#कुल्लू_दशहरा एक ऐसा विशिष्ट त्यौहार है जिसे हर भारतीय को एक बार जरूर देखना
चाहिए। देवभूमि हिमाचल के विभिन्न पर्वतों कन्दराओं में विराजे प्रायः समस्त देवी
देवता अपना मूल स्थान छोड़कर सजी-धजी पालकी में बैठकर इस दिन कुल्लू के रघुनाथ जी
से भेंट करने आते हैं। मनाली के अत्यंत प्राचीन मंदिर से देवी हिडिंबा भी पधारती
हैं जो यहाँ के राजपरिवार की अतिथि होती हैं। सामने के पर्वत शिखर से बिजली महादेव
भी होते हैं।
रघुनाथ जी स्वयं अपने स्थायी मंदिर
से निकलकर कुल्लू नगर के एक बड़े मैदान में आ विराजते हैं। कुल्लू के ऊंचे पर्वत
शिखर पर निवास करने वाली भेखली देवी अपने स्थान से झण्डा दिखाकर कार्यक्रम प्रारंभ
करने की अनुमति देती हैं। इस दिव्य और भव्य भेंट के बाद कुल्लू के राजपरिवार व
भक्त नागरिकों द्वारा श्री रघुनाथ जी का रथ खींचकर उस अस्थायी शिविर में ले जाया
जाता है जहां वे सभी देवी-देवताओं के साथ अगले एक सप्ताह तक कैम्प करते हैं।
पूरे सात दिनों के मेले में एक ही
स्थान पर सभी देवी-देवता अपनी-अपनी कुटिया (टेंट) में वैसे ही पूजा और दर्शन के
लिए उपलब्ध होते हैं जैसे अपने मूल स्थान के मंदिरों में। मुख्य शिविर श्री रघुनाथ
जी का होता है जहां उपस्थित दर्शनार्थियों के समक्ष उन्हें स्नान कराकर विधिवत्
शृंगार पूजन और आरती का कार्य पूरी श्रद्धा और भक्ति से किया जाता है। पूरे मेले
में ढोल,
मृदंग, नगाड़े और सिंगा की आवाज अद्भुत वातावरण
उत्पन्न करती है।
ऐसी मान्यता है कि श्री रघुनाथ जी
के रथ की रस्सी पकड़कर उसे खींचने का सौभाग्य जिन्हें मिल जाता है उनकी समस्त
मनोकामना पूरी हो जाती है। उस रस्सी को छू लेने भर से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।
उस दृश्य को साक्षात् देख लेने से भी प्रभु की कृपा बरस जाती है।
इस अद्भुत समागम को सपरिवार निकट
से देखने का सौभाग्य इस बार मुझे भी मिला। श्रद्धा और भक्ति का जनसमुद्र इतना
अनुशासित और विनम्र भी हो सकता है यह मैंने हिमाचल में ही देखा। अहोभाग्य।







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