Sunday, December 11, 2011

सेमिनार रिपोर्ट... डेटलाइन लखनऊ (कल्याण से लौटकर) भाग-I

ब्लॉग के बारे में विद्वानों की अद्‌भुत राय
...पिछली कड़ी से आगे

आपने हमारी लाइव रिपोर्ट्स और उनके बीच आये क्षेपक को पढ़ा ही होगा इसलिए अब हम बिना किसी भूमिका के सीधे प्रथम दिवस के अपराह्न सत्र की चर्चा करेंगे जो चाय विश्राम के बाद प्रारम्भ हुआ था। इस सत्र का विषय था – “ब्लॉगिंग की उपयोगिता” । इस भाग में तय कार्यक्रम के अनुसार कुल ११ वक्ताओं और एक संचालक को अपनी बात कहनी थी। वक्ताओं में एक अध्यक्ष, दो विषय विशेषज्ञ, दो विशेष अतिथि और छः प्रपत्र वाचक सम्मिलित थे। शाम चार बजे शुरु किए गये सत्र को पाँच बजे समाप्त हो जाना था। शुक्र है कि उसके बाद कोई और चर्चा सत्र नहीं था इसलिए संचालक की टोकाटाकी के बीच भी हम इसे सवा छः बजे तक खींच ले जाने में सफल रहे। एक अच्छी बात यह भी रही कि वक्ताओं में से दोनो विशेष अतिथि और एक प्रपत्र वाचक उपस्थित नहीं हुए, जिससे बाकी लोग कुछ अधिक समय पा सके।
संचालक डॉ.(श्रीमती) रत्ना निम्बालकर (संस्था की उप प्राचार्य) ने शुरू में ही बता दिया कि वे हिंदीभाषी नहीं हैं और वे अंत तक इस तथ्य की पुष्टि करती रहीं। उन्हें जो कहना था उसे उन्होंने लिखकर रखा था और बड़ी सावधानी से उसे पढ़ रही थीं। एक गैरहिंदीभाषी द्वारा इतना दत्तचित्त होकर हिंदी ब्लॉगिंग के चर्चा सत्र को संचालित करना हमें बहुत अच्छा लगा। ब्लॉगिंग विधा के लिए यह भी एक उपलब्धि है जो अलग-अलग भाषाओं को एक साथ जोड़ने का माध्यम बन रही है।

सर्व प्रथम प्रपत्र-वाचन का क्रम शुरू हुआ। यह प्रपत्र-वाचन आजकल बहुत ज्यादा प्रयोग किया जा रहा है। इसकी डिमांड अचानक बढ़ गयी है। मैंने पता किया तो लोगों ने बताया कि अब यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) ने विश्वविद्यालयों और डिग्री कॉलेजों में कार्यरत सहायक प्रोफ़ेसर व एसोसिएट प्रोफ़ेसर की पदोन्नति के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे क्लास में लेक्चर देने के अलावा एक निश्चित संख्या में शोधपत्र तैयार करें और राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार में हिस्सा लें। इस अनिवार्यता ने बहुत से अध्यापकों को ऐसे ‘राष्ट्रीय’ सेमिनारों की राह दिखा दी है। वे ऐसे विषयों पर भी किताबें पलट रहे हैं और इंटरनेट खंगाल रहे हैं जिनमें न तो उनकी कोई मौलिक रुचि रही है और न ही उसके अध्ययन-अध्यापन का कोई अनुभव रहा है। इस सेमिनार में भी जो प्रपत्र पढ़े गये उनकी विषयवस्तु और प्रस्तुतिकरण की शैली इसी बात की गवाही दे रही थी। यू.जी.सी. के इस फरमान ने ब्लॉगिंग को बहुत संबल दिया है। हम शुक्रगुजार हैं।

इस तीसरे सत्र से पहले भी करीब दर्जन भर प्रपत्र पढ़े जा चुके थे; मैंने उनकी विषयवस्तु सुन रखी थी और कुछ नोट भी कर लिया था। इसलिए मंचपर बैठे हुए मुझे बहुत कुछ नोट नहीं करना पड़ा। लगभग सभी ने ब्लॉग के बारे में इसकी उत्पत्ति, विकास और प्रसार की कहानी बतायी; कुछ प्रचलित, कुछ प्रसिद्ध और कुछ कम प्रसिद्ध ब्लॉग्स का नाम लिया और उद्धरण सुनाये; इसके लाभ गिनाये, इससे मिलने वाली अभिव्यक्ति की नयी आजादी की चर्चा की; और अंत में कुछ किंतु-परंतु के साथ इसकी कमियों पर दृष्टिपात किया। मुझे महसूस हुआ कि ये गिनायी गयी कमियाँ तथ्यात्मक विश्लेषण पर आधारित कम थीं और प्रायः प्रपत्र को संतुलन प्रदान करने के उद्देश्य से ही जोड़ी गयी थीं। जिस सत्र में मुझे विशेषज्ञ के रूप में बोलना था उसमें प्रपत्र वाचन करने वाले थे : शिरूर के डॉ. ईश्वर पवार, दिल्ली के डॉ.चन्द्र प्रकाश मिश्र, पश्चिम बंगाल के आशीष मोहता, दिल्ली की डॉ.विनीता रानी और मुम्बई के डॉ. विजय गाड़े।

ईश्वर पवार जी ने अपनी बात के बीच में कविता की चार पंक्तियाँ पढ़ी जिनपर तालियाँ बजी-
तुम हो तो ये घर लगता है,
वरना इसमें डर लगता है।
ख़ुलूस-ओ-मोहब्बत से तर है,
चले आइए ये अपना घर है।
मैं यह नोट नहीं कर पाया कि यह किस संन्दर्भ में कहा गया। फिर भी अच्छी भावुक कर देने वाली लाइने हैं इसलिए बता देना उचित लगा। उन्होंने आगे कहा कि ब्लॉग (पोस्ट) की उम्र बहुत कम होती है। जल्द ही लोग इसे भुला देते हैं। इसकी उम्र लम्बी करने के लिए उपाय खोजे जाने चाहिए। यह भी खोजा जाना चाहिए कि शिक्षा के क्षेत्र में ब्लॉग का प्रयोग कैसे किया जा सकता है। उन्होंने ब्लॉग को प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए उपयोगी बनाये जाने पर बल दिया। इस माध्यम की कमियों के रूप में उन्होंने यह बात बतायी कि ब्लॉग के आ जाने के बाद नयी पीढ़ी इस ओर चली आ रही है और बड़ा साहित्य पढ़े जाने से वंचित हो जा रहा है। इसी क्रम में उन्होंने यह जुमला भी उछाल ही दिया कि आजकल के युवा पहले ई-मेल से संबंध बना रहे हैं और बाद में फीमेल से। इसपर उन्हें उम्मीद थी कि तालियाँ बजेंगी लेकिन शायद यह चुटकुला सबको पहले से ही पता था।

अगले वक्ता के रूप में डॉ. चन्द्र प्रकाश मिश्र अपना ‘पेपर’ लेकर तो आये, लेकिन बोलते रहे बिना पढ़े ही। एक कारण तो यह था कि वे इस विषय के अच्छे जानकार हैं और बहुत अवसरों पर वार्ता दे चुके हैं, किताबे भी लिख चुके हैं; लेकिन दूसरा महत्वपूर्ण कारण यह था कि उनके पर्चे की अधिकांश बातें दूसरे वक्ता पहले ही बोल चुके थे। उन्होंने डॉ.सुभाष राय को उद्धरित करते हुए कहा कि “ब्लॉग लेखन असंतोष से उपजेगा।” अन्ना हजारे के आन्दोलन का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि व्यवस्था के प्रति युवा मन में जो आक्रोश पैदा हो रहा है उसे स्वर देने में ब्लॉग का माध्यम पूरी तरह सक्षम है और इसका उपयोग बढ़-चढ़कर हो रहा है। उन्होंने इस माध्यम के बारे में तमाम आशावादी बातें बतायीं और यह भी कहा कि इसे निरंकुश माध्यम कतई न माना जाय। हर ब्लॉगर को यह पता होना चाहिए और “पता है” कि निरंकुशता का वही हश्र होता है जो सद्दाम हुसेन और कर्नल गद्दाफ़ी का हुआ। उन्होंने कहा कि ब्लॉगर को किसी संपादक या सिखाने वाले की जरूरत नहीं है। वह ‘आपै गुरू आपै चेला’ है। उन्होंने प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (न्यूज चैनेल) में आने वाली गिरावट का जिक्र किया, नीरा राडिया टेपों और पेड न्यूज का उदाहरण देते हुए ललित शर्मा के वक्तव्य की चर्चा की जिसके अनुसार “ब्लॉगर मीडिया की बखिया उधेड़ रहे हैं”। चन्द्र प्रकाश जी ने कहा कि जहाँ तक ब्लॉग की उपयोगिता और इसके लिए विषय चुने जाने का सवाल है तो उसका एक शब्द में उत्तर है- “अनन्त”। इसके शीघ्र बाद उन्होंने अपनी वार्ता समाप्त कर दी।

कोलकाता से पाँच वर्ष की ब्लॉगिंग का अनुभव लेकर आये आशीष मोहता ने ‘विषय वस्तु की विशिष्टता’ (Specialization of Content) पर जोर दिया। उन्होंने ब्लॉगर को अपनी रुचि और विशेषज्ञता के अनुसार कोई खास विषय चुनने और उसे उपयोगी व आकर्षक रूप में प्रस्तुत करने की सलाह दी। उदाहरणार्थ उन्होंने पाकशास्त्र के जानकारों को लजीज व्यंजन बनाने का वीडियो तैयारकर उसे पॉडकास्ट करने का सुझाव दिया। इसी प्रकार अनेक ऑडियो-विज़ुअल और टेक्स्ट डिजाइन आधारित विशिष्ट विषयों के ब्लॉग बनाये जा सकते हैं।

दिल्ली की डॉ. विनीता रानी ने, जो पेशे से शिक्षिका हैं अपना पर्चा पूरे आत्मविश्वास से पढ़ा जो सुरुचिपूर्वक तैयार किया गया था। उन्होंने बताया कि ब्लॉग बीसवीं शताब्दी की सबसे बड़ी उपलब्धि है। इसे सामाजिक सरोकारों से जोड़ा जाना चाहिए। इसे समाज के हाशिए पर रहने वालों की आवाज़ बनाया जा सकता है। कभी कभी हमें अपना दुःख अभिव्यक्त कर लेने से भी मन को राहत मिल जाती है। दुःख और शोषण से मुक्ति दिलाने की दिशा में बड़ा योगदान हो सकता है यदि ब्लॉग इसके लिए जोरदार आवाज उठाएँ। इसे आपसी लड़ाई लड़ने के लिए निजी अखाड़े के रूप में प्रयोग नहीं करना चाहिए। वैसे तो इसका प्रयोग हर पढ़ा-लिखा व्यक्ति अपने-अपने तरीके से कर सकता है लेकिन सृजनात्मक प्रतिभा के धनी व्यक्ति के लिए यह माध्यम बहुत उपयोगी है।

मुम्बई के ही किसी कॉलेज में प्राध्यापक डॉ. विजय गाड़े ने अपना पर्चा उलट कर रख दिया और अपनी बात सीधे कहने लगे। उनकी शैली में मराठी भाषा का इतना जबरदस्त प्रभाव था कि हम बहुत सी बाते चाहकर भी समझ नहीं पाये, नोट करने में तो दिक्कत थी ही। फिर भी उनकी दो बातें मुझे जरूर समझ में आ गयीं। पहली यह कि कम्प्यूटर पर अधिक समय देने वाले समाज से कट जाते हैं। उन्होंने कहा कि हम दुनिया के बारे में तो तमाम बातें जान जाते हैं लेकिन पड़ोस में क्या हो रहा है इसकी खबर तक नहीं होती। दूसरी बात यह कि नेट आधारित माध्यम का नुकसान सबसे अधिक किताबों को हो रहा है। उन्होंने एक अज्ञात शायर का शेर सुनाया-
बच्चे तो टीवी देखकर खुश हुए जनाब।
दुख इस बात का है कि बेवा हुई किताब॥
इस शेर के बाद भी उन्होंने संचालक के इशारों के बीच कुछ बातें की लेकिन मुझे उनकी सुध नहीं रही क्योंकि उनके तुरन्त बाद मुझे बोलना था। मैंने जो कुछ नोट किया था उसे समेटा और माइक पर रत्ना जी के आह्वाहन पर माइक पर पहुँच गया।
(मैने वहाँ क्या बोला यह जानने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए।)
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

4 comments:

  1. संभावना़यें अनंत हैं, सुन्दर कार्य

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  2. वक्तव्य तो बड़ा बढ़िया दिया आपने! मजे आ गये।
    बाकी गुरुजन लोग अपनी भर्ती के समय जित्ता बांच लिये उससे आगे जरा कम ही बांचते हैं। विरले गुरुजन ही ऐसे होते हैं जो नये माध्यम अपनायें।

    अच्छा लगा वहां के किस्से पढ़ना!

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  3. आपकी विश्लेष्णात्मक रपट बल्कि रिपोर्ताज पढ़कर बस मजा आ गया सिद्धार्थ जी -

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  4. धन्यवाद, रपट के लिए.

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