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Monday, December 22, 2014

फासले बढ़ रहे जिंदगी में (तरही ग़जल)

(बह्‍र : फाइलुन फाइलुन फाइलुन फ‍अ)

फासले बढ़ रहे जिंदगी में
दूरियाँ हो गयीं आदमी में

चल पड़े हैं कहीं से कहीं हम 
ज़ानेजाँ बस तिरी आशिक़ी में

इश्क में डूबने की न पूछो
हुस्न देखा किया चाँदनी में

फूल भी, ख़ार भी मोतबर हैं
हुस्न पोशीदा है हर किसी में

नाज़-नख़रे उठाये बहुत से
फ़र्क़ आया नहीं बेरुख़ी में

बेख़ुदी में सनम उठ गए हैं
ये क़दम अब तिरी आशिक़ी में

काम था तो बड़ा मुख़्तसर ही
हो न पाया मगर काहिली में

आदमी आम कहता था खु़द को
सादगी तो न थी सादगी में

या इलाही बचा पाक दामन
जिस्म को घूरती देहलवी में

तू सितमगर अगर हो गया तो
ख़ुद भी तड़पेगा बेचारगी में

वाह रे जिंदगी की कहानी
तिश्‍नगी ही बची ज़िन्दगी में

हर किसी को बराबर न समझो
फर्क है आदमी आदमी में

शायरी में सितम है रुबाई
बह्‍र में या बधें हथकड़ी में

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
www.satyarthmitra.com

 

Friday, December 19, 2014

रुबाई की आजमाइश

तरही नशिस्त में उस्ताद जी ने चुनौती दी रुबाई कहने की। शायरी में रुबाई छंद कठिन माना जाता है। इसमें बीस-बीस मात्राओं की चार लाइनें कहनी होती हैं जिनकी पहली, दूसरी और चौथी लाइन की तुक (काफिया) समान होता है। सभी लाइ्नों में मात्राओं का क्रम (बह्‍र) एक समान रखना होता है और चारो लाइनों में अभीष्ठ बात पूरी (मुकम्मल) करनी होती है। उस्ताद द्वारा उदाहरण स्वरूप एक लाइन (मिसरा) समस्या के रूप में दे दी जाती है। उसी रूप और गुण वाली चार लाइने तैयार करके रुबाई पूरी होती है। मुझे जो मिसरा मिला उसकी बहर और उनके घटक (औजान) भी बताये गये जो निम्नवत्‍ है-

कुछ लोग बुरा भला मुझे कहते हैं
मफ़ऊल मफाइलुन मफाईलुन फअ
फलफूल सुफूलफल सुफलफलफल फल

इसके आधार पर जो रुबाई मेरे द्वारा कही गयी उसे उस्ताद ने पास कर दिया है। लीजिए आप भी शौक फरमाइए -

-1-
कमज़ोर सदा नज़र झुकी रखते हैं
कमज़र्फ बहुत सितम किया करते हैं
इक रोज बड़ी सज़ा मिलेगी उनको
जो लोग बुरा भला इन्हे कहते हैं

*
-2-
इक नजर तिरी उथल पुथल करती है
पुरजोर कशिश महक महक जाती है
सब लोग चकित पलट पलट तकते हैं
जो आग बुझी लहक लहक उठती है

**

-3-
वह रोज बहुत मरा मरा कहता था
प्रभु नाम वही जपे चला जाता था
यह बात हुई कि जो कभी रहजन था
वह संत बना अमर कथा रचता था

***

मुझे पता है कि आप हौसला आफ़जाई तो करेंगे ही। नया-नया फितूर है। आपकी दाद से ही यह परवान चढ़ेगा। Smile

(इस मौके पर जो ग़जल कही गयी वह अगली पोस्ट में।)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
www.satyarthmitra.com