Friday, June 19, 2009

क्या लिखूँ...? बताइए न...!

 

ब्लॉगरी भी अजीब फितरत है। इसमें लगे रहो तो मुसीबत और न लग पाओ तो और मुसीबत। अभी एक पखवारे तक जो लोग इसमें लगे रहे वे निरापद लेखन की खोज में हलकान होते रहे और मैं इस चिन्ता में दुबला होता रहा कि मैं तो कुछ लिख ही नहीं पा रहा हूँ।

28052009306 बेटे के मुण्डन में गाँव जाना क्या हुआ मैने उसकी व्यस्तता की आड़ में खूब आलस्य का मजा लिया। कार्यक्रम की फोटुएं भी भतीजे की तगड़ी मोबाइल में वहीं छोड़ आया। घर-परिवार वालों ने सलाह दी कि बच्चे को ज्यादा एक्सपोजर दोगे तो नज़र लग जाएगी। बस मेरे आलस्य की बेल इस सलाह की डाल का सहारा पाकर लहलहा उठी। आज ही कुछ तस्वीरें मेरे हाथ लगी हैं लेकिन कौन सी लगाऊँ समझ नहीं पा रहा। ...चलिए कोट माई के चरणों में खड़े सत्यार्थ की मुस्कान का आनन्द लीजिए।

इधर सत्यार्थ की मौसी श्रीमती रागिनी शुक्ला जी से भी भेंट हुई। उन्होंने एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की विधवा की करुण सत्यकथा हमें भेंट की। सोचा था पिछली दो कहानियों की कड़ी में उनकी तीसरी कहानी भी यहाँ पोस्ट कर दूंगा। लेकिन यहाँ घर में ही मात खा गया। श्रीमती जी ने अपनी दीदी की कहानी पर पहला हक़ जता दिया और वह भी टूटी-फूटी पर जा लगी।

उधर छ्ठे वेतन आयोग ने बुजुर्गों के साथ थोक भाव से सहानुभूति दिखायी है। अस्सी साल की उम्र पाते ही उन्हें २० प्रतिशत अधिक पेंशन दिए जाने और उसके बाद प्रत्येक पाँच साल पर इतना ही और बढ़ा देने का निर्णय ले लिया गया है। सौ साल पार करते ही वेतन के बराबर पेंशन हो जाएगी। इसमें अपने पति के स्थान पर पारिवारिक पेंशन पाने वाली अनेक बुजुर्ग और अनपढ़ महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें स्वयं अपनी उम्र नहीं मालूम, और न ही कोई अभिलेख ऐसे हैं जो ठीक-ठीक उम्र बता सकें। सी.एम.ओ.(Chief Medical Officer) दफ़्तर आयु बताने का काउण्टर खोलकर बैठा है; जहाँ फौरन आयु का प्रमाणपत्र बन जा रहा है। शरीर पर ‘आला’ (Stethoscope) लगा कर और जीभ-मुँह देखकर आयु का निर्धारण कर दिया जा रहा है। सुना था कि किसी खास हड्डी का एक्स-रे लेकर सही आयु बतायी जा सकती है। लेकिन वहाँ शायद इसकी जरूरत नहीं पड़ रही।  विज्ञ पाठक इसपर प्रकाश डाल सकते हैं। डॉक्टर ब्लॉगर्स से विशेष अनुरोध है।

सावित्री देवी हाई स्कूल १९४४ऐसे में सावित्री देवी जैसी पेंशनर से मन प्रसन्न हो गया जिन्होंने १९४४ में हाई स्कूल की परीक्षा पास करके अपना प्रमाणपत्र सजो कर रखा है और आज उसका लाभ ८२ साल की उम्र में पाने जा रही हैं।

गाँव में लगभग सभी बच्चे बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंको के साथ सफल रहे। वे भी जिन्हें खुद ही अपनी सफलता की आशा नहीं थी। नकल महायज्ञ की घनघोर सफलता ने सारे रिकार्ड पीछे छोड़ दिए। लड़कियाँ एक बार फिर लड़कों से आगे रहीं। इस शीर्षक की वार्षिक पुनरावृत्ति अखबारों में इस बार भी पूरे जोश से हुई। इसमें छिपी विडम्बना पर कुछ कहने की इच्छा थी, लेकिन संयोग से मेरी नज़र एक अज्ञेय ब्लॉगर की पोस्ट पर पड़ गई जहाँ इन साहब ने इस विषय पर काफी कुछ कह दिया है। सो यह प्रोजेक्ट भी जाता रहा।

Image039एक दिन के लिए ससुराल जाना हुआ। आम के बाग में बन्दरों की सेना समायी हुई थी। गाँव भर के लड़के बन्दरों को भगाने के बहाने गुलेल लेकर वहाँ जमा थे। उनकी निगाह बन्दरों द्वारा काटकर या तोड़कर गिराये जा रहे आमों पर अधिक थी। लेकिन जिस नन्हें और लुप्तप्राय जीव ने वहाँ मेरा मन मोहा वह थी वहाँ के पुराने मकान में जहाँ-तहाँ घोसला बनाकर रहने वाली नन्हीं गौरैया। घर के कोने-कोने में निर्भय होकर चहकने वाली और चुहू-चुहू की आवाज से पूरा घर गुंजायमान करने वाली गौरैया का बड़ा सा परिवार मुझे एक दुर्लभ आनन्द दे गया। मोबाइल से कठिनाई पूर्वक खींचे गये फोटू तो अभी भी सुरक्षित हैं लेकिन इस लुप्त होती प्रजाति पर एक खोजी और वैज्ञानिक रिपोर्ट बनाने के सपने ने इसपर भी एक पोस्ट को रोक रखा है। डॉ. अरविन्द जी या तसलीम जी कुछ मदद करें तो अच्छा हो।

लोकसभा चुनावों के परिणामों से मायावती जी को अपने खिसकते जनाधार का अंदेशा हुआ तो उन्होंने सत्ता की पकड़ मजबूत करने के लिए कई बड़े प्रशासनिक फैसले कर डाले। उस समय जब सरकारी अफसर ट्रान्सफर सीजन की तैयारी कर रहे थे और अच्छी पोस्टिंग के लिए अपने मन्त्रीजी को प्रसन्न करने के रास्ते तलाश रहे थे तभी मैडम ने शून्य स्थानान्तरण की नीति घोषित कर दी। कहते हैं कि कितनों के हाथ के तोते उड़ गये। लेकिन मैं स्वयं एक सरकारी मुलाजिम होने के नाते इन सुनी-सुनायी बातों पर चर्चा करने से बचता रहा।

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गाँव पर इस बार सन्ताइन और उनकी हिरमतिया से भेंट हुई। जब हम ‘कोट माई’ के स्थान पर बाबू के बाल चढ़ाने गये तो देखा कि वहीं पंचायत भवन के बरामदे में दोनो माँ-बेटी परित्यक्त और नारकीय जीवन जी रहे है। डिस्कवरी चैनेल पर दिखने वाला सोमालिया का भुखमरी का दृश्य वहाँ साक्षात्‌ उपस्थित था। मेरे कुछ मित्र और रिश्तेदार जिन्होंने हिरमतिया की कहानी पढ़ रखी थी वे भी उन्हें सजीव देककर आहत हो गये। लेकिन यहाँ सच कहूँ तो चाहकर भी मुझे इस दारुण कथा का अग्र भाग लिखने की हिम्मत नहीं हुई।

शशि पाण्डेय उधर इलाहाबाद संसदीय सीट की निर्दल प्रत्याशी शशि पाण्डेय ने सबसे कम वोट पाने के बाद अगले पाँच साल के लिए जो लक्ष्य निर्धारित किया है उसमें सबसे पहला लक्ष्य है- एक दूल्हा तलाशकर उससे शादी रचाना, उसके साथ देश विदेश घूमकर मजे करना और घर-गृहस्थी बस जाने के बाद पुनः जनसेवा के मैदान में कूद जाना। यह सब मुझे तब पता चला जब वो परिणाम घोषित होने के बाद अपने चुनावी खर्च का आखिरी हिसाब जमा करने के सिलसिले में मेरे कार्यालय आयी थीं। कल मुझे फोन करके पूछ रही थीं संसद में महिला आरक्षण बिल के बारे में मेरा क्या नजरिया है। मैने उनका नजरिया पू्छा तो बोलीं कि ‘आइ अपोज इट टूथ एण्ड नेल’ कह रहीं थीं कि इससे तो अगड़े कांग्रेसियों की बहुएं और बेटियाँ ही संसद में भर जाएंगी। ...एक बार फिर उनके साहसी कदम की चर्चा करना चाहता था लेकिन उन्हीं के डर से आइडिया ड्रॉप कर दिया। निरापद लिखने का दौर जो चल पड़ा है इन दिनों...। :)

अभी एक शादी में शामिल होने के लिए गोरखपुर तक ट्रेन से जाना-आना हुआ। सफर के दौरान लालू जी की चमत्कारी सेवाओं से लेकर उनके निर्णयों को पलटने वाली ममता बनर्जी की खूब गर्मागर्म चर्चा सुनने को मिली। लालूजी के साइड मिडिल बर्थ की खोज पर लानत भेंजने वालों के कष्ट को स्वयं महसूस करने का मौका मिला। लेकिन जो बर्थें अब निकाली जा चुकी हैं उनकी चर्चा बेमानी लगती है। साइड अपर बर्थ को भी ऊपर सरकाकर जो छत से सटा दिया गया था वो अभी वहीं अटकी हुईं हैं और मुसल्सल कष्ट देती जा रही हैं। यह सब लिखकर मैं उस जनादेश का अनादर नहीं करना चाहता जो लालूजी को इतिहास की वस्तु बना चुका है। अब लालू ब्रैण्ड की टी.आर.पी. नीचे हो चली है।

तो मित्रों, ये सभी मुद्दे मेरे मन में पिछले एक पखवारे से उमड़-घुमड़ रहे थे लेकिन एक पूरी पोस्ट के रूप में नहीं आ सके। अभी कल जब मैने एक शत-प्रतिशत निरापद पोस्ट देखा तो मन में हुलास जगा कि एक अदद पोस्ट तो चाहे जैसे निकाली जा सकती है। लेकिन बाद में किसी ने मेरे कान में बताया कि यह निरापद पोस्ट भी हटाये जाने के आसन्न संकट से दो-चार है तो मेरे होश गु़म हो गये।

अब तो यह सोच ही नहीं पा रहा हूँ कि क्या लिखूँ...! आप विषय बताकर मेरी मदद करिए न...! सादर!

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

24 comments:

  1. मानसिक हलचल के मामले में आपने ज्ञानदत्त जी को पछाड़ दिया -आदि वैदिक मनीषी की भांति आप भी एक उधेड़बुन में रह गए कि क्या लिखूं और क्या न लिखू -कस्मै देवाय हविषा विधेम की ही तर्ज पर ! मगर आपकी इस अर्जुनीय दुविधा में भी एक सुंदर सी निरापद पोस्ट निकल ही आयी -आप धन्य हैं -आपकी सक्रियता और निष्क्रियता दोनों ही प्रणम्य है -आप और आलस्य को प्राप्त हों यही कामना है !

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  2. क्‍या लिखूँ पर इतना लिख दिया, वकई अच्‍छा विषय चुन लिया आपने, आपको पुन: लिखते देख अच्‍छा लगा।

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  3. विषय पता होता तो आपकी अनुपस्थिति का लाभ उठा खुद न लिख डालते .....:)

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  4. जैसा अरविन्द जी ने कहा मुझे भी ज्ञान जी झलक मिलते दिख पड़ रही है !!

    बकिया तो आपने किसी न किसी रूप में अच्छी खासी चिट्ठी चर्चा कर ही डाली है !!


    बधाई!!

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  5. लौट के बुद्धू घर को आए। कहाँ गए थे पता नहीं! मैं तो अभी भी इसी ग़फलत में हूँ कि हिल स्टेशन घूमने गए थे।

    निरापद वग़ैरह के चक्कर से निकलो. मैं गिनाता हूँ कहाँ टिप्पणी और किस क्षेत्र में लेख की आवश्यकता है:

    (1) गड्ढे पर इलाहाबाद की प्रविष्टि अभी भी बाकी है।
    (2) मार्क्सवादी और मार्क्सवादी टाइप के कुछ चिट्ठे इधर आए हैं। उनके बहाने 'क़ब्जकारी' नहीं सरल शब्दावली में इन मुद्दों पर चर्चा हो सकती है:
    - WPI घट कर ऋणात्मक हो गया है लेकिन CPI के चलते महँगाई अभी भी बढ़ती जा रही है। वैसे मैं उल्टा बोल गया। महँगाई से ये बनते हैं, महँगाई इनसे नहीं। या अभी भी ग़लत हूँ? मेरे साथ आम जनता को ये गड़बड़झाला समझाओ।
    - लालगढ़ के बहाने नक्सली, माओवादी और आंतरिक सुरक्षा पर बहस छेड़ सकते हो।
    - डकैतों, नेताओं, नक्सलियों, सफेदपोश अपराधियों और माओवादियों में अंतर को कम से कम 25 बिन्दुओं में स्पष्ट करें।
    - गरीब अपनी गरीबी के लिए खुद कहाँ तक जिम्मेदार है? एक पोस्ट इस पर।
    (3) 'मोहल्ला' काण्ड के बहाने धर्म प्रचार और धर्मांतरण की नई तकनीकों पर बहस।
    (4) हिन्दी ब्लॉगरी को अपरिपक्व कहने वाले कुछ चिठ्ठे भी घूम रहे हैं। वे अपने विश्लेषण में क्यों कच्चे या पक्के हैं, इस पर एक अदद लेख।
    (5) ओबामा के 'मक्खी मारने' पर हिन्दी ब्लॉग पर पोस्ट शायद अब तक न आया हो सो नेताओं के मक्खी और आदमी मारने के बहाने से कुछ लिख सकते हो।
    (6) धमकात्मक स्नेह, श्रम और उद्यम का मुद्दा अभी तक हॉट है। मुझे कुछ समझ में नहीं आया लिहाजा अगर सरल भाषा में समझा सको तो 10 टिप्पणियाँ तो मैं ही भेज दूँगा।
    (7) यौन अपराध का मुद्दा तो है ही।
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    लिस्ट लम्बी है। ऑफिस जल्दी जाना है इसलिए काट रहा हूँ।

    हाई कोर्ट के शहर में रहने वाले को वकीलों से घबराना नहीं चाहिए। कहाँ तक भागोगे? आपदा बुलाओ और आपदा प्रबन्ध पर भी कुछ लिख डालो।

    आशा है भइया को निराश नहीं करोगे।

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  6. हाँ, मेरी एक अपील शायद पढ़ी ही नहीं:

    भोजपुरी के शब्दरत्न 'लण्ठ' की दुर्दशा परम आदरणीय और प्रात: दर्शनीय(ब्लॉग पर, कुछ और न समझो !) ज्ञानदत्त जी और अजित वडनेरकर जी कर चुके हैं।

    इस शब्द, इस प्रवृत्ति और उस टाइप के व्यक्तियों पर एक लेखमाला आवश्यक है। हम भोजपुरिए इस तरह अपनी संस्कृति और परम्परा के भ्रामक और गलत interpretation की अनुमति नहीं दे सकते।

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  7. आपको बधाई हो ये ना -ना करते हाँ हाँ हो गया .बढ़िया पोस्ट लिख दी आपनें .

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  8. वो उसके बारे में लिखो..

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  9. आप तो शोले के अमिताभ से भी ज्यादा स्मार्ट निकले।वीरू की तारीफ़ वाली स्टाईल मे क्या लिखू,क्या लिखू।ये है निरापद लेखन्।

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  10. ’क्या लिखूँ’ में ’क्यों न लिखूँ’ का भाव भर दिया ।

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  11. "इसमें लगे रहो तो मुसीबत और न लग पाओ तो और मुसीबत।" ब्लागरी की जादूगरी यही है शादी जैसी- करो तो मुश्किल, न करो तो भी मुश्किल:-)

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  12. अरे भईया क्या लिखु क्या लिखु कर के आप ने अपने मन की सारी भडास निकाल दी, बहुत अच्छी लगी आप की यह अदा भी
    निर्दल प्रत्याशी शशि पाण्डेय जी भी तो अब पांच साल बेकार थोडे बेठेगी, अजी पंचव्रषिया योजना है.
    धन्यवाद





    मुझे शिकायत है
    पराया देश
    छोटी छोटी बातें

    नन्हे मुन्हे

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  13. शानदार ब्लॉग पोस्ट है. अद्भुत!
    और क्या लिखूँ?
    शशि पाण्डेय जी को हमारी तरफ से हार्दिक शुभकामनाएं.
    गौरैया की केवल फोटो छपने से नहीं चलेगा. उसके ऊपर एक कविता भी लिखनी होगी.

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  14. भाई वाह !
    ऐसा लगता है तीन चार लोगो ने मिलकर लिखा है .ज्ञान जी की छाया नजर आती है .....वैसे एक ओर कार्यशाला कर लीजिये चार पांच पोस्ट निकल आयेगी.. .....

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  15. इत्ता बहुत है जी आज के लिये।

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  16. सर्टिफिकेट देख कर तो मन खुश हो गया जी !
    और बाकी 'अपडेट' भी अच्छे रहे...

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  17. धन्यवाद एवम नमस्कार जी


    हे प्रभु यह तेरापथ
    मुम्बई टाईगर

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  18. जल्दी से एक अच्छी सी पोस्ट लगाइए
    क्या कहाँ ये पोस्ट ही तो है
    अजी ठेंगे से ये कोई पोस्ट है, ये तो आप बता रहे है की आलस किया और इन विशय पर लिखने को सोचा था
    चलिए अब हमें जानकारी हो गई
    पोस्ट कहाँ है ?
    वीनस केसरी

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  19. मौन जब टूटता है तो ऐसे ही बलबला कर बहता है। आप उसे अगर माडरेट करते हैं तो ईमानदारी नहीं दिखाते।
    आपने ईमानदारी दिखाई!

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  20. Bhai itna to kah gaye bina vishaya ke, BACHA KYA ?

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  21. kya likhu mai itna kuchh,likhane baithte to kya hota? maja aa gaya post padh ke.bade din ke bad ki post thi to badi to honi hi thi. par badhia vihangam drishti dali hai aapne.sadhuvaad

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  23. hmmmm ye sayad khichadi hi to hai...lekin hazam karne se pahle ek sawal hai man me...ye khichdi visayo ki adhikta ka fal hai ya fir kami ya fir pura khana na pakne ka aalas......jo bhi hai bani zabrjast hai...
    :-)

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  24. क्या लिखूं की दुविधा के बीच भी इतना कुछ लिख डाला, बधाई. इस बहाने आपकी एक पिछली पोस्ट पढने का मौक़ा भी मिला. अब जब हम लोग हिरमतिया और उसकी माँ को जान-पहचान गए हैं क्या उनके लिए कुछ किया जा सकता है?

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