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Sunday, August 31, 2014

कूड़े के ढेर पर विद्यार्थी


बचपन में पंडित जी से विद्यार्थी के इन पाँच लक्षणों के बारे में सुना था

काकचेष्टा,वकोध्यानं ,श्वाननिद्रा,तथैव च।
अल्पाहारी,गृहत्यागी विद्यार्थी पंच सुलक्षणं॥

प्रमेय- विद्यार्थी की उपर्युक्त परिभाषा गलत है, आइए सिद्ध करके देखें-

मैंने अपने छात्रजीवन में इन गुणों को आत्मसात करने का बहुत प्रयास किया लेकिन शत प्रतिशत सफलता कभी नहीं मिली। अपने बच्चों को भी यह सूक्ति सुनाता रहता हूँ लेकिन आज की बदली परिस्थितियों में उन्हें भी इस साँचे में ढालना अपने हाथ में नहीं लगता। इन न्यूनताओं के बावजूद मेरे या मेरे बच्चों के विद्यार्थी होने में कोई संदेह नहीं है।

लेकिन हमारे समाज में एक बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है जिनके भीतर ये सभी गुण अनायास ही विद्यमान हैं जबकि उन्हें विद्यार्थी के रूप में स्कूल जाने, किताब-कॉपी के साथ पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने के प्रायः सभी रास्ते बन्द हैं।

rag-pickers-kids-in indiaपीठ पर बस्ते की तरह टँगा है बोरा,
ड्रेस भी तो है उनकी,
एक पैण्ट जिसकी जेबें फ़टी है,
चेन टूटी है,शर्ट पर लगी है,कालिख की ढेर
और पैर में टूटा हुआ प्लास्टिक का चप्पल,
साथ में ही घूमते हैं,ठीक विद्यार्थियों की तरह बतियाते हुए
पर अपने लक्ष्य के प्रति सचेष्ट।
तो क्या वे विद्यार्थी हैं?
नहीं, वे कूड़ा बीनने वालें हैं
अल्पाहारी शौकिया नहीं मजबूरी में
गृहत्यागी शिक्षा के लिये नहीं, प्लास्टिक के लिये
ध्यान बगुलें का है सीखने के लिये नहीं,अपितु,
बीनने के लिये,
काकचेष्टा दूसरे से आगे होने के लिये,
और,
श्वाननिद्रा तो इसलिये कि,
भूखे पेट,नंगे शरीर,
खुले छ्त के नीचे,नींद आती ही नहीं।

(१) अल्पाहारी-

वे गरीब हैं जो दोनों जून मिला कर भी नहीं पाते एक वक्त का भोजन।

(२) गॄहत्यागी -

घर छोड़ देने से ही तो चलता है उनका जीवन रोज ही घर से बहुत दूर तक चले जाते हैं वे, अपने लक्ष्य की तलाश के लिये।

(३) बको-ध्यानम्‌-

बगुलों जैसे एकाग्रचित्त। ध्यान तो उनका बगुलों से भी तेज है जो सामने पड़ी हर वस्तु की उपयोगिता बस एक ही नजर में परख लेते हैं।

(४) काकचेष्टा-

कौए जैसी चपल और तेज क्रियाशीलता। यही तो आधार है उनकी सफ़लता का। जिसमें जितनी काकचेष्टा, सफ़लता उतनी ही अधिक; यानि उसका बोरा उतना अधिक भरा हुआ।

(५) श्वाननिद्रा -

कुत्ते जैसी नींद। शायद नींद उन्हें आती ही नही, जब पुकारो जागते मिलेंगे, आहट हुई नहीं की उठ बैठे।

इन कूड़ा बीनकर पेट पालने वालों को यदि आप विद्यार्थी कहना चाहें तो यह भी कहना पड़ेगा कि विद्यार्थी कूड़े के ढेर पर बैठा कष्ट भोगता एक मनुष्य होता है।

इस प्रकार विद्यार्थी की यह आदिकालीन परिभाषा त्रुटिपूर्ण सिद्ध होती है।

(इति सिद्धम्‌)

(लगभग री-ठेल)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
www.satyarthmitra.com

8 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के - चर्चा मंच पर ।।

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  2. सच में ....विद्यार्धियों जैसा ही पर कितना अलग है उनका जीवन .... :(

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  3. The post is very relevant in today's context. A big slap on the face of so called civilized and developed society.
    Thanks for visiting my blog and posting a comment thereon.

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  4. हमारी वसति में तो ऐसे चित्र 'शिक्षा का अधिकार ' के विज्ञापन पटल तक के नीचे दृष्टि गोचर होते हैं उसमें लिखा होता है ऐसे बच्चे कहीं दिख जाएं तो फून करें.....एक ही काम हो सकता है या इनको फून करो या इनको भोट करो.....

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  5. यह दृश्य इस हेतु हैं क्योंकि आप इन खटिया तोडों को अपना बहुमूल्य मत देते हैं.....

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  6. उत्‍तम आज के संदर्भ में।

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  7. उनकी विवशता, अपना पेट भर सकें इसलिए ये आचरण कियो बिना, जिनका कोई दिन इससे बच नहीं सकता !

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