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Wednesday, March 11, 2009

होली की छुट्टी में बैठे-ठाले...? (भाग-२)

 

image मैं यहाँ प्रयाग में बैठा तो हूँ लेकिन संजय की तरह अपने गाँव की रंग बिरंगी होली को ठीक-ठीक देख पा रहा हूँ। जैसा कि मैने कल पिछली कड़ी में बताया था आधी रात के बाद होलिका दहन फाग और जोगीरा के गलाफाड़ प्रदर्शन के बीच सम्पन्न हो चुका होगा। सुबह-सुबह घर के बच्चे सम्मत से आग लाकर घर का चूल्हा जलवा चुके हैं। एक दिन पहले ही हरे बाँस का पलौझा (सबसे ऊपरी सिरा जो अधिक खोखला, पतला और हल्का होता है) काटकर देसी पिचकारियाँ बनायी जा चुकी हैं। धूप होने से पहले ही गाँव के मर्द और लड़के सम्मत उड़ाने यानि होलिकादहन की राख का भभूत उड़ाने चल पड़ते हैं।

सम्मत स्थल से राख का प्रसाद (भभूत) एक दूसरे के मस्तक पर लगाकर यथोचित चरण-स्पर्श या आशीर्वाद का अभिवादन करेंगे। जोगीरा के शब्द और भाव बरसने लगेंगे। सभी इस प्रसाद को गमछे और कुर्ते की थैलियों में भरकर गायन मण्डली के साथ गाते-बजाते गाँव के भीतर बाहर के सभी देवस्थलों (बरम बाबा, कालीमाई, कोटमाई, भवानीमाई, महादेव जी, इनरा पर के बाबा) पर जाकर उस विभूति को चढ़ाकर प्रणाम करेंगे। इन सभी स्थलों पर प्रार्थना परक फाग गाया जाएगा।

रास्ते में मिलने वाले सभी लोगों को व अपरिचित राहगीरों को भी सम्मत की राख का प्रसाद विधिवत पोता जाएगा। इस ‘धुरखेल’ का शिकार सबको बनाया जाएगा। इस समय बाँस की पिचकारियों में नाबदान का पानी भरकर हर एक के ऊपर फेंकना गाँव के बच्चे अपना नैसर्गिक अधिकार मान लेते हैं। उन्हे इससे कोई रोक भी नहीं सकता। बड़े लोग भी बाल्टी में गोबर-मिट्टी घोलकर एक दूसरे को और हर आने-जाने वाले को आपादमस्तक नहलाने का काम एक शौर्य प्रदर्शन की भाँति करते हैं। इस बात की जानकारी क्षेत्रीय लोगों को तो होती है लेकिन यदि कोई बाहरी मुसाफिर इस समय राह पर आता मिल गया तो उसकी दुर्गति करने में भी कोई संकोच नहीं करता है। ग्यारह-बारह बजे तक धुरखेल व कनई-माटी (कीचड़-मिट्टी) का खेल चलता रहेगा। उसके बाद सभी अपनी-अपनी दुर्गति कराने के बाद चीथड़ों में लिपटकर नहर या बोरिंग पर नहाने जाएंगे। ऐसी म्लेच्छ अवस्था में घर में प्रवेश वर्जित हो जाता है।

नहाकर घरमें आने के बाद  गुझिया, नमकीन, मालपूआ, पूड़ी, खीर, और तेज मसालेदार सब्जी का गम्भीर भोजन होगा। अब रंग खेलने की बारी आएगी। लाल गुलाबी हरे रंगों में डूबी मानव आकृतिया झुण्ड में चलेंगी तो उन्हें अलग-अलग पहचानना मुश्किल हो जाएगा। प्रायः सबके चेहरे विविध रंगों और अबीर से पूरी तरह ढके होंगे। गाँव के सभी टोलों से लड़कियों-बच्चों की रंग-टोलियाँ घर-घर में जाकर रंग-स्नान का आदान-प्रदान करेंगी। बड़े लड़के और मर्द फाग मंडली में शामिल होकर सबके दरवाजे पर जाएंगे। छोटे-बड़े के पद के अनुसार पारम्परिक रीति से अभिवादन होगा। सबके दरवाजे पर जाजिम बिछाकर एक-दो फाग गाया जाएगा। गृहस्वामी सबको यथा सामर्थ्य जलपान कराएगा। यह क्रम शाम ढलने तक चलता रहेगा। गायक मण्डली के सदस्य शाम तक अपने ऊपर रंग गुलाल की अत्यन्त मोटी परत चढ़ा चुके होते हैं।

 

होलीघर के आंगन में रंग होली (6)  बाहर फाग मण्डली का सत्कार
होली (3)       रंग स्नान होली (7)     ठण्ड‍ई में भाँग तो नहीं?

शाम को रंग का प्रयोग बन्द करके सभी नहा-धोकर एक-दूसरे से होली मिलने निकलते हैं। घर-घर में जलपान की व्यवस्था होती है। सब जगह कुछ न कुछ लेना ही पड़ता है। रात में इसे पचाने के लिए विशेष दवा का इन्तजाम करना पड़ता है।

होली के दिन सबसे रोचक होता है जोगीरा पार्टी का नाच-गाना। गाँव के दलित समुदाय के बड़े लड़के और वयस्क अपने बीच से किसी मर्द को ही साड़ी पहनाकर स्त्रैंण श्रृंगारों से सजाकर नचनिया बनाते हैं। यहाँ इसे  ‘लवण्डा’ नचाना कहते हैं। जोगीरा बोलने वाला इस डान्सर को जानी कहता है। दूसरे कलाकार हीरो बनकर जोगीरा गाते हैं। और पूरा समूह प्रत्येक कवित्त के अन्त में जोर-जोर से सररर... की धुन पर कूद-कूद कर नाचता है। वाह भाई वाह... वाह खेलाड़ी वाह... का ठेका लगता रहता है।

कुछ जोगीरा दलों के (दोहा सदृश) कवित्तों की बानगी यहाँ पेश है :

[दोहे की पहली लाइन दो-तीन बार पढ़ि जाती है, उसके बाद दूसरी लाइन के अन्त में सबका स्वर ऊँचा हो जाता है।]

जोगीरा सर रर... रर... रर...

फागुन के महीना आइल ऊड़े रंग गुलाल।

एक ही रंग में सभै रंगाइल लोगवा भइल बेहाल॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

गोरिया घर से बाहर ग‍इली, भऽरे ग‍इली पानी।

बीच कुँआ पर लात फिसलि गे, गिरि ग‍इली चितानी॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

चली जा दौड़ी-दौड़ी, खालऽ गुलाबी रेवड़ी।

नदी के ठण्डा पानी, तनी तू पी लऽ जानी॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

चिउरा करे चरर चरर, दही लबा लब।

दूनो बीचै गूर मिलाके मारऽ गबा गब॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

सावन मास लुग‍इया चमके, कातिक मास में कूकुर।

फागुन मास मनइया चमके, करे हुकुर हुकुर॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

एक त चीकन पुरइन पतई, दूसर चीकन घीव।

तीसर चीकन गोरी के जोबना, देखि के ललचे जीव॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

भउजी के सामान बनल बा अँखिया क‍इली काजर।

ओठवा लाले-लाल रंगवली बूना क‍इली चाकर॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

ढोलक के बम बजाओ, नहीं तो बाहर जाओ।

नहीं तो मारब तेरा, तेरा में हक है मेरा॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

बनवा बीच कोइलिया बोले, पपिहा नदी के तीर।

अंगना में भ‍उज‍इया डोले, ज‍इसे झलके नीर॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

गील-गील गिल-गिल कटार, तू खोलऽ चोटी के बार।

ई लौण्डा हऽ छिनार, ए जानी के हम भतार॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

आज मंगल कल मंगल मंगले मंगल।

जानी को ले आये हैं जंगले जंगल॥

जोगीरा सर रर... रर... रर...

कै हाथ के धोती पहना कै हाथ लपेटा।

कै घाट का पानी पीता, कै बाप का बेटा?

जोगीरा सर रर... रर... रर...

 

ये पंक्तियाँ पूर्वी उत्तर प्रदेश व बिहार के भोजपुरी लोकगायकों द्वारा अब रिकार्ड कराकर व्यावसायिक लाभ के लिए भी प्रयुक्त की जा रही हैं। शायद यह धरोहर बची रह जाय।

 (समाप्त)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

14 comments:

  1. सर रर... रर... रर...
    होली पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ .....

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  2. जोगीरा सर..रर..रर///

    वृतांत पढ़कर लगा आपके साथ गांव में होली खेल रहे हैं..बहुत आनन्द आ गया.

    आपको होली की मुकारबाद एवं बहुत शुभकामनाऐं.

    सादर

    समीर लाल

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  3. बड़ा ही सजीव वर्णन ..
    जोगीरा सर्र सर्र सर्र तो आम है,
    ' सम्मत ' तो हमारे उत्तरी बिहार क्षेत्र में प्रचलित है ।
    आज यहाँ दूसरी बार देखा !
    त आवा होलिया भेंटायल जाये !
    सादर

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  4. बहुत सुंदर ... होली की ढेरो शुभकामनाएं।

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  5. हरे बांस की पिचकारी! मैं बरबस बचपन में पंहुच गया अपने गांव!
    बहुत दमदार लिखी है पोस्ट!

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  6. दोनों भाग अभी पढ़े।

    लोक-मानस का जीवन्त वर्णन है। बधाई। होली हम भी नहीं मना रहे।

    और हाँ, इसे समूह पर भी भेज सकते थे ना!

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  7. हम भी बनाते थे बांस की पिचकारॊ, बहुत ही अच्छा लगा, होली का पढ कर, कल मे होली अलग आंदाज मे होली का गीत ढुढ रहा था, तो भोजपुरी लोकगीतो की तरफ़ चला गया, बाप रे सुन कर हेरान रह गया.... बहुत ही ....
    क्या सच मै ऎसॆ गीत होते है या फ़िर इन गायकओ ने पेसा कमाने के लिये बनाये है. जरुर बताना.
    धन्यवाद

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  8. होली मुबारक! गांव न जा पाये लेकिन ब्लाग होली मना ली!

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  9. अरविंद मिश्र जी द्वारा छेडी जोगीरा की तान यहॉं तक आ पहुंची। मजा आया पढकर।

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  10. ओह देर हो गयी ! बहुत खूब सिद्धार्थ भाई आपने तो सामान बाँध दिया -ऐसे जोगीरा गीतों को खोज लाये कि मजा आ गया ! हंसी भी छूटी -हमारे पूर्व जन कितने रचनाधर्मी थे -अपनी बातों को किसे अभिधा ,लक्षणा और व्यंजना में लपेट में कह देते थे ! और संकेतार्थ और गूढार्थ के कहने ही क्या ?
    वाह मस्त पोस्ट ! मैं कुछ गुन्गुना भी रहा हूँ !

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  11. धत् तेरे की सामान नहीं समां .....

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  12. Bahut achcha. Shahri ho gaye hone ki vajah se ( shahar mein hi hui paidayish, parvarish) gaon mein holi khelane ka anubhav to nahi hai, haan suna jaroor hai. Shahar mein to gat 20 varshon mein bahut parivartan aa gaya hai holi manane ke tarike mein. Ab to saari masti sms aur sharab mein hi simit ho gayi lagti hai. Sambhavatah gaon bhi parivartan se achute na honge. Is parivartan par bhi kuch padhana chahunga.

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  13. DR. MUKESH RAGHAV : Holi toba toba!!!!!! A hindu festival for the cause of burai par achhayi ki jeet. colors are being showered but have any person seen in the heart, whether he is up to the mark....No???? hence Holi to be celebrated by whom , whose heart are clean. I am sorry for the true but harrsh language. Don't mind . But think many times. Hope u may find me right.

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