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Sunday, October 8, 2017

जी.एस.टी. के भ्रष्टाचारी अवरोध

“साहब, यह काम हो ही नहीं पाएगा।” एक सप्ताह की प्रतीक्षा के बाद पधारे ठेकेदार ने कार्यालय में घुसते ही अपनी असमर्थता जाहिर कर दी।
अरे, आप जैसा होशियार और सक्षम ठेकेदार ऐसी बात कैसे कह सकता है? मैंने तो सुना है आप बहुत बड़े-बड़े ठेके लेकर सरकारी काम कराते रहते हैं। तमाम सरकारी बिल्डिंग्स और दूसरे निर्माण और साज-सज्जा के काम आपकी विशेषज्ञता मानी जाती है।
“वो बात ठीक है, लेकिन अब सरकारी काम करना बड़ा मुश्किल है। इस जी.एस.टी. ने सबकुछ बर्बाद कर दिया है। आप बिना रसीद मांगे कैश पेमेन्ट कर दीजिए तो एक दिन में ही आपका काम करा दूंगा। लेकिन आपको पक्की बिल चाहिए तो कोई तैयार नहीं होगा।” यह सुनकर मेरा सिर चकरा गया। यशवन्त सिन्हा ‘शल्य’ की बातें इसके बाद मीडिया में आयीं तो मेरे कान खड़े हो गये।
अब जी.एस.टी. पर मचे घमासान और छोटे दुकानदारों, व्यापारियों और ठेकेदारों की त्राहि-त्राहि देखकर मन चिन्तित हो गया है। बड़े उद्योगपति शायद ज्यादा परेशान नहीं हैं। उन्हें इस नयी व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाने में शायद कोई बड़ी दिक्कत नहीं है। मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ। मुझे इस योजना की बारीक बातों की अच्छी समझ नहीं है। इसलिए इसके पक्ष या विपक्ष में तनकर खड़ा होने के बजाय मैं धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करना चाहूंगा। इस बीच मैंने अपने कार्यालय में बैठकर जी.एस.टी. के प्रभाव का जो रोचक अनुभव किया है उसे साझा कर रहा हूँ।
हुआ ये कि नये शहर के नये कार्यालय में काम शुरू करने पर मुझे कुछ अवस्थापना सुविधाओं को अपने हिसाब से संशोधित परिवर्द्धित करने की आवश्यकता महसूस हुई। कंप्यूटर, इन्टरनेट, कुर्सी, टेबल-ग्लास, स्टेशनरी इत्यादि की व्यवस्था तो थोड़ी-बहुत जद्दोजहद से सुदृढ हो गयी लेकिन मेरे कार्यालय कक्ष से सटे हुए विश्राम-कक्ष को मन-माफ़िक बनाने में मुझे सफलता नहीं मिल रही है। दरअसल एक ही बड़े हाल में स्थित इस कक्ष को कार्यालय से अलग करने के लिए एल्यूमिनियम के ढांचे में काँच या फ़ाइवर की शीट लगाकर दीवार नुमा घेरा बनाया गया है जो अर्द्ध-पारदर्शी है। इस दीवार के जिस ओर प्रकाश अधिक रहता है वह दूसरी ओर से साफ़ दिखायी देता है। अधिक प्रकाशित हिस्से में बैठने वाला दूसरी ओर नहीं देख सकता जबकि उसे दूसरी ओर से देखा जा सकता है। इस प्रकार उत्पन्न असहज स्थिति से बचने के लिए पूरे घेरे पर कपड़े के पर्दे लटकाये गये हैं। लेकिन इन पर्दों पर धूल बहुत जल्दी-जल्दी जमा होती है जिसे साफ़ करते रहना बहुत टेढ़ा काम है। धूल से एलर्जी होने के कारण मुझे इनके संपर्क में आते ही लगातार छींकना पड़ जाता है और नाक से पानी आने लगता है।
धीरे-धीरे मेरे भीतर इन पर्दों के प्रति असहिष्णुता का भाव पैदा हो गया है। पर्दों के स्थान पर मैंने इस काँच की दीवार पर अपारदर्शी वाल-पेपर लगवाने का मन बनाया है लेकिन जी.एस.टी. की व्यवस्था ऐसा होने नहीं दे रही है। ठेकेदार कह रहा है कि कोई भी दुकानदार वाल-पेपर की बिक्री ‘एक-नम्बर’ में करने को तैयार नहीं है। अर्थात वह इस बिक्री को अपने लेखा-बही में प्रदर्शित नहीं करना चाहता क्योंकि इसके लिए जरूरी पंजीकरण कराने व ऑनलाइन टैक्स जमा करने की प्रक्रिया से वह जुड़ा ही नहीं है। उसके पास जो माल है वह भी बिना रसीद के ही खरीदा गया है। इसलिए उसे इसपर कोई इनपुट टैक्स-क्रेडिट नहीं मिलने वाला। उसने बताया कि इस प्रकार के बहुत से काम हैं जो पूरी तरह कैश लेन-देन पर ही चलते हैं जो अब जी.एस.टी. के बाद अवैध हो गये हैं। अब कोई ठेकेदार भी उन सामानों को नगद खरीदकर सप्लाई नहीं कर सकता क्योंकि वह अपने लेखे में इसकी खरीद दिखाये बिना इसकी बिक्री या आपूर्ति को जायज नहीं ठहरा सकता।
इस बात से मुझे व्यापारिक गतिविधियों में निचले स्तर पर होने वाली बड़े पैमाने की टैक्स-चोरी की एक झलक दिखायी दे गयी जिसपर लगाम लगाने का ठोस उपाय शायद इस जी.एस.टी. में ढूँढ लिया गया लगता है। यह उपाय कुछ वैसा ही है जैसा नोटबन्दी और डिजिटल लेन-देन के माध्यम से कालेधन पर लगाम लगाने का उपाय किया गया था और जिसे अब प्रायः असफ़ल मान लिया गया है। जिनके पास अघोषित आय का नगद धन मौजूद था वे इसे बचाने के लिए किसी न किसी प्रकार इसे अपने या दूसरों के बैंक खातों में जमा कराने में सफ़ल हो गये। नोटबन्दी के राजमार्ग के किनारे जो चालू खाते, पेट्रोल-पम्प, विद्युत-देय, अन्य शुल्क-टैक्स आदि जमा करने के काउन्टर और दो लाख की सीमा वाली छूट के सर्विस-लेन बना दिये गये थे उसपर जोरदार ट्रैफ़िक चल पड़ी और अधिकांश कालाधन बैंकों में जाकर मुख्यधारा में शामिल हुआ और सफ़ेद हो गया। ऐसे बिरले ही मूर्ख और गये-गुजरे धनपशु होंगे जो अपना पुराना नगद नोट बदलकर नया नहीं कर पाये होंगे। नोटबन्दी की आलोचना करने वाले भी यह नहीं कह पा रहे थे कि इसने आयकर की चोरी पर लगाम लगाकर अच्छा नहीं किया।

साभार : http://news24online.com/know-why-implementing-gst-is-still-a-long-road-ahead-2/

ऐसे में यह निष्कर्ष निकलता है कि भ्रष्टाचार मिटाने और शुचिता बढ़ाने की अच्छी से अच्छी योजना भी क्रियान्वयन के स्तर पर जाकर उसी भ्रष्टाचार और बेईमानी की भेंट चढ़ जाती है जिसे यह रोकने चली थी। उल्टे उसमें छोटे व गरीब वर्ग का जीवन-यापन बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। दिहाड़ी मजदूर या कामगार तो दिन में जो कमाता है वही रात में खाता है। यदि किसी दिन उसका काम रुक गया तो शाम को फ़ांके की नौबत आ जाती है। यही हाल छोटे व्यापारियों और दुकानदारों का जी.एस.टी. के लागू होने के बाद हो गया लगता है। वे साफ़-साफ़ यह तो कह नहीं सकते कि अबतक उनका धन्धा टैक्स की चोरी के कारण चोखा हुआ करता था जो चोरी अब मुश्किल हो गयी है, लेकिन नयी व्यवस्था से उपजे दर्द को वे दूसरे तरीकों से व्यक्त तो कर ही रहे हैं।
हमारे समाज में भ्रष्टाचार का रोग इतना सर्वव्यापी हो गया है कि इसे बुरी चीज बताने वाले भी अवसर मिलते ही इसका अवगाहन करने में तनिक देर नहीं लगाते। जबतक हम केवल दूसरों से ईमानदारी और सत्यनिष्ठा की अपेक्षा करते रहेंगे और स्वयं मनसा-वाचा-कर्मणा इसके लाभ उठाने को उद्यत रहेंगे तबतक हम किसी नोटबन्दी, जी.एस.टी. या अन्य कड़े उपायों से भी अपेक्षित फ़ल की प्राप्ति नहीं कर सकते।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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