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Monday, May 16, 2016

पेंशन तो देना बनता है...!

शत्रुघ्न सिंह चौहान गुजरात राज्य सरकार के सिंचाई विभाग में नौकरी करते थे। उनकी 1976 में छंटनी हो गयी। फिर किसी सरकारी निगम में पुनः सेवायोजित होकर 1991 में सेवानिवृत्त हुए। सरकार इन्हें पेंशन मंजूर करती इसके पहले ही 08 अगस्त 1992 को मृत्यु हो गयी। उनकी विधवा पत्नी अपने पुत्र के साथ गुजरात से अपने गाँव मूल निवास स्थान रायबरेली वापस आ गयी। विभाग ने पति की मृत्यु के बाद 1994 में पेंशन स्वीकृत भी की तो उसमें पत्नी के नाम पारिवारिक पेंशन नदारद थी। पति के जीवनकालीन पेंशन का भुगतान 1994 में ही पत्नी और पुत्र को बराबर-बराबर करने के बाद कोषागार ने पत्रावली बंद कर दाखिल दफ़्तर कर दी।
अब 22 साल बाद गुजरात सरकार ने पारिवारिक पेंशन स्वीकृत कर आदेश ए.जी. के माध्यम से कोषागार रायबरेली को भेज दिया है जिसमें पिछले आदेश का सन्दर्भ देते हुए उसके आगे का भुगतान एरियर सहित करने का प्राधिकार दिया गया है। इधर बाइस साल से बंद हुई फ़ाइल मिल नहीं रही है और न ही उसका किसी इंडेक्स रजिस्टर में कोई उल्लेख मिल रहा है। ऑफिस का लगभग पूरा स्टाफ इसकी तलाश के लिए एक-एक इंच खंगाल चुका है। उस समय जिस लेखाकार ने अंतिम भुगतान किया था वे सेवानिवृत्त होकर हाल ही में स्वर्गीय हो चुके हैं। उनका हस्ताक्षर पेंशनर द्वारा दिखाई जा रही उसके पास सुरक्षित पुरानी कॉपी में दिख रहा है।
अस्सी की उम्र पार कर चुकी अपनी माँ की पेंशन के लिए अहर्निष भाग-दौड़ कर रहे रामहर्ष जी ने बताया कि गुजरात के सैकड़ों चक्कर लगाने के बाद भी जब विभाग ने अम्मा की पेंशन नहीं दी तो मैं तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से उनके जनता दरबार में मिला। उन्होंने पूरी बात सुनने के बाद जाँच बैठा दी। जाँच में पता चला कि कर्मचारी द्वारा भरे गए पेंशन प्रपत्र में पत्नी का नाम मौजूद होने के बावजूद विभाग द्वारा उनके नाम से पारिवारिक पेंशन स्वीकृत नहीं की गयी थी। इस चूक के लिए जिम्मेदार कर्मचारी और उसका उच्चाधिकारी दोनो निलंबित कर दिये गये हैं। उनकी बहाली तबतक नहीं हो सकेगी जबतक वे यह प्रमाणपत्र न प्रस्तुत कर दें कि पीड़ित विधवा को समस्त बकाया पेंशन का भुगतान कर दिया गया है। रामहर्ष ने कहा कि मुझे अपनी माँ की पेंशन से ज्यादा उन दो परिवारों की फिक्र हो रही है जहाँ कई महीनों से वेतन नहीं जा रहा है।
अब मुझे कार्यालय के पुराने अभिलेख की अनुपलब्धता की स्थिति में भी यह भुगतान ताजे प्राधिकार पत्र के आधार पर करना है। मुझे इतने लंबे संघर्ष की कहानी झूठी नहीं लग रही है। भगवान का नाम लेकर विश्वास करने का जी चाहता है।
अस्तु, मैंने आज यह निर्णय सुनाया कि आप अपनी माँ को लेकर आइए, वैयक्तिक पहचान दो पक्के गवाहों (पेंशनर) के माध्यम से कराइए और यह पूरी कहानी एक शपथ-पत्र के माध्यम से प्रस्तुत कराइए। बैंक खाते का विवरण भी साथ लाइए ताकि भुगतान की कार्यवाही पूरी कर प्रमाणपत्र निर्गत किया जा सके।
अब आगे जो होगा देखा जाएगा।
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
www.satyarthmitra.com

3 comments:

  1. आज की बुलेटिन विश्व दूरसंचार दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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  2. इस चूक के लिए जिम्मेदार कर्मचारी और उसका उच्चाधिकारी दोनो निलंबित कर दिये गये हैं। उनकी बहाली तबतक नहीं हो सकेगी जबतक वे यह प्रमाणपत्र न प्रस्तुत कर दें कि पीड़ित विधवा को समस्त बकाया पेंशन का भुगतान कर दिया गया है।

    यह अच्छा किया गया है, नहीं तो पेंशन अभी भी नहीं मिलता.
    पेंशन के लिए तमाम नियम हैं कि जिस दिन कर्मचारी सेवा निवृत्त हो उसी दिन उसका निपटारा हो जाए और पेंशन मिल जाए, परंतु सिस्टम आंखें मूंदे ही पड़ा रहता है. मुझे भी साल भर बाद पेंशन चालू हुई, और अभी ताज़ा घटना है कि उत्तमार्ध के कॉलेज में एक सेवा निवृत्त प्रोफ़ेसर की पेंशन डेढ़ साल से उलझी पड़ी है.

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  3. नमस्ते मेरा नाम सागर बारड हैं में पुणे में स्थित एक पत्रकारिकता का स्टूडेंट हूँ.

    मेंने आपका ब्लॉग पढ़ा और काफी प्रेरित हुआ हूँ.

    में एक हिंदी माइक्रो ब्लॉग्गिंग साईट में सदस्य हूँ जहाँ पे आप ही के जेसे लिखने वाले लोग हैं.

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    या क्या आप वहां पे सदस्य बनकर ऐसे ही लिख सकते हैं?

    #भारतमेंनिर्मित #मूषक – इन्टरनेट पर हिंदी का अपना मंच ।

    कसौटी आपके हिंदी प्रेम की ।

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    जय हिन्द ।

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