एक सुखद संयोग बना जब मेरे भाग्य
से आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्रा जी ट्रैफिक जाम में अटक गए और उनकी सहारनपुर से लखनऊ
की ट्रेन छूट गई। अगली ट्रेन कुछ घंटे बाद थी। मित्र मनीष कच्छल जी ने बताया तो
मैंने शाम की चाय पर उन्हें सानुरोध
आमंत्रित किया। साथ में कुछ और कविगण भी पधारे। एक अल्पकालिक कविगोष्ठी हो गयी।
शाम यादगार बन गई। कविश्रेष्ठ का कालजयी गीत बगल में बैठकर सुनने का आनंद ही कुछ
और था। "एक बार जाल और फेंक रे मछेरे..."
शनिवार, 23 नवंबर 2024
बुद्धिनाथ मिश्र जी का कालजयी गीत उनके ही स्वर में, मेरे घर में
सोमवार, 18 नवंबर 2024
नई दिशा में साइकिल से सैर
आज लंबे अंतराल के बाद साइकिल_से_सैर का संयोग बना। मुझे "अति सर्वत्र वर्जयेत" के संदेश का
उल्लंघन करना भारी पड़ गया था। पिछली बार जब साइकिल लेकर निकला था तो आनंद के अति
उत्साह में तय सीमा से अधिक दूर तक चला गया। लौटकर आने के कुछ घंटों बाद रीढ़ की
सबसे निचली हड्डी (टेल-बोन) और आसपास की मांसपेशियों में दर्द महसूस होने लगा जो
रुक रुककर महीनों तंग करता रहा। मजबूरन मुझे साइकिल छोड़कर जमीन पर आना पड़ा।
योगासन, प्राणायाम, ध्यान की कक्षा के
बाद 30-40 मिनट जिम में बिताने की दिनचर्या बन गई।
आज हुआ ये कि जिम में पहुंचा तो
ट्रेनर महोदय नदारद थे। ऐसी स्थिति में अपनी डायरी देखकर खुद ही तय करना होता है
कि किस अंग की मांसपेशी पर वजन डालना है -- यथा पीठ, छाती, पेट, कंधा, बाहें, जंघा, पिंडली, एड़ी, कलाई आदि, और किस प्रकार के वजन से क्या और कितनी
क्रियाएं करनी हैं? इस सबका एक जटिल विधान है जिसे नए लड़के
शायद याद रख लेते होंगे लेकिन मैं इसे याद रखने की कोशिश भी नहीं करता। किसी सुजान
ने सबकुछ डायरी में लिखने की सलाह दी थी जिसका पूरी तरह पालन करता हूं। लेकिन आज
मुझे डायरी खोलने का मन नहीं हुआ। ठंडे मौसम की आमद और सोमवार के कारण जिम में
भीड़ भी बहुत थी। मन हुआ कि आज एक बार फिर से साइकिल से सैर की जाय। मैं फौरन बाहर
निकला और मुख्य सड़क से पुंवारका गांव की ओर
चल पड़ा।
गांव में मुख्य सड़क एक नहर को
काटती हुई सहारनपुर की ओर चली जाती है। इसी नहर की पटरी पर एक पक्की सड़क निकलती
हुई दिखाई दी तो मैने मुख्य सड़क छोड़कर साइकिल उस ओर मोड़ ली। आज किसी नई सड़क पर
जाने का मन था। यह ग्रामीण सड़क सुंदलहेड़ी गांव की ओर जाती है। सड़क के दोनों ओर
समतल उपजाऊ खेतों की छटा दिखी। अधिकांश में धान की कटाई की जा चुकी थी और गेहूं
बोए जाने का काम प्रगति पर था। कुछ खेतों में तो गेहूं के पौधे उग भी आए थे। वही
कुछ खेतों में अभी धान की पराली खड़ी थी। एक खेत में पराली जलाकर छोड़ी हुई थी।
कुछ खेतों में गन्ने की फसल तैयार खड़ी थी। खेती-किसानी के काम में मौसम और मिट्टी
की गुणवत्ता के साथ - साथ किसान की
कर्मठता,
निजी प्रयास और मजदूरों की उपलब्धता की बहुत बड़ी भूमिका है।
अगल-बगल के दो खेतों की फसल की तुलना करने पर इसका स्पष्ट अंतर समझ में आता है।
बहरहाल मैं खेतों और उनकी मेड़ पर
करीने से लगे पॉपलर के पेड़ों की छटा देखते देखते सुंदलहेड़ी गांव को पार करते हुए
दूसरी छोर पर पहुंच गया। कुल 35 मिनट का टाइम सेट कर चुका था जिसमें 20 मिनट बीत
गए थे। मैं वापस मुड़कर गांव के बीच से होता हुआ लौटने लगा। गांव के लोग सुबह की
बेला में सड़क पर ही टहलते मिले। प्रायः सबके हाथ में मोबाइल था और हर दूसरा
व्यक्ति मोबाइल पर सक्रिय था। फोनकॉल, चैटिंग, व्हाट्सएप, रील, फेसबुक,
गेम आदि क्या - क्या नहीं है जो आपका स्क्रीन टाइम बढ़ाता ही जा रहा
है।
गांव के प्रायः सभी मकान पक्के थे।
गांव में किराने के साथ साथ मोबाइल रिचार्ज व एक्सेसरी की दुकानें थीं और एक जनसेवा केंद्र भी था।
पंचायत भवन पर प्रधान पुष्पा देवी और सचिव का नाम लिखा हुआ था। मुख्य सड़क पर ही
प्रधान जी की भव्य कोठी भी आकर्षित कर रही थी। इसे रंगीन कपड़ों की लंबी झालर से
सजाया गया था जो संकेत कर रहा था कि किसी विशेष उत्सव का आयोजन होने वाला है या
हाल ही में हो चुका है।
कई व्यक्ति मुझ जैसे एक अपरिचित को
वहां साइकिल पर देखकर आश्चर्य और कौतूहल से लगभग घूरते हुए अपनी नजरों से ही पीछा
करते दिखे। लेकिन किसी ने टोका नहीं तो मैं भी सिर झुकाए गांव से बाहर निकल आया।
अबतक मोबाइल कैमरा निकालने का विचार कई बार सिर उठा चुका था जिसे मैं दबाता रहा
था। लेकिन अंततः जब गांव से स्कूल के लिए निकल रहे बच्चों का क्रम शुरू हुआ तो
मुझे इस दृश्य ने मोह लिया। पुंवारका में हमारा विश्वविद्यालय तो अभी खुला है
लेकिन यहां नर्सरी स्कूल से लेकर डिग्री कॉलेज तक
बहुत पहले से स्थापित है। वे बच्चे श्री मंगल सिंह मेमोरियल इंटर कॉलेज
पुंवारका की ओर जा रहे थे जिसका मुख्य द्वार नहर की पटरी पर ही है।
कुछ बच्चे पैदल निकले थे जो पीछे
मुड़ मुड़कर किसी संभावित लिफ्ट की तलाश कर रहे थे। मेरे सामने ही एक बाइक वाले को
रोककर दो बच्चे बैठ गए। तीसरा बच्चा हे! हे! की पुकार करता रहा कि उसे क्यों छोड़
दिया। लेकिन बाइक वाला यह बड़बड़ाते हुए चलता बना कि अगली सवारी/ लिफ्ट की
प्रतीक्षा करो। कुछ लड़के और लड़कियां अपनी साइकिल से भी जा रही थीं। एक स्कूटी पर
फर्राटे भरती लड़की कदाचित् अपने छोटे भाई को बिठाकर जा रही थी।
कुछ लड़कियां समूह में पैदल जा रही
थीं लेकिन उन्हें किसी लिफ्ट की तलाश नहीं थीं। प्रायः सिर झुकाए या आपस में बात
करती,
किसी अपरिचित से निगाहें बचाती अपना बस्ता सम्हाले चली जा रही थीं।
यह अंतर प्रकृति प्रदत्त लिंग भेद है या समाज द्वारा सृजित स्वाभाविक व्यवहार है?
इसका निर्णय आप पर छोड़ता हूँ।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
गुरुवार, 14 नवंबर 2024
प्रवृत्ति और निवृत्ति
व्यक्तित्व के गुणों और दुर्गुणों का अच्छा विश्लेषण है। समझने और अनुसरण करने लायक। प्रवृत्ति और निवृत्ति के अवयव।
आलस्य नष्ट करे महत्वाकांक्षा को, गुस्सा नष्ट करे बुद्धिमानी को, भय नष्ट करे सपनों को, अहंकार नष्ट करे उन्नति को, ईर्ष्या नष्ट करे शांति को, संदेह नष्ट करे विश्वास को। इसे उल्टा करके पढ़ें तो भी उतना ही सही है। अब आप तय करें कि आप क्या धारण करना चाहते हैं।
मेरी कोशिश है कि आलस्य, गुस्सा, भय, अहंकार, ईर्ष्या, संदेह आदि का परित्याग करूँ और महत्वाकांक्षा, बुद्धिमानी, सपने, उन्नति, शांति और विश्वास का वरण करके जीवन को सफल बनाऊँ।
गुरुवार, 7 नवंबर 2024
सहारनपुर में छठ पूजा
पूर्वांचल का छठ महापर्व अब अखिल भारतीय स्वरूप ले चुका है। सात समुंदर पार भी डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने का अनुष्ठान देखा जा सकता है। सुदूर पश्चिम सहारनपुर में भी यहां गठित पूर्वांचल सांस्कृतिक सभा ने एक भव्य आयोजन किया। मुझे भी सौभाग्य मिला इस प्रकृति के सामीप्य को रेखांकित करने वाली शक्ति की पूजा में सम्मिलित होने का। जय जय छठ मैया! आप सबका कल्याण करें।



















