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Wednesday, April 23, 2008

तकिया...?


आज बिस्तर पर पहली बार
तकिये को खड़ा पाया ,
तो घबरा गया,
सोचा यह कैसा जमाना आ गया

तकिये ने मेरी बात समझ ली
और बोली -"आज तक तुने मुझे बहुत सताया है
कभी पैरो से उछाला है,
तो कभी सीने से लगाया है,
पैरों के बीच फंसा तूने,
मुझे अपनी वासना का शिकार भी बनाया है.

अपने जीवन की अनगिनत लम्हों को
मेरे सानिध्य में बिताया है,
फ़िर भी तुम्हे मेरी फिक्र नही है?
मेरे बिगड़ते हालात का,
तेरी देश-भर की चर्चाओं में कोई जिक्र नहीं है?

मेरे तन के कपड़े फटे जा रहे हैं,
मेरे अन्दर की रूई अब दबकर,
हाड़ हो गई है,
मोड़ते मोड़ते
यह कई फाड़ हो गई है।

तूने क्या मुझे अपनी बीबी समझ रखा है?
जैसे चाहेगा वैसे रख लेगा?
और जब चाहे, जैसे चाहे,
साथ का मजा चख लेगा।

होशियार किए देती हूँ,
कल ही मेरे लिए नए कपड़े लाओ,
मेरे अन्दर कुछ बढ़िया रूई डलाओ,
वरना अब सोने नहीं दूँगी,
लोकतंत्र का जमाना है,
मैं भी आन्दोलन करूंगी।"

आन्दोलन के नाम से मैं घबरा गया,
बिस्तर से लुढ़क कर जमीन पर आ गया,
उठ कर देखा तो मैं पसीने से नहा गया था,
नींद टूट गई थी और मैं होश में आ गया था।

पर एक बात का
कन्फ्यूजन अभी भी जारी है,
कि सपने की बातें तकिये ने सुनाई थी,
या तकिये में छुपी
कोई भारतीय नारी है।

दोनों की दशा एक सी है ,
दोनों की व्यथा एक सी है,
पर दोनों में एक ही अन्तर है,
एक बिस्तर पर है,
और एक स्वयं बिस्तर है ।

पाठकों की प्रतिक्रिया के बाद बालमन द्वारा एक भूल सुधार किया गया। आखिरी पद निम्नवत है:

दोनों की दशा एक सी है,
दोनों की व्यथा एक सी है ,
पर क्या दोनों में एक ही अन्तर है?
कि एक बिस्तर पर है और
एक स्वयं बिस्तर है ?


बालमन

10 comments:

  1. नमस्कार सिद्धार्थ जी। कविता तो बहुत अच्छी लगी पर अंतिम पंक्ति से इत्तेफाक नहीं रख पा रहा हूँ । नारी के ऊपर निबन्ध लिखने का मेरा कोई इरादा नहीं है पर फिर भी बिस्तर, रसोई, बच्चे, घर, और पति... इन सभी मे घुली-मिली, खोई हुई नारी को आप एक ही कोण से कैसे विभाजित करेंगे?
    खैर! चलिये, आज कुछ अच्छा पढ़ने को मिला ।

    नीरज चड्ढा

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  2. कविता बहुत ही अलग और सचाई की परत खोलती है,लिखने का अंदाज़ भी खूबसूरत है पर आखिरी लाइन 'एक बिस्तर पर है,

    और एक स्वयं बिस्तर है ।' से आप क्या कहना चाहते हैं?
    एक ओरत जिसके बिना किसी समाज की कल्पना भी नही की जासकती,उसे मात्र बिस्तर तक समेटने से आपका क्या मतलब है?
    मैं ये नही कह रही की आप के कहने का कोई ग़लत अर्थ होगा...इतना अच्छा कवि ग़लत हो ,ऐसा नही हो सकता.हो सकता है मेरे समझने में कोई कमी हो पर मैं चाहती हूँ आप इसे समझाने का कष्ट करें.

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  3. तकिया के माध्यम से अगर आपने नारी की बात कही, ठीक , पर आखिरी लाइन पढने के बाद कविता हलकी पड़ जा रही है।

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  4. एक बिस्तर पर है,

    और एक स्वयं बिस्तर है ।

    प्रणाम आपकी सोच को……

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  5. आपकी कल्पनाशीलता के लिए बधाई ....

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  6. आप सभी की प्रतिक्रिया के लिए धन्यवाद. शायद आपलोगों ने इसे मेरी कविता मान लिया है.
    दरअसल यह कविता बालमन जी की है और संभवतः इनकी प्रथम औपचारिक रचना है. ये अविवाहित युवा हैं जो चीजों को चरम विन्दु तक ले जाने का उत्साह रखते होंगे
    औरत के जिस रूप का चित्रण इन्होने किया है उसके उदाहरण कदाचित् इन्होने देखा हो. जाहिर है, इसका सामान्यीकरण करना बड़ा शर्मनाक होगा.
    अन्तिम पंक्ति शायद शिल्प में अनुभव के कच्चेपन के कारण त्रुटिपूर्ण हो गई है.
    मुझे विश्वास है कि बालमन इसे स्वीकार करेंगे और अपनी बात संशोधित शब्दों में रखेंगे ताकि 'वजन' अंत तक बना रहे.
    सुधी पाठक वैकल्पिक पंक्तियाँ सुझाना चाहें तो स्वागत है

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  7. बुद्धिमान टिप्पणीकार बंधुओं,
    बालमन जी के संदेश को एक अनगढ़ पंक्ति में संकुचित कर अर्थ का अनर्थ न करें तो अच्छा होगा. यह सच है कि आज के संक्रमणकालीन समाज में भारत की नारी घर का चौखट लांघकर बहुत आगे बढ़ चुकी है, देश के सर्वोच्च पदों तक पहुँच चुकी है; किंतु अभी भी असंख्य बहनें ऐसी ही दारुण दशा में जीने को अभिशप्त हैं जिसकी झलक इस कविता में दिखाई देती है.
    मैं इस कविता की आखिरी दो पंक्तियों को इस प्रकार बदलना चाहूंगी
    .....
    दोनों की दशा एक सी है,
    दोनों की व्यथा एक सी है.
    पर दोनों में एक ही अन्तर है
    कि तकिये को बिस्तर पर ही रहना है
    लेकिन नारी को आगे भी बहुत कुछ सहना है.
    ...बालमन जी, नारी समाज के प्रति अपनी चेतना जागृत रखिये ...साधुवाद .

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  8. अरे बाप रे,...बंधुओं मैं कच्चा तो हूँ लेकिन टाइपिंग में. इसी कमजोरी ने गच्चा दे दिया. चलिए कोई बात नही आप सभी का प्यार मिला जो मेरे लिए अमूल्य है.
    नीरज जी ने गलती पकड़ी जो मेरे लिए उलटी पड़ गई. फ़िर तो रक्षंदा जी, ममता जी और पारुल जी ने आन्दोलन खड़ा कर दिया. आप सब की प्रतिक्रियाएं मुझे रोमांचित कर रही हैं. अच्छा अब लीजिये अन्तिम दो संशोधित पंक्तियाँ बर्दाश्त कर लीजिये...
    ...
    दोनों की दशा एक सी है,
    दोनों की व्यथा एक सी है ,
    पर क्या दोनों में एक ही अन्तर है?
    कि एक बिस्तर पर है और
    एक स्वयं बिस्तर है ?
    पुनः आपकी प्रतिक्रियाओं कि प्रतीक्षा है, अपने प्रथम प्रयास का यह हस्र हमेशा याद रहेगा....धन्यवाद

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  9. क्या बात है। बहुत बढ़िया।

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  10. बहुत खूब बालमन जी .... सुधार के साथ आप बहुत बड़ी बात भी कह गये हैं ... वैसे आपकी पहले वाली पंक्तियाँ भी कुछ कम ना थी....

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