हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Wednesday, September 21, 2016

महानन्दपुर की तंग गलियों के दुधारू पशु

कई दिनों बाद आज सुबह सैर को निकला। बरामदे में खड़ी साइकिल कई दिनों से शिकायत कर रही थी। इसे छोड़कर मैंने दुबारा बैडमिंटन खेलना शुरू कर दिया था। नये बॉस को कम्पनी देने के बहाने मैंने डॉक्टर की सलाह को मटिया दिया था। अपने मन की दबी इच्छा को यह बहाना मिलते ही मैंने हवा दे दी। अब घुटने की तकलीफ़ को नी-सपोर्ट बांधकर दबा देता हूँ और रात के दस बजे तक खेल कर स्टेडियम से वापस आता हूँ।
ऐसे में सुबह साइकिल से सैर करना मुश्किल हो गया। लेकिन आज मैं खुद के लिए नहीं बल्कि साइकिल का मन रखने के लिए निकल पड़ा।
एक और बात यहाँ बताता चलूँ। जब मैंने स्वास्थ्य कारणों से साइकिल खरीदी थी तो बैडमिंटन के एक साथी खिलाड़ी ने विनोद किया था कि "दो-चार दिन बाद जब आप बोर होकर साइकिल खड़ी कर देंगे और इसे बेच देने का विचार बनाएंगे तो मुझे सबसे पहले बताइयेगा। मुझे एक सेकेण्ड-हैण्ड साइकिल खरीदनी है।" उनकी यह बात भी मुझे चुनौती जैसी लगती है।
तो आज मैंने सिर्फ टोकन साइक्लिंग की। अपनी कॉलोनी से निकलकर इन्दिरा उद्यान के सामने से महानंदपुर की ओर गया। यह मुहल्ला बिल्कुल गाँव जैसा है। सरकारी कॉलोनी से सटा हुआ है इसलिए यहाँ की आर्थिक गतिविधि इससे जुड़ी हुई है। सरकारी बंगलों व अन्य आवासों में झाड़ू-पोछा-बर्तन की काम वालियाँ इसी बस्ती से निकलती हैं। अपना परिवार लखनऊ, इलाहाबाद या अन्यत्र छोड़कर रायबरेली में नौकरी करने वालों के कुछ घरों में खाना बनाने वाली भी यहीं से जाती हैं। इस मुहल्ले में दुग्ध व्यवसाय भी खूब फल-फूल रहा है। यहाँ छोटी-बड़ी अनेक डेयरियां दिखी जहाँ डब्बा लिए अनेक शहराती बुजुर्ग और बच्चे दूध नपवाने की प्रतीक्षा करते दिखे। बाकी घरों में भी इक्का-दुक्का दुधारू पशु जरूर दिखे।
मेरी नजर फिर एक बार गाय और भैंस के रहन-सहन के बीच दिखने वाले भारी अंतर पर टिक गयी। गायें जहाँ साफ-सुथरे स्थान पर नहा-धुलाकर बांधी गयी दिख रही थीं वहीं भैसों के लिए मानो जान-बूझकर नरक कुण्डों की रचना की गयी थी। घुटने तक कीचड़ और गोबर के दलदल में खड़ी या एक-तिहाई शरीर उसी में डुबाकर बैठी हुई भैंस आराम से पगुरी करती दिखी।
बड़ा अंतर है जी - गाय और भैंस में। मेरे एक संपन्न रिश्तेदार की छोटी बेटी ने कहीं नाले में लोटती भैंस को देख लिया था। तबसे उसने भैंस का दूध पीना छोड़ दिया। आज वह बड़ी होकर विश्वविद्यालय में पढ़ रही है लेकिन भैंस के दूध से मेल अभी भी नहीं हो सका है। यह सुनकर मुझे पहले तो आश्चर्य हुआ था लेकिन अब लगता है कि बच्ची की सोच में कोई लोचा नहीं था।









सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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Monday, September 19, 2016

यही समय है आँखें खोलो (गीत)

एक अंग्रेजी व्हाट्सएप सन्देश से प्रेरित ताज़ी रचना
यही समय है आँखें खोलो
जब इस दुनिया से चल दूंगा, तुम रोओगे नहीं सुनूंगा
व्यर्थ तुम्हारे आँसू होंगे, तब उनको ना पोछ सकूंगा
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मेरी खातिर जी भर रो लो
यही समय है आँखें खोलो
मेरे पीछे तुम भेजोगे गुलदस्तों में फूल सजाकर
उनकी महक व्यर्थ जाएगी, छू न सकूंगा हाथ बढ़ाकर
बेहतर है तुम अभी यहीं पर फूलों वाली खुशबू घोलो
यही समय है आँखें खोलो

जब न रहूँगा इस दुनिया में मुझपर अच्छी बात करोगे
वह सराहना सुन न सकूंगा चाहे जितने भाव भरोगे
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मुझे सराहो मुझे भिगो लो
यही समय है आँखें खोलो

प्राण पखेरू उड़ जाने पर सारी गलती माफ़ करोगे
जान नहीं पाऊंगा वह सब जैसा भी इंसाफ करोगे
बेहतर है तुम अभी यहीं पर पाप मेरे निज मन से धो लो
यही समय है आँखें खोलो

जब न मिलूंगा आसपास तो कमी खलेगी तुमको मेरी
पर महसूस कहाँ होगा तब ढँक लेगी जब नींद घनेरी
बेहतर है तुम अभी यहीं पर मिस करते हो खुलकर बोलो
यही समय है आँखें खोलो

इस दुनिया से लेकर हमको चल देगा जब काल हमारा
पछताओगे कितना कम था मेरे संग जो समय गुजारा
बेहतर है तुम अभी यहीं पर साथ-साथ जीवन में हो लो
यही समय है आँखें खोलो

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
ये है मूल रचना
*"When I'll be dead.....,*
*Your tears will flow,..*
*But I won't know...*
*Cry for me now instead !*

*You will send flowers,..*
*But I won't see...*
*Send them now instead !*

*You'll say words of praise,..*
*But I won't hear..*
*Praise me now instead !*

*You'll forget my faults,..*
*But I won't know...*
*Forget them now, Instead !*

*You'll miss me then,...*
*But I won't feel...*
*Miss me now, instead*

*You'll wish...*
*You could have spent more time with me,...*
*Spend it now instead !!"*
Moral......
Spend time with every person you love,
Every one you care for.
Make them feel special,
For you never know when time will take them away from you......

(भावानुवाद : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Friday, September 2, 2016

भूएमऊ के प्राथमिक स्कूल और ज्ञान मन्दिर

भुएमऊ गांव में ही बात-चीत करते आठ बज गये। इसका भान मुझे तब हुआ जब सड़क किनारे की दो-तीन दुकानों को मिलाकर खोले गये सरस्वती ज्ञान मंदिर (अंग्रेजी माध्यम) नामक प्राइवेट स्कूल के बच्चे प्रार्थना के लिए खड़े मिले। उनके सर, मैडम और मिस लोग सामने खड़े होकर प्रेयर और नेशनल एंथम का पाठ करा रहे थे। सड़क और स्कूल भवन के बीच की जमीन ही बच्चों के लिए प्ले-ग्राउंड और असेंबली के लिए प्रयुक्त होती है। आवश्यक अवस्थापना सुविधाओं से वंचित इस स्कूल को पता नहीं नियमानुसार मान्यता मिली भी है या नहीं; लेकिन वहाँ बच्चों की अच्छी संख्या यह बता रही थी कि स्थानीय अभिभावकों ने इस स्कूल को सरकारी प्राथमिक पाठशाला से बेहतर मान रखा है। मैंने ज्ञान मंदिर की प्रार्थना समाप्त होने के बाद अपना मोबाइल जेब में रखा और साइकिल आगे बढ़ा दिया।
ज्ञान मंदिर से महज सौ मीटर की दूरी पर सड़क के दूसरी तरफ परिषदीय प्राथमिक और जूनियर स्कूल का बड़ा सा परिसर है। अनेक क्लास-रूम और दूसरी सुविधाओं से लैस इस प्रांगण की बाहर से तस्वीर लेने के लिए मैंने इसके जूनियर सेक्शन के गेट के सामने साइकिल रोक दी।
अंदर दो-चार बच्चे खाकी कपड़ों में इधर-उधर घूमते दिखे। गेट पर चार-पाँच लड़कियां खड़ी होकर आपस में बात कर रही थीं। मुझे मोबाइल निकालकर फोटो खींचता देखकर वे अंदर की ओर चली गयीं। मेरे इस प्रश्न को अनसुना करते हुए कि 8:10 बजे भी वे गेट पर क्या कर रही हैं। तभी अंदर से मुझे किसी ने फोटो लेते देखा और दौड़कर स्कूल की घंटी बजा दी। करीब एक दर्जन बच्चे 'प्राथना' के लिए इकठ्ठा होने लगे। इस बीच दो बच्चियां गेट से बाहर आती दिखीं जिन्हें शायद सामूहिक प्रार्थना में कोई रुचि नहीं थी।
सरकारी और निजी स्कूलों का यह कंट्रास्ट सड़क से ही देखने के बाद मैं वापस रायबरेली शहर की और चल पड़ा जो करीब छः किलोमीटर दूर था। रास्ते में शहर की ओर जाते बड़े विद्यार्थी और कामगार अपनी साइकिलों पर दिख रहे थे। लेकिन मेरी दृष्टि शहर की ओर से देहात की ओर आती सवारियों पर टिकने लगी। करीब बीस स्त्रियां और पुरुष शहर की ओर से आते हुए ऐसे मिले जिन्हें देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि ये किसी सरकारी प्राथमिक पाठशाला के शिक्षक होंगे।
स्कूटी पर सवार शिक्षिकाएँ साड़ी या सूट में सलीके से नख-शिख ढकी हुई, बड़े से हैंडबैग में टिफिन और छाता सम्हाल कर रखे हुए चली जा रही थीं। कुछ अपने पति या किसी और की बाइक के पीछे बैठी थीं। सबकी वेश-भूषा से पता चलता था कि वे अच्छे वेतन का सुख ले रही हैं।
मुझे रास्ते में पुरुष शिक्षकों ने भी क्रॉस किया होगा लेकिन उनकी अलग से पहचान का कोई लक्षण मुझे नहीं सूझा। लेकिन यह प्रश्न जरूर सूझ रहा था कि आठ बजे खुलने वाले स्कूलों के ये शिक्षक साढ़े आठ बजे के आसपास अभी रास्ते में हैं तो वहाँ बच्चों की प्रार्थना कैसे होगी और भगवान उनका कल्याण कैसे करेंगे, माँ सरस्वती उन्हें ज्ञान का वरदान कैसे देंगी।





सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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Thursday, September 1, 2016

भूएमऊ गाँव की गन्दी भैंसें और भली गायें

आज साइकिल लेकर रायबरेली से परसदेपुर मार्ग पर भुएमऊ गांव के उस पार तक गया। बल्कि उससे भी आगे जहाँ रायबरेली विकास प्राधिकरण वालों ने एक स्वागत द्वार बनवा रखा है। इसके ऊपर हिंदी और उर्दू में एक सन्देश लिखा है - "राजी ख़ुशी खैरियत से रहिए"। पता नहीं क्यों लोग इतनी सरल बात नहीं समझते और नाराजगी में दुःखी रहा करते हैं।
भुएमऊ गाँव की एक विशेषता सभी जानते हैं। कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया जी के संसदीय क्षेत्र का विश्राम स्थल यहीं है। भुएमऊ गेस्ट हॉउस की ड्योढ़ी उनके प्रवास के समय बड़े-बड़े सत्ताधिपतियों और उम्मीदवारों के माथा टेकने की गवाह होती है।
इस गाँव की दूसरी विशेषता जो मैंने आज देखी वह है- पारंपरिक ग्रामीण जीवनशैली का प्रायः अपरिवर्तित रूप। शहर के समीप होने के बावजूद इस गाँव में बहुत कुछ एक दूर-दराज के पिछड़े देहात जैसा ही दिखा। प्रायः प्रत्येक घर के सामने एक-दो गाय या भैंस बधी मिली और उनके आसपास कीचड़ और गन्दगी का अंबार भी मिला। पक्के कुँए भी दिखे जिनके ऊपर फिट की गयी पुल्ली और रस्सी यह गवाही दे रहे थे कि कुँए का पानी प्रयोग भी किया जाता है।
मैं रुककर तस्वीर लेने लगा तो गमछा लपेटे कुछ लोग कौतूहल वश मुझे घेरकर खड़े हो गये। मैंने करीब एक फिट गहरे कींचड़ में खड़ी भैंस को इंगित कर पूछा कि ऐसे में यह आराम कैसे कर पाती होगी तो नंगे बदन वाले एक आदमी ने बताया - भैंस को तो जितना ही कींचड़ और पानी मिले उतना ही अच्छा है। यह इसी में लोट-पोट कर आराम भी करती है और खाती-पीती भी है। मेरे लिए यह कल्पना करना कठिन हो रहा था कि इसके पालक कीचड़ के बीच ही रखे नाद में चारा डालने कैसे जाते होंगे और दूध कैसे दूहते होंगे। उस आदमी ने यह भी बताया कि गाय को आराम से बैठने के लिए सूखी जमीन चाहिए लेकिन भैंस तो कैसे भी रह जाती है।
मुझे इस बात पर अपने गाँव का वह दृश्य याद आ गया जो मैंने इस रक्षाबंधन के दिन अपने अति संक्षिप्त प्रवास के दौरान देखा था। दो-तीन दिनों की बारिश के बाद उस दिन तेज धूप निकली थी, ऊमस और गर्मी अपने चरम पर थी। दोपहर में जब मैं वहाँ पहुँचा तो घर में पिताजी को न पाकर बाहर के बैठके में गया। वहाँ पता चला कि गायों के आराम करने की जो मड़ई है उसकी फ़र्श पर ईंटों का खड़ंजा लगाया जा रहा है। पिताजी स्वयं इस कार्य में लगे हुए थे। दरवाजे का सेवक और मेरे भाई साहब सहयोगी की भूमिका में थे। उन्हें पसीने से तर-बतर देखकर मैंने पूछा कि कोई मजदूर क्यों नहीं लगा लिए। वे बोले- गो-सेवा का काम मजदूर के भरोसे नहीं होता। अपना हाथ लगाना ही पड़ता है।
मैंने भुएमऊ वालों से वहाँ की गन्दगी और जनसुविधाओं के अभाव को इंगित करते हुए पूछा कि यह तो वीआईपी गांव है, सोनिया जी का? उसने छूटते ही प्रतिवाद किया कि सोनिया जी कभी इस गेस्ट हाउस से एक कदम भी आगे गांव में आयीं हो तो बताइए। इसपर मेरा ध्यान उस घर के द्वार पर स्थापित अम्बेडकर जी की प्रतिमा की ओर चला गया जिसे किसी तारावती जी ने स्थापित किया था। वहाँ लगा पत्थर बता रहा था कि वे किसी जिला-जज के ड्राइवर की पत्नी हैं।
मैंने पूछा - अभी भी कुँए का पानी पीते हैं आपलोग? उन्होने सकुचाते हुए बताया कि नहीं, पीने के पानी के लिए एक सरकारी नल है। उसी से सबका काम चलता है। कुँए का पानी जानवर पीते हैं और हम लोग नहाते-धोते हैं।
इसके बाद मैंने लौटते हुए रुक-रुककर सड़क किनारे बंधे हुए कई पशुओं की तस्वीर ली। बछड़े, बछिया, बैल, भैंस, घोड़ा और घोड़ागाड़ी व बैलगाड़ी भी। सबकुछ इस गाँव में ही मिला। एक जगह तो गाय और भैंस एक ही फ्रेम में मिल गये। गाय एक नीम के पेड़ के नीचे थी जिसकी जड़ पर रंग-बिरंगी झंडियाँ लगी थीं। शायद किसी देवी माँ का स्थान था। भैंस एक मड़ई में खड़ी पगुरा रही थी जिसके पैर गंदे कींचड़ में डूबे हुए थे। आगे बढ़ा तो सड़क किनारे बंधे अनेक पशुओं में लाल-गेरुए रंग की दो सुन्दर गायें भी दिखी। साथ में उनका एक बछड़ा भी दूध पीता हुआ। आप तस्वीरें देखिए। लिखकर कितना बताऊँ।























(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)