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Wednesday, January 29, 2014

यह रिपोर्ट विचलित करती है

आज के अखबार में ये विचलित करने वाले आंकड़े देखने को मिले- भारत में गरीब घरों के वे बच्चे जो लगातार चार साल स्कूल जाते रहे उनमें से 90 प्रतिशत बच्चे साक्षर ही नहीं हो सके। यही नहीं पाँच से छः साल तक स्कूल जाने के बावजूद 30 प्रतिशत बच्चों को अक्षर ज्ञान नहीं हो सका। ग्रामीण क्षेत्रों में कक्षा-पाँच में पढ़ने वाले महाराष्ट्र के 44% विद्यार्थियों और तमिलनाडु के 53% विद्यार्थियों को दो अंको का जोड़-घटाना नहीं आता। बाकी राज्यों में भी हालत खराब ही है। ग्रामीण भारत की गरीब लड़कियों को शतप्रतिशत साक्षर बनाने में अभी 66 साल और लगेंगे। ssa-logo

ये शर्मनाक आंकड़े काल्पनिक नहीं हैं और न ही किसी पार्टी विशेष को लक्ष्य करके तैयार किये गये हैं। भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में संचालित सर्व शिक्षा अभियान को अरबो रूपये की आर्थिक मदद देने वाली संस्था यूनेस्को की 11वीं ग्लोबल मॉनीटरिंग रिपोर्ट में ये आंकड़े बताये गये हैं। स्वतंत्र एजेन्सियों द्वारा किये गये सर्वेक्षण पर आधारित ये आंकड़े हमारी प्रशासनिक असफलता और शिक्षा के प्रति लापरवाह दृष्टिकोण को उजागर करते हैं।

यह रिपोर्ट बताती है कि सर्व शिक्षा अभियान के जो लक्ष्य तय किये गये थे उनमें से अधिकांश 2015 तक पूरे नहीं किये जा सकेंगे। यह भी कि दक्षिण-पश्चिम एशिया के देशों में प्राथमिक, जूनियर हाईस्कूल व हाईस्कूल स्तर पर गरीब और वंचित वर्ग के शत प्रतिशत बच्चों को साक्षर और शिक्षित करने की रफ़्तार बहुत ज्यादा धीमी है। भारत में आर्थिक रूप से संपन्न घरों की लड़कियाँ तो शत प्रतिशत साक्षर हो गयी हैं लेकिन गरीब घरों की लड़कियों को शत प्रतिशत साक्षर करने का लक्ष्य सन्‌ 2080 से पहले पूरा होता नहीं दिखता।

इस रिपोर्ट में यह विश्लेषण भी किया गया है कि समाज के हाशिये पर रहने वाले बच्चों को अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा देने के लिए सरकारे पर्याप्त खर्च नहीं कर पा रही हैं। एक बच्चे पर खर्च की जाने वाली औसत राशि की तुलना उसे अच्छी शिक्षा देने के लिए आवश्यक राशि से की गयी तो स्थिति बहुत खराब पायी गयी। भारत के आंकड़ों के अनुसार अपेक्षाकृत धनी राज्य केरल में प्रति बालक 685 डालर खर्च किये गये जबकि बिहार में प्रति बालक मात्र 100 डालर की ही व्यवस्था की जा सकी।

इस रिपोर्ट के मुताबिक सभी बच्चों को स्कूल तक पहुँचा देने के लक्ष्य को हासिल करने में भारत अग्रणी रहा है लेकिन स्कूल में उन्हें प्राथमिक स्तर की शिक्षा वास्तव में मिल भी जाय इसकी ओर जैसे कोई ध्यान ही नहीं गया। पूरी दुनिया के करीब 25 करोड़ बच्चे स्कूल जाने के बावजूद निरक्षर हैं और इनमें से एक तिहाई दक्षिण-पश्चिम एशिया के देशों में हैं। इस बेहद निराशाजनक स्थिति में भारत प्रमुख रूप से सम्मिलित है।

ssaशैक्षिक स्तर में प्रगति अत्यन्त धीमी है, खासकर वंचित वर्ग के बालको में। गणित में तो उनकी हालत बहुत ही खराब है। ग्रामीण क्षेत्रों के अध्ययन में यह बात स्पष्त रूप से सामने आयी कि आर्थिक रूप से संपन्न राज्यों में शिक्षा का स्तर गरीब राज्यों की अपेक्षा बहुत बेहतर है। लेकिन महाराष्ट्र और तमिलनाडु जैसे संपन्न राज्यों में भी गरीब घरों की लड़कियाँ शैक्षिक रूप से बहुत पिछड़ी हुई हैं।

बच्चों द्वारा कक्षा-पाँच में पहुँचने से पहले ही स्कूल छोड़ देने का प्रतिशत सीधे तौर पर गरीबी से जुड़ा है। गरीब राज्यों से और गरीब परिवारों के बच्चे स्कूल में टिके रहना ज्यादा कठिन पाते हैं। उत्तर प्रदेश में ऐसे ड्रॉप-ऑउट्स की संख्या 70% और मध्य प्रदेश में 85% पायी गयी।

प्रथमिक स्तर पर शिक्षा के इस संकट का सबसे बड़ा कारण शिक्षकों पर कुशल प्रशासन का अभाव बताया गया है। स्कूल से गैरहाजिर रहने वाले अध्यापकों का प्रतिशत संपन्न राज्यों में 15% (महाराष्ट्र) और 17% (गुजरात) से लेकर विपन्न राज्यों में 38% (बिहार) और 42% (झारखंड) तक है।

इन आंकड़ों को देखकर यह सुनिश्चित जान पड़ता है कि दुनिया चाहे जितनी कोशिश कर ले, हम भारत के लोग विकसित होने को कतई तैयार नहीं हैं। हमें जो भी अवसर मिलेगा हम उसे अपनी मक्कारी, जाहिली और क्षुद्र स्वार्थों की भ्रष्ट बलि-बेदी पर चढ़ा देंगे और झूठी आत्मप्रशंसा के नारे गढ़कर जश्न मनाते रहेंगे। दुनिया वालों हमारा क्या कल्लोगे...?

(सत्यार्थमित्र)
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Thursday, January 23, 2014

यूँ छोड़कर मत जाइए (तरही ग़जल-III)

यह तरही नसिश्त का सिलसिला भी बड़ा मजेदार है। देखते-देखते आप शायर बन जाते हैं, कुछ बातें तुकबन्दी में जोड़ते-जोड़ते पूरी ग़जल बन जाती है। मेरे साथ ऐसा तीसरी बार हुआ है| रायबरेली कलेक्ट्रेट के पास बने रैन बसेरा में जुटे शायरों के बीच मैं नौसिखिया भी पहुँच गया जहाँ उस्ताद नाज़ प्रतापगढ़ी ने ‘तरह के मिसरे’ पर आयी प्रविष्टियों को सुना और बारीकी से इनकी खूबियाँ और खामियाँ समझायी। मेरी रचना यह रही-
यूँ छोड़कर मत जाइए

जख़्मी है दिल बहलाइए
यूँ छोड़कर मत जाइए
यह चोट ताजा है अभी
कुछ देर तक सहलाइए
घर आपकी खातिर खुला
जब जी करे आ जाइए
है प्यार भी नफ़रत भी है
दिल की दुकाँ में आइए
कर ली सितम की इंतिहा
अब तो करम फरमाइए
रखते हैं हम भी दिल बड़ा
इक बार तो अजमाइए
इक आस थी तो चैन था
क्यूँ कह दिया घर जाइए
(2)
जो आम थे अब खास हैं
थोड़ा अदब दिखलाइए
मर जाएगा अनशन में वो
जैसे भी हो तुड़वाइए
अनशन से होंगे फैसले?
अब और मत भरमाइए
धरना प्रदर्शन कर चुके
अब काम भी निपटाइए
दिल्‍ली में कितना दम बचा
इक और सर्वे लाइए
लो टूटकर जाने लगे
इनको टिकट दिलवाइए
माना प्रवक्ता हो गये
फिर भी शरम दिखलाइए
(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Tuesday, January 21, 2014

माइक, कैमरा, एक्शन और आम आदमी

20-arvind-kejriwal-dharna-600भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना हजारे के मंच से अरविंद केजरीवाल के भाषण देश के नौजवानों में जोश भरने वाले होते थे। रामलीला मैदान हो या जन्तर-मन्तर, केजरीवाल जब भी माइक सम्हालते देश की मीडिया जुट जाती उसके कवरेज के लिए। न्यूज चैनेलों के माध्यम से दूर-दूर तक केजरीवाल की आवाज पहुँचाती वीडियो कैमरे और ओ.वी.वैन की सुविधा इन्हें ऐसी रास आयी कि आगे के सभी कार्यक्रमों में इनका पुख्ता इन्तजाम किया जाने लगा। आन्दोलन जब अपने चरम पर पहुँचा तो सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की ओर से राजनीति में सीधे हाथ आजमाने की चुनौती और सलाह पेश कर दी गयी। मजबूत कलेजे वाले केजरीवाल ने अन्ना जी को पीछे छोड़कर आम आदमी पार्टी का गठन किया और पहली ही परीक्षा में पास होते हुए दिल्ली विधान सभा चुनाव में मिली अप्रत्याशित सफलता के बाद मुख्य मंत्री की कुर्सी पर काबिज हो गये।

भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक मजबूत (जन) लोकपाल बनाने की मांग से प्रारंभ हुआ धरना-प्रदर्शन विभिन्न मुद्दों, बहसों और रोज बदलती घटनाओं के बीच आगे बढ़ता हुआ आज चार पुलिस वालों को निलंबित किये जाने की मांग को लेकर बदस्तूर जारी है। केजरीवाल पहले सड़क पर नारे लगाते और भाषण देते एक आम आदमी से बदलकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बन गये; लेकिन यह अद्‌भुत बदलाव भी सड़क पर जारी आन्दोलन की निरन्तरता में बाधक नहीं बन पाया। भरपूर भीड़ के बीच मंच पर खड़ा होकर भाषण देने, नारे लगवाने और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को बाइट देने का जो नशा है वह उतरने का नाम ही नहीं ले रहा। मंत्रीमंडल का शपथ ग्रहण कार्यक्रम ही रामलीला मैदान में मंच सजाकर अपार भीड़ के बीच में किया गया। आम आदमी ने खूब जश्न मनाया था; लेकिन अब भी रोज़-ब-रोज़ दिल्ली के मंत्रीगण और मुख्यमंत्री जी बार-बार अपने दफ़्तर से बाहर निकलकर सड़क पर आने और माइक, कैमरा के सामने एक्शन दिखाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं।

मुझे लगता था कि राज्य सत्ता में बैठे हुए मंत्रियों और उनके अधीन कार्यरत नौकरशाही द्वारा आम जनता के अधिकारों और जरूरी नागरिक सुविधाएँ मुहैया कराने में जो भ्रष्टाचार व्याप्त है उसे दूर करने के उद्देश्य से केजरीवाल जी ने यह आन्दोलन खड़ा किया है और इसी साध्य को साधने में उनका सहयोग करने के लिए देश का आम जनमानस और मीडिया भी आगे आया है। धरना प्रदर्शन का साधन कारगर भी लगने लगा था क्योंकि जनता ने उससे प्रभावित होकर उन्हें वोट भी दे दिया था, मुख्य मंत्री की कुर्सी भी मिल गयी और संसद ने लोकपाल अधिनियम भी बना दिया। फिलहाल जो लक्ष्य लेकर केजरीवाल जी चुनाव लड़े थे वह पूरा होता दिखायी दिया। इसके बाद उम्मीद थी कि वे लोग जमकर सचिवालय में बैठकर काम करेंगे और अबतक हुए घपलों घोटालों की खबर लेंगे और जनता को तमाम सहूलियतें देने का रास्ता निकालेंगे। लेकिन देख रहा हूँ कि मुख्य मंत्री जी ने शपथ ग्रहण करने के बाद भी सड़क पर आकर माइक, कैमरा, एक्शन का लुत्फ़ लेना जारी रखा हुआ है।

Kejriwal-dharna_जनता की अर्जी लेने के नाम पर ‘जनता दरबार’ (एक सामन्ती संज्ञा) लगा तो सड़क पर लगा, माइक-कैमरा-एक्शन के साथ। मुख्यमंत्री जी भीड़ के बीच कैमरे से ओझल होने लगे तो भागकर चारदीवारी पर चढ़ लिए। आम आदमी ने वहाँ भी नहीं छोड़ा तो छत पर पहुँचकर माइक सम्हाल लिया लेकिन कैमरा नीचे से मुस्तैद रहा। मंत्रीगण अपने सरकारी काम के लिए बाहर निकलते हैं तो माइक और कैमरा का इन्तजाम पहले से कर लेते हैं। यहाँ तक कि आधी रात को गश्त पर भी बिना माइक-कैमरा लिए नहीं जा पाते। पुलिस वालों से तू-तू मैं-मैं भी हुई तो माइक-कैमरा-एक्शन के साथ ताकि चैनेल वाले बुरा न मान जाँए।

लगता है जैसे यह ‘माइक-कैमरा-एक्शन’ कोई साधन नहीं है बल्कि अपने आप में एक साध्य हो गया है। इस साध्य को सिद्ध कर लेने के बाद अब आगे कुछ बचता ही नहीं। वो अठ्ठारह मुद्दे जो माइक-कैमरा-एक्शन के साथ मीडिया में गिनाये गये थे उनका कोई पुरसा हाल नहीं है। जिन मुद्दों पर काम करके वे आम दिल्लीवासियों को तत्काल राहत पहुँचा सकते थे वे पीछे हो गये। इनकी फाइलों पर कोई निर्णय लिये जाने हेतु धरना-रत मंत्रियों के सचिवालय में लौटने तक प्रतीक्षा करनी होगी।

अब मुद्दा वह चुना गया है जो राज्य सरकार के पास है ही नहीं। मुद्दा यही है कि क्यों नहीं है राज्य सरकार के पास - पुलिस पर नियन्त्रण? आजादी के इतने साल बाद भी दिल्ली पुलिस को राज्य सरकार के हाथ में नहीं दिया गया। केंन्द्र और दिल्ली में परस्पर विरोधी सरकारें भी रहीं फिर भी यह मुद्दा कभी इतना भारी नहीं हुआ। राष्ट्रीय राजधानी होने के कारण दिल्ली की पुलिस निगरानी बहुत आसान है भी नहीं। हो सकता है कि पहले की राज्य सरकारें इस झंझट से जानबूझकर दूरी बनाये रखना चाहती हों।

पुलिस का काम अपराध को रोकना और अपराध करने वाले को दंडित कराना है। इसके लिए पुलिस को पर्याप्त अधिकार दिये गये हैं और जिम्मेदारी भी। पुलिस यदि इन अधिकारों का ठीक-ठीक प्रयोग करे तो भी अपनी जिम्मेदारी पूरी तरह नहीं निभा सकती; कुछ न कुछ अपराध होते ही रहेंगे। लेकिन यदि पुलिस वाले अपराधियों के साथ नरमी बरतने और पैसे के बदले आँख मूंद लेने के लिए सहज ही तैयार हो जाँय तब तो स्थिति भयावह हो जाएगी। एक दक्ष और समर्पित पुलिस समाज में छोटे-मोटे अपराध होने से तो रोक ही सकती है; लेकिन ये छोटे-मोटे अपराध ही पुलिसवालों की कमाई का साधन बन जाँय तो क्या कीजिएगा? केजरीवाल ने पुलिस के मगरूर रवैये के खिलाफ खड़ा होकर कुछ गलत नहीं किया है; लेकिन उन्होंने जो तरीका चुना है वह उन्हें अपने दायित्वों से विचलित करने वाला है।

kejriwal on streetपुलिस व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जो विरोध और आन्दोलन करना है उसे वे अपने कार्यकर्ताओं के जिम्मे कर सकते थे; लेकिन मुख्यमंत्री होने के नाते उनके पास दूसरे सांस्थानिक तरीके भी उपलब्ध थे। विधानसभा की विशेष बैठक बुलाकर बहस कराने, राज्य सरकार की ओर से औपचारिक विरोध दर्ज कराते हुए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजने का विकल्प चुनना चाहिए था। पहले वे शांति पूर्वक गृहमंत्री, प्रधानमंत्री और आवश्यक होने पर राष्ट्रपति से समय लेकर मुलाकात करते और अपनी भावनाओं से अवगत कराते हुए ठोस मांग रखते। पूरे देश में तब भी चर्चा होती और शायद कोई रास्ता भी निकलता। लेकिन बात-बात पर सड़क पे आ जाना, अनशन करना और धरना देना काम के प्रति एक स्टेट्समैन की गंभीरता को नहीं दिखाता।

जिस सोशल मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उन्हें आँखों पर बिठाया वही उनका उपहास करने लगी है। मुद्दा विचारणीय होने के बावजूद आज चर्चा मुद्दे पर कम हो रही है और उनके छूठे दंभ, अनावश्यक आक्रामकता, और पदीय दायित्वों से भटक जाने की अधिक हो रही है। जिन लोगों की छाती पर मूंग दलते हुए उनका काफिला सत्ता के गलियारों तक पहुँचकर कुर्सी पर कब्जा जमा बैठा वे ही इस तमाशे को देखकर जैसे दुबारा जिन्दा हो गये हैं। डॉ. हर्षवर्धन की दमित इच्छा भी मानो अब कुलाँचे मारने लगी है। आम आदमी पार्टी की विरुदावली गाने वाले अब इसका उपसंहार लिखने बैठ गये हैं। यह उन करोड़ों लोगों के लिए निराशा का क्षण है जिन्होंने इस बदलाव की बयार से बहुत उम्मीदें लगा ली थीं। कदाचित्‌ मैं भी उनमें सम्मिलित हूँ।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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