रविवार, 31 मई 2026

विश्वविद्यालय परिसर का मोहपाश

आज रविवार को माँ शाकुंभरी विश्वविद्यालय परिसर में सन्नाटा पसरा रहा। छुट्टी के दिन मैं अकेला ही था। अपने आवास में बिस्तर पर लेटा हुआ लखनऊ से किसी समाचार की प्रतीक्षा में था। हाथ में टीवी का रिमोट लेकर  ओटीटी पर विचरण करता रहा। आज मध्यरात्रि को स्थानांतरण की समय सीमा भी समाप्त हो रही है। कल शायद कोई आदेश मिल जाय। इस परिसर में मेरे लिए कुछ ही दिन शेष बचे हैं। सूरज ढल गया तो घर से बाहर निकला। 

आज शाम को परिसर में अकेले टहलते हुए मुझे एक मोहपाश में बंध जाने की अनुभूति हुई। स्वच्छ वातावरण, प्रदूषण रहित भरपूर ऑक्सीजन, नवरोपित पेड़-पौधों की हरियाली में खिलखिलाता उनका बचपन, भीड़भाड़ से बिल्कुल अछूता यह प्रांगण कुछ ही दिनों में मेरे लिए दुर्लभ हो जाएगा। सबकुछ बहुत याद आएगा। 

जब मैंने यहाँ ज्वाइन किया था तो यहां के भवनों की नींव खोदी जा रही थी। लगभग चार साल बाद आज इस परिसर ने एक मोहक छवि प्राप्त कर ली है। प्रशासनिक और अकादमिक भवन, कुलपति आवास के साथ टाइप 5, 4, 3 के आवास बन गए हैं और प्रायः बस भी गये हैं। पक्की सड़कों के किनारे स्ट्रीट लाइट, सोलर लाइट और हाईमास्ट लाइट की सीधी पंक्तियां सूर्यास्त के समय यहां की स्काईलाइन को बेहद आकर्षक रूप दे रही हैं। इसे शब्दों में वर्णन करना कठिन है। आप आज की ताजा तस्वीरों का आनंद लीजिए।
























सोमवार, 6 अप्रैल 2026

प्रयागराज अत्यंत प्रिय है मुझे

पिछले दिनों एक व्यक्तिगत प्रयोजन से मुझे प्रयागराज जाना हुआ। इस शहर की तासीर मुझे एक जादुई मोहपाश में बांध लेती है। मुझे लगता है कि मैंने अपने जीवन में जो कुछ भी अर्जित किया है वह इस तीर्थराज प्रयाग की ही देन है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक व परास्नातक की शिक्षा के बाद अल्पकालिक पत्रकारिता और फिर प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से राजकीय सेवा में चयन का गौरव इसी पावन भूमि पर मिला। कोषाधिकारी के रूप में यहाँ तैनाती हुई तो एक बार फिर लिखने-पढ़ने का सिलसिला नए सिरे से परवान चढ़ने लगा। ब्लॉगरी का नशा ऐसा चढ़ा कि देखते-देखते महाजाल के बड़े लिख्खाड़ों से परिचय हो गया। कई राष्ट्रीय स्तर के सेमिनार आयोजित करने का सौभाग्य मिला और हिंदुस्तानी एकेडमी के सौजन्य से मेरे ब्लॉग के भीतर से एक किताब भी छपकर आ गई। यह सब चमत्कार इसी प्रयागराज ने किया।

अस्तु आज भी जब मुझे प्रयागराज जाना होता है तो मैं यहाँ बहने वाली सरस्वती की धारा से एक तुष्टिकारक आचमन करने का लोभ संवरण नहीं कर पाता। इस बार भी मैं अत्यंत संक्षिप्त अवधि के बावजूद दो विभूतियों से मिला।

यूट्यूब पर सनातन संस्कृति और राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रबल पैरोकार के रूप में प्रतिष्ठित अनुपम मिश्रा जी अपनी निष्पक्ष और निडर टिप्पणियों के लिए जाने जाते है। 'घूमता आइना' (@GhoomtaAaina_AnupamMishra) नाम से इनका बेहद लोकप्रिय यूट्यूब चैनल अपने दर्शकों से कोई सहयोग राशि नहीं मांगता। इसी चैनल पर रोज शाम को साढ़े आठ से नौ बजे के आसपास आप एक लाइव शो लेकर आते हैं जिसका नाम है - लोकतंत्र का नृत्य। राष्ट्रीय राजनीति से लेकर अंतरराष्ट्रीय घटनाओं तक और फिल्मों से लेकर खेल और मनोरंजन तक के विषयों की जैसी ज्ञानवर्धक और सरल समीक्षा आप करते हैं वह मंत्रमुग्ध कर देती है। अच्छे को अच्छा और बुरे को बुरा कहने का साहस आप में कूट-कूट कर भरा है। पॉलिटिकल करेक्टनेस का पाखंड आप नहीं पालते। वोकिज्म और सेकुलरिज्म का कीड़ा आपको बहुत खतरनाक लगता है जिससे बचने की सलाह आप देते रहते हैं। @scribe9104 ट्विटर (अब X ) पर आप की टिप्पणियाँ अक्सर वायरल हो जाती हैं। अनुपम जी से मात्र बीस-बाईस मिनट की भेंट ही मुझे समृद्ध कर गई।

रेलवे स्टेशन पर मैं गाड़ी आने से दस मिनट पहले ही पहुंच गया। यहाँ मुझे Hitesh Kumar Singh जी से मिलने की उम्मीद थी। अपनी रेलवे की व्यस्त नौकरी के साथ साथ वे साहित्य साधना में लगे रहते हैं। प्रयाग-पथ नाम से 'साहित्यिक कला और संस्कृति का संचयन' संपादित और प्रकाशित करते हैं। कुल पांच मिनट की भेंट में उन्होंने मुझे दिसंबर-२०२५ में प्रकाशित प्रयाग-पथ का कृष्णा सोबती पर केंद्रित जन्मशती विशेषांक भेंट किया। इसमें विभूतिनारायण राय का कृष्णा सोबती जी के संबंध में रोचक आलेख प्रमुखता से छपा है। दूसरे संस्मरण और समीक्षाएं भी है। एक संग्रहणीय अंक मेरे हाथ लगा है। आप भी इसे खोजकर पढ़िए। 

इन दो यादगार मुलाकातों की तस्वीर भी लगा देता हूँ। 'अहा इलाहाबाद' से 'प्रिय प्रयाग' तक मेरे लिए जादू है जादू।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी




बुधवार, 25 मार्च 2026

साइकिल से सैर में शहद की मिठास

प्रातःकालीन योगासन व प्राणायाम के ऑनलाइन सत्र के बाद साइकिल से सैर का मन हुआ। सहारनपुर का मौसम आजकल शानदार है। ठंड जा चुकी है और गर्मी अभी आयी नहीं है। बागों में वाकई बहार है। पूरा वसंत है। अमराइयों में अब मंजरी से आम के टिकोरे बनने का मंजर है। खेतों में गेहूं की फसल पकने की तैयारी में है। हरा-भरा खेत अब सुनहले रंग में बदलने लगा है। जैसे प्रौढ़ावस्था में सिर के काले बाल सफेदी की यात्रा शुरू करते हैं तो उनका रंग खिचड़ी सा हो जाता है वैसे ही इस समय गेहूं  की अधपकी फसल हरे और सुनहले रंग की खिचड़ी सा कलेवर ले चुकी है। सरसो प्रायः पक चुकी है और काटी जाने को तैयार है। गन्ना अभी शैशवावस्था में है। इसकी निराई-गुड़ाई और सिंचाई का कार्य प्रगति पर है। पॉपलर की खेती यहाँ बहुत पॉपुलर है। खेत के खेत इसके सीधे खड़े लंबे-छरहरे पेड़ों से अटे पड़े हैं। प्लाईवुड उद्योग का कच्चा माल होता है पॉपलर। इन्हीं पॉपलर के खेतों में साथ-साथ गेहूं या गन्ना भी काट लिया जा रहा है।

सहारनपुर के देहात में उर्वरा भूमि की हरियाली देखते ही बनती है। यहां ग्रामीण क्षेत्र में भी अधिकांश सड़कें पक्की हैं। खेतों के बीच वाले चकरोडों पर भी प्रायः खड़ंजा लगा हुआ है। कच्ची सड़क कम ही मिलती है। साइकिल से सैर के लिए मैं खेतों के बीच गुजरती कच्ची सड़क या पगडंडी की तलाश में रहता हूँ। इस बार मैने विश्वविद्यालय परिसर से निकलकर पुंवारका से सुंदलहेड़ी की राह पकड़ी। सुंदलहेड़ी को पार करके सद्दामाजरा होते हुए घड़कौली की ओर जाने वाली पक्की सड़क पर पहले भी जा चुका हूँ। इस बाद सुंदलहेड़ी से आगे बढ़ा ही था कि बायीं ओर खेतों की ओर जाता एक चौड़ा खड़ंजा मार्ग दिखा। मैने साइकिल उस ओर मोड़ ली। खेतों की घनी हरियाली और फसलों की भीनी सुगंध के बीच मैं मस्त चाल से चलने लगा। यहां ताजा और शुद्ध ऑक्सीजन भरपूर थी।

पुराने खड़ंजे वाली इस सड़क पर ट्रैक्टर ट्रॉली के आवागमन से दो समानांतर नालियों जैसी रचना बन चुकी थी। खड़ंजा भी जहाँ तहाँ ऊबड़खाबड़ हो गया था। लेकिन साइकिल के लिए कोई खास दिक्कत नहीं थी। इसी पर सावधानी से एक दो किलोमीटर तक हिचकोले भरी यात्रा करने के बाद मुझे एक ओर पतली सड़क निकलती दिखाई दी। मैने फौरन उधर का रुख कर लिया।

इस चकरोड पर समकोण के मोड़ जल्दी जल्दी आ रहे थे। तीन-चार मोड़ पार करने के बाद मैने देखा एक खेत के किनारे दो लोग आग सुलगाकर बैठे हुए थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि अच्छी-खासी धूप निकल चुकी है, फिर भी ये लोग आग जला रहे हैं। मैने सोचा शायद कुछ पकाने की तैयारी हो रही होगी। अपनी साइकिल को यथावत गति देता हुआ मैं आगे बढ़ गया। तिरछी नजरों से इतना देख पाया कि वहाँ कोई रसोई नहीं बन रही थी। उन दोनों में से एक नुकीली दाढ़ी वाले प्रौढ़ गृहस्थ थे तो दूसरा एक नौजवान था। उन दोनों ने भी मुझे हैरत से देखा था। मुझे अनुमान हुआ कि उनकी नजरें मेरा दूर तक पीछा करती रहीं। मैं उनकी आंखों से ओझल भी नहीं हो पाया था कि करीब तीन सौ मीटर आगे जाकर एक खेत के कोने पर वह चकरोड समाप्त हो गया। उसके आगे कच्ची पगडंडी थी जिसमें पानी भरा हुआ था। मजबूरन मुझे साइकिल वापस मोड़नी पड़ी। वे दोनों पहले से ही जानते थे कि मैं वापस आऊंगा ही। मेरे उनके पास आने पर नौजवान ने हास्य मिश्रित उत्साह से पूछा- कहां जाओगे जी?

मेरे पास इसका ठीक ठीक एक शब्द में उत्तर नहीं था। मैने अपनी स्थिति स्पष्ट की - यूँ ही साइकिल से घूमने निकला था। माँ शाकुंभरी यूनिवर्सिटी वापस जाने का रास्ता खोज रहा हूँ। इधर से लखनौती जाने वाली सड़क पर जाना चाहता था। इसके लिए शायद थोड़ा आगे जाकर मुड़ना था। लेकिन मैं पहले मुड़ गया और आप लोग मिल गए।

मैने गेहूं के हरे डंठल से बने गट्ठर में सुलगती आग की ओर देखते हुए इशारे में इसका प्रयोजन पूछना चाहा। तभी नौजवान ने एक पॉलीथिन आगे कर दी। इसमें शहद के छत्ते के छोटे-छोटे टुकड़े भरे हुए थे। मुझे समझते देर न लगी कि इन लोगों ने मधुमक्खी के छत्ते तोड़कर शहद निकालने का प्रयास किया है। हरे डंठल में आग सुलगाकर उसके धुएं से मधुमक्खियों को छत्ते से भगाया गया होगा और फिर उनके आशियाने को तोड़कर शहद निकालने की कोशिश की गई होगी। शहद का यह छत्ता खेत के कोने पर ट्यूबवेल की कोठरी के भीतर लगा हुआ था।

मुझे किसी अनुभवी की यह बात याद आई कि शहद निकालने का सही समय कृष्णपक्ष की अमावस्या से पूर्व का होता है। मधुमक्खियों द्वारा शुक्लपक्ष में शहद का ज्यादा उपभोग कर लिया जाता है क्योंकि उजाले में उनके चोरी हो जाने की संभावना रहती है। इसी क्रम में मुझे बताया गया था कि छत्ते में शहद की मात्रा कृष्णपक्ष में अधिक होती है और शुक्लपक्ष में कम। मैने इस मान्यता की पुष्टि के लिए पूछा- बस इतना ही मिला क्या?

नौजवान ने वहां रखी खाली बाल्टी दिखाते हुए कहा - मैं तो यह लाया था शहद ले जाने को लेकिन बहुत थोड़ा ही मिला। इस पन्नी में ही आ गया। फिर उसने पूछा - आप टेस्ट करोगे? उसने पॉलीथिन से एक टुकड़ा शहद का छत्ता निकाला और ध्यान से देखते हुए आश्वस्त किया कि इसमें कोई अंडा-बच्चा नहीं है। शुद्ध शहद ही है। इसे चूसकर देखो।

इस शहद भरे टुकड़े को मुँह में रखकर चूसने का मेरा पहला अनुभव बड़ा ही मीठा रहा। बहुत देर तक मुंह में शुद्ध शहद का स्वाद बना रहा। बाजार में बिकने वाले डिब्बाबंद शहद से बिल्कुल अलग।

उन लोगों ने पूरा परिचय जानने के बाद मुझे गाँव में चलने की दावत दी लेकिन मुझे तो अब लौटना था। समय से तैयार होकर ऑफिस में पहुंचना भी जरूरी था। मैने उनसे वापसी का रास्ता समझा और आगे बढ़ चला। आगे मुझे वह सीधी-सपाट और कच्ची सड़क मिली जो अल्हेड़ी गांव के बगल से होकर लखनौती जाने वाली पक्की सड़क पर पहुंचाती है। पक्की सड़क पर पहुंचते ही मुझे एक जनसेवा केंद्र जैसा कुछ दिखा जिसका साइनबोर्ड बता रहा था कि यहां से विदेश यात्रा संबंधी दस्तावेज बनवाने की सुविधा/ सेवा उपलब्ध कराई जाती है। कदाचित पासपोर्ट और बीजा बनवाने वाले कुछ लोग वहां जमा भी थे।

पक्की और गड्ढामुक्त सड़क मिली तो मेरी चाल भी तेज हो गई। आगे जो गांव मिला उसका नाम था- दतौली मुग़ल। इसके मुहाने पर आते ही सड़क की चौड़ाई आधी हो गई। थोड़ा और आगे बढ़ा तो बनारस की गलियां याद आने लगीं। थोड़ी ही देर में मुझे साइकिल रोकनी पड़ी क्योंकि आगे का रास्ता बेहद संकरा और किसी के घर में जाता हुआ जान पड़ा। वहीं एक घर से लोहे का गेट खोलकर एक लड़का निकला। बिना पूछे ही उसने मुझे उत्तर दिया - आप गलत आ गए हैं। पीछे लौटिए और उस टंकी के बगल से गांव के बाहर-बाहर होकर जाइए तो लखनौती की सड़क फिर मिल जाएगी।

मैने गांव के बाहरी सिरे पर खड़ी पानी की विशाल टंकी को लक्ष्य किया और उस संकरी गली से निकलकर चौड़ी सड़क पर आ गया। टंकी के पास ही बड़ा सा सोलर प्लांट भी लगा हुआ था और बिल्डिंग मटेरियल की बड़ी सी दुकान भी थी। खच्चर जुती हुई एक बग्घी पर सीमेंट की बोरियां लादी जा रही थीं। मैने झटपट टंकी के साथ एक सेल्फी ली। रुककर और फोटो खींचने का विचार मैने त्याग दिया। देर तो हो ही रही थी। इस गांव में अजनबी के रूप में गली - गली भटकते हुए मुझे कई नजरों ने देखा था। अब गांव की हलचल की फोटो खींचते देखकर कोई कुछ गलत समझ बैठे इससे पहले ही निकल लेना मुझे उचित लगा। खामखां रेकी करने का इल्ज़ाम क्यों लगवाता मैं।

हरे-भरे झूमते खेतों और आम के बागों के बीच दौड़ती सड़क से चलकर अंततः मैं लखनौती गांव के तिराहे पर आ गया। चायपान और किराना दुकानों की हलचल और ट्रैक्टर-ट्रॉली, मिनी ट्रक, ऑटोरिक्शा, ई-रिक्शा, बाइक, ठेला, खोमचा आदि की चिल्ल-पों और धूल धक्कड़ के बीच लौटकर मुझे लगा जैसे अचानक दुनिया ही बदल गई। तभी मुझे तीन-चार जोरदार छींकें आईं। उनसे पार पाकर नाक पोंछते हुए मैं अपने विश्वविद्यालय की ओर जाने वाले स्टेट हाईवे पर मुड़ गया।

घर पहुंचने पर दो जोड़ी चिंतातुर आंखे मेरी प्रतीक्षा करती मिलीं। चलते समय श्रीमती जी ने चेताया था कि तीन-चार किलोमीटर से ज्यादा मत चलाइएगा। लेकिन लौटने पर मेरी स्मार्ट वॉच ने 13.6 किलोमीटर का आंकड़ा दर्ज किया था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
















गुरुवार, 15 जनवरी 2026

प्रयाग से पुंवारका का प्रवास

मकर संक्रांति, २०२६

प्रयागराज की पुण्यभूमि ने मेरे जीवन को सवाँरने में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। प्रदेश में सबसे पूरब के जिले कुशीनगर के अपने गाँव से निकलकर उच्च शिक्षा के लिए जब मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पहुँचा था तो एक सुंदर सपना साकार होने की नींव पड़ी थी। मैंने यहीं से प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी की और एक सम्मानजनक सेवा में चयनित हुआ। कालांतर में मुझे यहाँ कोषाधिकारी इलाहाबाद के पद पर कार्य करने का सौभाग्य मिला तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उसी समय अपना एक हिन्दी ब्लॉग-सत्यार्थमित्र-बनाकर उसपर नियमित लेखन करते हुए मैंने सरकारी नौकरी से इतर अपनी एक अलग पहचान बनाई। अनेक स्थानांतरण और पदोन्नतियों के क्रम में मुझे दूसरी बार राजस्व परिषद प्रयागराज में अपर आयुक्त वित्त के रूप में तैनाती मिली तो एक बार फिर मुझे इस शहर की उर्वरा भूमि पर जीवन का सुख उठाने और गंगा-यमुना-सरस्वती के संगम की समृद्ध परंपरा और संस्कृति का रसपान करने का सुअवसर मिला।

प्रयाग में अपनी पुरानी यादों को दुबारा जी लेने के लिए मैं अक्सर अपनी साइकिल से सैर करने निकल जाता था। सौ साल से कहीं अधिक उम्र पार कर चुके पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय परिसर के केंद्र में स्थित वह विशाल वटवृक्ष, उसके आसपास हरेभरे लॉन में बैठकर पढ़ते हुए बच्चे, यहीं पर टहलते हुए अनेक प्रोफेसर और पुराने कर्मचारी मुझे अपने घर के जैसे लगते थे। चंद्रशेखर आजाद उद्यान जो पहले अल्फ्रेड पार्क हुआ करता था वहाँ सुबह शाम सैर करने वालों और योगासन, प्राणायाम, ध्यान और दूसरे व्यायाम करने वालों की भारी भीड़ का एक अलग ही आकर्षण था। इसके अलावा सिविल लाइंस की रंगभरी शाम, अपने विद्यार्थी जीवन की याद दिलाते कटरा के नेतराम चौराहे से गुजरते छात्र-छात्राओं की मस्ती, संगम क्षेत्र की सुहानी सुबह, यमुना नदी का सरस्वती घाट और बड़े हनुमान जी के दर्शन का क्या कहना।

यह सब आनंद दुबारा भोगने का अवसर मिले कुछ ही महीने बीते थे कि मेरी अगली पदोन्नति हो गई और अचानक प्रदेश के सबसे पश्चिमी जिले सहारनपुर में मेरी तैनाती का फरमान निकल गया। मुझे तभी पता चला कि राज्य सरकार ने यहाँ एक नया विश्वविद्यालय खोला था। इसके पहले पूर्णकालिक वित्त अधिकारी के रूप में पदस्थापन का आदेश मिला तो यह मेरे लिए किसी आघात से कम न था। मन में एक तरफ प्यारा प्रयागराज छूटने का दुख था तो दूसरी तरफ अपने गाँव से लगभग एक हजार किलोमीटर दूर आकर अपने परिजनों से बिछड़ जाने की आशंका थी। एक नितांत अपरिचित क्षेत्र और बिल्कुल देहात में एक अविकसित स्थान पर बिना किसी साधन-सुविधा के कार्य प्रारंभ करने की चुनौती तो थी ही। आगे की बात बताने से पहले यहाँ की यादों को सहेजने वाले कुछ चित्र दिखाता हूँ। 












विश्वविद्यालय में प्रथम कुलपति और कुलसचिव की नियुक्ति पहले ही हो चुकी थी। मैंने कुलपति जी से फोन पर बात की तो उन्होंने अत्यंत हर्ष व्यक्त करते हुए मेरा स्वागत किया। उनसे पहली बातचीत में जैसा अपनत्व मैंने महसूस किया वह आजतक इस प्रांगण के साथ एक स्थायी भाव के रूप में बना हुआ है। स्थानांतरण रुकवाने की जब कोई युक्ति काम नहीं आई और पता चला कि मुख्यमंत्री जी का विशेष निर्देश है तो मैंने झट अपना बोरिया बिस्तर बांधा और रेलगाड़ी पकड़कर सहारनपुर आ गया। कुलपति जी ने मुझे ट्रेन से रीसीव करने और सर्किट हाउस में स्थापित करने के लिए एक जिम्मेदार व्यक्ति को लगा दिया था।

जब मैंने माँ शाकुंभरी विश्वविद्यालय में कार्यभार ग्रहण किया उस समय तक शहर से दस-पंद्रह किलोमीटर दूर पुंवारका गाँव में इसकी स्थापना के लिए करीब पचास एकड़ जमीन खरीद ली गई थी। देश के गृहमंत्री और प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा एक भव्य कार्यक्रम में शिलान्यास किया जा चुका था। पैतृक विश्वविद्यालय से सौ करोड़ रुपये मिल चुके थे और कार्यदायी संस्था पी.डबल्यू.डी. के माध्यम से ठेकेदार ने निर्माण कार्य प्रारंभ करने के लिए अपना टीन-टप्पर गाड़ दिया था। करीब सवा दो सौ सम्बद्ध महाविद्यालयों के प्रशासनिक और अकादमिक नियंत्रण का दायित्व विश्वविद्यालय के अधिकारियों पर पहले ही आ चुका था। इन महाविद्यालयों में छात्रों के पंजीकरण, प्रवेश और परीक्षा संबंधी कार्यों का संचालन प्रारंभ हो चुका था। ऑफिस खोलकर तत्काल कार्य प्रारंभ करने के लिए राजकीय महाविद्यालय पुंवारका का अधिग्रहण कर लिया गया था। इस पुराने कॉलेज की बिल्डिंग के पढ़ाने के कमरों में अधिकारियों के कार्यालय बनाए जा रहे थे। ऑफिस स्टाफ के रूप में नजदीकी महाविद्यालयों के कर्मचारी सम्बद्ध किए गए थे। पैतृक विश्वविद्यालय मेरठ से भी कुछ कर्मचारी सप्ताह में एक-दो दिन के लिए आते थे। मुझे भी अपने लिए एक कक्षाकक्ष मिल गया जिसमें कुर्सी मेज डालकर मैंने वित्त अधिकारी का काम शुरू कर दिया।

सर्किट हाउस में रुकने की एक सीमा थी जिसके पूरा हो जाने से पहले मुझे एक किराये का मकान खोजना था। जिलाधिकारी महोदय ने सरकारी आवास उपलब्ध होने पर आबंटन का आश्वासन तो दिया लेकिन पता चला कि वहाँ पहले से ही प्रतीक्षा सूची लंबी थी। मेरी कोशिश थी कि शहर में विश्वविद्यालय से सबसे नजदीक किसी मुहल्ले में सुविधाजनक ठिकाना खोज लूँ। लेकिन दर्जनों मकान देखने के बाद अंततः मुझे ऐसी कॉलोनी में मकान मिला जो विश्वविद्यालय से लगभग बीस किलोमीटर दूर शहर के दूसरे छोर पर थी। बहरहाल अगले ही सप्ताह मैंने प्रयागराज के सरकारी आवास से अपना सामान ट्रक पर लदवाया और सहारनपुर लाकर लंबे अरसे बाद एक प्राइवेट किराये के मकान में अपनी गृहस्थी बसा ली। यहाँ भी आसपास साइकिल से सैर और सार्वजनिक उद्यानों में प्रातःकालीन योगासन प्राणायाम का सिलसिला चल निकला। प्रतिदिन पूरे शहर की सघन ट्रैफिक पारकर विश्वविद्यालय आना और वापस जाना एक अतिरिक्त संघर्ष था। साथ ही मुझे कुछ समय के लिए राजकीय मेडिकल कॉलेज सहारनपुर के वित्त नियंत्रक की जिम्मेदारी अलग से सौंप दी गई जो शहर के तीसरे छोर पर था। लेकिन इस आपदा में मुझे एक अवसर मिल गया। मेडिकल कॉलेज कैंपस में मुझे एक सरकारी आवास मिल गया।

विश्वविद्यालय परिसर के भवनों का निर्माण मंथर गति से चलता रहा। तमाम तकनीकी और व्यावहारिक बाधाओं को पार करते हुए शिलान्यास की तिथि से लगभग चार साल में प्रथम चरण के भवन बनाकर तैयार हुए और अंततः हम नए नवेले कार्यालय में शिफ्ट कर गए हैं। परिसर में बने आवासों में सबसे पहले प्रवेश करने का कीर्तिमान भी मेरे नाम रहा। बाद में माननीया कुलपति जी आयीं। फिर अन्य अधिकारी भी आ गए। इस बीच विश्वविद्यालय से तीन शिक्षा सत्र पूर्ण करके विद्यार्थी स्नातक और स्नातकोत्तर की उपाधियाँ प्राप्त कर चुके हैं। तीन बार दीक्षांत समारोह आयोजित किए जा चुके हैं जिनकी अध्यक्षता महामहिम राज्यपाल द्वारा की जा चुकी है। ये तीनों समारोह विश्वविद्यालय परिसर में प्रेक्षागृह के अभाव के कारण सहारनपुर नगर निगम के प्रेक्षागृह ‘जनमंच’ में आयोजित हुए। इस अवसर पर विश्वविद्यालय की कार्य-परिषद के सदस्यों के साथ एक ही रंग के बंद गले वाले सूट और उसके ऊपर विशिष्ट रंग का उत्तरीय डालकर दीक्षांत समारोह की शोभा-यात्रा में सम्मिलित होना और मंच पर महामहिम की छत्रछाया में बैठकर अत्यंत गरिमामय कार्यक्रम का साक्षी बनना एक अविस्मरणीय गौरव की अनुभूति देकर जाता है।

विश्वविद्यालय में कार्यभार ग्रहण करने से लेकर आजतक बिताया हुआ प्रत्येक दिन मेरे लिए अनेक खट्टे-मीठे अनुभवों से सम्पन्न करने वाला रहा है। मुझे यहाँ बहुत कुछ नया सीखने का अवसर मिला। जीवन भर सहेजकर रखने लायक अनेक अनमोल यादों की थाती मेरे पास जमा हो चुकी है।

वित्त एवं लेखा विभाग की कार्य पद्धति प्रायः नीरस किस्म की होती है। अन्य विभागों को प्रायः शिकायत रहती है कि उनके भुगतान बाधित या विलंबित होते रहते हैं। मैंने अपने पुराने अनुभव की पूँजी का निवेश किया और इस पारंपरिक छवि को बदलने कि भरपूर कोशिश की है। मुझे लगता है कि सीमित संसाधनों के बावजूद मुझे इसमें अच्छी सफलता मिली है। प्रसन्नता की बात यह है कि यहाँ के वातावरण में मुझे कुछ भी तनावग्रस्त करने वाला नहीं मिला।

लेकिन यहाँ मेरी प्रसन्नता के दूसरे कारण अधिक महत्वपूर्ण हैं। उच्च शिक्षा के एक नव-स्थापित संस्थान में खूब पढ़े-लिखे लोगों के बीच कार्य करने का अवसर यहाँ मुझे दूसरी बार मिला। इससे पहले कुछ समय के लिए महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा में रहकर देश-विदेश के अनेक मूर्धन्य विद्वानों, लेखकों, कवियों और साहित्यकारों का सानिध्य मिल चुका था। लेकिन सहारनपुर की बात ही अलग थी। यहाँ तो सबकुछ भविष्य की कोख में था। वर्तमान तो एक गरिमापूर्ण विश्वविद्यालय रूपी विशाल वटवृक्ष के लिए बीजारोपण करने का था। अबतक इस बीज के अंकुरण से लेकर पुष्पन-पल्लवन की प्रक्रिया में सहभागी होने का दुर्लभ अनुभव मुझे बहुत समृद्ध कर गया है।

पिछले तीन-चार वर्ष में बहुत कुछ अच्छा घटित हुआ है। विश्वविद्यालय में दूसरी कुलपति जी की नियुक्ति भी हो गई, कुल सचिव व परीक्षा नियंत्रक भी बदल गए। लेकिन विश्वविद्यालय परिवार की कार्यप्रणाली में वही निरन्तरता बनी हुई है। यहाँ कुलपति जी व अन्य अधिकारियों के साथ बैठकर प्रतिदिन की चुनौतियों का समाधान खोजने की कोशिश, एक टीम के रूप में एक दूसरे का सहयोग करते हुए सामूहिक प्रयास से नित नयी उपलब्धियों के लिए कदम बढ़ाते जाने, सीमित संसाधनों के बावजूद अन्य स्थापित विश्वविद्यालयों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलने और नए-नए बौद्धिक विमर्श में सम्मिलित होकर कुछ नया सीखने-सिखाने का गौरव प्रतिदिन महसूस होता है।


विश्वविद्यालय की आय और व्यय का लेखा-जोखा रखने और अधिनियम में परिभाषित शक्तियों व कर्तव्यों के निर्वहन के दैनंदिन उत्तदायित्व से इतर मुझे यहाँ अनेक उत्कृष्ट कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता करने का लाभ मिला। बौद्धिक संपदा अधिकार के क्षेत्र में उभरते नए रुझान और चुनौतियों पर राष्ट्रीय सेमीनार हो, दिव्यांग जनों को उनके प्रति सहानुभूति से सशक्तता की ओर ले जाने के लिए विचार-गोष्ठी हो, विज्ञान विषय के विद्यार्थियों को सॉफ्ट स्किल सिखाने के लिए विशेषज्ञों की कार्यशाला हो, गीता के संदेश पर विद्वान आचार्य का उद्बोधन हो, या वर्षाजल संचयन की योजना व प्रबंधन विषयक प्रशिक्षण हो; ऐसे विविध अवसरों पर उपस्थित रहकर अपने ज्ञान और अनुभव में वृद्धि करना यहीं पर संभव था। आई.सी.एस.एस.आर. द्वारा प्रायोजित युवा शिक्षकों की क्षमता में अभिवृद्धि के लिए दो सप्ताह तक चलने वाली आवासीय कार्यशाला तो कमाल की थी। दूर-दूर से आए अनेक प्रतिभा के धनी नई पीढ़ी के आचार्यों से बहुत कुछ सीखने को मिला। वर्ष भर चलने वाले अनेक राष्ट्रीय व प्रादेशिक अभियानों व उत्सवों में विश्वविद्यालय की सक्रिय भागीदारी देखने लायक रही। महामहिम राज्यपाल व कुलाधिपति की अद्भुत ऊर्जामयी प्रेरणा से इस नवस्थापित विश्वविद्यालय के बच्चों ने सौ किलोमीटर से अधिक दूरी तक सांस्कृतिक  साइकिल यात्रा करके जनपद के प्रायः समस्त दर्शनीय स्थलों का अध्ययन-भ्रमण किया। इसमें हम भी कुछ देर साथ रहे। एक माह तक चलने वाले योग महोत्सव का वृहद आयोजन पूरे विधि-विधान से सम्बद्ध महाविद्यालयों और विश्वविद्यालय परिसर में हुआ। इसमें हमने भी योगाचार्यों से बहुत कुछ सीखा। स्थानीय स्तर पर आंगनवाणी केंद्रों को गोद लेकर वहाँ के बच्चों और कार्यकर्त्रियों व सहायिकाओं को संबल प्रदान किया गया। स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में पंजीकृत लगभग अस्सी तपेदिक रोगियों के पोषण के लिए खाद्य सामग्री की व्यवस्था विश्वविद्यालय द्वारा की गई। इसमें हमने भी पुण्यलाभ अर्जित किया।

प्रधानमंत्री जी की अनेक महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक स्टार्ट-अप इंडिया को दृष्टि में रखते हुए हमारे विश्वविद्यालय में एक इनक्यूबेटर की स्थापना की गई जो इस क्षेत्र के लिए बिल्कुल नई उपलब्धि है; और एक विशिष्ट अवसर भी। इसके लिए सबसे पहले कंपनी अधिनियम के सेक्शन-8 के अंतर्गत एक गैर-लाभार्जनकारी कंपनी बनी जिसका नाम हुआ- “एमएसयू एकेडेमिक फाउंडेशन”।  इस कंपनी ने अंबिका (AMBIKA) नाम से एक इनक्यूबेटर की स्थापना की है। यह इनक्यूबेटर नव-उद्यमियों के लिए उनके स्टार्ट-अप्स को एक सफल उद्यम के रूप में स्थापित करने में तकनीकी और आर्थिक सहायता प्रदान करेगा। अनेक सरकारी व गैरसरकारी संस्थाओं, उद्यमों, निगमों व मंत्रालयों से संपर्क साधा गया है, एम.ओ.यू. हस्ताक्षर किए गए हैं। कंपनी के सी.ई.ओ. की नियुक्ति की जा चुकी है। इनके द्वारा ‘अंबिका’ की सफलता के लिए अथक प्रयास किए जा रहे हैं। मुझे कंपनी के निदेशक मण्डल का सदस्य होने का सुअवसर भी यहीं मिला है। इस उपक्रम की गतिविधियों में सम्मिलित रहकर मुझे भी बहुत कुछ नया सीखने-समझने को मिल रहा है।

सहारनपुर की भौगोलिक स्थिति इतनी विशिष्ट है कि यहाँ से उत्तरप्रदेश के मैदान में रहते हुए उत्तराखंड व हिमांचल प्रदेश के सुरम्य पहाड़ी स्थलों के भ्रमण का आनंद अत्यंत सुलभ है, हरिद्वार, ऋषिकेश जैसे तीर्थस्थलों का पुण्यलाभ बहुत सुगम है, गंगोत्री-यमुनोत्री और बद्रीनाथ-केदारनाथ का तीर्थाटन भी कठिन नहीं है, और देहरादून, दिल्ली और चंडीगढ़ घूमकर आने का सुभीता भी है। माँ शाकुंभरी मंदिर का शक्तिपीठ पूरे देश के तीर्थयात्रियों के लिए भले ही दुर्गम हो, हमारे लिए तो यह घर के बगल जैसा ही है। मैंने तो दोपहर के बाद यहाँ से शिवालिक की सुरम्य पहाड़ियों में जाकर चाय पी है और लौट आया हूँ। चकराता से ऊपर चिरमिरी टॉप पर जमी बर्फ देखकर और देववन की जमी हुई झील और बर्फ से ढके पहाड़ी ढाल पर उछल-कूद करके एक ही दिन में वापस आ गया हूँ। इतनी विविधता से भरे हुए अनुभव और कहाँ मिलने वाले थे। यहाँ के कार्यकाल ने सच में जिंदगी बदल दी।

मेरे लिए यहाँ गौरव के अनेक क्षणों में एक था विश्वविद्यालय के लिए कुलगीत की रचना का सौभाग्य। तेजस्विनावधीतमस्तु के ध्येय-वाक्य के चयन से लेकर विश्वविद्यालय के प्रतीक चिह्न (Logo) की तैयारी में सक्रिय भाग लेना और उसके बाद माँ शाकुंभरी की कृपा से कुलगीत के शब्दों का संवाहक बन जाना एक अकथनीय आत्मीय आनंद का अनुभव दे गया। राग हंसध्वनि में स्वरबद्ध किए गए कुलगीत में विश्वविद्यालय के ध्येय-वाक्य, मूल संदेश, लोक-संस्कृति, और जन-आकांक्षाओं को समाहित करने का प्रयास किया गया है। विश्वविद्यालय के स्थापना-दिवस की प्रथम वर्षगांठ पर आयोजित समारोह में इसका लोकार्पण किया गया। महामहिम के हाथ से इसकी रचना के लिए प्रशस्ति-पत्र और पुरस्कार पाना मेरे लिए एक दैवीय अनुकंपा ही थी। इसके संगीतबद्ध गायन को सुनकर मेरा रोम-रोम माँ शाकुंभरी की कृपा और माँ सरस्वती के आशीर्वाद को महसूस करके खिल उठता है। अहोभाग्य मेरा।



सहारनपुर जिले के उत्तरी छोर पर पुंवारका के ग्रामीण क्षेत्र में राजकीय विश्वविद्यालय की स्थापना और प्रथम चरण के निर्माण के पूरा हो जाने के बाद यह परिसर अब मन को मोह ले रहा है। यद्यपि अभी चुनौतियाँ समाप्त नहीं हुई हैं और इसे अभी लंबा सफर तय करना है लेकिन अब यहाँ के पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और लोग-बाग जाने-पहचाने से लगने लगे हैं। अनेक विद्वान प्रोफेसर मेरे मित्र बन गए हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विख्यात योगाचार्य, लोकप्रिय कवि, मूर्धन्य साहित्यकार, उत्कृष्ट वैज्ञानिक, कर्मठ कृषि-विशेषज्ञ, प्रसिद्ध पर्यावरणविद्, सफल उद्योगपति, राष्ट्रीय पदक प्राप्त खिलाड़ी और संवेदनशील जन-प्रतिनिधि, इन सबसे मिलने-जुलने और आत्मीय परिचय बढ़ाने का अवसर मुझे यहाँ मिला है। कृतज्ञ हूँ मैं इस धरती का। इस दैवीय भावभूमि का। माँ शाकुंभरी की प्रेरणा और कृपा के बिना यह संभव नहीं था।

एक सरकारी नौकर के लिए स्थानांतरण एक सामान्य बात है जो असामान्य अनुभव देकर जाता है। मेरी पदोन्नति हो चुकी है इसलिए फिर से स्थानांतरण हो जाएगा। इस परिसर के शुद्ध ऑक्सीजन का लाभ कुछ ही दिनों तक ले पाऊँगा। फिर एक नई चुनौती होगी और उसके आनंद का अवसर भी। चरैवेति चरैवेति।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी 

वित्त अधिकारी