हिंदी भाषा को साहित्य के सभागार
के बाहर निकलकर, मनोरंजन के मंच से नीचे उतरकर और राजनीति के रण को पीछे
छोड़कर व्यावहारिक जीवन के लिए उपयोगी ज्ञान, विज्ञान और
कामकाजी संचार का वाहक बनना होगा तभी इसे सच्ची प्रतिष्ठा मिल सकेगी। आज आवश्यक है
कि मात्र कविता, कहानी, गीत, चुटकुलों और गोष्ठियों की भाषा से अधिक हिंदी का प्रयोग उच्च शिक्षा के
विविध पाठ्यक्रमों हेतु मौलिक विषय-वस्तु तैयार करने में, वाणिज्य,
उद्योग व व्यवसाय का संचालन करने में तथा सरकारी कार्यालयों से लेकर
उच्च व सर्वोच्च न्यायालय के कार्यों को निष्पादित करने में सहजता से हो सके इसके
लिए गंभीर प्रयास किए जाएं। अभी इन सभी प्रतिष्ठानों में अंग्रेजी की प्रधानता है।
एक विद्वान प्रोफ़ेसर, प्रतिष्ठित
वैज्ञानिक, एक सफल वकील, चार्टर्ड
एकाउंटेंट, बैंकर, उच्च पदस्थ नौकरशाह,
कॉर्पोरेट प्रबंधक और ऐसे अन्यान्य पेशेवर कार्य हिंदी की परिधि से
अभी भी प्रायः बाहर ही हैं। हिंदुस्तान की आजादी के अमृतकाल में भी अच्छी नौकरी
पाने और इसे ठीक से निभाने के लिए अंग्रेजी के प्रयोग में कुशलता को प्रायः
अनिवार्य मान लिया गया है।
रोजगार के मोर्चे पर हिंदी भाषा के
अच्छे जानकार भी हीनता ग्रंथि के शिकार हो जाते हैं। संघ लोक सेवा आयोग की
प्रतिष्ठित परीक्षा के परिणाम भी इस ओर संकेत करते हैं। दूसरी तरफ हम देखते हैं कि
देश की विशाल जनसंख्या में हिंदीभाषी ही सर्वाधिक हैं। इन्हें वृहद उपभोक्ता के
रूप में देखने वाली कंपनियां अपने उत्पादों के प्रचार-प्रसार के लिए लुभावने
विज्ञापन हिंदी में ही देती हैं। उत्पाद की पैकेजिंग भी हिंदी में करती हैं। टीवी
पर हिंदी चैनलों की टीआरपी अंग्रेजी वालों से बहुत आगे है। हिंदी अखबारों का
प्रसार भी अंग्रेजी से अधिक है। लेकिन इन सबका कार्यालय व व्यवसाय अंग्रेजी के
माध्यम से चलता है। हिंदी की पैठ वहाँ भी क्यों नहीं हो सकती?
निश्चित ही हिंदी के उन्नयन की
संभावना अपार है। हिंदी का भला चाहने वाले यदि इसके सामर्थ्य को बढ़ाकर इसे वास्तव
में कामकाज की भाषा बना सकें तो यही हिंदी की सच्ची सेवा होगी।
सभी हिन्दी प्रेमियों को ढेरों
बधाई और हार्दिक शुभकामनाएँ। 🎉💐💕
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) वित्त
अधिकारी,
मां शाकुम्भरी विश्वविद्यालय सहारनपुर



