौर की एक डायरी में अचानक मिली इस कविता के अनुवादक का नाम लिखना भूल गया था... )
कविता सबकी तरह मुझे भी बहुत अच्छी लगी। आगे की बात जानने से पहले यह कविता पढ़ लीजिए :

युवा कवियों से
जैसा चाहे लिखो
पसन्द आये जो शैली तुम्हें,
अपना लो
पुल के नीचे से बह चुका है इतना खून
मुमकिन नहीं अड़े रहना इस टेक पर
कि सिर्फ एक ही रास्ता सही है
कविता में हर बात की इजाज़त है
बस, शर्त है सिर्फ यही
कि तुम्हें कोरे कागज़ को बेहतर बना देना है

इस कविता को दो-चार बार पढ़ने का असर ये हुआ कि मुझे भी कविता लिखने की ऊर्जा मिलती सी लगी। सोचते-सोचते मैने अपनी पिछ्ली कोशिशों को याद किया, और ‘पार्रा’ साहब की आश्वस्ति और प्रेरणा को सलाम करते हुए कुछ शब्द जोड़ डाले। शुरुआत उन्ही की अंतिम पंक्ति से हुई। लीजिए सुनाता हूँ...

यह शर्त छोटी नहीं

बस कोरे कागज को बेहतर बना देना है?
यह शर्त छोटी नहीं।
काफ़ी कुछ मांगती है कविता;
अपने जन्म से पहले
इसका अंकुर फूटता है
हृदय की तलहटी में,
जब अंदर की जोरदार हलचल
संवेगों का सहारा पाकर धर लेती है रूप
एक भूकंप का;
जो हिला देता है गहरी नींव को,
गिरा देता है दीवारें,
विदीर्ण कर देता है अन्तर्मन के स्रान्त कलश,
बिंध जाता है मर्मस्थल,
तन जाती हैं शिरायें,
फड़कती हैं धमनियाँ
जब कुछ आने को होता है।

यह सिर्फ़ बुद्धि-कौशल नहीं;
आत्मा को पिरोकर
मन के संवेगो से
इसे सिंचित करना पड़ता है।
देनी पड़ती है प्राणवायु
पूरी ईमानदारी से,
ख़ुदा को हाज़िर नाजिर जानकर,
अपने पर भरोसा कायम रखते हुए;
भोगे हुए संवेगों को
जब अंदर की ऊष्मा से तपाकर
बाहर मुखरित किया जाता है,
तो कविता जन्म लेती है।

माँ बच्चे को जन्म देकर,
जब अपनी आँखों से देख लेती है
उसका मासूम मुस्कराता चेहरा,
तो मिट जाती है उसकी सारी थकान,
पूरी हो जाती है उसकी तपस्या
खिल जाता है उसका मन।
लेकिन प्रसव-वेदना का अपना एक काल-खण्ड है
जो अपरिहार्य है।

कविता पूरी हो जाने के बाद, वह
मंत्रमुग्ध सा अपलक देखता रहता है
उस कोरे काग़ज को,
जिसे अभी-अभी बेहतर बना दिया है
उसके भीतर उठने वाले ज्वार ने;
जो छोड़ गया है
कुछ रत्न और मोती
इस काग़ज के तट पर।
या, उसने गहराई में डूबकर
निकाले हैं मोती।
किन्तु जो वेदना उसने सही है
उसका भी एक काल-खण्ड है।

फिर कैसे कहें,
कविता में हर बात की इज़ाजत है?

(मेरा प्रयास कितना सफ़ल हुआ यह बताने का जिम्मा आप मर्मज्ञ पाठकगण और श्रेष्ठ कबाड़ी भाइयों पर छोड़ता हूँ।)

2 comments:

  1. चलिये, नेरूदा के बाद एक और नाम तो पता चला - निकानोर पार्रा। इ्ण्टलेक्चुअल समां बांधने में सहायता मिलेगी!

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  2. माहोल तो जम ही गया, बाकि वो लोग बतायें. :)

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