Saturday, October 23, 2010

अच्छाई को सजोना पड़ता है जबकि बुराई अपने आप फैलती है…।

 

पिछले दिनों विश्वविद्यालय प्रांगण में आयोजित ब्लॉगिंग संगोष्ठी में दिल्ली से श्री जय कुमार झा जी पधारे थे। ‘ऑनेस्टी प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी’  के अलावा उनके दूसरे भी ब्लॉग हैं। ब्लॉगरी को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने पर झा जी का बहुत जोर है। इतना कि उनसे चाहे जिस मुद्दे पर बात करिए उनका हर तीसरा वाक्य ‘सामाजिक सरोकार’ की ओर ही मोड़ कर ले जाता है। उनसे हमें जब भी कुछ चर्चा का मौका मिला वे ‘सोशल ऑडिट’ पर जोर देते दिखे। मुझे थोड़ा विस्मय हुआ कि घूम-फिरकर इन्हीं दो बातों के इर्द-गिर्द परिक्रमा करने से ये थकते क्यों नहीं। उनका कहना था कि हमारे समाज की गड़बड़ियों को दूर करने का सबसे कारगर तरीका है सोशल ऑडिट यानि सामाजिक जाँच।

जय कुमार झा जी ने संगोष्ठी समाप्त होने पर बताया कि वे वर्धा प्रांगण में एक दिन और रुकेंगे। यहाँ संपन्न हुई कार्यशाला में ब्लॉगिंग से जुड़ने वाले नये ब्लॉगर विद्यार्थियों व अन्य छात्रों से अलग से मिलकर कुछ संदेश देना चाहेंगे। संभव हो तो कुलपति जी को भी यह प्रस्ताव देंगे कि वे अपने छात्रों की टीम बनाकर सुदूर गाँवों में सोशल ऑडिट के लिए भेजें। राष्ट्रीय स्तर पर जो लोग इस प्रकार के अभियान में लगे हुए हैं उनकी मदद से इन टीमों को प्रशिक्षित कराया जाय आदि-आदि।

दो-दिवसीय संगोष्ठी की समाप्ति पर मैं थकान मिटाने के नाम पर आराम की मुद्रा में जाना चाहता था लेकिन उनकी ऊर्जा और सामाजिक सरोकार के प्रति अदम्य आग्रह को देखकर मुझे जन संचार विभाग के अध्यक्ष प्रो. अनिल राय ‘अंकित’ से बात करके झा जी की कक्षा का आयोजन करना पड़ा। विभागाध्यक्ष ने सहर्ष रुचि दिखायी और हम झा जी को लेकर पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे छात्रों के बीच एक क्लास-रूम में पहुँच गये। विभाग में उपस्थित सभी कक्षाओं के छात्र कुछ शिक्षकों के साथ वहाँ इकठ्ठा थे। मैने सबसे पहले वहाँ उपस्थित विद्यार्थियों को संगोष्ठी के आयोजन में सहयोग देने हेतु धन्यवाद दिया और फिर अतिथि वार्ताकार का संक्षिप्त परिचय देकर पोडियम पर झा जी को आमंत्रित कर दिया। झा जी ने अपनी बात सामाजिक सरोकार, सोशल ऑडिट, ग्रास रूट लेवेल, सिटिजेन जर्नलिस्ट इत्यादि के माध्यम से रखी। झा जी ने India Rejuvenation Initiative (iri.org.in) नामक संगठन के बारे में बताया जो प्रायः सेवानिवृत्त हो चुके ऐसे प्रभावशाली और अनुभवी नौकरशाहों, न्यायाधीशों, पुलिस अधिकारियों इत्यादि द्वारा खड़ा किया गया है जो समाज में सच्चाई और ईमानदारी को बढ़ावा देना चाहते हैं।

उनकी वार्ता सुनकर मैंने जो समझा उसका सार यह था कि समाज के जागरूक लोगों द्वारा अपने आस-पास हो रहे प्रत्येक कार्य पर न सिर्फ़ निगरानी रखना चाहिए बल्कि कुछ भी गड़बड़ पाने पर सक्षम प्राधिकारियों तक उसकी शिकायत भी पहुँचानी चाहिए। जबतक हर पढ़ा लिखा आदमी सबसे निचले स्तर (grass-root level) पर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सतर्क निगाह रखकर धाँधली करने वाले लाभार्थियों, कर्मचारियों और अधिकारियों को गलत करने से रोकने व टोकने के लिए कुछ कष्ट नहीं उठाएगा तबतक हम एक ईमानदार और पारदर्शी समाज की रचना नहीं कर सकेंगे। आज स्थिति बिल्कुल उल्टी और भयावह है। सरेआम लूट और भ्रष्टाचार होते देखकर भी हम चुप रह जाते हैं और अपराधी निर्द्वंद्व होकर अपने कारनामें करता रहता है। ऐसा इसलिए कि हम केवल अपने सुकून और स्वार्थ की पूर्ति की चिंता में ही रमे हुए हैं। किसी ऐसे काम को झंझटी समझ कर किनारा कर लेते हैं जिसमें कुछ व्यक्तिगत स्वार्थ न सधता हो। सामाजिक सरोकारों पर ध्यान देने की फुर्सत किसी के पास नहीं है। उन्होंने सबसे अपील की कि हमें अपने कीमती समय में से कुछ समय समाज के गरीब और असहाय तबके की सहायता के लिए निकालना चाहिए।

झा जी की बातें सबने बड़े ध्यान से सुनीं। बीच-बीच में अनेक छात्र-छात्राओं ने उनसे सवाल दागने शुरू कर दिए। उन युवा चेहरों पर व्यवस्था के प्रति अत्यन्त रोष दिखा। उनकी बातों से ऐसा लगा कि ये सब आदर्श की बातें हैं जो केवल गोष्ठियों और सभाओं में अच्छी लगती हैं। व्यावहारिक दुनिया की सच्चाई बहुत कठोर और कड़वी है। जो लोग सत्ता और शक्ति के शिखर पर बैठे हैं उन्हें किसी तरह से डिगा पाना लगभग असम्भव है। जिनके पास अवसर हैं वे इसका प्रयोग अपनी तिजोरियाँ भरने के लिए कर रहे हैं। अपराधी प्रवृत्ति के लोग गिरोहबंद होकर देश और समाज को लूट रहे हैं। ईमानदार और सच्चे लोगों को कदम-कदम पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। वे असहाय होकर किनारे खड़े हैं। हम युवाओं को ऐसे उपदेश खूब दिये जाते हैं। लेकिन हमारे सामने सबसे बड़ी समस्या तो जीविका का सहारा ढूँढना है। नौकरियाँ दुर्लभ होती जा रही हैं। जो थोड़ी बहुत हैं भी वे भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जा रही हैं। सरकारी धन की लूट मची हुई है। प्रायः सभी इस प्रयास में लगे हैं कि उस लूट में हिस्सेदारी पाने का कोई जुगाड़ खोज लिया जाय। जिन्हें हिस्सा मिल गया वो यथास्थिति बनाये रखने का इन्तजाम सोचते हैं और जो बाहर हैं वे विरोध, धरना, प्रदर्शन, आंदोलन की राह चुनते हैं या चुप होकर अपनी नियति का दोष मानकर घर बैठ जाते हैं।

मुझे लगा कि यह नयी पीढ़ी यथार्थ के धरातल पर कुछ ज्यादा ही पैर जमाकर चलने को तैयार है। आदर्श की बातें सुनने के लिए भी इनके पास धैर्य नहीं है। झा जी उत्साहपूर्वक अपनी ‘ऑनेस्टी प्रोजेक्ट डेमोक्रेसी’ की बात बढ़ाते रहे और छात्रगण उनसे रोटी का सवाल उछालते रहे। एक छात्र ने विश्वविद्यालय के विरुद्ध नाना प्रकार के अनर्गल कुप्रचार में लगी एक वेबसाइट का उदाहरण देते हुए कहा कि यहाँ बहुत से अच्छे कार्य हो रहे हैं लेकिन बाहर वालों के सामने यहाँ की जो छवि बनी है उसे देखकर हमें इस कैम्पस से बाहर जाने पर शर्म महसूस होती है। इस शरारत के पीछे जिनका हाथ है उन्हे सभी पहचानते भी हैं लेकिन फिर भी हम हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। उनके विरुद्ध तो हम कुछ कर नहीं रहे हैं, बल्कि कुछ कर ही नहीं पा रहे हैं तो बाकी दुनिया को सुधारने की बात करने का क्या औचित्य है? मतलब यह कि बुराई अपने पाँव पसारती जाएगी। उसे रोकने वाला कोई नहीं है। किसी के पास इसकी फुर्सत ही नहीं है। इस बहस के बीच मैने ह्वाइट बोर्ड (अब ब्लैक-बोर्ड नहीं रहे) पर इस प्रकार का रेखाचित्र बना दिया-

good&evil

मैने सबका ध्यान आकृष्ट करते हुए कहा कि आपलोगों के हिसाब से आज के समाज में अच्छाई और बुराई की तुलनात्मक स्थिति कुछ इस प्रकार की है। बुराई का दानव विकराल रूप लेता जा रहा है और सच्चाई और ईमानदारी जैसी अच्छी बातें अल्पमत में आ गयी हैं। बुराई को कम करने के सभी प्रयास प्रायः विफल होते जा रहे हैं। कोई शरीफ़ आदमी गुंडे-मवाली से उलझना नहीं चाहता। झंझट मोल नहीं लेना चाहता। ‘संघे शक्तिः कलियु्गे’ - अपराधियों का गिरोह बहुत एकजुट होकर काम करता है जबकि सच्चे और ईमानदार लोग अकेले पड़ जाते हैं। ऐसे में शायद आप यह मान चुके हैं कि बायीं ओर के स्तम्भ को छोटा नहीं किया जा सकता। लगभग सभी ने मेरी इस बात पर हामी भरी। मैने कहा कि आप सबकी बात मानकर मैं भी स्वीकार कर लेता हूँ कि बुराई को कम नहीं किया जा सकता। लेकिन आप लोगों को अच्छाई की मात्रा बढ़ाने से किसने रोका है? अधिक से अधिक लोग यदि अपने आप में  सद्‍गुणों का विकास कर लें तो यह अंतर उलट सकता है। कुछ इस प्रकार से-

good&evil2

बुराई को उसके हाल पर छोड़ दें, और अच्छाई का अवगाहन करें तो आप दूसरी स्थिति पैदा कर सकते हैं। इस पर वे शांत होकर कुछ सोचने लगे। मैने आगे कहा – लेकिन यह इतना आसान काम नहीं है। क्योंकि प्रकृति आपके विरुद्ध खड़ी है। यह दुनिया जिस रूप में आज है उसमें बुराई स्वाभाविक रूप से अपने आप फैलती जाएगी लेकिन अच्छाई की मात्रा बढ़ाने के लिए मनुष्य को सकारात्मक कदम उठाने पड़ेंगे। प्राकृतिक रूप से  हमारा वातावरण ऐसा ही है। किसान अपने खेत की जुताई करके यत्न पूर्वक खर-पतवार की जड़ सहित सफाई कर लेने के बाद साफ़-सुथरी मिट्टी में अनाज के बीज डालता है। लेकिन बीज के साथ अवांछित घास-फूस अपने आप उग आती है। यदि खेत की निराई-गुड़ाई समय-समय पर न की जाय तो ये खर-पतवार अनाज के पौधों को अच्छादित कर देंगे और खेत की फसल चौपट हो जाएगी। थोड़ी सी असावधानी हुई नहीं कि बीज की बढ़वार रुक जाएगी और सारी मेहनत चौपट हो जाएगी। इसलिए सद्‌गुणों को अपने भीतर सावधानी से सजो कर रखना पड़ता है जबकि दुर्गुण अपने आप घर बना लेते हैं।

इस बात को सिद्ध करने के लिए कुछ और भी उदाहरण मेरे मन में आये। दाँतों को साफ़ रखने के लिए हमें नित्य उनकी सफाई करनी पड़ती है। लेकिन यदि उनका हम कुछ न करें, बस यूँ ही छोड़ दें तो जल्दी ही गंदगी जमती जाएगी। शरीर को साफ़ रखने के लिए रोज साबुन लगाकर नहाना पड़ता है, लेकिन इसे गंदा रखने के लिए किसी प्रयास की जरूरत नहीं है। हमारे वातावरण से आकर गंदगी अपने आप शरीर पर आसन जमा लेती है। घर को साफ रखने के लिए रोज झाड़ू-पोछा करना पड़ता है लेकिन गंदगी जाने कहाँ से अपने आप पधार जाती है। हमारे वातावरण में नकारात्मकता की विषबेल फैलने के अनुकूल अवसर बहुत हैं लेकिन सकारात्मक सुगंध का फूल खिलाने के लिए अच्छा माली बनकर कठिन परिश्रम करना पड़ेगा।

ऊपर के कई उदाहरण मुझे वहाँ कक्षा में नहीं देने पड़े। शायद नयी पीढ़ी को यह बात आसानी से समझ में आ गयी। कम से कम जोरदार तालियों से प्रकट होता उनका समर्थन तो यही कह रहा था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

23 comments:

  1. वर्धा का बेहतर निष्कर्ष !!

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  2. वर्धा का बेहतर निष्कर्ष !!

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  3. सिद्धार्थ जी
    आपने जिस शीर्षक से अपनी बात को रखने का प्रयास किया है , काफी हद तक वह सोचने पर मजबूर करती है , जहाँ तक जय प्रकाश झा जी की बात है, वह नेक दिल इंसान हैं और एक इंसान हमेशा इंसानियत को बढ़ाबा देने का भरसक प्रयत्न करता है , आप सब इस अभियान में शामिल हैं , और यह बात भी सच है जब हमारी सोच में परिवर्तन आ जायेगा सारी स्थितियां खुद व खुद बदल जाएँगी , और आप सबका प्रयास जरुर रंग लायेगा ......!
    शुभकामनायें

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  4. आपने शायद यह मान लिया होगा कि जब अच्छाई वाले अच्छाई को बढ़ा रहे होंगे तब बुराई के डिपार्टमेंट वाले चुपचाप बैठकर तमाशा देखेंगे ।

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  5. समाज के जागरूक लोगों द्वारा अपने आस-पास हो रहे प्रत्येक कार्य पर न सिर्फ़ निगरानी रखना चाहिए . यह तरीका हर बुराई के लिए अपना लिया जाए तो समाज सुधर जाएगा.

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  6. ये कहानी है दिये की और तूफ़ान की :)

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  7. आपने जो बातें कहीं हैं न...बस आपके पाँव छू लेने को मन आंदोलित हो गया है...
    ईश्वर ऐसे सकारात्मक विचार सबके ह्रदय में दें और अच्छाई का ग्राफ यूँ ही आगे बढ़ बुराई को पछाड़ दे ,यही मंगल कामना है...

    बहुत ही सुन्दर बात कही है आपने...कोटिशः आभार आपका...

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  8. मै भी जय प्रकाश झा जी की बातो से सहमत हुं, ओर यह बुराई तभी समाज से मिटेगी जब हम सब मिल कर इसे हटाने की कोशिश करेगे.... काम कठिन तो हे लेकिन असम्भंव नही, धन्यवाद इस अति जागरुक करने वाले लेख के लिये

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  9. शीर्षक ही सूक्ति है। टेबल पर रखने और व्यवहार में लाने लायक।

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  10. शीर्षक ही सूक्ति है। टेबल पर रखने और व्यवहार में लाने लायक।

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  11. सिद्धार्थ जी आपका और श्री अनिल रॉय जी का मैं हार्दिक आभारी रहूँगा जिनके हार्दिक सहयोग से कुछ छात्रों को मैं सामाजिक जाँच और ब्लोगिंग को सामाजिक सरोकार से जोड़ने के लिए प्रेरित करने का काम कर सका ...इसमें से एक भी छात्र अगर ईमानदारी से इस दिशा में आगे बढ़ जाता है तो इसे एक कामयाबी ही कहा जायेगा और जिसका श्रेय आपको और आपके विश्वविध्यालय प्रशासन को जायेगा | दरअसल ऐसे प्रयास हर विश्वविध्यालय द्वारा किये जाने की जरूरत है तब जाकर अच्छाई का ग्राफ ऊपर आएगा | शिक्षा संस्थान अगर अच्छाई को बढ़ाये तो इस दिशा में सार्थक बदलाव तेजी से लाया जा सकता ...आपका ये ग्राफ वाला विचार निश्चय ही शानदार है |

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  12. अपका आलेख विचारणीय और मनन योग्य है। सार्थक प्रयास हमेशा फल देते हैं। हम आपके साथ हैं। मार्गदर्शन करते रहिये। धन्यवाद।

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  13. कुछ ऐसी ही बातों से होकर प्रेरित
    मैंने भी बनाये हैं रास्ते
    सामान्य से कुछ अलग
    पर कभी-कभी पाता हूँ
    खुद को एकाकी
    फिर सोचता हूँ!!!!
    कहीं मै गलत तो नहीं???

    प्रकाश पर्व दीवाली से पहले देश और समाज को प्रकाशित करने के उद्देश्य से लिखी इस पोस्ट से अच्छी पोस्ट क्या हो सकती है? कैसी रही वर्धा में मनाई गई दीवाली, उम्मीद करूँगा एक special पोस्ट की.

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  14. जय कुमार झा की सोच और आपके संजीदा उदाहरणों ने इस विषय में एक ऊर्जा डाली है , प्रयास जारी रहे , नदी बह निकलेगी अच्छाई की !

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  15. मुझे दिल्ली में १४ नवंबर से २१ नवम्बर तक रुकना है। २१ की रात दस बजे वर्धा वापसी की ट्रेन है। यदि फुरसत मिली तो दिन में कुछ देर के लिए रोहतक आ सकता हूँ।

    नीरज जाट जी, यदि दिल्ली से सड़क मार्ग से आना हो तो दूरी कितनी है? समय कितना लगेगा? रूट क्या होगा?
    ...
    सिद्धार्थ जी, दिल्ली से रोहतक की दूरी लगभग 70 किलोमीटर है। सीधे कश्मीरी गेट से चलकर पुल बंगश के पास से रोहतक रोड पकडकर रोहतक पहुंच सकते हैं। नहीं तो दिल्ली में कहीं से भी पूछताछ करते हुए नांगलोई पहुंचे। नांगलोई से रोहतक रोड मिल ही जायेगी।

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  16. "बुराई को उसके हाल पर छोड़ दें, और अच्छाई का अवगाहन करें तो आप दूसरी स्थिति पैदा कर सकते हैं।" आइये इसी दीपावली के दिन हम कुछ थोडी सी अच्छाइयों के अवगाहन का संकल्प लें!

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  17. पूर्ण सत्य,

    कपडा सहजता से फट तो सकता है पर सहजता से सिल नहिं जाता। सिलने के लिये विशेष पुरुषार्थ की आवश्यकता रहती ही है।

    उसी तरह बुराईयां सहजता से चली आती है, किन्तु अच्छाई के पुरुषार्थ अपेक्षित है।

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  18. आप सभी को खासकर इमानदार इंसान बनने के लिए संघर्षरत लोगों को दीपावली की हार्दिक बधाई और शुभकामनायें....

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  19. दीप पर्व की हार्दिक शुभकामनायें !

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  20. आप,आपके परिवार और सभी ब्ला‍गर मित्रों को दीपावली की हार्दिक बधाई एवं शुभ कामनाएं।

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  21. हमारे वातावरण में नकारात्मकता की विषबेल फैलने के अनुकूल अवसर बहुत हैं लेकिन सकारात्मक सुगंध का फूल खिलाने के लिए अच्छा माली बनकर कठिन परिश्रम करना पड़ेगा।

    सही कहा आपने .....
    प्रयास karenge तो ही safalta milegi .....

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  22. जबतक हर पढ़ा लिखा आदमी सबसे निचले स्तर (grass-root level) पर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सतर्क निगाह रखकर धाँधली करने वाले लाभार्थियों, कर्मचारियों और अधिकारियों को गलत करने से रोकने व टोकने के लिए कुछ कष्ट नहीं उठाएगा तबतक हम एक ईमानदार और पारदर्शी समाज की रचना नहीं कर सकेंगे।

    झा जी के विचार अतिउत्तम हैं .....प्रतेक नागरिक का फर्ज बनता है वह अपने आस पास होती धांधली पर आवाज़ उठे ....
    हमारे मौन की वजह से ही भ्रष्टाचार और पैर फैलता है .....
    विचारणीय पोस्ट ....!!

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