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Tuesday, July 21, 2009

बच के रहना रे बाबा... जाने कौन कैसा मिल जाय- भाग-२

(इस पोस्ट को पढ़ने से पहले इसका पूर्वार्द्ध जानना आवश्यक है। यदि आप पिछली पोस्ट न पढ़ पाये हों तो यहाँ चटका लगाएं...।)

अब आगे... 

failed marriageजुलाई की ऊमस भरी गर्मी...। मैं अपने ऑफिस में बैठा कूलर की घर्र-घर्र के बीच चिपचिपे पसीने पर कुढ़ता हुआ सरकारी फाइलों और देयकों (bills) आदि का काम निपटा रहा था। बाहर का मौसम तेज धूप और रुक-रुक कर पड़ते बारिश के छींटो से ऐसा खराब बन गया था कि बहुत मजबूरी में ही बाहर निकला जा सकता था। मेरे कमरे में कोई दूसरा न था।

तभी एक स्मार्ट सा युवक अन्दर आया और मेरी अनुमति लेकर कुर्सी पर बैठ गया। उसका चेहरा कुछ जाना पहचाना लगा। एक दिन पहले ही इस चेहरे से परिचय हुआ था जब लखनऊ से कुछ प्रशिक्षु अधिकारियों का एक दल हमारे कोषागार में भ्रमण के लिए आया था। करीब पन्द्रह प्रशिक्षणार्थियों ने एक-एक कर अपना नाम बताया था और अपना संक्षिप्त परिचय दिया था। सुन्दर काया और किसी जिमखाने से निकली सुडौल देहयष्टि वाला यह नौजवान भी उस टी्म का एक सदस्य था। लेकिन तब उस परिचय में सबका नाम तत्काल याद कर पाना सम्भव नहीं हो पाया था।

“तुम तो कल आए थे...? सॉरी यार, मैं तुम्हारा नाम याद नहीं रख पाया...” मैने संकोच से पूछा।

“जी सर, मैं कल आया था। आपसे अकेले मिलने की इच्छा थी इसलिए आज चला आया। ...मेरा नाम आप जानते होंगे। ...मैं अमुक हूँ। ...आज फेमिली कोर्ट में सुनवायी थी, लेकिन वो लोग फिर नहीं आए। केवल डिले करने की टैक्टिक्स अपना रहे हैं।”

“ओफ़्फ़ो, यार मैं तो तुम्हारे बारे में सुनकर बड़ा रुष्ट था। आखिर यह सब करने की क्या जरूरत थी? अच्छी भली लड़की का जीवन नर्क बना दिया।” मैं तपाक से बोल पड़ा।

उसके चेहरे पर एक बेचैनी का भाव उतर आया था, “सर, लगता है उसने यहाँ आकर भी अपनी कलाकारी का जादू चला दिया है...। सच्चाई यह है सर, कि जिन्दगी मेरी तबाह हुई है। उसने जो कहानी गढ़ी है वह उसके वकील की बनायी हुई है।”

मैंने अपने हाथ का काम बन्द कर दिया और उसकी बात ध्यान से सुनने लगा।

“सर, जब इन्स्टीट्यूट में यहाँ से फोन गया था तो मैं वहीं था। बाद में मुझे पता चला कि आपको भी इस मामले में गुमराह किया गया है। ...उसने जो आरोप लगाया है वह पूरी तरह बेबुनियाद है।”

“भाई मेरे, इस आरोप को सही सिद्ध करने के लिए तो शायद उसने मेडिकल एक्ज़ामिनेशन की चुनौती दी है...।”

“सर, मैने तो एफिडेविट देकर इसकी सहमति दे दी है। लेकिन इक्ज़ामिनेशन उसका भी होना चाहिए। शादी के बाद हम साथ-साथ रहे हैं। वह अपनी सेक्सुअल एक्टिविटी को कैसे एक्सप्लेन करेगी...?”

“ऐसी परसनल बातें यहाँ करना ठीक नहीं है... लेकिन वो बता रही थी कि आप उसके साथ किसी डॉक्टर से भी मिले थे, फर्जी नाम से...”

“नहीं सर, मेरी जिन्दगी का सुख चैन छिन गया है। रात-दिन की घुटन से परेशान हूँ। सच्चाई कुछ और है और मेरे ऊपर वाहियात आरोप लगाया जा रहा है। ...आप ही बताइए, मेरे घर में ही तीन-चार डॉक्टर हैं। मुझे कोई दिक्कत होती तो मैं उनसे परामर्श नहीं लेता?”

मैं चुपचाप सुनता रहा, इतनी अन्तरंग बातें कुरेदने की मंशा ही नहीं थी। लेकिन उसे अपने साथ हुए हादसे को बयान करना जरूरी लग रहा था। इसलिए मुझे भी उत्सुकता हो चली...

सर, यह मामला ‘थर्ड-परसन’ का है। लड़की का ऑब्सेसन एक दूसरे लड़के से है जिससे वह शादी नहीं कर सकती क्योंकि वह उसके ‘ब्लड रिलेशन’ में है। ...विदा होकर जब यह मेरे साथ मेरे घर गयी तो अगले दिन ही ये जनाब मेरे घर पहुँच गये। ...सीधा मेरे बेडरूम में जाकर पसर गये और फिर दिनभर जमे रहे। मेरे ही शहर में उसकी बहन का घर भी था। लेकिन सारा समय मेरे घर में, मेरी नयी नवेली पत्नी के साथ गुजारता रहा...

नयी-नयी शादी, ससुराल से आया हुआ चचेरा साला, संकोच में कुछ कहते नहीं बनता...। एक दिन बीता, दूसरा दिन गया, तीसरा दिन भी ढल गया...। रोज की वही दिनचर्या.... सुबह दोनो का एक साथ ब्रश करना, नाश्ता करना, आगे-पीछे नहाना-धोना, लन्च, डिनर सब कुछ साथ में; और देर रात हो जाने पर... “अब इतनी रात को कहाँ जाओगे, ताऊजी को फोन करदो, यहीं लेट जाओ”

“मैं बगल का कमरा ठीक करा देता हूँ? वहाँ आराम से सो जाओ...” मैने कहा था।

“नहीं-नहीं, किसी को क्यों डिस्टर्ब करेंगे। यहीं सोफ़े पर लेट जाता हूँ। ...या फर्श पर ही गद्दा डाल लिया जाय... ” उसने ‘बेतक़ल्लु्फी’ दिखायी।

“हाँ-हाँ ठीक तो है, यहीं ठीक है।” मेरी पत्नी ने खुशी से ‘इजाजत’ दे दी थी।

यह सब करने में उन दोनो को कोई शर्म या संकोच नहीं था। भाई-बहन का रिश्ता  मेरे सामने ही अन्तरंग दोस्ताना बना रहता, एक दूसरे के बिना उनका मन ही नहीं लगता। अपने ही बेडरूम में अपनी ब्याहता पत्नी के साथ एकान्त क्षण पाने के लिए मैं तरसता रहता। 

धीरे-धीरे मेरा माथा ठनका। मैने उन्हें चेक करना शुरू किया और उन्होंने मुझे टीज़ करना...। मैने उस लड़के के घर वालों से बात की। उन्होंने इस ‘इल्लिसिट रिलेशन’ की बात स्वीकार की लेकिन इसे रोक पाने में अपने को असहाय प्रदर्शित किया। बोले, “हमने लड़की की शादी में इसी उम्मीद से सहयोग किया था कि शायद इसके बाद हमारा लड़का हमारे हाथ में आ जाय। ...लेकिन अफ़सोस है कि वह हमारे हाथ से निकल चुका है।”

फिर मैंने अपने ससुर और साले से कहा। लेकिन उनकी बात से यही लगा कि सबकुछ जानते हुए भी उन्होंने यह शादी बड़े जतन से इस आशा में कर दी थी कि एक बार पति के घर चले जाने के बाद मायके की कहानी समाप्त हो जाएगी और लोक-लाज बची रह जाएगी। ...दुर्भाग्य का यह ठीकरा मेरे ही सिर फूटना लिखा था। मुझे पिछले दो साल में जो ज़लालत और मानसिक कठिनाई झेलनी पड़ी है उसे बयान नहीं कर सकता।

“आपने पता चलने के बाद उस लड़के को घर से बाहर क्यों नहीं कर दिया?” मैंने अपनी व्यग्रता को छिपाते हुए पूछा।

उसने मुझे इसका मौका ही कहाँ दिया...? शुरू-शुरू में तो मैं संकोच कर रहा था। इतने बड़े धोखे की मुझे कल्पना भी नहीं थी। लेकिन जब उनकी गतिविधियाँ पूरी तरह स्पष्ट हो गयीं और आठवें-नौवें दिन जब उन्हें लगा कि असलियत जाहिर हो चुकी है तब वह उस लड़के के साथ अपने सारे जेवर और कीमती सामान गाड़ी में लेकर मायके चली आयी...।

“आजकल जेवर वगैरह तो लॉकर में रख दिए जाते हैं? आपने सबकुछ घर में ही रख छोड़ा था?”

नहीं सर, मैने उससे कीमती जेवर वगैरह पास के ही बैंक लॉकर में रखने को जब भी कहा था तो वह कोई न कोई बहाना बनाकर टाल जाती। अब मुझे लगता है कि सबकुछ योजनाबद्ध था। यहाँ तक की नौकरी मिलने के बाद मेरे पापा ने मेरे नाम से जो गाड़ी बुक करायी थी उसे भी इन लोगों ने कैन्सिल कराकर इसके नाम से रजिस्ट्रेशन कराया जबकि बुकिंग एमाउण्ट का रिफण्ड लेकर हमने इनके खाते में ट्रान्सफर किया था। सारे बैंक रिकॉर्ड मौजूद हैं।

“अभी क्या स्थिति है?”

अब मैं तलाक का मुकदमा लड़ रहा हूँ। फेमिली कोर्ट सुनवायी कर रही है। नियमित हाजिर होकर जल्द से जल्द निपटारा कराना चाहता हूँ ताकि दूसरी शादी कर सकूँ। उसे अब शादी करनी नहीं है इसलिए उन्के द्वारा किसी न किसी बहाने से मामले को लटकाए रखा जा रहा है। ऐसे मामलों की सुनवायी शुरू होने से पहले पत्नी के निर्वाह की धनराशि कोर्ट द्वारा तय की जाती है जो उसके पति को मुकदमें के अन्तिम निस्तारण होने तक प्रति माह अदा करनी पड़ती है। अभी कोर्ट ने मेरे वेतन को ध्यान में रखते हुए ढाई हजार तय किया है। वे लोग इसे बढ़वाना चाहते हैं। इसी लिए ‘पे-स्लिप’ की खोज कर रहे हैं...। अपने वेतन की सूचना तो मैने एफीडेविट पर दी है लेकिन उन्हें विश्वास नहीं है।

पहले उसने मेडिकल जाँच की माँग उठायी। मैने कोर्ट में इसके लिए सहमति दे दी। साथ में यह भी अनुरोध कर दिया कि उसकी भी जाँच होनी चाहिए। यदि उसके अनुसार मैं नपुंसक हूँ तो उसकी वर्जिनिटी भी सिद्ध होनी चाहिए। यदि उसमें नॉर्मल सेक्सुअल एक्टिविटी पायी जाती है तो उसका आधार भी उसे स्पष्ट करना पड़ेगा। इसके बाद उसका दाँव उल्टा पड़ गया है। अब ‘सबकुछ भूलकर साथ रहने को तैयार’ रहने का सन्देश आ रहा है। लेकिन सर, मैं इस नर्क से निकलना चाहता हूँ...।

वह अपने पिता के घर में ही रह रही है। प्रायः उस लड़के के साथ सिविल लाइन्स, मैक्डॉवेल्स, हॉट स्टफ या दूसरे स्पॉट्स पर घूमती और मौज उठाती दिख जाती है। लड़का भी एक सरकारी महकमें में मालदार पोस्ट पर काम करता है।

“उसके पिताजी यह सब करने की उसे अनुमति क्यों देते हैं? उन्हें यह सब कैसे देखा जाता है?”

असल में वह पूरा परिवार ही व्यभिचार और अनैतिक सम्बन्धों के मकड़जाल में उलझा हुआ है। ससुर जी का व्यक्तिगत जीवन भी मौज-मस्ती से भरा रहा है। उनके बड़े भाई का लड़का उनकी बेटी के साथ जिस अन्तरंगता से रहते हुए उनकी छाती पर मूँग दल रहा है उसे अलग करने का नैतिक बल उनके पास नहीं है। सुरा और सुन्दरी उनकी पुरानी कमजोरी रही है। यह सब उनकी लड़की बखूबी जानती है और यही सब देखते हुए बड़ी हुई है। उस लड़के के माँ-बाप ने स्वयं अपनी व्यथा मुझसे बतायी है। उस परिवार में केवल मेरे सगे साले की पत्नी है जो मेरे साथ हुए अन्याय की बात उठाती है। बाकी पूरे कुँए में भाँग मिली हुई है...।

“मुझे जहाँ तक याद है उन लोगों ने दहेज उत्पीड़न का मुकदमा भी कर रखा है। सामान वापस देने और क्षतिपूर्ति के लिए यदि आप तैयार हो जाँय तो क्या निपटारा हो सकता है?” मैने पूछा।

सर, मैं तो कबसे तैयार बैठा हूँ। लेकिन वे लोग बहुत लालची है। सुरसा की तरह उनका मुँह फैलता जा रहा है। मेरा प्रस्ताव है कि जिन लोगों ने यह शादी तय करायी थी, वे दोनो पक्ष के मध्यस्थ एक साथ बैठ जाँय, जो भी दहेज का सामान और रुपया पैसा मिला था उसकी सही-सही सूची बना दें। मैं उससे कुछ ज्यादा ही देकर इस कलंक से छुट्टी पाना चाहता हूँ।

दूसरी शादी के लिए भी उम्र निकल जाएगी तो मैं कहीं का नहीं रहूँगा। उसे तो अब शादी की जरूरत ही नहीं है। वह चाहती है कि मैं उसे अपना आधा वेतन देता रहूँ, पति का नाम बना रहे और वह मायके में रह कर अपने साथी के साथ लिव-इन रिश्ता बनाये रखे। मुकदमा यूँ ही अनन्त काल तक चलता रहे...। (इति)

उसने इस दौरान जाने कितनी कानून की किताबें पढ़ ली हैं कि उसकी हर बात में आइपीसी, सीआरपीसी और सीपीसी की अनेक धाराएं उद्धरित होती रहती हैं। कानूनी पेंचों को वह समझने लगा है और सभी बातों में सतर्कता झलकती है। पीसीएस की तैयारी करके अपने दम पर नौकरी पाने वाले इस युवक की प्रतिभा और अनुशासन पर कोई सन्देह तो वैसे भी नहीं है लेकिन वह ऐसे सन्देह के घेरे में तड़प रहा है जिससे पार पाना मुश्किल जान पड़ता है...।

इतना सब सुनने के बाद मेरा दिमाग शून्य हो गया...। मैं निःशब्द होकर बैठा रहा। यह तय करना मुश्किल है कि कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ। आप कुछ निष्कर्ष निकाल पाएं तो जरूर बताएं।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

21 comments:

  1. बहुत् बडिया कहानी है अगर सच पता भी हो तो भी कानून की आँखों पर तो पट्टी बन्धी है अय्र भावनाओं अनुभूतियों के लिये कोई सबूत भी नहीं होता--- कैसे साबित कर पायेगा---- यही काराण है कि कई बेगुनाह कानूनी धाराओं के बीच अपना अस्तित्व खो देते हैं वैसे वो लडका पूरा सच नहीं बोल रहा--- कोई जबर्दस्ती कैसे किसी के घर मे रह सकता है ---- आभार्

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  2. जमीं खा गयी आसमां कैसे-कैसे .

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  3. ऐसे हादसों में कोई भि अपनी राय कायम नहीं कर पाता है। कौन सच्चा और कौन है झूठा????

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  4. हम तो कोई समाधान निकालने के चक्कर में पूरी कहानी ध्यान से पढ़े थे पर जो समाधान सामने आया वह बताने लायक ही नहीं ,इसीलिए हमारा दिमाग भी शून्य हो गया है !

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  5. जब दिलों के आसार ही संदेहस्पद हो तो निर्णय लेना मुस्किल काम है. अब तो इसे नियति पर छोड़ देना चाहिए.

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  6. कुछ भी कहा नहीं जा सकता है.. नार्को टेस्ट से हो सकता है कुछ रिजल्ट निकले?? पर वो भी इतनी आसानी से संभव नहीं..

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  7. बड़ी खतरनाक मुद्रा धारण किए हो भाई!

    "हाँ हम मुज़रिम हैं चढ़ा तो हमें डार पर,
    हमने की है ज़िन्दगी के सर्द रुखसारों की बात।"

    क्रांतिकारी 'किसानी' के लिए बधाई।

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  8. बहुत उलझा हुआ मामला है -मेरी अकल और समझ के -कोर्ट ही फैसला करे !

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  9. इन दोनों को 'सच का सामना' में भेज देना चाहिए. एपिसोड देखकर लोग पता कर लेंगे.

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  10. jaise hi post padhkar khatm kiya mere dimag me aaya ki in logo ko sach ka samna karne ko bhej diya jay, lekin ab aisa lag raha hai ki kahi dono ka sach sunkar mashine hi jhuth na bolne lage.niskarsh tak pahuchna to bada muskil lag raha hai lekin yadi dulha medical chekup ko tyar hai to fir pativrata dulhan payment ke chakkar me kyon padi hai.....??? bhagwan bhala karen yadi koi niskarsh nikle to hame bhi bataiyega. such ka intjar rahega....

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  11. jaise hi post padhkar khatm kiya mere dimag me aaya ki in logo ko sach ka samna karne ko bhej diya jay, lekin ab aisa lag raha hai ki kahi dono ka sach sunkar mashine hi jhuth na bolne lage.niskarsh tak pahuchna to bada muskil lag raha hai lekin yadi dulha medical chekup ko tyar hai to fir pativrata dulhan payment ke chakkar me kyon padi hai.....??? bhagwan bhala karen yadi koi niskarsh nikle to hame bhi bataiyega. such ka intjar rahega....

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  12. कुन्द मति भी शून्यता प्राप्त करती है यह आज अपनी हालत देखकर जाना...

    मिश्र जी ने सही फरमाया:

    जमीं खा गयी आसमां कैसे-कैसे .

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  13. ऐसे लोगों को ही सच का सामना करना चाहिए
    कैसे कैसे लोग पहुच रहे हैं वहां पर
    इनको भेजिए तो कुछ काम बने

    वीनस केसरी

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  14. समस्या का समाधान बहुधा उस स्तर पर नहीं होता जिस स्तर पर समस्या उपजी है।
    इस लड़के को सही भी माने तो यह एक पक्ष की अनैतिकता और इस लड़के के लल्लुत्त्व के स्तर से उपजी समस्या है।

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  15. हम क्या कहें !
    सच का सामना वाली बात ही सही लग रही है हमें तो.

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  16. बहुत ही दुखद सामाजिक पहलू से आपने परिचित कराया.. किन्तु यह बातें आज आम हो चली हैं.. न जाने क्यों विवाहेतर सम्बन्ध बनाते समय बड़ी हिम्मत दिखाते हैं लेकिन उसी हिम्मत के साथ उसे स्वीकार नहीं कर पाते, ना मालूम वे प्रेम करते हैं या उनके अन्दर केवल देह-वासना का साझा व्यापार होता है तभी तो वे उसी सच्चाई के साथ एक दूसरे को जीवन साथी बनाने के लिए समाज से अपील नहीं कर पाते। और जब उनके घर वाले उनका विवाह किसी अन्य स्थान पर कर देते हैं तो वे इसी तरह के लुका-छिपी का खेल खेलते हैं। इसका बड़ा ही दु:खद अन्त होता है। इस तरह की अनेक घटनाएं समाचार पत्र में पढ़ने मे अक्सर आती रहती हैं। एक घ्घटना में एक विवाहिता की अधजली लाश बारा क्षेत्र में सुनसान स्थान पर मिली, उसके सामानों में लाल साड़ी और सिन्दूर की डिबिया थी अभी हाल ही में उसका विवाह हुआ था और दो दिन पूर्व ही वह अपनी ससुराल के वापस आयी थी। वह स्कूल टी०सी० लेने गयी साथ में अपना सारा जेवर भी ले गयी थी और तभी से लापता थी। बात में जांच में पता चला की पास का ही एक युवक जिसके साथ उसकी अच्छी बनती थी वह भी उसी दिन से गायब है। इस तरह की अनेक घटनाओं का जिक्र यहां करना उचित नहीं प्रतीत होता पर यह घटना अत्यन्त संवेदनशील है। प्प्प्या...र के लिए
    यदि हम समाधान की बात करें तो मैं सबसे पहले लड़की के पक्ष को लेते हुए विचार करता हूं - लड़की का आरोप है कि उसके पति ने शारीरिक अक्षमता को छिपाकर दहेज के लालच में शादी की है। इसका समाधान मुझे आसान सा लगता है लड़के का स्वास्थ्य परीक्षण कराया जाय तो लड़की के आरोप की जांच हो जोयगी। लड़की ने इसके अतिरिक्त अन्य किसी अत्याचार या दहेज मांग की बात नहीं की है आपकी कहानी के अनुसार इसलिए इसमें दहेज उत्पीड़न का मामला नहीं बनता है। यदि पुरुष नपुंंसक है तो महिला को पूरा अधिकार है कि वह दूसरी शादी कर सके। दोनों अलग होकर सुख से नये जीवन की शुरुआत करें।
    अब लड़के के पक्ष को ध्यान में रखकर विचार करते हैं- इसका समाधान भी मेडिकल चेकअप से होने की सम्भावना है। यदि पुरुष नपुंसक नहीं है तो उसकी पत्नी का आरोप झूठा हो जायेगा और प्रथम दृष्टया हम लड़के की बातों को सच मान सकते हैं।
    मेरा मानना है कि दोनों को अलग होकर अपनी नयी जिन्दगी की शुरुआत करनी चाहिए जितनी जल्दी हो सके कोर्ट कचेहरी के चक्करों से मुक्त हो जाना चाहिए। आज के समय में पुनर्विवाह को सामाजिक मंजूरी भी मिल चुकी है। कहा भी गया है कि -
    मन पटे तो मेला, नहीं तो सबसे भला अकेला।।

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  17. ये कहानी तो हम लोग रोज ही कोर्ट में देखते हैं । इन मोहतरता को यह पता नहीं है कि ये जिस रास्ते पर चल रही हैं वो व्यभिचार का एक ऐसा दलदल है जिसमें से वो चाह कर भी बाद में न निकल पायेंगी और अपनी जिंदगी नर्क बना लेंगी ।

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  18. असली क्या,नकली क्या..........बाप रे

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  19. फुरसत से आज दोनों पोस्ट पढ पाया हूँ।

    बेहद रोचक।

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