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Saturday, June 14, 2008

एक है हिरमतिया…

प्यार क्या है? इस जटिल प्रश्न का उत्तर कवियों, शायरों, फ़िल्मकारों, अनुभवी प्रेमियों और खालिस विद्वानों ने अपने-अपने ढंग से दिया है। इसके पीछे पड़े बगैर मैं आपको एक ऐसी दास्ताँ सुनाने जा रहा हूँ जहाँ प्यार सिर्फ़ एक कल्पना है, एक अव्यक्त एहसास है, कुछ अस्पष्ट यादें हैं और बाकी आँसू हैं।

यह कोई काल्पनिक कहानी नहीं है। बल्कि आँखों देखी एक सच्ची बात है। मेरे गाँव की। यह कहानी वहाँ रोज चर्चा का विषय बनती है। क्योंकि इसकी नायिका जहाँ-तहाँ घूमती, गाँव की गलियों में, घरों के आँगन में, नुक्कड़ की दुकान पर लोगों के मनोरंजन का केन्द्र बनी लड़की-लड़कों व आदमियों से घिरी दिख जाती है।

इस कहानी के मुख्य पात्र से मेरा परिचय उसकी माँ के माध्यम से हुआ जो मेरे घर बर्तन माँजने आया करती थी। उसकी माँ की उम्र लगभग ५५-६० की रही होगी पर काम के बोझ और अपने पति के हाथों नित्य-प्रति प्रताड़ना व पिटाई से वह ७० से उपर की दिखती थी। हम उसे ‘संताइन’ के नाम से जानते थे। इस महिला का नाम संताइन क्योंकर पड़ा यह मेरे लिये एक अबूझ पहेली सा रहा क्योंकि उसका ‘संत गोंड़’ नामक पति परम नशेड़ी (वस्तुतः गँजेड़ी) रिक्शाचालक था। ऐसे में मास्टराईन, डाक्टराईन वाला फ़ार्मूला उस पर लागू नहीं होना चाहिए था। खैर …

आइये अपने मुख्य पात्र पे आते हैं। संताइन के साथ साए की तरह लिपटी उसकी बेटी ‘हीरमती’। इसकी उम्र करीब २४-२५ साल की होगी लेकिन आजभी उसकी माँ ही उसका खयाल रखती है। संताइन के साथ ही घरों में काम करने वह भी आती थी। उसके हाव-भाव और कपड़े से थोड़े ही समय में मैने यह अनुमान कर लिया कि ‘हीरमती’ मंदबुद्धि है। वैसे यह बात मेरे घर वाले पहले से ही जानते थे और इसका प्रयोग भी चतुराई से करते थे। जैसे एक कप चाय के बदले सब्जी कटवा लेना या इधर-उधर की बातों में उलझा कर घंटों शरीर दबवाना वगैरह-वगैरह…। हीरमती का इस तरह का शोषण सिर्फ़ मेरे ही घर नही होता वरन्‍ पूरा गाँव ही मौके-बेमौके इस मुफ़्त सेवा का लुत्फ़ उठाता था। उसकी उलझी-उलझी बातों का सिर-पैर ढूढने की मेरी सभी कोशिशें बेकार गयीं। तुलसीदास जी को झुठलाती हुई हीरमती एक ही समय में ‘हँसहि, ठठाहिं, फुलावहिं गालू’ की छवि पेश कर देती।

जीवन के २४-२५ बसन्त यूँ ही देख लेने के बाद हीरमती का शरीर इतना विकसित न था कि एक बार में ही नज़र में आ जाए पर इतना अविकसित भी न था कि नज़र ही न आए। वैसे भी गरीब की बेटी की बढ़ती उमर का शोर कुछ जल्दी ही हो जाता है। ऐसे में कभी-कभी अगर यह सुनने को मिल जाता कि आज ‘हिरमतिया’ ने फलाने को मारने के लिये दौड़ा लिया या उसकी माँ ढिमाके को पानी पी-पी कर गरिया रही है तो किसी को कत्तई आश्चर्य नही होता।

गाँव भर की ‘हिरमतिया’ को संताइन हमेशा ‘बबुनवा’ ही कहती। प्यार से अपने दुलारे बेटे को किया जाने वाला संबोधन है यह। इसे सुनने वाले मुँह छिपाकर मुस्कराये बिना नहीं रहते। लेकिन संताइन के लिये उसे अपने खाने से पहले खाना खिलाना, उसकी हर एक बात का समर्थन कर उस मंदबुद्धि लड़की को संतुष्ट रखना बहुत सहज लगता था। ऐसा लगता जैसे संताइन ने मंदबुद्धि बच्चों के साथ रहने और उनकी परवरिश करने की ट्रेनिंग ले रखी है। पर ऐसा नहीं था, यह तो एक अनपढ माँ की नैसर्गिक ममता थी जो बेटी के लिये कुछ भी करने को तैयार थी। हम तथाकथित पढे-लिखे लोग मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों से जैसे पेश आते हैं, उसे संताइन के व्यवहार के प्रकाश में देखने पर खुद से शर्म आती है।

दिन ऐसे ही कट रहे थे- संताइन के घर-घर जाकर बर्तन धोते, हीरमती के दूसरों की कुटिल मेहरबानियों की चाय पीते, गाँववालों के घटिया मुफ़्तखोरी और व्यर्थ की चर्चा और ठिठोली करते। शायद ऐसे ही जिन्दगी चलती भी रहती अगर संताइन ने हीरमती की शादी न की होती। लेकिन लोकलाज के भय से माँ ने जवान होती गरीब की बेटी के हाथ पीले करना बेहद जरूरी समझा।

हीरमती की शादी ‘प्रभू’ नाम के एक शख्स से हुई, जो खेती-बाड़ी करने वाला एक साधारण गृहस्थ था। हीरमती की ससुराल मेरे गाँव से कोई पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर थी। ये बातें मुझे संताइन के माध्यम से पता चलीं। हीरमती के ससुराल चले जाने के बाद संताइन जब हमारे घर आती तो बहुत उदास दिखती। कभी गुस्से में बड़बड़ाती तो कभी रोने भी लगती। मेरे घर वाले उसे समझाते कि बेटी को विदा तो करना ही पड़ता है। यही उचित कायदा है। यह सुनकर वह चुप हो जाती, हीरमती और उसकी ससुराल का जिक्र छेड़ देती और प्रसन्न हो जाती।

पर शायद विधाता इतने दयालु भी नहीं हैं कि वह संताइन की खुशी को लंबे अरसे तक बनाये रखते । ससुराल जाने के १०वें दिन दुपहर में ही हीरमती अकेले पैदल गाँव लौट आई। आश्चर्य प्रायः किसी को नहीं हुआ। यह तो होना ही था। आखिर पागल लड़की को कोई कब तक बर्दाश्त करता। अलबत्ता उसके पीहर के अनुभवों को जानने का कौतूहल सारे गाँव में फैल गया।

हीरमती अगले ही दिन संताइन के साथ मेरे घर आई। उत्सुकता हम सभी के मन में भी थी। सोच रहे थे कि संताइन आते ही सबकुछ बड़बड़ा के बता देगी पर आज वह बेहद शांत थी। हमने हीरमती से ही पूछा- “बड़ी जल्दी चली आयी ?” उसके चेहरे पर डर उभर आया, बोली- “बड़ा मारत रहले हँ, एही से भाग अइनी हईं”। हीरमती ने ससुराल में हुई अपनी दुर्दशा के बारे में सारी बातें रोते हुए बताया पर वहाँ से भाग आने की अपनी बहादुरी को हँस-हँस कर बताया।

हीरमती के गाँव लौटने के बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया। पर हीरमती में एक परिवर्तन आ गया था। उसके भीतर उस एहसास का प्रवेश हो चुका था जिसे पारखी ‘प्रेम’ कहते हैं। एक दिन, एक रात या एक पल का जो प्यार हीरमती को अपने ‘परभू’ से मिला था (कदाचित वासना-प्रधान ही रहा हो) उसने हीरमती को अपने वश में कर लिया था। अब वह सिर्फ़ और सिर्फ़ परभू की बात करती। हिचकी आती तो अपनी माँ से पूछती- “के इयाद करता?” फ़िर खुद ही जवाब देती, “प्रभू इयाद करताड़े”। छींक आती तो प्रभू याद करते, पानी सरक जाता तो प्रभू याद करते, खाना अटक जाता तो प्रभू याद करते, मतलब यह कि हीरमती अब ‘प्रभुमय’ हो चुकी थी। (यहाँ आपको याद दिला दूँ कि प्रभू हीरमती के पति का नाम था कहीं आप इसे ईश्वर न समझ लीजियेगा।)

इधर गाँववालों को एक नया खेल मिल गया था। लोग हीरमती से प्रभू का हाल-चाल पूछते और उसकी बिना सिर-पैर और कल्पना की बातों को सुनकर आनन्द उठाते। घंटों उससे इस आश्वासन पर काम कराते कि प्रभू की चिट्ठी आई है और अभी वह उसे पढ़कर के सुनायेंगे। काम कराने के बाद कुछ भी ऊल-जलूल पढ़ देते और हीरमती पूरे गाँव को बता आती कि ‘परभू के चिट्ठी आइल बा, कहलें हँ आइब, साड़ी अउरी चूड़ी लेकर अइहें’ या ‘देवरा परसों आई’ या ‘ससुई के तबियत खराब बा’। चूंकि गाँव में प्रायः सभी हिरमतिया का मुफ़्त प्रयोग करने के आदी हो चुके थे इसलिये किसी को भी दूसरे का कार्य अनैतिक नहीं लगता।

पर संताइन बेटी को लेकर चिंतित थी। वह उसकी दूसरी शादी कराना चाहती थी। उसने फ़िर से एक बार प्रयास किया। हीरमती एक बार फ़िर दुल्हन बनी, ससुराल गई लेकिन इसबार तीसरे दिन ही लौट आई, शरीर पर चोटों के पर्याप्त निशान लिये। लेकिन बड़ी चोट उसके मन को लगी थी। वह किसी को दिखा भी नहीं सकती थी। अगले दिन उसके ससुराल वाले उसे खोजते हुए आये। उन्होंने बताया कि यह न तो अपने पति के पास रहती है और न ही घर में बैठती है। बार-बार भागने का प्रयास करती है। इसका दिमाग खराब है, हम इसको अपने पास नहीं रख सकते। यह कह कर वे भी चले गये।

हीरमती से भाग आने का कारण पूछने पर उसने जो उत्तर दिया उसकी मैने कल्पना भी न की थी। उसने भाव बिह्वल होकर भींगी आँखों को झुकाकर कहा-‘‘हमार बियाह त परभू से भईल बा, हम केहू दुसरा लगे काहें सूती? एही से भाग अइनी हईं’’।

इस घटना के बाद संताइन ने हीरमती की शादी का प्रयास फ़िर नहीं किया। हीरमती ने प्रभू का जिक्र करना नहीं छोड़ा है। प्रभू कभी हीरमती से मिलने नहीं आया। गाँववालों ने हीरमती का शोषण करना नहीं छोड़ा, बस बहाने बदल गये है। हीरमती को मोबाइल से कस्टमर-केयर पर मिलाकर प्रभू से बात करा दी जाती है। हीरमती इतने पर ही घर के सारे काम कर देती है।

अब हीरमती दुबली-पतली और मलिन हो गई है या थोड़ा और स्पष्ट करें तो बस हाड़ की गठरी रह गई है। संताइन जरावस्था में पहुँचकर और कमजोर हो घर पर पड़ी रहती है। गाँववालों की दया से इन दोनों माँ-बेटी को कुछ खाने को मिल जाता है। पर हीरमती आज भी प्रभू की आस में जी रही है। उसे यह कौन बताये कि उसने दूसरी शादी करके अपना घर बसा लिया है। बताये भी तो वह विश्वास कहाँ करेगी?

हीरमती के लिये प्रभू का नाम एक उम्मीद है, एक इंतजार है, एक खूबसूरत एहसास है, जिसके आलोक में वह जी रही है। शायद प्यार ऐसा ही कुछ होता है।

( यह सत्यकथा बालमन द्वारा लिखी गयी है। )

6 comments:

  1. बहुत सोचने का पिटारा खोलती है "प्रभू की हीरामती"। बहुत सुन्दर लिखा है।

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  2. यह सत्यकथा बालमन द्वारा लिखी गयी है। ....

    लेकिन लिखी गजब गई है, बहुत उम्दा लेखन है. बधाई.

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  3. अपनी तरह का एक बेजोड़ चित्रण है ,हिरमतिया जैसे आंखो के सामने आ गई हो....,पूरी कथा मे कही कोई बोझिल भाग नही है.

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  4. बहुत अच्छा लिखा, हिरमतीया जैसे सामने ही अभी भी दिख रही है।

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  5. ग़ज़ब संवेदना से परिपूर्ण है भाई यह कथा. इस देश के हर गांव में दो-चार हिरमतिया हैं और चतुर-सुजान लोग इनका अपने-अपने ढंग से फायदा भी उठाते हैं.

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