एक सुखद संयोग बना जब मेरे भाग्य
से आदरणीय बुद्धिनाथ मिश्रा जी ट्रैफिक जाम में अटक गए और उनकी सहारनपुर से लखनऊ
की ट्रेन छूट गई। अगली ट्रेन कुछ घंटे बाद थी। मित्र मनीष कच्छल जी ने बताया तो
मैंने शाम की चाय पर उन्हें सानुरोध
आमंत्रित किया। साथ में कुछ और कविगण भी पधारे। एक अल्पकालिक कविगोष्ठी हो गयी।
शाम यादगार बन गई। कविश्रेष्ठ का कालजयी गीत बगल में बैठकर सुनने का आनंद ही कुछ
और था। "एक बार जाल और फेंक रे मछेरे..."
जिम में रामधुन, जन्माष्टमी प्रभाव
-
सुप्रभात राम राम
भारत अद्भुत है और हम भारतीय भी आमतौर पर सुबह की सैर ही मुझे रुचती है, लेकिन
बीच-बीच में जिम में भी जाता हूं। जिम में ट्रेडमिल पर चलने...
1 दिन पहले




कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)