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Wednesday, January 21, 2015

एक रुबाई एक ग़ज़ल (तरही नशिस्त से)

रुबाई
हर शाख हरी भरी महकते हैं फूल
जो साथ मिले तेरा चहकते हैं फूल 
लहरा जो गयी हवा तेरा आँचल सुर्ख
पाकर के जवाँ अगन दहकते हैं फूल
ग़ज़ल
आज ये हादसा हो गया
प्यार मेरा जुदा हो गया
बंदगी कर न पाया कभी
यार मेरा ख़ुदा हो गया
आप ने तो जिसे छू लिया
वो ही सोना खरा हो गया
सूखता जा रहा था शजर
तुमने देखा हरा हो गया
आदमी ख़्वाब में उड़ रहा
जागना बेमज़ा हो गया
भाइयों की जुदा ज़िन्दगी
दरमियाँ फासला हो गया
गोद में जिसने पाला कभी
आज वो भी ख़फा हो गया
उसकी उंगली पकड़ के चले
बस यही हौसला हो गया
जब सियासत में रक्खा क़दम
देखिये क्या से क्या हो गया
है सियासत बड़ी बेवफ़ा
दोस्त बैरी बड़ा हो गया
राजधानी में छायी किरन
केजरी क्या हवा हो गया

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
www.satyarthmitra.com

5 comments:

  1. खूब ..... सामायिक और प्रभावी पंक्तियाँ

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  2. सब अपना अपना फायदा देखते हैं वही किरण बेदी ने भी किया अब दोस्त , दोस्त न रहा ! मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

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  3. क्या बात है! क्या बात है! वाह!

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  4. बहुत खूब .. सामयिक शेर ... लाजवाब ग़ज़ल ...

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  5. सूखता जा रहा था शजर
    तुमने देखा हरा हो गया...क्या खूब ..वाह ..

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