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Thursday, May 12, 2016

सोच की बदलती दुनिया (कहानी)

स्टेशन पहुँचने पर उसे पता चला कि आज राजधानी एक्सप्रेस दो घंटे विलम्ब से चलेगी। इसके रूट पर कोई मालगाड़ी डिरेल हो गयी थी। दिल्ली में एक ऑफ़िस से दूसरे ऑफ़िस का चक्कर लगाते हुए कब सुबह से शाम हो गयी इसका पता ही नहीं चला। दिन भर चिलचिलाती धूप और गर्मी में भटकना था इसलिए उसने वापसी के लिए एसी बर्थ रिज़र्व कराया था ताकि थकान मिट सके। अब उसे दो घंटे प्लैटफ़ॉर्म पर बिताने थे।
उसने अपना बैग उठाया और एसी वेटिंग हॉल की ओर चल पड़ा। हॉल के बाहर एक वेंडर से उसने चाकलेटी क्रीम बिस्कुट का पैकेट ख़रीदकर बैग में डाल लिया और हाल के गेट पर रखे रजिस्टर में अपना विवरण दर्ज करके भीतर आ गया। हॉल अपेक्षाकृत ठंडा था, लेकिन सभी सोफ़े और कुर्सियाँ भरी हुई थीं। उसने चारो ओर बारीकी से नज़र दौड़ाई तो एक टू-सीटर सोफ़े पर एक बुजुर्ग़ अकेले ही बैठे हुए दिखायी दिए जिन्होंने अपना बैग बग़ल में रखा हुआ था। वह तेज़ क़दम बढ़ाकर उस सोफ़े तक पहुँचा और इशारे में बुजुर्ग से इजाज़त लेकर उनका बैग नीचे रखकर सोफ़े पर बैठ गया। सामने दीवार पर टंगी टीवी पर आईपीएल का मैच चल रहा था।
थोड़ी देर बाद उसे भूख महसूस हुई। दिन-भर की भागदौड़ में उसे इतना भी ख़याल न रहा कि कुछ खा-पी ले। उसने नीचे रखे बैग से बिस्कुट का पैकेट निकाला और खोलकर खाने लगा। बग़ल में बैठे बुजुर्ग ने उसे बड़े ग़ौर से देखा और अपनी निगाहें बिस्कुट पर टिका दीं। जब उसने एक बिस्कुट निकालकर मुँह में डाला तो बुजुर्ग की अपलक दृष्टि उसके हाथ का अनुसरण करते हुए नीचे बिस्कुट के पैकेट से उठकर उसके मुँह तक गयी। बुजुर्ग ने सहसा अपना हाथ बढ़ाया और एक बिस्कुट निकालकर मुँह में डाल लिया। उसने हैरत से बुजुर्ग की ओर देखा तो उसने मुस्करा भर दिया। संकोचवश वह कोई और प्रतिक्रिया न कर सका।
उसके बाद हुआ ये कि उस बुजुर्ग ने बड़े आराम से उसकी गति से गति मिलाते हुए एक-एक बिस्कुट निकाल कर खाने शुरू कर दिए। जब वह एक बिस्कुट निकालता तो बुजुर्ग भी एक निकाल लेता। बारी-बारी से दोनों एक-एक बिस्कुट निकालते और खाते रहे। उसका मन यह सोच कर परेशान तो हो रहा था कि यह कैसा निर्लज्ज आदमी है, बिना पूछे हाथ बढ़ाकर भकोसे जा रहा है। लालची भुक्खड़ कहीं का। लगता है दिमाग़ से थोड़ा खिसका हुआ है; लेकिन प्रकट रूप में वह कुछ नहीं कह सका। यह सोचकर कि शायद इसे ज़्यादा भूख लगी हो... लेकिन कम से कम एक बार याचना तो करनी चाहिए थी... मैं मना तो कर नहीं देता।
हद तो तब हो गयी जब आख़िरी बिस्कुट बच रहा। वह थोड़ी देर के लिए असमंजस में पड़ गया, लेकिन उस विचित्र आदमी ने बिना अवसर गँवाए इत्मिनान से आख़िरी बिस्कुट भी उठा लिया; लेकिन मुँह में डालने से पहले रुका, उसके दो बराबर टुकड़े किए और एक टुकड़ा इसे थमा दिया। पैकेट ख़त्म हो जाने के बाद वह बुजुर्ग उठ खड़ा हुआ और बिना कोई शब्द बोले चला गया। सोफ़े पर अकेला बैठा हुआ यह युवक सोचने लगा कि दिल्ली में ऐसे बेग़ैरत इंसान भी होते हैं। मान न मान मैं तेरा मेहमान...! चल के घर वालों को बताऊँगा। ऑफ़िस में भी चर्चा करूँगा। अपने लखनऊ वाले तो सुनकर सिर पीट लेंगे।
उसकी भूख अभी मिटी नहीं थी। हाल के गेट से बाहर वह वेंडर दिख रहा था। उसने अपना बैग सोफ़े पर रखा और दौड़कर गेट तक गया और बिस्कुट का दूसरा पैकेट ले आया। वापस आकर उसने दो-चार बिस्कुट खाए और पानी की बोतल निकालने के लिए बैग की जिप खोली। बैग में हाथ डालते ही उसका माथा ठनका। उसके हाथ में बिस्कुट का पहला पैकेट टकराया जो उसने बैग में रख छोड़ा था। ओ माय गॉड... इसका मतलब जो पैकेट हम दोनों ने ख़त्म किया वह उस बुजुर्ग का ही था... उफ़्फ़, लगता है ग़लती से मैंने उसके बैग में हाथ डालकर वैसा ही पैकेट निकाल लिया था। क्या-क्या सोच लिया मैंने उस सज्जन के बारे में...! लेकिन क्या शानदार आदमी था वो...! कितना दरियादिल, सहिष्णु, धैर्यवान और शांतचित्त...
अब सिर पीट लेने की बारी उसकी थी। ग़लतफ़हमी का ख़ुलासा होने पर उसकी सोच की दुनिया ही बदल चुकी थी।
(व्हाट्सएप्प पर प्राप्त एक अंग्रेज़ी आलेख से प्रेरित)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
www.satyarthmitra.com

3 comments:

  1. ऐसे ही पता नहीं कितने संस्मरण हमारे जीवन को अनुभवों से भरते हैं।

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  2. https://bnc.lt/m/GsSRgjmMkt

    निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
    बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।

    बात मात्र लिख भर लेने की नहीं है, बात है हिन्दी की आवाज़ सुनाई पड़ने की ।
    आ गया है #भारतमेंनिर्मित #मूषक – इन्टरनेट पर हिंदी का अपना मंच ।
    कसौटी आपके हिंदी प्रेम की ।
    जुड़ें और सशक्त करें अपनी हिंदी और अपने भारत को ।

    #मूषक – भारत का अपना सोशल नेटवर्क

    जय हिन्द ।

    https://www.mooshak.in/login

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  3. बहुत सुन्दर लेख .....विचारणीय

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