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Friday, December 9, 2011

सेमिनार रिपोर्ट... डेटलाइन कल्याण (मुम्बई) :एक क्षेपक

...पिछ्ली किश्त से आगे

चाय विश्राम से लौटकर मुझे सीधे मंच को ‘सुशोभित’ करना था इसलिए लाइव रिपोर्टिंग का सिलसिला थम गया। मुझे तमाम लोगों को यह बताना था कि ब्लॉगिंग की उपयोगिता क्या है। मुझसे पहले चार-पाँच विद्वानों को इस विषय पर प्रपत्र वाचन भी करना था। बहुत जानदार व शानदार सत्र रहा। मंच पर जो कुछ हुआ उसका किस्सा आगे है। अभी यह बताता चलूँ कि जिस ‘बालाजी इंटरनेशनल’ में हमें ठहराया गया था उसमें हम आज की रात मौजूद नहीं हैं।

हमें कोई ले उड़ा है। सिर्फ़ हमें ही नहीं, हमारे साथ रवीन्द्र प्रभात जी और शैलेश भारतवासी भी आ गये हैं। या कह लीजिए कि हम उनके साथ उड़ा लिए गये हैं। कल्याण से करीब पचास किलोमीटर दूर पहाड़ी ऊबड़ खाबड़ रास्तों से होते हुए हमें जिस तरह लाया गया है उसका परिणाम यह है कि हम लोग यहाँ से वापस भी अपनेआप नहीं जा पाएंगे। अंधेरे रास्ते से होते हुए आये। मुम्बई के रास्तों पर भी स्ट्रीट लाइट नहीं जलती है यह जानकर हमें सदमा सा लग रहा था। कार के बन्द शीशे से बाहर झाँकते हुए रस्तेभर हम साइनबोर्ड पढ़ने की कोशिश करते रहे कि जान सकें किधर को जा रहे हैं। लेकिन अभी जब मैं लिखने की कोशिश कर रहा हूँ तो एक भी नाम याद नहीं आ रहे। रवीन्द्र जी भी भौचक बैठे हैं। रास्ते में शैलेश बार-बार एक उन्नत मोबाइल पर लोकेशन का नक्शा देखने की कोशिश करते रहे लेकिन उन्हें भी कुछ खास पता नहीं चला। हमें बस इतना पता है कि इस समय ‘नवी मुम्बई’ के किसी पॉश इलाके की ऊँची मिनार नुमा एक रिहाइशी बिल्डिंग की नवीं मंजिल पर हम दो जने ठकुआए एक दूसरे को निहार रहे हैं। भकुआए हुए खिड़कियों से बाहर जगमगाती मुम्बई को ताक रहे हैं।

इस पेन्टहाउस (Painthouse Penthouse) के ऊपरी कमरे के हवाले कर हमें लाने वाली शख़्सियत “सुबह भेंट होगी” कहकर चली गयी हैं। शैलेश भी किसी बहाने से अपने एक दोस्त के घर मिलने निकल गया।  हमारे ‘मेजबान’ ने दिनभर की बातें और तमाम ब्लॉगजगत का हालचाल जानने और उसपर चर्चा करने के बाद कहा कि आप लोगों को कल सुबह वापस छोड़ दिया जाएगा। रात यहीं काटनी होगी। उनके जाने के बाद हमने फौरन कमरे की बत्ती बुझा दी, सारी खिड़कियाँ खोल लीं जिनसे ताजा हवा अंदर आने लगी। ए.सी. का रिमोट हमें दिखा दिया गया था लेकिन उसे चलाने की जरूरत नहीं पड़ी। (क्या पूछ रहे हैं? ए.सी.? जी हाँ, यहाँ मुम्बई में इतनी गर्मी है कि लोग ए.सी. पंखा इस्तेमाल कर रहे हैं। हमने जो स्वेटर और कोट रखा था उसका प्रयोग गैर जरूरी हो गया है।)

खैर... हम सोने की कोशिश करते रहे लेकिन बहुत करवट बदलने के बाद भी नींद नहीं आयी। अन्ततः हमने हमने सोचा कि अरविन्द जी की प्रतीक्षा और लम्बी करने के बजाय आज का पूरा हाल यहाँ लिख ही डालें। सो हम उठ बैठे हैं; और चायकाल के सत्र के बाद का हाल बताने वाले हैं...

क्या कहा? उससे पहले यह बताएँ कि इस हाईजैकिंग का राज क्या है? बिना यह जाने कि यू.पी. की तहजीबी राजधानी से आये हम दो ब्लॉगरान के साथ यह बरजोरी किसने की, आप सेमिनार का आगे का हाल नहीं पढ़ेंगे? तो साहब, बस इतना जान लीजिए कि हम अपने साथ घटी इस घटना से बहुत खुश हो लिए हैं। क्योंकि सेमिनार के आयोजकों के भरोसे तो हम कल्याण के उस मुहल्ले से बाहर कदम भी नहीं रख पाते। पहली बार मुम्बई आये लेकिन बिना कुछ देखे-जाने लौट जाते। इसलिए हम यहाँ आकर आनंदित च किलकित हैं। जिस व्यक्ति ने हमें अपनी गाड़ी में बिठाकर, खुद ड्राइव करते हुए अपने भव्य आशियाने तक लाया, बालकनी से चारो ओर की जगमगाती मुम्बई का दर्शन कराया, तालाब के आकार का एक्वेरियम और उसमें तैरती मछलियों से परिचय कराया और स्वादिष्ट भोजन अपने हाथ से परोसकर खिलाया उसे आप स्वयं देख लीजिए। हम अपने मुँह से उनका नाम क्या लें...! तारीफ़ के शब्द कम पड़ रहे हैं सो यह तस्वीर लगाकर काम चला लेते हैं। देखिए...



इस भोजन के बाद नींद भला कैसे न आती। रवीन्द्र जी जगाकर पूछ रहे हैं कि क्या हुआ पोस्ट का। छाप दिए कि नहीं...? 
ओहो... क्या बजा है? 
साढ़े बारह बज गये। 
अब इतनी रात कौन लिखेगा और कौन पढ़ेगा...
अब कल देखी जाएगी...

हम ही सो गये दास्ताँ कहते-कहते... 
(सिद्धार्थ)

11 comments:

  1. इहाँ तो हम भी हो आये हैं ..........किसी के सहारे !
    चलते चलते एक बात और कि लगता नहीं कि रवींद्र जी की खुराक कुछ ज्यादे ही है?.......हर टेबल कुछ कहती है !

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  2. काश!!हम होते वहाँ...

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  3. इतनी बड़ी रिपोर्ट बिन भोजन के अपूर्ण है।

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  4. इस अपहरण की जानकारी पुलिस को दे दी जाये क्या? एफ़.आई.आर. करा दी जाये।

    इंतजाम तो बड़ा चकाचक लगता है अपहरणकर्ता का।

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  5. व्यक्तियों की संख्या और भोजन की मात्रा में कुछ असंतुलन लग रहा है।

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  6. तो आपकी यह पेंटहाऊस रात थी ...छि छि ...ये क्या कह रहे हैं आप?

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  7. ये हुई न ब्‍लागिंग.

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  8. ब्लोगिंग के सही झण्डे गाढ रहे हैं।

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  9. अरविंद जी, कृपया इस लिंक पर जाना चाहें
    http://oald8.oxfordlearnersdictionaries.com/dictionary/penthouse

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  10. हाँ आपसे बात करने पर मैंने भी पेंटहाउस पर घर की आक्सफोर्ड डिक्शनरी से ज्ञानार्जन किया .पेंट हाउस घर के सबसे ऊँचे कमरे /कक्ष को कहते हैं ....मगर क्या करें मैं तो इसे इसके अपभ्रंश से ही जानता रहा और विद्वत जनों में यह इसी अर्थ में ही रूढ़ है ....इस प्रकरण से एक शब्द ज्ञान का आह्लाद अनुभव कर रहा हूँ ..सुबरन को खोजत फिरत .....

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