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Saturday, May 27, 2017

बारिश में भींगने की अधूरी ख़्वाहिश

आज सुबह की नींद टूटी बादलों के गर्जन से। उठकर बाहर देखा तो आसमान में उनकी आवाजाही हो रही थी। काले बादल कम थे, हवा में ठंडक भी कम थी। फिर भी माहौल बाहर की सैर के लिए आकर्षित कर रहा था। मैंने साइकिल चलाते हुए भींगने की तैयारी कर ली। जेब में एक पॉलीथिन की थैली रख ली। धुलने के लिए तैयार एक पैंट और एक पूरे बाँह की पुरानी टीशर्ट पहनकर निकल पड़ा। गार्ड ने टोका - बारिश आ सकती है, भींग जाएंगे तो मैंने बताया- इसीलिए तो जा रहे हैं।
राजकीय कॉलोनी से गौरा बाजार चौराहा और वहाँ से परशदेपुर जाने वाली सड़क पर भुएमऊ गाँव की ओर जाना मेरा पसंदीदा रास्ता है। हल्की धूल भरी हवाएं उठने लगीं थी और सड़क के किनारे वाले मकानों के लोग दरवाजे पर पानी छींटने का काम स्थगित करने लगे थे, महिलाएँ झाड़ू लगाकर कूड़े को समेटने का काम जल्दी-जल्दी करने लगी थीं। चाय-पान की दुकानों का बाहर फैला सामान समेटा जाने लगा था और छोटू नौकर कोयले के ढेर को प्लास्टिक से ढंकने लगा था।
रायबरेली पी.ए.सी. परिसर से आगे बढ़ने के बाद हरियाली मिलने लगती है। इस सड़क पर पहले एक प्रायः सूख चुके प्राकृतिक नाले पर बना पुराना जीर्ण-शीर्ण पुल और उसके बाद पानी से लबालब भरी इंदिरा-नहर का ऊँचा पुल मिलता है। यहाँ साइकिल से चढ़ाई करने के लिए पहले से गति बढ़ानी पड़ती है जो टीएमटी (Tread Mill Test) का मजा देती है। पुल के दूसरी ओर की लंबी ढलान साइकिल पर सुस्ताने और साँसे स्थिर करने में पार हो जाती है। यहाँ सड़क के दोनो ओर पंक्तिबद्ध खड़े हरे-भरे पेड़ आँखों को शीतलता से और फेंफड़ों को ताजी ऑक्सीजन से भर देते हैं।
अभी आसमान में तैरते बादलों ने हवा में शीतलता की अतिरिक्त आपूर्ति कर रखी थी। पुल पर पहुँचा तो कुछ बड़ी-बड़ी जल्दबाज किस्म की बूँदें बादलों से छिटककर नीचे आने लगीं थीं। जैसे कुछ बच्चे छुट्टी की घंटी लगने से पहले ही क्लास से बाहर निकल आते हैं या कुछ बाराती खाने के औपचारिक संकेत से पहले ही प्लेट उठाकर सलाद निकालने लगते हैं। इन शुरुआती बूंदों का हश्र गर्म मिट्टी में समाकर धूल की पोटली बन जाना था या पक्की सड़क पर पटकी जाकर क्षत-विक्षत हो जाना था। यहाँ किसी सीप के मुंह में समाकर मोती बनने का सौभाग्य कहाँ! थोड़ी ही देर में मेरी सफ़ेद टीशर्ट पर गन्दे पानी के छींटों जैसे निशान पड़ने लगे। यह पहली बारिश की बूंदों के साथ वायुमंडल में तैरती धूल और धुंए की कालिख का मिश्रण था। मुझे बचपन में सुनी पिताजी की बात याद आ गयी कि सीजन की पहली बरसात में नहीं नहाना चाहिए। इससे फोड़ा-फुंसी निकलता है। अम्ल-वर्षा का भय सिर उठाने लगा तो मैंने उसे फौरन मटिया दिया और आगे बढ़ गया।
भुएमऊ गांव के शुरू होने से पहले कांग्रेस पार्टी का गेस्ट हाउस पड़ता है। इसके गेट पर बना संतरी-पोस्ट वीरान लग रहा था। कभी इसके सामने सड़क के दोनो तरफ चाय-पान की दो-तीन दुकानें हुआ करती थीं जिसपर प्रायः चहल-पहल रहती थी। लेकिन आज देखा तो एक दुकान का छप्पर जमीन पर गिरकर उजड़ चुका है और दूसरी दुकान की भठ्ठी भी मानो महीनों से ठंडी पड़ी हुई है। शायद दुकानदारी न चल पाने से इन लोगों ने कोई और धंधा अपना लिया हो। गेस्ट-हाउस के भीतर लगे असंख्य पेड़ इसकी ऊँची चारदीवारी के ऊपर से भी हरे-भरे और लहलहाते दिख रहे थे।
मैं गाँव की ओर आगे बढ़ा तो बादलों से टपकने वाली मोटी बूँदों की संख्या बढ़ने लगी। एक चाय की दुकान पर कोयले की भठ्ठी लहक रही थी और तीन-चार लोग अंदर शरण ले चुके थे। एक आदमी बाहर की बेंच पर बैठा टोकरी भर प्याज लेकर उसे छील-काट रहा था। यह पकौड़ी छानने की तैयारी थी। तभी हवा तेज हुई और बूंदे अब बौछार बनकर बरसने लगीं। प्याज काटता आदमी भी अंदर आ गया।
इस बीच मेरी चाय और मठरी मेरे सामने आ चुकी थी। वहाँ मौसम की चर्चा में इस बात पर मतभेद सामने आया कि अभी गर्दा उठेगा कि सिर्फ पानी गिरेगा। एक बुजुर्ग ने फैसला दिया कि सुबह के वक्त गर्दा नहीं उठेगा और पानी भी कम ही है इन बादलों में। मतलब धरती अभी प्यासी ही रहने वाली है। चाय खत्म कर पैसे देने के बाद मैंने जेब से पॉलीथीन निकालकर उसमें अपना पर्स और मोबाइल सुरक्षित किया और उसे पिछली जेब में खोंसकर अधकचरी बारिश के बीच साइकिल लेकर चल पड़ा। मेरी यह गतिविधि वहाँ बैठने वालों की आँखों में कौतूहल भर रही थी।
मैंने गांव के दूसरी छोर तक साइकिल ले जाकर वापस मोड़ लिया। सड़क लगभग भींग चुकी थी। तबतक गांव के भीतर से और पीछे के गांवों से आनेवाले साइकिल सवार विद्यार्थियों की आवाजाही शुरू हो गयी थी। शहर की ओर बस्ता लेकर जाने वालों में मुझे लड़कों से ज्यादा लडकियां दिखीं। कुछ लड़के तो सिर्फ एक कापी दबाये जाते दिखे।
वापस लौटते हुए मैं ऊँचे पुल पर रुका। तबतक रही-सही बारिश भी रुक चुकी थी। मेरी बारिश में सराबोर भींगने की इच्छा तो पूरी नहीं हो सकी लेकिन मौसम खुशगवार हो चुका था। इधर-उधर दुबके हुए विद्यार्थी शहर की ओर जाने लगे थे जो बहुत खुश लग रहे थे। इस खूबसूरत मौसम की कुछ झलकियाँ अपने मोबाइल कैमरे में कैद कर लाया हूँ। देखिए और आप भी खुश हो जाइए।













(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Thursday, May 25, 2017

ऑर्टीमिसिया और ओडीएफ़ गाँव की खोज


आजकल की भीषण गर्मी के मौसम में बाहर की ठंडी हवा खानी हो तो सबेरे अंधेरा छटते ही निकल लीजिए। जॉगिंग करनी हो, टहलना हो अथवा किसी उद्यान में बैठकर गप्पे लड़ाना हो या योगासन करना हो। प्रातःकाल के एक-दो घंटे ही राहत देने वाले हैं। आज मैंने भी कई दिनों बाद हवाखोरी के लिए बाहर निकलने का मन बनाया। साथ में मेरी प्यारी साइकिल भी थी।
हम अपनी कॉलोनी से जेलरोड होते हुए स्टेडियम के आगे जाकर रायबरेली पुलिस लाइन्स के बगल से मटिहा रोड पर आगे बढ़े और दो-तीन गांवों को पार करते हुए सई नदी के पुल तक गये। खेतों से गेहूँ की फसल कट चुकी है। हरियाली के नाम पर नेनुआ, तरोई, कद्दू, लौकी, खीरा, ककड़ी आदि सब्जियों वाले इक्का-दुक्का खेत मोर्चा सम्हाले हैं। सूखते हुए तालाबों की सतह पर जमी हुई काई भी हरी-भरी थी। एक जगह पिपरमिंट का खेत भी दिखा, और उसके बगल में करीब तीन फीट ऊँची झाड़ीनुमा फसल की कटाई होती दिखी। इसे पहले तो मैंने भांग का झाड़ समझा लेकिन करीब जाने पर कुछ अलग प्रकार का पौधा लग रहा था। उत्सुकतावश मैंने यहाँ साइकिल रोक दी।
अपने परिवार की महिलाओं के साथ यह फसल काट रहे किसान ने इसका नाम 'अल्टीमिसिया' बताया। बता रहे थे कि इसकी पत्तियों से बुखार की दवा बनती है। एक महिला ने बताया कि इसे सुखाकर बोरे में भरा जाएगा और ट्रक से मध्यप्रदेश के रतलाम भेजा जाएगा। (सागर विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर Dr Siddhartha Mishra जी के अनुसार इसका सही नाम Artemisia है।) मैंने उन लोगों से और बात की तो पता चला कि सूखी हुई पत्तियों के लिए 3400 रूपये प्रति क्विंटल का दाम किसान को मिलेगा। डेढ़ बीघे के इस खेत से करीब पंद्रह क्विंटल माल तैयार होगा। तीन-चार महीने में तैयार हो जाने वाली इस फसल से करीब 50000 रू. मिलेंगे। मैं यह नहीं पूछ सका कि पूरी लागत छांटने के बाद मुनाफा कितना होता होगा। कोई जानकार इसपर प्रकाश डाले।
गांव के लोग सुबह के धुंधलके में उठकर सिर्फ टहलने के लिए नहीं निकलते। अनेक जरूरी काम इस ठंडे समय में करना होता है। सब्जी के खेतों की निराई-गुणाई, बकरी चराना, पशुओं के लिए हरे चारे की व्यवस्था, गोबर व अन्य अपशिष्ट बाहर के घूरे तक पहुंचाने का काम इसी समय होता है। इसके साथ ही एक काम जो सभी पुरुष और महिलाएं, बच्चे, बूढ़े, जवान, लड़के, लड़कियां, सास और बहू, मालिक और नौकर इस समय करते हुए दिखे वह था बहु-प्रचारित ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम को मुँह चिढ़ाना।
खुले में शौच करने की परंपरा को शतप्रतिशत बन्द करने की महत्वाकांक्षी योजना (ODF) का लेशमात्र प्रभाव भी मुझे लाला का पुरवा, कोल्वा और इब्राहिमपुर जैसे गांवों में नहीं दिखा। बड़े और पक्के मकानों से भी हाथ में बोतल या लोटा लिए खेतों की ओर जाते या वापस लौटते लोग दिखे। शुरुआत में महिलाओं और लड़कियों की संख्या अधिक थी और बाद में पुरुषवर्ग ज्यादा दिखा। सई नदी के तटपर जाने वालों को पानी ले जाने की भी जरूरत नहीं थी। इक्कीसवीं सदी के राइजिंग इंडिया को शर्मसार करती कुछ तस्वीरें छोड़े जा रहा हूँ। निजता की मर्यादा के समादर में महिलाओं के चेहरे अलक्षित हैं।





















सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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