हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Monday, December 22, 2014

फासले बढ़ रहे जिंदगी में (तरही ग़जल)

(बह्‍र : फाइलुन फाइलुन फाइलुन फ‍अ)

फासले बढ़ रहे जिंदगी में
दूरियाँ हो गयीं आदमी में

चल पड़े हैं कहीं से कहीं हम 
ज़ानेजाँ बस तिरी आशिक़ी में

इश्क में डूबने की न पूछो
हुस्न देखा किया चाँदनी में

फूल भी, ख़ार भी मोतबर हैं
हुस्न पोशीदा है हर किसी में

नाज़-नख़रे उठाये बहुत से
फ़र्क़ आया नहीं बेरुख़ी में

बेख़ुदी में सनम उठ गए हैं
ये क़दम अब तिरी आशिक़ी में

काम था तो बड़ा मुख़्तसर ही
हो न पाया मगर काहिली में

आदमी आम कहता था खु़द को
सादगी तो न थी सादगी में

या इलाही बचा पाक दामन
जिस्म को घूरती देहलवी में

तू सितमगर अगर हो गया तो
ख़ुद भी तड़पेगा बेचारगी में

वाह रे जिंदगी की कहानी
तिश्‍नगी ही बची ज़िन्दगी में

हर किसी को बराबर न समझो
फर्क है आदमी आदमी में

शायरी में सितम है रुबाई
बह्‍र में या बधें हथकड़ी में

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Friday, December 19, 2014

रुबाई की आजमाइश

तरही नशिस्त में उस्ताद जी ने चुनौती दी रुबाई कहने की। शायरी में रुबाई छंद कठिन माना जाता है। इसमें बीस-बीस मात्राओं की चार लाइनें कहनी होती हैं जिनकी पहली, दूसरी और चौथी लाइन की तुक (काफिया) समान होता है। सभी लाइ्नों में मात्राओं का क्रम (बह्‍र) एक समान रखना होता है और चारो लाइनों में अभीष्ठ बात पूरी (मुकम्मल) करनी होती है। उस्ताद द्वारा उदाहरण स्वरूप एक लाइन (मिसरा) समस्या के रूप में दे दी जाती है। उसी रूप और गुण वाली चार लाइने तैयार करके रुबाई पूरी होती है। मुझे जो मिसरा मिला उसकी बहर और उनके घटक (औजान) भी बताये गये जो निम्नवत्‍ है-

कुछ लोग बुरा भला मुझे कहते हैं
मफ़ऊल मफाइलुन मफाईलुन फअ
फलफूल सुफूलफल सुफलफलफल फल

इसके आधार पर जो रुबाई मेरे द्वारा कही गयी उसे उस्ताद ने पास कर दिया है। लीजिए आप भी शौक फरमाइए -

-1-
कमज़ोर सदा नज़र झुकी रखते हैं
कमज़र्फ बहुत सितम किया करते हैं
इक रोज बड़ी सज़ा मिलेगी उनको
जो लोग बुरा भला इन्हे कहते हैं

*
-2-
इक नजर तिरी उथल पुथल करती है
पुरजोर कशिश महक महक जाती है
सब लोग चकित पलट पलट तकते हैं
जो आग बुझी लहक लहक उठती है

**

-3-
वह रोज बहुत मरा मरा कहता था
प्रभु नाम वही जपे चला जाता था
यह बात हुई कि जो कभी रहजन था
वह संत बना अमर कथा रचता था

***

मुझे पता है कि आप हौसला आफ़जाई तो करेंगे ही। नया-नया फितूर है। आपकी दाद से ही यह परवान चढ़ेगा। Smile

(इस मौके पर जो ग़जल कही गयी वह अगली पोस्ट में।)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Saturday, November 15, 2014

जिन्दगी अपनी बनाते हैं बनाने वाले (तरही ग़जल)

उस्ताद ने इस बार जब मिसरा दिया था तो मैं उपस्थित नहीं था। किसी और ने जब फोन पर बताकर नोट कराया तो इसकी बहर गलत समझ ली गयी और पूरी ग़जल गलत बहर में कह दी गयी। बाद में ऐन वक्त पर नशिस्त से पहले गलती का पता चला तो काट-छांट करके और कुछ मलहम पट्टी लगाकर शेर खड़े किये गये। अब यहाँ ब्लॉग पर तो अपनी मिल्कियत है। सो इस अनगढ़ को भी ठेल देता हूँ। साथ में एक कठिन बहर की रुबाई भी बनाने को दी गयी थी जिसे मैंने डरते-डरते आजमाया। 

रुबाई

हरगिज न करूँ कभी कहीं ऊल जुलूल
अब बाँध लिया गिरह तिरा पाक उसूल
हर रोज किया करूँ मैं सजदा तेरा
कर ले तू खुदा मेरी इबादत को कुबूल

ग़जल

बदगुमाँ होते हैं क्यूँ हार के जाने वाले
जिंदगी अपनी बनाते हैं बनाने वाले

मत करें प्यार का इजहार गरज़मंदी में
बेगरज़ होके रहें प्यार जताने वाले

गुल खिलाती है हवा धूप की गर्मी लेकर
प्यार के जश्न हुए दिल को खिलाने वाले

प्यार गहरा हो तो बढ़ जाती है ताकत दिल की
साहसी होते बहुत दिल से निभाने वाले

चूम लेने का हुनर आया अदा में कुछ यूँ
लब बिना बोले बहुत कुछ हैं बताने वाले

प्यार के रंग बने जैसे कि ये शेरो सुखन
यकबयक बनते नहीं बनने बनाने वाले

एक मुस्कान से शुरुआत भली होती है
प्यार की राह यही लब हैं बताने वाले

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

सत्यार्थमित्र
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Sunday, October 26, 2014

मोदी-चाय है कि बवाल की दावत…

namochayमीडिया के लिए मोदी की चाय पार्टी से सोशल मीडिया में जो हलचल मची है वह प्याले में तूफान की उक्ति चरितार्थ करती है। प्रिन्ट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की प्रायः सभी बड़ी हस्तियाँ जो देश की राजधानी में कार्यरत हैं उन्हें नरेन्द्र मोदी ने आदर सहित बुलाया, दीपावली की शुभकामनाएँ दीं और स्वच्छ भारत अभियान में उनके सहयोग के लिए धन्यवाद दिया। देश के सबसे लोकप्रिय राजनेता के पास पहुँच जाने के बाद कुछ लोगों में यह सहज इच्छा पैदा हो गयी कि उनके साथ तस्वीरें खिचवा ली जाय।

मोबाइल फोन में कैमरे की सुविधा ने तो यह हाल कर दिया है कि हमें राह चलते कोई सुन्दर सा कुत्ता भी दिख जाय तो उसके साथ सेल्फ़ी क्लिक करने लगते हैं और तुरन्त देश भर के मित्रों को फेसबुक और व्हाट्सएप के माध्यम से दिखाने लगते हैं। तो फिर पूरी दुनिया में अपने किस्म की अकेली शख्सियत को देखकर किस चुगद का मन सेल्फ़ी खिंचाने के लिए नहीं ललचा जाएगा। अलबत्ता कुछ स्वनामधन्य ऐसे लोग भी हैं जिन्हें मोदी नाम से ही सख्त नफ़रत है। इन्हें भारतीय लोकतंत्र के किसी भी मूल्य से बड़ा लगता है अपने पूर्वाग्रहों की हर हाल में रक्षा करना।

इस चाय-पार्टी से प्रेस की स्वतंत्रता पर आँच आने की चिन्ता में घुलते तमाम मित्रों के स्टेटस देखकर मैं दंग रह गया। भड़ास4मीडिया पोर्टल पर प्रचुर सामग्री जमा हो चुकी है। कुछ देर के लिए सामान्य शिष्टाचार तो हम अपने दुश्मन के साथ भी निभा लेते हैं। यहाँ तो देश के सर्वोच्च जनप्रतिनिधि ने आदर व सम्मान से बुला रखा था। अब इसे जो लोग उत्कोच समझने कॊ मनोवृत्ति रखते हैं वे निश्चित रूप से यह भी समझते होंगे कि पत्रकार समुदाय में ऐसे लोग भरे पड़े हैं जो थोड़ा सा प्रलोभन सामने आते ही उसओर झपट पड़ेंगे और अपने स्वार्थ के आगे जनहित का ख्याल छोड़ देंगे। namochay.2jpg

भगवान न करे यह बात सच हो; लेकिन यदि इस बात में लेश मात्र भी सच्चाई है कि मीडिया वाले भी मात्र अर्थोपार्जन के उद्देश्य से ही काम कर रहे हैं और ‘मिशन’ वाला हिस्सा पीछे छूट चुका है तो इसके लिए सिर्फ़ उस चाय-पार्टी में सम्मिलित होने को दोष देकर छुटकारा नहीं मिलने वाला। फिर तो पत्रकार बन्धुओं द्वारा गुजारी गयी हर शाम पर निगाह रखनी होगी जिसमें दस-पाँच रूपये की टुच्ची चाय नहीं बल्कि एक से एक उम्दा ब्रैंड की देशी-विदेशी मदिरा और फाइव-स्टार डिनर पार्टी भी आसानी से उपलब्ध है। प्रोफेशनलिज्म की मांग तो यह है कि अपनी स्टोरी को विश्वसनीय बनाने के लिए और अन्दर की सच्ची खबर बाहर लाने के लिए चाहे जिस भी रूप में अन्दर जाना पड़े, चले जाना चाहिए। घोटालेबाज के साथ मक्कारी का खेल खेलकर भी सच्चाई बाहर निकल आये तो ऐसी मक्कारी करने में कोई हर्ज़ नहीं। स्टिंग ऑपरेशन इसे ही तो कहते हैं।

namochay.1jpgलेकिन जो लोग नरेन्द्र मोदी का नाम लेते ही उल्टियाँ महसूस करने लगते हैं, सारी तर्कशक्ति मिथ्या प्रलाप में लगा देते हैं और हास्यास्पद होने की सीमातक प्रतिकार की भाषा बोलने लगते हैं उनका रोग बहुत भयानक और असाध्य है। कोई एक दशक पहले लगा आघात इनके मन मस्तिष्क पर जो निशान छोड़ गया उससे मानो इनमें बदलते समय के साथ आगे बढ़ने की क्षमता ही जाती रही। स्थिति यह हो गयी है कि अब ये “पाप से घृणा करो पापी से नहीं” वाले सन्देश को उल्टा समझते हैं। यानि- वे पाप से भले ही घृणा न करें लेकिन पापी से घूणा करने का दिखावा जरूर करेंगे। अगर वे वास्तव में पाप से घृणा कर रहे होते तो ऐसे पाप की लंबी फेहरिश्त से जुड़े सभी पापियों से समान दूरी बनाकर चलते। लेकिन तमाम दलों में विविध रूप लेकर बैठे इसी प्रकार का पाप कर चुके लोगों की गोद में बैठकर अपना उल्लू सीधा करते रहने में इन्हें कोई शर्म नहीं आती।

लोकसभा चुनाव से पहले और बाद में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चर्चित चेहरों के रुख में आये बदलाव को देखकर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि लाखो की लागत लगाकर करोड़ो की कमाई करने के लिए कैसे रंग बदलना पड़ता है, कैसे शर्म-हया ताख पर रख देनी पड़ती है और मालिकान के फरमान को हर हाल में पूरा करना पड़ता है। यह सब मोदी की चाय-पार्टी से पहले की बात है; तो फिर इस चाय पर इतना तूफान क्यों?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Monday, September 22, 2014

जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते है (तरही ग़जल)

तरही नशिस्त के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए इस बार उस्ताद ने जो मिसरा दिया उसने मुझे बहुत परेशान किया। लेकिन आखिर कुछ तुकबन्दियाँ बन ही गयीं। आप भी समाद फरमाइए :

जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते हैं


पूंजीपति के मॉल सजीले बनते हैं
श्रमजीवी बदहाल वहीं पे रहते हैं

सरकारों ने दिये बहुत उपहार उन्हें
खोज रहा हूँ गाँव जहाँ वे मिलते हैं

जंग जीतता सूरज सदा अँधेरे से
जुगनू अपना फर्ज़ निभाते रहते है

बीज डालने की फितरत कुछ लोगों की
कुछ हैं जो बस फसल काटते रहते है

छोटे से छोटे को छोटा मत समझो
बूंदों से ही पत्थर चिकने बनते हैं

मर्दों ने तामीर मकानों की कर ली
औरत के हाथों ही वे घर बनते हैं

मन में हो तूफान मगर मत घबराना
अक्सर मंद समीर बाद में बहते हैं

अच्छी फसलें बहुत सजोनी पड़ती हैं
खर पतवार बिना बोये ही उगते हैं

सदाचार सच्‍चाई की है राह कठिन
झूठे रस्ते अनायास खुल पड़ते हैं

-सत्यार्थमित्र

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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Saturday, September 13, 2014

बचपन के मीत का गीत…

आज मेरे बचपन के दोस्त संजय कुमार त्रिपाठी का जन्मदिन है। हम आठवीं से दसवीं कक्षा तक एक साथ पढ़े। उन तीन सालों में शायद ही कोई ऐसा दिन रहा हो जब कक्षा में हम एक साथ न बैठे हों। उस ग्रामीण विद्यालय में पढ़ने के लिए मैं अपने घर से दूर एक ‘क्‍वार्टर’ में रहता था जो वहाँ के इलाके में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के घर के बाहरी बरामदे का छोटा सा कमरा था। संजय अपने मामाजी के घर रहते थे जो बगल के गाँव में था। स्कूल के बाहर भी हम लोगों की पढ़ाई प्रायः एक दूसरे के संपर्क में रहते हुए ही होती थी। कभी-कभी मैं उनके मामाजी के घर जाकर रुक जाता था। कभी वे मेरे कमरे पर आ जाते थे; लेकिन रात में रुक नहीं सकते थे क्यों कि कमरा इतना बड़ा नहीं था। बोर्ड परीक्षा देने के लिए जब परीक्षा केन्द्र तीस किलोमीटर दूर निर्धारित हुआ तो वहाँ हम एक साथ रुके और परीक्षा में लगभग बराबर की सफलता प्राप्त करते हुए एक दूसरे से विदा हुए।

मैंने उस ग्रामीण विद्यालय के खराब माहौल से तौबा कर ली और पिताजी से जिद करके राजकीय इंटर कॉलेज में पढ़ने गोरखपुर चला आया। गोरखपुर से इलाहाबाद विश्वविद्यालय और वहाँ से लोक सेवा आयोग की दी हुई सरकारी नौकरी बजा रहा हूँ। उधर संजय ने उसी जनता इंटर कालेज से इंटर पास किया, फिर बिहार से शिक्षक प्रशिक्षण (बी.टी.सी.) प्राप्त किया, और प्राथमिक शिक्षक बनने से पहले बी.ए. और एम.ए.(अंग्रेजी) की डिग्री गोरखपुर विश्वविद्यालय से अर्जित कर ली। आज वे बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में सरकारी जूनियर हाई स्कूल में एक आदर्श शिक्षक की नौकरी करते हुए अपनी छोटी सी गृहस्थी सम्हाल रहे हैं। उनके शिक्षण कार्य की कुशलता को देखते हुए उन्हें अन्य शिक्षकों को प्रशिक्षण देने का अतिरिक्त कार्य सौंप दिया गया है जिसे पूरा करने के लिए उन्हें रविवार की साप्ताहिक छुट्टी भी समर्पित करनी पड़ती है। इसके लिए मिलने वाला अतिरिक्त पारिश्रमिक उनके समक्ष मुंह खोले तमाम आर्थिक चुनौतियों का सामना करने हेतु कुछ अतिरिक्त संबल जरूर देता होगा लेकिन उनकी कर्मनिष्ठा में डूबी हुई दिनचर्या इतनी व्यस्त हो चुकी है कि नौकरी के बाहर के सारे काम ठप हो चुके हैं। इष्टमित्रों से मिलना-जुलना, रिश्तेदारों के घर आना-जाना, छुट्टियों में बच्चों को लेकर बाहर घूमने जाना या सोशल मीडिया पर स्टेटस डालने और बतकही करने का शौक पैदा ही नहीं हो सका।

संजय एक ऐसी दुनिया में रमे हुए हैं जो महानगरीय संस्कृति और उपभोक्ता वादी सामाजिकता से कोसों दूर है। निवास स्थान से बीस-पच्चीस किलोमीटर दूर की नौकरी बजाने के लिए अनिवार्य हो चुकी मोटरसाइकिल भी काफी प्रतीक्षा के बाद आ सकी और अदना सा मोबाइल उसके भी बाद में। कर्ज लेकर घर का ढाँचा तो खड़ा कर लिया लेकिन उसके खिड़की दरवाजे बनवाने में कई साल लग गये। बच्चों की छोटी-छोटी जरूरतों के लिए भी अपने साथ कई समझौते करने पड़े। लगभग पूरे वेतन पर ई.एम.आई. ने कब्जा कर रखा है लेकिन मजाल क्या कि इनके चेहरे पर कभी शिकन देखने में आयी हो। जब भी पडरौना जाता हूँ तो इनके घर मिलने जरूर जाता हूँ। वही प्रसन्नता से मुस्कराता चेहरा और अपनी गृहस्थी के प्रति सजगता और जिम्मेदारी से भरा, उत्साह से लबरेज जीवन्त व्यक्तित्व देखने को मिलता है।

बात-बात में ठहाके लगाते और गुदगुदाने वाले किस्से-कहानियों का लुत्फ़ लेते हुए संजय की कोई ऑनलाइन प्रोफाइल नहीं है। वर्षों पहले मैंने इनका एक जी-मेल खाता बना के दे दिया तो उसका पासवर्ड धरे-धरे गायब हो गया और मेल चला गया तेल लेने। इंटरनेट तक अपनी पहुँच बनाने की न तो इन्हें जरूरत महसूस हुई और न ही कोई सुभीता ही हुआ। मेरे झकझोरने पर आज जब किसी दूसरे के ई-मेल एकाउंट से इन्होंने मुझे अपनी एक हस्तलिखित रचना भेजी तो मैंने सोचा फोन के बजाय इस पोस्ट के माध्यम से इन्हें अपनी शुभकामनाएँ उनतक पहुँचाऊँ। 

Sanjay K Tripathi1

अपनो का हो साथ तो इक संबल मिलता है
जीवन नौका को खेने का बल मिलता है

सत्य और भ्रम का अंतर जो समझ सका है
श्रमजीवी होने का मतलब समझ सका है
मन में रखता है जो ऊँची अभिलाषाएँ
घोर निराशा में आशा के दीप जलाए

ऐसे ‘कर्मवीर’ को ही प्रतिफल मिलता है
अपनों का हो साथ तो इक संबल मिलता है

जीत हार का जिसपर कोई असर नहीं है
दुनियादारी की बातों का असर नहीं है
अन्तर्मन के निर्णय पर ही चलता जाये
यमदूतों के भय से भी जो ना घबराये

ऐसे को ही हर प्रश्नों का हल मिलता है
अपनों का हो साथ तो इक संबल मिलता है।

-संजय कुमार त्रिपाठी

मैं चाहता हूँ आधुनिकता की चकाचौंध से दूर दुर्गम ग्रामीण इलाकों में शिक्षा की ज्योति जलाने में लगे इस अहर्निश कर्मयोगी को उसके जन्मदिन (१३ सितंबर) पर आप भी शुभकामनाएँ देना चाहें।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Sunday, August 31, 2014

कूड़े के ढेर पर विद्यार्थी


बचपन में पंडित जी से विद्यार्थी के इन पाँच लक्षणों के बारे में सुना था

काकचेष्टा,वकोध्यानं ,श्वाननिद्रा,तथैव च।
अल्पाहारी,गृहत्यागी विद्यार्थी पंच सुलक्षणं॥

प्रमेय- विद्यार्थी की उपर्युक्त परिभाषा गलत है, आइए सिद्ध करके देखें-

मैंने अपने छात्रजीवन में इन गुणों को आत्मसात करने का बहुत प्रयास किया लेकिन शत प्रतिशत सफलता कभी नहीं मिली। अपने बच्चों को भी यह सूक्ति सुनाता रहता हूँ लेकिन आज की बदली परिस्थितियों में उन्हें भी इस साँचे में ढालना अपने हाथ में नहीं लगता। इन न्यूनताओं के बावजूद मेरे या मेरे बच्चों के विद्यार्थी होने में कोई संदेह नहीं है।

लेकिन हमारे समाज में एक बड़ी संख्या ऐसे बच्चों की है जिनके भीतर ये सभी गुण अनायास ही विद्यमान हैं जबकि उन्हें विद्यार्थी के रूप में स्कूल जाने, किताब-कॉपी के साथ पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने के प्रायः सभी रास्ते बन्द हैं।

rag-pickers-kids-in indiaपीठ पर बस्ते की तरह टँगा है बोरा,
ड्रेस भी तो है उनकी,
एक पैण्ट जिसकी जेबें फ़टी है,
चेन टूटी है,शर्ट पर लगी है,कालिख की ढेर
और पैर में टूटा हुआ प्लास्टिक का चप्पल,
साथ में ही घूमते हैं,ठीक विद्यार्थियों की तरह बतियाते हुए
पर अपने लक्ष्य के प्रति सचेष्ट।
तो क्या वे विद्यार्थी हैं?
नहीं, वे कूड़ा बीनने वालें हैं
अल्पाहारी शौकिया नहीं मजबूरी में
गृहत्यागी शिक्षा के लिये नहीं, प्लास्टिक के लिये
ध्यान बगुलें का है सीखने के लिये नहीं,अपितु,
बीनने के लिये,
काकचेष्टा दूसरे से आगे होने के लिये,
और,
श्वाननिद्रा तो इसलिये कि,
भूखे पेट,नंगे शरीर,
खुले छ्त के नीचे,नींद आती ही नहीं।

(१) अल्पाहारी-

वे गरीब हैं जो दोनों जून मिला कर भी नहीं पाते एक वक्त का भोजन।

(२) गॄहत्यागी -

घर छोड़ देने से ही तो चलता है उनका जीवन रोज ही घर से बहुत दूर तक चले जाते हैं वे, अपने लक्ष्य की तलाश के लिये।

(३) बको-ध्यानम्‌-

बगुलों जैसे एकाग्रचित्त। ध्यान तो उनका बगुलों से भी तेज है जो सामने पड़ी हर वस्तु की उपयोगिता बस एक ही नजर में परख लेते हैं।

(४) काकचेष्टा-

कौए जैसी चपल और तेज क्रियाशीलता। यही तो आधार है उनकी सफ़लता का। जिसमें जितनी काकचेष्टा, सफ़लता उतनी ही अधिक; यानि उसका बोरा उतना अधिक भरा हुआ।

(५) श्वाननिद्रा -

कुत्ते जैसी नींद। शायद नींद उन्हें आती ही नही, जब पुकारो जागते मिलेंगे, आहट हुई नहीं की उठ बैठे।

इन कूड़ा बीनकर पेट पालने वालों को यदि आप विद्यार्थी कहना चाहें तो यह भी कहना पड़ेगा कि विद्यार्थी कूड़े के ढेर पर बैठा कष्ट भोगता एक मनुष्य होता है।

इस प्रकार विद्यार्थी की यह आदिकालीन परिभाषा त्रुटिपूर्ण सिद्ध होती है।

(इति सिद्धम्‌)

(लगभग री-ठेल)

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी
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Thursday, July 31, 2014

वाह जुलाई के क्या कहने…!

भाग-एक


स्कूलों की घंटी बोली, बच्‍चों की लो निकली टोली
भारी बस्ते चढ़े पीठ पर, फिर भी करते हँसी ठिठोली
नौनिहाल को हैं सब सहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥१॥

अब तिहवारी मौसम आया, सबने ईद उल फित्र मनाया
आयी तीज लिए हरियाली, मंगल व्रत करती घरवाली 
राखी चुनने निकली बहनें, वाह जुलाई के क्या कहने ॥२॥

सूखे की आहट से टूटे, यह किसान की दुनिया लूटे
मानसून ने कर दी देर, लिया विकट चिन्ता ने घेर
तभी लगी पुरवाई बहने, वाह जुलाई के क्या कहने॥३॥

आम दशहरी, चौसा- लगड़ा, अल्फान्सो का रुतबा तगड़ा
हफ़्तेभर तक जामुन आया मधुरोगी ने छककर खाया
हरित वसन धरती ने पहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥४॥

शिव शंकर का सावन आया, भक्तजनों का मन हर्षाया
सांई पर उखड़े आचार्य भूले संत सरीखे कार्य
ऐसे कैसे धर्म निबहने? वाह जुलाई के क्या कहने ॥५॥

भाग-दो

बजट बिगाड़ा महंगाई ने, रेट बढ़ा डाला बाई ने 
दूर पकौड़ी, प्याज रुलाये, हरी मिर्च भी आंख दिखाये
घर में नहीं टमाटर रहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥६॥

सबसे पहले रेल किराया, बोले बरसों बाद बढ़ाया
पेश बजट तो ऊँचा शोर, संसद बहस करे घनघोर
किले हवाई लगते ढहने, वाह जुलाई के क्या कहने॥७॥

लॉर्ड्स जीतकर मारा तुक्का, अगले टेस्ट में खाया धक्का
कॉमनवेल्थ पदक की होड़, भारत की कुश्ती बेजोड़
जीत लिए सोने के गहने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥८॥

नटवर करे प्रहार करारा, त्याग नहीं नाटक था सारा
सहजादे ने रोकी राह, भीतर ही दब गयी कराह
चाटुकार अब लगे बहकने, वाह जुलाई के क्या कहने ॥९॥

कैसा अंगरेजी आयोग, अजब गजब का करे प्रयोग
प्रतियोगी हैं जन्तर-मन्तर, अंग्रेजी भारी है सबपर
निकल पड़े कुछ फिरसे जलने वाह जुलाई के क्या कहने ॥१०॥

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Tuesday, July 22, 2014

पीछे की अक्ल में आगे बुद्धिजीवी

नौ साल पहले सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा किये गये भ्रष्टाचार के पोषण के बारे में जस्टिस मारकंडेय काटजू ने जो खुलासा किया वह बहुत आश्चर्यजनक नहीं है; लेकिन इसपर जो बहस चल रही है वह बहुत ही रोचक होती जा रही है। एक राज्य के मुख्यमंत्री द्वारा एक जिला जज को उसके द्वारा पूर्व में किये गये उपकार (जमानत) के बदले हाईकोर्ट में एडिशनल जज बनवा दिया गया; फिर उसका कार्यकाल बढ़वाने का सफल प्रयास किया गया; हाई-कोर्ट में उस जज ने कुछ और उपकार कर दिये होंगे जिससे खुश होकर उसका कार्यकाल और बढ़वाने फिर स्थायी जज बनवाने का इन्तजाम भी नेता जी द्वारा कर दिया गया। इस इन्तजाम के तहत ही केन्द्र सरकार को दिये जा रहे समर्थन के बदले प्रधानमंत्री की सिफारिश से भारत के चीफ जस्टिस की कृपा भी प्राप्त कर ली गयी। चीफ जस्टिस ने प्रधानमंत्री जी की खुशी के लिए उस जज के खिलाफ़ खुफिया रिपोर्ट को थोड़ा अनदेखा कर दिया। बस इत्ती सी तो बात है।

सामान्य दुनियादारी की समझ रखने वाले एक साधारण बुद्धि के मनुष्य के लिए इसमें कुछ भी अजूबा नहीं है। लेकिन देश के भारी भरकम बुद्धिजीवी और पत्रकार इस बात को लेकर हलकान हुए जा रहे हैं। लगता है कि इन लोगों को न्यायपालिका में इसके पहले भ्रष्टाचार के कोई चिह्न ही नहीं दिखे थे। जबकि आम आदमी निचले स्तर पर यह सब रोज ही झेल रहा है। चैनेल वाले तो ऐसे बदहवास हैं मानो मनमोहन सिंह के बारे में कोई बहुत गूढ़ और अनसुनी बात खुलकर सामने आ गयी हो। जबकि देश की जनता ने मौनी बाबा की हकीकत समझकर उन्हें कबका किनारे लगा दिया है।

लूट, डकैती , हत्या, बलात्कार, इत्यादि की घटना घटित हो जाने और अपराधी के बच निकलने और भाग जाने के बाद जब लोग इकठ्ठा होते हैं तो एक से एक बढ़िया तरीके बताते हैं कि उस समय क्या किया जाना चाहिए था। चुटकी में पॉलिसी और स्ट्रेटजी बनाने वाले एक से एक विशेषज्ञ प्रकट हो जाते है। दरअसल असली मौके की नज़ाकत  और तात्कालिक परिस्थिति की मजबूरियों को न समझने का सुभीता इन रायचंदों के पास खूब होता है।

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टाइम्सनाऊ पर जस्टिस काटजू के सामने बहस के लिए राम जेठमलानी और सोली जे.सोराबजी आये थे। तीनो अपने क्षेत्र के धुरन्धर और ख्यातिनाम। पहली बार अर्नब गोस्वामी को कम बोलते और सीमित टोका-टाकी करते देखकर अच्छा लगा। मजेदार बात यह थी कि कानून के तीनो दिग्गज एक दूसरे से असहमत होते हुए भी सच्चाई से बोलते दिखे।

सोराब जी ने कहा कि काटजू की बात पर कोई संदेह नहीं किया जा सकता लेकिन इन्होंने यह बात खोलने में बहुत देर कर दी जो एक प्रकार से अपने कर्तव्यों की उपेक्षा है। इन्हें पता था कि एक भ्रष्ट आदमी को जज बनाया जा रहा है लेकिन उन्होंने इसे रोकने के लिए जितना करना चाहिए था उतना नहीं किया। राम जेठमलानी ने भी कहा कि मैं होता तो चीफ जस्टिस द्वारा अनसुना कर दिये जाने पर चुप नहीं बैठता और आगे बढ़कर इसका खुला विरोध कर देता। जेठमलानी का मत था कि काटजू को शायद उस भ्रष्ट जज द्वारा किया जाने वाला नुकसान उतना बड़ा नहीं लगा होगा जितना उनके द्वारा अनुशासन तोड़ देने पर न्यायपालिका की छवि को होता। काटजू से यह रहस्योद्घाटन करने में इतनी देर करने की वजह जेठमलानी को बिल्कुल समझ में नहीं आ रही थी।

जब दोनो की घेरेबन्दी को अर्नब गोस्वामी ने काटजू के ऊपर और कसना शुरू किया तो काटजू ने झल्लाकर कहा- ये दोनो लोग कानून के बहुत बड़े जानकार भले ही होंगे, वकील भी बहुत बड़े होंगे लेकिन ये कभी जज नहीं रहे हैं। इसीलिए मेरी बात ये लोग नहीं समझ पा रहे हैं। न्यायमूर्ति की कुर्सी पर बैठे रहते हुए मैं पब्लिक के बीच कोई मुद्दा कैसे उठा सकता था? मैंने जीफ जस्टिस को इस बारे में पूरी बात बता दी थी। इससे ज्यादा मैं और क्या कर सकता था?

इसपर जेठमलानी बोले कि आपकी मजबूरी तभी तक थी न जबतक आप न्यायमूर्ति थे। छोड़ देते कुर्सी और आ जाते मैदान में। मैं तो इस्तीफा दे देता और इस भ्रष्टाचार की पोल खोल देता। इसपर काटजू ने पहले तो हँसकर मौज लेने की कोशिश की लेकिन बाद में गंभीर होकर बोले कि बेहतर होगा कि आप वकालत से ही इस्तीफा दे दीजिए। उनका आशय शायद यह था कि देश के सभी बड़े-बड़े अपराधी और घोटालेबाज जेठमलानी जी के मुवक्किल होते हैं। काटजू ने यह भी याद दिलाया कि उन्होंने अपनी मर्यादा में रहते हुए भी जो किया वह पहले किसी ने नहीं किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट में ‘जज-अंकल’ की सड़ांध के बारे में उन्होंने ही खुलेआम चीफ जस्टिस को बताया था और उसपर कार्यवाही हुई थी।

उधर मनमोहन सिंह अभी साल भर पहले ही प्रधानमंत्री बने थे। उनकी कुर्सी सोनिया गांधी के आशीर्वाद के साथ साथ करुणानिधि की कृपा पर भी टिकी थी। हाईकोर्ट के एक भ्रष्ट जज को रोकने के लिए क्या वे अपनी सरकार चली जाने देते? लेकिन आज सबलोग यही कह रहे हैं कि उन्हें वह सिफारिश नहीं करनी चाहिए थी। भले ही करुणा बाबू अपना समर्थन खींच लेते। इन लोगों से कैसी महानता की आशा कर लेते हैं हम?  बहुत भोले हैं न हम सब?

Monday, June 30, 2014

अच्छे दिन की जल्दी मची है…

विज्ञान भवन सभागार में उद्योग और व्यापार संबंधी सम्मेलन में मनमोहन सिंह के भाषण के बाद नरेन्द्र मोदी ने जब उनकी इस बात का समर्थन अपने खास अन्दाज में किया कि भारत की बिगड़ी अर्थव्यवस्था में जल्द ही सुधार होगा और अच्छे दिन आएंगे तो इसका अर्थपूर्ण ढंग से तालियाँ बजाकर स्वागत करने वालों ने भी नहीं सोचा होगा कि अच्छे दिन का जुमला इतनी दूर और इतनी देर तक लोगों की जुबान पर चढ़ा रहेगा। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा ने जमकर यह नारा लगाया और भुनाया। कुछ इस तरह कि यदि जनता ने वोट देकर भाजपा को जिता दिया तो चुनाव के परिणाम घोषित होते ही देश का काया-पलट हो जाएगा।

ऐसे वादे हुए मानो गरीबी, अशिक्षा, महंगाई और भ्रष्टाचार समुद्र में डूबकर आत्महत्या कर लेंगे, गाँव- गाँव में तेल के कूँए निकल आएंगे, जमीन में से हजारो टन सोना सही में बाहर आ जाएगा, लोगों का बैंक में जमा सारा रूपया डॉलर में तब्दील हो जाएगा और स्विस बैंक से काला धन मालगाड़ी में लादकर भारत चला आएगा, बेरोजगारी उड़न-छू हो जाएगी, सभी अपराधियों का हृदय परिवर्तन हो जाएगा और बलात्कारी साधुवेश धारणकर तीर्थाटन पर निकल जाएंगे । जनता ने शायद इसी तरह के चमत्कार की आशा में प्रचंड बहुमत से उन्हें जिता भी दिया।

अब जबकि झटपट रेल का किराया बढ़ा दिया गया है, एक महीने के भीतर दूसरी बार पेट्रोलियम उत्पादों के दाम बढ़ रहे हैं और देश की बाकी चीजें जहाँ की तहाँ वैसी ही बनी हुई हैं तो वही जनता सरकार पर पिल पड़ी है। क्या यही हैं अच्छे दिन? मानो मोदी सरकार ने घोर अनर्थ और भयंकर धोखा कर डाला हो उनके साथ। सरकार को खरी-खोटी सुनाने में कांग्रेस समर्थक और वामपंथी खेमा तो स्वाभाविक रूप से आगे है लेकिन बहुत से पार्टी-लाइन से स्वतंत्र विचार रखने वाले और कुछ भाजपा समर्थक भी इस हो-हल्ले में शामिल हो गये दिख रहे हैं।

कोई यह मानने को तैयार नहीं कि चुनावी मौसम की जुमलेबाजी और यथार्थ के धरातल पर नीति निर्माण और शासन का संचालन बिल्कुल दो अलग बातें हैं। बिगड़ी हुई अर्थ-व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जिस कठिन संयम, कठोर अनुशासन और संयत धैर्य की आवश्यकता है उसका संज्ञान लेने की सुध सोशल मीडिया के लिक्खाड़ों से लेकर अखबार के संपादकों और न्यूज चैनेलो के पैनेलो में बोलने वाले विशेषज्ञों में भी नहीं दिख रहा है। चुनाव में करारी शिकस्त खाने वाले कांग्रेसी अपनी दस साल की करनी को भूलकर इस बात से खफा हैं कि इसी एक महीने में वह चमत्कारी परिवर्तन हुआ क्यों नहीं। वामपंथी और ‘सेकुलर गिरोह’ की तो बाछें खिली हुई हैं कि जनता का मोहभंग इतना जल्दी हो गया।

देश की अर्थव्यवस्था कैसे चलती है और किसी आर्थिक नीति का प्रभाव कितने दिनों बाद दिखायी देता है यह सब सोचने-समझने की किसी को फुर्सत नहीं है। बौद्धिक स्तर पर खुद से बेईमानी भरी सोच के एक से एक नमूने दिखायी दे रहे हैं।

किसी अच्छे-भले घर को सिर्फ़ रंगवाने-पुतवाने का काम कराना हो तो भी कुछ दिन के लिए इसमें रहने वालों को परेशानी का सामना करना पड़ता है, बजट के संतुलन के लिए कुछ दूसरे कामों को रोकना पड़ता है तब जाकर काम पूरा होता है। सोचिए अगर किसी इमारत की हालत बेहद कमजोर हो जाय, उसकी दीवारें खराब हो जायें, नींव की ताकत पर भी संदेह हो जाय तो उसे ठीक और मजबूत करने के लिए क्या-क्या करना पड़ेगा। शर्त यह भी है कि इमारत को ठीक तो करा दिया जाय लेकिन इसके लिए इसमें निवास करने वालों को कोई तकलीफ़ न हो, उन्हें इमारत से न तो बाहर निकालना है और न ही पूरी इमारत को गिराकर नये सिरे से बनाना है।

अब ऐसा चमत्कार तो कोई जिन्न ही कर सकता है जिसे अलादीन अपने चिराग से निकालते थे। फिलहाल मोदी सरकार के पास कोई जादू की छड़ी है नहीं। आपने अगर इस मुगालते में वोट दे दिया था तो आप घामड़ किस्म के इंसान हैं। आप अपने निर्णय पर पछता लीजिए, अपने बाल नोच लीजिए, स्टेटस डालकर पूरी भड़ास निकाल लीजिए। अच्छे दिन की इतनी जल्दी है तो छत से कूद जाइए लेकिन उसे आना होगा तो भी वह अपना समय लेकर ही आएगा। अभी जो वातावरण है उसमें तो नहीं आने वाला है अच्छा दिन।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Thursday, June 19, 2014

मन कहे तो गुनगुनाइए

यह गीत उन तमाम सरकारी सेवकों को समर्पित है जिनकी दिनचर्या में हंसने, मुस्कराने और गुनगुनाने के लिए कोई अवसर नहीं मिल पाता। मुझे लगता है कि वे कोशिश करें तो अवसर जरूर मिलेगा। बस थोड़ी सोच बदलनी होगी।

मन कहे तो गुनगुनाइए

मन कहे तो गुनगुनाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए
राग और छंद बिगड़ते हैं तो बिगड़े
दिल की बात लब पे लाइए।

बात आपकी सुने या अनसुना करे जहाँ
प्यार दे दुलार दे या छोड़ दे जहाँ तहाँ
खुद ही देखिए भला क्या मान अपमान है
फिक्र नहीं कीजिए क्या सोचता जहान है
कभी अपने से मुस्कुराइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

संवेदना मन की हमको जगाये
अंतस की पहचान हमसे कराये
मन के सवालो की भरपाई करती
ओजस्वी आशा की प्राणवायु भरती
फिर निराशा न उपजाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

देश के प्रदेश के विकास के हरास की
मन में फ़िक्र होने लगे डूब रही आस की
इष्ट मित्र भाई बंधु टूटते समाज की
धर्म में अधर्म और जाति के रिवाज की
थोड़ी देर भूल जाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

कामकाज खोज रहे जीविका की चाह में
छोड़ दिए राग रंग जो भी मिले राह में
भौतिक सुख साधन से घर आँगन भरते
माया की खातिर जाने क्या क्या करते
थोड़ा खुद पे तरस खाइए
मन कहे तो गुनगुनाइए

29.05.2014
सत्यार्थमित्र
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Saturday, May 31, 2014

कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है

चुनावी कार्यक्रम की जिम्मेदारियों से निवृत्त होने के बाद तरही नसिश्त के संयोजक से मुलाकात हुई। उन्होंने कहा कि अगली बैठक में तो आना ही पड़ेगा। मैंने पूछा मिसरा क्या है तो बोले – “कितना रौशन-रौशन उसका चेहरा है।” फिर क्या था मेरे भीतर शायरी का कीड़ा कुलबुलाने लगा। इसके बाद जो कुछ अवतरित हुआ है वह आपकी नज़र करता हूँ :

कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है

(भाग-१)

कितना रौशन रौशन उसका चेहरा है
बैठा उस पर काले तिल का पहरा है

आँखें अपलक देख रहीं हैं सूरत को
दिल भी मेरा उसी ठाँव पर ठहरा है

प्यारी सूरत से ही प्यार हुआ है जो
प्यार का तूने सीखा नहीं ककहरा है

जिसने सूरत से बेहतर सीरत समझा
उसके सर पर सजता सच्चा सेहरा है

चक्कर खा गिर पड़े अचानक अरे मियाँ
बस थोड़ा सा उसका आँचल लहरा है

 

(भाग-२)

वह पुकारती रही सांस थम जाने तक
उसे पता क्या यह निजाम ही बहरा है

अच्छे दिन आने की आस लगी मुझको
मुस्तकबिल उनके संग बड़ा सुनहरा है

वो आये तो अन्धकार मिट जाएगा
ऐतबार इस चमत्कार पर गहरा है

नौजवान उठ खड़ा हुआ तो ये समझो
छंटने वाला बदअमनी का कोहरा है

जिसके सर तोहमद है कत्लो गारद की
गुनहगार वो असल नहीं बस मोहरा है

बदल गयी है बात चुनावी मौसम की
राजनीति का यह चरित्र ही दोहरा है

बैरी ने हमको जब भी ललकारा है
उसके सर पे सदा तिरंगा फहरा है

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Thursday, May 29, 2014

बदलाव की बातें

new governmentसभी ज्योतिषियों, चुनावी पंडितों व भाजपा सहित सभी राजनीतिक पार्टियों के अनुमानों को धता बताते हुए नरेन्द्र मोदी ने अपनी बेहतरीन नेतृत्व क्षमता, उपलब्ध संसाधनों के प्रभावशाली प्रयोग के कौशल और विपक्षी की हर बात का माकूल जवाब देने की चतुराई से लोकसभा के चुनाव में रिकॉर्ड सफलता अर्जित करते हुए देश के पंद्रहवें प्रधानमंत्री के रूप में कुर्सी संभाल ली है। राहुल गांधी, सोनिया गांधी और बाद में सक्रिय हुई प्रियंका गांधी के पास मोदी के हमलों का कोई जवाब नहीं था। कुछ सस्ते किस्म के सिखाये हुए जुमलों और मुहावरों से मोदी के गंभीर, तार्किक और तथ्यपूर्ण भाषणों का कोई मुकाबला नहीं किया जा सका। भ्रष्टाचार, मंहगाई और सरकारी अकर्मण्यता से उकताई हुई जनता को “अच्छे दिन आने वाले हैं” की धुन में एक आशा का राग सुनायी पड़ा और उसने जाति, धर्म और क्षेत्रीयता की बंटवार से बाहर आकर एक ऐसा जनादेश दे दिया जिसमें अनेक समस्याओं का समाधान समाया हुआ था। ऐसी समस्याएँ जिनसे पिछली अनेक सरकारें ग्रसित थीं। आइए देखते हैं क्या-क्या बदल गया है :

  1. रिमोट कंट्रोल : सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब सत्ता का असली अधिकार भी उसी के पास है जिसके पास जवाबदेही की जिम्मेदारी है। नरेन्द्र मोदी ने अपनी मेहनत और योग्यता से जो सत्ता हासिल की है उसके महत्वपूर्ण नि्र्णयों के लिए उन्हें किसी अन्य अधिष्ठान की ओर ताकने की जरूरत नहीं होगी।
  2. गठबंधन : लंबे समय से क्षेत्रीय क्षत्रपों ने अपनी स्वार्थी राजनीति से बहुदलीय गठबंधन वाली सरकारों को परेशान कर रखा था। किसी राष्ट्रीय-नीति के निर्माण और क्रियान्वयन जैसी कोई बात हो ही नहीं सकती थी। अपने क्षेत्र में धुर विरोधी राजनीति करने वाले नेता भी एक साथ केन्द्र सरकार को भीतर या बाहर से समर्थन देकर अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति कर रहे थे।
  3. अस्थिरता : पिछली सरकारों की सबसे बड़ी चिन्ता मात्र सरकार को बचाये रखने की ही रहती थी। घटक दलों में से कोई नाराज न हो जाय इसके लिए तमाम जतन करने पड़ते थे। सीबीआई लगाने से लेकर लालबत्ती देने तक के तमाम हथकंडे जिनकी देश के विकास और राष्ट्र के निर्माण में कोई भूमिका नहीं थी।
  4. अनिर्णय : निर्णय लेने वाले इतने केन्द्र हुआ करते थे कि कोई एक निर्णय लेना लगभग असंभव था। कुछ निर्णय ले भी लिए गये तो उनके लागू होने से पहले कोई न कोई बिदक गया और कागज फाड़ कर फेंक दिया गया। रोचक बात यह है कि लोगों को ऐसे फाड़ू निर्णय मजेदार लगने लगे।
  5. देसी-विदेशी : बार-बार यह सफाई देने से निजात मिली कि सत्ता की असली चाभी शुद्ध भारतीय हाथों में ही है, कोई विदेशी शक्ति सत्ता के गलियारों में नियंत्रक की भूमिका में नहीं है।
  6. लिखित-वाचन : अब हमें स्वाभाविक भाषण सुनने को मिला करेंगे। बोलने वाला यह समझता भी रहेगा कि किस विषय पर बात कर रहा है। लिखी हुई स्क्रिप्ट बाँचने के चक्कर में हमारे नेता नर्मदा योजना को नर-मादा योजना से कन्फ़्यूज नहीं करेंगे।
  7. राज-परिवार : फिलहाल देश में अब जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को किसी राज परिवार के प्रति अपनी निष्ठा सिद्ध करने के लिए अपनी गरिमा और स्वतंत्र विचार का बलिदान नहीं करना पड़ेगा। बहुत से प्रतिभाशाली नेता इस अपरिहार्य चरण-वंदना की वृत्ति के कारण कांतिहीन होकर अपनी दुर्गति को प्राप्त हो गये। उम्मीद है कि नयी सरकार जाति और वंश पर ध्यान दिये बिना प्रतिभा और योग्यता के आधार पर बेहतर काम का अवसर देगी।
  8. पिलपिली उदारता : भ्रष्टाचार, महंगाई, अल्पसंख्यकवाद, क्षेत्रीयतावाद, परिवारवाद, विदेशी घुसपैठ, सांप्रदायिक उन्माद, झगड़े और ब्लैकमेलिंग के प्रति एक लिजलिजे उदार दृष्टिकोण को अब जगह नहीं मिलने वाली। कम से कम गुजरात में सफल मोदी मॉडल के आधार पर ऐसी उम्मीद की जा सकती है।
  9. सेकुलर-कम्युनल विमर्श : चुनाव परिणाम देखकर भारतीय राजनीति के सेकुलर खेमे के सभी सूरमाओं की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी है। वे सोच रहे होंगे कि देश की भतेरी जनता ही कम्युनल हो गयी है। जब तक वे इस सदमे से बाहर नहीं आते तबतक यह विमर्श ठंडे बस्ते में रहेगा।
  10. दूरदर्शन : सरकारी टेलीविजन के समाचारों में दिखने वाले चेहरों और पैनेल डिस्कसन के विशेषज्ञों का नया सेट आ गया है। कुछ दिनों तक इस चैनेल की टीआरपी ऊँची रहने वाली है।
  11. पप्पू और फेंकू : सोशल मीडिया के इन दो दुलारों को अब बहुत मिस किया जाएगा। पप्पू शायद कहीं पढ़ाई करने चले जाय और फेंकू ने राजनैतिक पटल पर जो-जो बीज फेंके थे उनके जमीन से उग आने पर खेत में निराई-गुड़ाई करने और उसकी फसल काटने में व्यस्त हो जाएंगे।

बदलाव तो और भी बहुत से होने वाले हैं; लेकिन सब के सब मैं ही थोड़े न बताऊँगा। कुछ आप भी गिनाइए, अपनी नजर से देखकर। टिप्पणी बक्सा इसीलिए तो खुला है। Smile

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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छपते-छपते- इधर मैंने 11 तक गिनती पूरी की उधर धारा-370 पर “ले तेरी की - दे तेरी की” शुरू हो गयी है। मैंने तो यह सोचा ही नहीं था। मतलब सरप्राइज एलीमेन्ट भी भरपूर रहने वाला है।

Wednesday, April 30, 2014

सोलहवें का सुरूर…

16th year आज सोलहवीं लोकसभा के लिए वोट डाल कर आया हूँ। चुनावी ड्यूटी की जिम्मेदारी थी इसलिए रायबरेली में बना रहना अनिवार्य था। वर्ना आज लखनऊ जरूर जाता। इसलिए कि आज उस घड़ी को याद करने का दिन भी है जब मेरे जीवन में युगान्तकारी परिवर्तन की शुरुआत हुई; जब मेरे मन पर और मेरी इच्छाओं पर स्थायी लगाम लगाने की ठोस व्यवस्था सुनिश्चित कर दी गयी थी। जी हाँ, आपने ठीक समझा। इसी तारीख को मेरी शादी हुई थी। पन्द्रह साल पहले। आज से मैं दांपत्य जीवन के सोलहवें साल में प्रवेश कर रहा हूँ।

मैं इस सालगिरह को चुनाव की भेंट चढ़ाने का दोष लेकर कैसे रह जाता…! इसलिए मैंने लखनऊ से श्रीमती जी और बच्चों को रायबरेली बुला लिया। एक तरफ़ नौकरी और दूसरी तरफ़ बच्चों की शिक्षा की जरूरतों को एक साथ साधने के लिए और साथ ही एक-दूसरे का साथ पाने के लिए हम दोनो के लिए लखनऊ और रायबरेली की दूरी नापते रहने की मजबूरी साथ लग गयी है। कुछ वैसे ही जैसे केन्द्र में सरकार चलाने के लिए दूसरे दलों से गठबंधन करने की मजबूरी होती है। इस मजबूरी की आगे भी जारी रहने की संभावना है, अगली सरकार की ही तरह। अपनी शादी के सोलहवें साल के बारे में सोचते-सोचते मुझे सोलहवी लोकसभा का ध्यान आ जाता है और कभी इसका उल्टा भी।

इस चुनाव के बाद ज्यादा संभावना यही है कि सत्ता की सेज पर जमे रहने के लिए सबसे बड़े दल को छोटे-छोटे दूसरे दलों के साथ गठबंधन करना पड़ेगा, उनके नखरे उठाने पड़ेंगे, अपना मैनीफेस्टो ताख पर रखकर उनके साथ न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय करना पड़ेगा; और रोज-ब-रोज उनके मूड का ख्याल रखना पड़ेगा। ना जाने कौन सी बात उन्हें नागवार लगे और बिदककर समर्थन वापस ले लें। एक मदारी की तरह हाथ में लोकलुभावन घोषणाओं का बाँस लेकर संतुलन बनाते हुए आसमान में तनी हुई सत्ता की रस्सी पर चलना होगा। सारा ध्यान बस इसपर कि इस छोर से उस छोर तक सकुशल पहुँच सके।

शादी की सत्ता भी कुछ ऐसा ही कौशल मांगती है। यह भी ऐसा ही गठबंधन है कि अपनी छोड़ अपने पार्टनर के बारे में ज्यादा सोचना पड़ता है, सोलहवाँ साल आते-आते तो कुनबा बढ़कर ऐसा हो जाता है कि आप पूरी तरह अल्पमत में आ जाते हैं। आप की कोई नहीं सुनता और आपको सबकी सुननी पड़ती है। बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़ों तक जो जैसा कहे आपको वैसा ही करना पड़ता है। बिल्कुल यूपीए-टू की तरह।  अभी एक मित्र ने फेसबुक पर स्टेटस डाला कि शादी के पहले तो सभी केजरीवाल होते हैं लेकिन बाद में मनमोहन बन जाना पड़ता है। ठीक ही कहा है, कमोबेश सबका अनुभव ऐसा ही होता होगा।

जीवन के सोलहवें साल का जो सुरूर होता है वह शादी के सोलहवें साल में शीर्षासन करता दीखता है। वह उमंग, वह उत्साह, वह क्रान्ति कर डालने का जज़्बा, कुछ भी कर डालने की ऊर्जा का एहसास लेकर जब सोलह साल की उम्र में हम स्कूल से कॉलेज पहुँचते हैं और अपने करियर की जद्दोजहद के बाद नौकरी और शादी का पायदान छू लेते हैं तो जीवन एक उत्सव लगने लगता है।

इस उत्सव को और आगे तक ले जाने के लिए हमें एक साथी मिलता है, जीवन भर साथ निभाने को। ऐसी घड़ी को याद करने और अच्छा महसूस करने का समय तो निकालना ही चाहिए। छोटी-छोटी खुशियों को सहेजकर ही हम जीवन में उमंग और उत्साह को बनाये रख सकते हैं और शादी की सत्ता का स्वाद लंबे समय तक ले सकते हैं। सोलहवें के सुरूर को जो जितनी दूर तक खींच कर ले जा सके वह उतना ही धन्य है। इष्टमित्रों व रिश्तेदारों की शुभकामनाएँ भी तो इसी लिए हैं।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Friday, April 18, 2014

वृक्ष और बालक

child-climbing-treeबहुत पुरानी बात है। गाँव में एक विशाल आम का पेड़ था। बहुत घना और छायादार जो गर्मियों में फल से लदा रहता था। उसमें फलने वाले छोटे-छोटे देसी (बिज्जू) आम जो पकने पर पूरी तरह पीले हो जाते थे बहुत मीठे और स्वादिष्ट थे। निरापद इतने कि चाहे जितना खा लो नुकसान नहीं करते थे।

एक छोटा बच्चा उस पेड़ को बहुत पसंद करता था। वह रोज आकर उसके नीचे खेलता, उसके ऊपर तक चढ़ जाता, आम तोड़कर खाता और उसकी ठंडी छाँव में सोकर आराम करता। उसे पेड़ से बहुत प्यार था और पेड़ को भी उससे बहुत लगाव हो गया था।

कुछ साल बीत गये। बच्चा अब कुछ बड़ा हो गया था। अब वह पेड़ के नीचे खेलने नहीं आता था। पेड़ भी उसके दूर हो जाने से उदास रहता था। एक दिन  वह लड़का अचानक पेड़ के पास आया और बहुत बुझा-बुझा लग रहा था।

पेड़ ने उसे देखा तो बहुत खुश हुआ, चहककर बोला- “आओ-आओ, मेरे साथ खेलो।”

बच्चे ने जवाब दिया - “मैं अब छोटा बच्चा नहीं रहा जो पेड़ के आस-पास खेलता रहूँ। अब मुझे खेलने के लिए अच्छे खिलौने चाहिए। उसके लिए रूपयों की जरूरत पड़ती है और मेरे पास रूपये हैं ही नहीं...!”

पेड़ सोच में पड़ गया, फिर बोला, “ओह! लेकिन मेरे पास तो रूपये हैं नहीं जो तुम्हें दे सकूँ। अलबत्ता तुम मेरे सारे आम तोड़ सकते हो और उन्हें बाजार में बेच सकते हो। इससे तुम्हें रूपये मिल जाएंगे।”

यह सुनकर बच्चा खुशी से उछल पड़ा। उसने फौरन पेड़ के सारे आम तोड़ डाले और उन्हें लेकर बाजार की ओर चल पड़ा। उसके बाद लड़का फिर नहीं लौटा। पेड़ फिर से उदास रहने लगा।

कुछ साल बाद वही लड़का जो अब बड़ा होकर एक युवा आदमी बन चुका था, पेड़ के पास लौटकर आया। उसे देखकर पेड़ बहुत खुश हुआ। बोला- “आओ-आओ, मेरे साथ जी भरकर खेलो।”

“मेरे पास अब खेलने का समय नहीं है। मुझे अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए काम करना पड़ता है। बहुत व्यस्त रहता हूँ। अभी हमें रहने के लिए एक घर बनाना है। क्या तुम इसमें हमारी कोई मदद कर सकते हो?”

पेड़ फिर सोच में पड़ गया और बोला, “ओह! लेकिन मेरे पास तो रूपये हैं नहीं जो तुम्हें दे सकूँ। अलबत्ता तुम मेरी शाखाओं को काटकर अपने घर के काम में ला सकते हो।”

युवक के मन की मुराद पूरी हो गयी। उसने बिना देर किये पेड़ की मोटी-मोटी शाखाओं को काट डाला और उन्हें ट्रक में लादकर ले गया। जाते समय युवक बहुत प्रसन्न था और पेड़ भी उसकी खुशी देखकर मुस्करा रहा था। युवक उसके बाद फिर कई साल तक नहीं लौटा। पेड़ अकेला उदास रहते हुए उसकी बाट जोहता रहता।

एक दिन भीषण गर्मी के दिन वह आदमी अचानक दिखायी पड़ा। पेड़ इतने सालों बाद उसे देखकर बहुत प्रसन्न हुआ।

“आओ-आओ, मेरे साथ खेलो।” पेड़ ने मुस्कराकर आमंत्रण दिया।

“नहीं-नहीं, अब मेरी वो उम्र नहीं रही। अब तो मैं देश भर की सैर करना चाहता हूँ। दुनिया देखना चाहता हूँ। छुट्टियों में घूमना चाहता हूँ। हाँ, इसके लिए मुझे एक नाव की जरूरत है। क्या तुम मेरी कोई सहायता कर सकते हो?” उस आदमी ने बेहद अनौपचारिक ढंग से कहा।

“हाँ-हाँ, क्यों नहीं। नाव बनाने के लिए तुम मेरे तने का प्रयोग कर सकते हो। इसमें इतनी लकड़ी निकल आएगी कि तुम्हारी नाव तैयार हो जाय। इससे तुम दूर-दूर तक घूमना और खुश रहना।” पेड़ ने उत्साह पूर्वक कहा।

इतना सुनकर आदमी ने मजदूर बुलाये और पेड़ का मोटा तना काटकर ले गया। उसने बड़ी सी नाव बनवायी और सैर पर निकल गया। कई साल तक उसका पता नहीं चला। कट चुके तने के बाद बेहाल पेड़ वहीं पड़ा रहा।

अन्त में कई साल बाद वह आदमी फिर एक दिन वहाँ लौटा। थका-हारा उदास चेहरा लेकर।

“ओह! मेरे बच्चे, लेकिन अब तो मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है जो तुम्हें दे सकूँ। अब तो आम भी नहीं हैं।” पेड़ उसे देखते ही दुखी होकर बोला।

“कोई बात नहीं।” उस प्रौढ़ आदमी न कहा, “वैसे भी अब आम खाने लायक मैं नहीं रह गया हूँ। दाँत भी टूट चुके हैं और मधुमेह का रोगी अलग से हो गया हूँ।”

पेड़ बोला, “मेरा तो तना भी नहीं बच रहा और न ही शाखाएँ जिनपर तुम चढ़ सको।”

“वे होतीं तब भी मैं कैसे चढ़ पाता? अब बूढ़ा जो हो गया हूँ।” आदमी ने कैफ़ियत दी।

पेड़ रो रहा था। बोला- “असल में अब तुम्हें देने को मेरे पास कुछ भी नहीं बचा है। क्या करूँ अब? अब तो केवल ये जड़ें बची हैं; ये भी धीरे-धीरे सूख रही हैं।”

“मुझे आपसे अब कुछ चाहिए भी नहीं। बस आराम करने के लिए एक शान्त स्थान चाहिए। मैं भी इतने सालों की भाग-दौड़ में थक गया हूँ।” आदमी ने जवाब दिया।

“तब तो बहुत अच्छा है, पुराने पेड़ की मोटी जड़ टेक लेकर आराम करने के लिए बहुत सुविधाजनक होती है। आओ, मेरे पास बैठो और आराम करो।” आदमी वहाँ टेक लेकर बैठा तो बूढ़ा पेड़ प्रसन्न होकर मुस्कराने लगा। खुशी के आँसू छलक पड़े।child-and-tree1

***

यह कहानी यहीं खत्म होती है। लेकिन हमारे समाज में यह कहानी रोज दुहरायी जाती है। यह कहानी हम सबकी है। यह पेड़ हमारे माता-पिता ही तो हैं। बचपन में हमें उनकी गोद में खेलना अच्छा लगता है। जब हम बड़े हो जाते हैं तो उन्हें छोड़कर चले जाते हैं। जब हमें उनसे कुछ चाहिए होता है तभी लौटते हैं; या जब कोई संकट आता है। इसके बावजूद माता-पिता हमारे लिए, हमारी खुशियों के लिए हमेशा हाजिर रहते हैं; अपना सबकुछ सौंप देने को तैयार ताकि हम खुश रह सकें।

आप सोच सकते हैं कि इस कहानी में उस बच्चे ने उस पेड़ के साथ बहुत निर्दयता की; लेकिन हम भी शायद अपने माता-पिता के साथ कुछ ऐसा ही करते हैं। हम यह मानकर चलते हैं कि यह तो उनका काम ही है। वे हमारे लिए जो भी करते हैं उसका सम्मान करना, उसका महत्व समझना और उसे अपने व्यवहार से व्यक्त करना हम भूल जाते हैं। जब इसकी याद आती है तबतक बहुत देर हो चुकी होती है।

जिनके माता-पिता साथ हैं उन्हें इस अनमोल सौभाग्य के लिए ईश्वर को धन्यवाद देना चाहिए और श्रद्धा पूर्वक सेवा से उनको तमाम खुशियाँ देनी चाहिए। ऐसा न हो कि हमें उनका महत्व तब पता चले है जब वे हमें छोड़कर चले जाएँ।

(अनूदित)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Monday, March 31, 2014

वोट नहीं डालोगे तो लानत है तुमपर

  आगामी लोकसभा चुनावों की सबसे उत्साहजनक तस्वीर यह होने जा रही है कि इस बार वोट देने वालों की संख्या अबतक की सर्वाधिक होगी। जनसंख्या वृद्धि इसका एक कारण तो है ही लेकिन मैं जिस वृद्धि की बात कर रहा हूँ वह मतदान प्रतिशत की है; जो इस बार पिछले सारे रिकार्ड तोड़ने वाला है।

SVEEP Poster1अभी तक होता यह रहा है कि मतदाता सूची में जितने लोगों का नाम होता था उसमें से आधे से कुछ ही अधिक लोग वोट डालते थे, शेष या तो उस स्थान पर रहते ही नहीं थे या रहते हुए भी वोट डालना बेकार का काम समझते थे। इसका कुफल यह हुआ कि राजनीतिक दलों ने अपनी जीट के लिए पन्द्रह से बीस प्रतिशत मतदाताओं को खुश करने के आसान फॉर्मूले खोजने शुरू कर दिए। जाति और धर्म के आधार पर गोलबन्दी होने लगी, अगड़े-पिछड़े-दलित-अल्पसंख्यक वर्ग के लोग अपनी जातीय या सांप्रदायिक पहचान के आधार पर एकजुट होकर अपने को एक वोटबैंक के रूप में देखने लगे और प्रत्याशियों को चुनने के लिए उनकी जातीय या सांप्रदायिक पहचान को अपने मत का आधार बनाने लगे।

इसका परिणाम यह हुआ कि संकीर्ण क्षेत्रीयता और जातीयता का पोषण करने वाली पार्टियों को चुनावों में सफलता मिलने लगी और सत्ता मिलने के साथ ही एक नये प्रभु वर्ग का उदय हो गया जिसके बारे में घोटालों और भ्रष्टाचार की खबरे ज्यादा और जनहित के लिए काम करने की बातें कम सुनायी देती रहीं। हमारी चुनावी पद्धति ऐसी है कि प्रत्याशी को जीत के लिए आधे वोटों की भी जरूरत नहीं पड़ती इसलिए वह सच्चे बहुमत के बारे में सोचने की जरूरत ही नही समझता।

SVEEP Posterभारत के चुनाव आयोग ने ठीक ही अपना कर्तव्य समझा कि सच्चे अर्थों में लोकतंत्र तभी स्थापित होगा जब वास्तव में बहुमत से चुने हुए प्रतिनिधि देश की संसद और विधान सभाओं में जायें। इसके लिए एक सुविचारित रणनीति बनायी गयी है। यह एक कोशिश है देश की जनता को जगाने की, यह समझाने की कि वोट देना कितना जरूरी है। देश के प्रत्येक वयस्क नागरिक को यह कर्तव्यबोध कराने की कि दुनिया का तथाकथित सबसे बड़ा लोकतंत्र असफल हो जाएगा यदि देश की जनता के आलस्य और उदासीनता के कारण दोयम दर्जे के नेता देश की बागडोर सम्हालते रहेंगे।

इस अभियान की सफलता के लिए युद्ध स्तर पर प्रयास किये गये हैं। यह सुनिश्चित किया जाना है कि देश का संविधान जिस व्यक्ति को वोट देने का अधिकार देता है वह इस अधिकार का प्रयोग भी जरूर करे। इस अभियान को नाम दिया गया है– स्वीप; अर्थात्‌ Systematic Voters’ Education and Electoral Participation (SVEEP).

चुनाव आयोग ने यह महसूस किया कि देश की जनता को उसके मताधिकार के प्रति जागरूक करना जितना जरूरी है उससे ज्यादा जरूरी यह है कि वोट डालने की राह में आने वाली उन सभी बाधाओं को दूर किया जाय जो जागरूक वोटर को भी पोलिंग बूथ तक जाने से रोकती हैं।

देश के एक आम नागरिक को मतदाता के रूप में जो ज्ञान रखना चाहिए और वह वास्तव में जितना जानता है  इन दोनो में बड़ा अन्तर है। इस अन्तर को पाटने के लिए आयोग ने गंभीर प्रयास किये हैं। मतदाता पंजीकरण कैसे होगा, फोटोयुक्त मतदाता पहचान पत्र (EPIC) कैसे बनेगा, दूसरे पहचान-पत्र क्या हो सकते है, आपका मतदान केन्द्र कहाँ है, बूथ कौन सा है, ई.वी.एम. का प्रयोग कैसे करना है, चुनाव के दिन क्या करना है और क्या नहीं करना है, प्रत्याशी के लिए आदर्श आचार संहिता क्या है, धन-बल का प्रयोग करने वालों की क्या दवा है, समाज के कमजोर और असहाय तबकों का चुनाव के दौरान भयादोहन कैसे किया जा सकता है, और इसे रोकने  क्या उपाय हैं; इन सभी प्रश्नों का समुचित उत्तर बताने के लिए चुनाव आयोग ने बाकायदा एक कार्य योजना बनाकर जिम्मेदार अधिकारियों की फौज इसके क्रियान्वयन के लिए लगा रखी है।

आयोग ने कम मतदान प्रतिशत के लिए मोटे तौर पर जिन कारणों की पहचान की है वे हैं- त्रुटिपूर्ण व अधूरी मतदाता सूची, शहरी वर्ग की उदासीनता, लैंगिक विभेद, युवाओं की बेपरवाही इत्यादि। इनके निवारण के लिए मतदाताओं को शिक्षित करने, जागरूक करने और चुनाव संबंधी प्रशासनिक तंत्र को दक्ष बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाये गये हैं।

SVEEP Poster2 मतदाता सूची में अनेक फर्जी और गैरहाजिर लोगों के नाम भरे रहते थे जिन्हें गहन समीक्षा करते हुए निकाल दिया जा रहा है, घर से बाहर रहकर रोजी-रोटी कमाने वालों या सरकारी नौकरी करने वालों का नाम गाँव की सूची से निकालकर उनके सामान्य निवास के स्थान पर जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ऑनलाइन पंजीकरण की सुविधा तो है ही, सभी बूथॊं के लिए स्थानीय रूप से उपलब्ध एक-एक समर्पित कर्मचारी (BLO) की नियुक्ति करके उसे जिम्मेदारी दी गयी है कि वह उस बूथ से संबंधित मुहल्लों में घर-घर जाकर वैध मतदाताओं की सूची तैयार करेगा, उनके पंजीकरण का फॉर्म भरवाएगा, जो मर चुके हैं या कहीं बाहर चले गये हैं उनका नाम सूची से हटवाएगा और वैध व सच्ची मतदाता सूची तैयार करेगा। इस प्रकार तैयार की गयी अद्यतन सूची की प्रतियाँ बूथ के नोटिस बोर्ड पर लगायी जाएंगी, मतदाताओं की चौपाल लगाकर मतदाता सूची को त्रुटिरहित बनाया जाएगा।

सभी मतदाताओं का फोटोयुक्त पहचानपत्र तैयार कराकर घर-घर ले जाकर प्राप्त कराने तक की जिम्मेदारी इस बी.एल.ओ. को दी गयी है। अपने बूथ के प्रायः सभी मतदाताओं को यह व्यक्तिगत रूप से पहचान सकेगा। मतदान के दिन से तीन-चार दिन पहले ही सभी मतदाताओं को वोटर-पर्ची बनाकर उनके घर पर दे आने का जिम्मा भी यह कर्मचारी उठाएगा। अब पार्टियों की स्टॉल लगाकर पर्ची बाँटने के काम से छुट्टी कर दी गयी है।

लाखों की संख्या में जो सरकारी कर्मचारी, पुलिस और अर्द्ध सैनिक बलों के लोग चुनाव की ड्यूटी होने के कारण अपना वोट नहीं डाल पाते थे उनका वोट भी हर हाल में डलवाने की व्यवस्था कर ली गयी है। पोस्टल बैलेट से लेकर ड्यूटी वाले बूथ पर ही उनका वोट डलवाने के विकल्प खोले गये हैं। यह अभियान ‘पल्स पोलियो अभियान’ या ‘सर्व शिक्षा अभियान’ की याद दिलाता है जिसका नारा है- “एक भी बच्चा छूटने न पाये।” चुनाव आयोग भी चाह रहा है कि “एक भी वोटर छूटने न पाये।”

चुनाव आयोग मानो कह रहा है कि हे वोटर महोदय, इतनी कृपा कीजिए कि बूथ तक पहुँचकर अपना वोट डाल दीजिए। लोकतंत्र के मंदिर में वोटर को भगवान बनाने की यह मुहीम रंग लाने वाली है। प्रिन्ट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में, बौद्धिक सेमिनारों में और गाँव-गाँव की गली-गली तक इस संदेश को पहुँचाने की पुरजोर कोशिश की जा रही है। यह सब देखकर बस यही कहने का मन करता है कि इसके बावजूद यदि आप अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करते हैं तो लानत है।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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Thursday, March 20, 2014

चुनाव आयोग का पीपली लाइव

Election2014भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा त्यौहार शुरू हो गया है। यह महीनों चलेगा। राजनीतिक पार्टियाँ कमर कस चुकी हैं, निर्दल भी किस्मत आजमाने का मन बना चुके हैं, पाला बदलने वाले न्यूज चैनेल्स पर छाये हुए हैं, भाषण बाजी में खंडन और मंडन की जोर आजमाइश चल रही है, टिकट के लिए घमासान मचा हुआ है, पैराशूट से प्रत्याशी उतर रहे हैं, उनका विरोध करने वाले कार्यकर्ताओं को समझाया जा रहा है। उपमा अलंकार में घोड़े, गधे से लेकर गिरगिट तक की मांग बढ़ गयी है। उधर प्रशासनिक तंत्र की कमान चुनाव आयोग ने संभाल लिया है। स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने की चुनौती को खूब गंभीरता से लिया गया है। चुनाव जीतने के लिए धनबल और बाहुबल के प्रयोग पर अंकुश लगाना सबसे बड़ी चुनौती है जिसे चुनाव आयोग ने शीर्ष प्राथमिकता दी है।

चुनावों की घोषणा होते ही आदर्श आचार संहिता लागू हो चुकी है और सरकारी तंत्र का ध्यान चुनाव संबंधी हरेक गतिविधि पर केंद्रित हो गया है। चप्पे-चप्पे पर आयोग की निगरानी टीमें वीडियो कैमरे के साथ तैनात कर दी गयी हैं। प्रत्याशी और उसके समर्थकों की एक-एक गतिविधि पर निगाह रखी जा रही है। आम जनता को भी जागरूक किया जा रहा है कि उन्हें कहीं से भी इस बात की भनक लगे कि मतदाताओं को लुभाने के लिए अवैध रूप से रुपया, शराब, साड़ी या अन्य गिफ़्ट आइटम किसी प्रत्याशी या उसके कार्यकर्ताओं द्वारा बाँटा जा रहा है तो तत्काल टोल-फ्री नंबर पर बतायें। हर जिले में 24X7 आधारित कॉल-सेन्टर खोले जा रहे हें। शिकातकर्ता की इच्छा पर उसकी पहचान गोपनीय रखते हुए प्राप्त शिकायत पर त्वरित कार्यवाही की जाएगी। पुलिस अधिकारी व मजिस्ट्रेट सहित उड़न-दस्ता तैयार है। खबर मिलते ही रवाना होने को तत्पर। रिस्पॉन्स टाइम की मॉनीटरिंग हो रही है।

elections-2014-400x250एक लोकसभा क्षेत्र में करीब डेढ़ दर्जन उड़न दस्ते घूमते रहेंगे। इसके अलावा इतनी ही स्थैतिक निगरानी टीमें (Static Surveillance Team) भी प्रमुख चौराहों और कस्बों में आने-जाने वालों की संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखेंगी। सभी जनसभाओं व रैलियों की वीडियो रिकॉर्डिंग इस प्रकार करायी जाएगी कि इसमें प्रयुक्त झंडा, बैनर, पोस्टर, बैरिकेडिंग, तोरणद्वार, शामियाना, कुर्सी, मेज, सोफा, मंच, माइक, स्पीकर, पर्दे, गाड़ियाँ, फूल-माला, मुकुट, तलवार, शाल-टोपी, चाय-कॉफी, लंच-नाश्ता आदि की संख्या गिनी जा सके और निर्धारित दर पर इनका खर्च जोड़कर प्रत्याशी के खाते में चढ़ाया जा सके। यहाँ तक की प्रत्याशी द्वारा किसी वैवाहिक प्रीतिभोज में जाकर यदि अपने लिए वोट मांगा जाएगा तो उस भोज का पूरा खर्चा जोड़कर उसके खाते में डाल दिया जाएगा।

निगरानी में लगी सभी टीमें वीडियो रिकार्डिंग करने के बाद उसकी सीडी बनाएंगी और ‘क्यू-शीट’ पर संक्षिप्त विवरण लिखकर सीडी केन्द्रीय नियन्त्रण कक्ष में जमा करेंगी जहाँ वीडियो देखकर विस्तृत विवरण तैयार करने वाली अलग टीम होगी। यह टीम खर्चे का हिसाब लगाकर लेखा टीम को बताएगी। ये सारे खर्चे एक ‘छाया प्रेक्षण पंजी’ (Shadow Observation Register-SOR) में दर्ज किये जाएंगे जिनका मिलान प्रत्याशी द्वारा प्रस्तुत खर्चे से किया जाएगा। यदि उसने कोई खर्चा छिपाया होगा तो उसे यहाँ से जोड़ दिया जाएगा। नोटिस अलग से दी जाएगी।

अखबारों के विज्ञापन और पेड-न्यूज को चिह्नित करके उसका खर्चा प्रत्याशी के खाते में जोड़ने के लिए अलग एक्सपर्ट लगाये गये हैं। इन सबकी मॉनीटरिंग के लिए चुनाव आयोग अलग से व्यय प्रेक्षक (Expenditure Observer) तैनात कर रहा है।

सभी प्रत्याशियों के लिए अनिवार्य कर दिया गया है कि वे चुनाव लड़ने के प्रयोजन से एक अलग बैंक खाता खोलें और अपने सभी खर्चे इसी खाते से चेक काटकर भुगतान करें। जो भी सहयोग राशि या चन्दा उन्हें प्राप्त हो उसे पहले इस खाते में जमा करना होगा तब खर्च करना होगा। नगदी लेन-देन की सीमा तय कर दी गयी है। किसी एक व्यक्ति या फर्म को उसके सामान या सेवाओं के बदले संपूर्ण अभियान के दौरान जोड़कर कुल बीस हजार से ज्यादा नगद भुगतान नहीं किया जा सकता। प्रत्याशी के प्रचार वाहन से यदि बड़ी मात्रा में नगदी या अन्य उपहार-भेंट आदि की सामग्री मिलती है तो उसे जब्त कर लिया जाएगा और उसके खर्चे में जोड़ भी लिया जाएगा। किसी सार्वजनिक भवन की दीवार पर यदि कोई चुनावी प्रचार लिखा मिला तो उसे आयोग के अधिकारियों द्वारा तत्काल मिटवा दिया जाएगा और उस प्रचार को लिखाने का खर्च व मिटाने का खर्च दोनो प्रत्याशी के खाते में जुड़ जाएगा। निर्वाचन व्यय प्रेक्षक की निगरानी में प्रत्याशी के चुनावी खर्च की मॉनीटरिंग (अनुवीक्षण) करने के लिए जो टीमें हैं उनसे कौन जाने आपकी भेंट कहीं हो ही जाय। इसलिए इनके नाम से परिचित हो लीजिए -

  1. व्यय प्रेक्षक (Expenditure Observer-EO)
  2. सहायक व्यय प्रेक्षक (Assistant Expenditure Observer-AEO)
  3. वीडियो निगरानी टीम (Video Surveillance Team-VST)
  4. वीडियो अवलोकन टीम (Video Viewing Team-VVT)
  5. लेखा टीम (Accounts Team-AT)
  6. शिकायत अनुवीक्षण नियन्त्रण कक्ष और कॉल सेन्टर (Complaint Monitoring Control Room & Call Centre)
  7. मीडिया प्रमाणन और अनुवीक्षण समिति (Media Certification and Monitoring Committee-MCMC)
  8. उड़न दस्ते (Flying Squads)
  9. स्थैतिक निगरानी टीम (Static Surveillance Team-SST)
  10. व्यय अनुवीक्षण प्रकोष्ठ (Expenditure Monitoring Cell-MNC)

Indian general election, 2014लोकसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की विधान परिषद के लिए स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के चुनाव आगामी 23 तारीख को होने जा रहे हैं। इसमें मतदान प्रक्रिया की वेबकास्टिंग की जाने वाली है। चुनिन्दा पोलिंग बूथों को सीधे इंटरनेट पर सजीव प्रसारण के लिए लिंक कर दिया जाएगा। प्रयोग सफल रहा तो लोकसभा में भी इसे दुहराया जा सकता है।

इस संपूर्ण तंत्र को पूरे चुनाव अभियान की अवधि में सक्रिय रखने के लिए कितना व्यय सरकारी खजाने से होगा इसका हिसाब आप लगाइए। मैं इतना बता दूँ कि लोकसभा प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने के लिए खर्च की सीमा जो चालीस लाख निर्धारित थी उसे इस बार बढ़ाकर सत्तर लाख कर दिया गया है।

उदासीन मतदाताओं को हर हाल में वोट डालने के लिए प्रेरित करने का जिम्मा भी चुनाव आयोग ने अपने ऊपर लिया है। इसके लिये चलाये गये अभियान को ‘स्वीप’ नाम दिया गया है। पिछले चुनावों में मतदान प्रतिशत में आयी उछाल इसी अभियान की परिणति है। स्वीप (Systematic Voter Education and Electoral Participation-SVEEP) के बारे में कुछ बातें अगली कड़ी में।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Friday, February 28, 2014

इधर खाप उधर जिर्गा

Swara Customसनीदा जब पाँच साल की थी तो उसे एक दिन अपने स्कूल से घर वापस जाने में डर लग रहा था। वह इधर-उधर छिपती रही क्यों कि घर पर उसका बाप बैठा हुआ था जिसके सामने वह जाना नहीं चाहती थी। दर असल उसके अब्बा अली अहमद ने उसकी सगाई का सौदा एक दूसरे कबीले से ‘स्वार’ व्यवस्था के तहद कर दिया था। हुआ यह था कि उस दूसरे कबीले की किसी लड़की को वह भगा लाया था और पकड़ा गया था। कबीले वाले उसकी जान लेने पर उतारू थे। झगड़ा निपटाने के लिए जिर्गा बुलायी गयी थी। यह जिर्गा पश्तूनों के झगड़े निपटाने के लिए वही शक्ति रखती है जैसी हमारे यहाँ खाप पंचायतें। जिर्गा ने फैसला सुनाया कि अली अहमद को अपने गुनाह के बदले अपने घर से दो कुँवारी लड़कियाँ देनी होंगी। उसने फैसला मंजूर किया और अपनी बेटी सनीदा (५वर्ष) और भतीजी सपना (१५ वर्ष) को उस कबीले के हाथों स्वार कर दिया।

लेकिन सनीदा का भाग्य उतना बुरा नहीं था। वह उन तमाम पाकिस्तानी स्वात घाटी की पश्तून समुदाय की लड़कियों की तरह अभागिन नहीं थी। उसकी माँ ने इस सौदे का कड़ा प्रतिरोध किया और अपने भाई के माध्यम से कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाल ही में ग़ैरकानूनी ठहरा दी गयी इस प्रथा के खिलाफ़ कोर्ट ने आदेश पारित करते हुए सनीदा को छोड़े जाने का हुक्म दिया। अली अहमद और जिर्गा के तमाम सरदार गिरफ़्तार कर जेल भेज दिये गये। अब सनीदा सात साल की है और स्कूल में पढ़ने जाती है। यह बात अलग है कि स्कूल में उसे यह कहकर चिढ़ाया जाता है कि इसका सौदा हो चुका है और जल्दी ही कोई मर्द इसका खसम बनेगा। उधर उसकी चचेरी बहन सपना को तो उस दुश्मन कबीले के किसी प्रौढ़ आदमी के साथ घर बसाना ही पड़ा। उसके ऊपर इतने प्रतिबन्ध लाद दिये गये हैं कि बहुत कोशिश के बाद भी मीडिया (AFP) और मानवाधिकार संगठन सपना से बात नहीं कर सके; ताकि उसके अनुभवों को दुनिया के सामने ला सकें।

Swara Custom1पाकिस्तानी अखबार डान की यह खबर पढ़ने के बाद मैंने इस प्रथा के बारे में कुछ जानकारी जुटाने की कोशिश की। स्वार बाल-विवाह की एक ऐसी प्रथा है जो पाकिस्तान और अफगानिस्तान के कबीलाई इलाकों में प्रचलित है। इसका संबंध खून से जुड़े उन विवादों से है जो अलग-अलग कबीलाई खानदानों के बीच प्रायः पैदा होते रहते हैं। पंचायत द्वारा इन झगड़ों का समाधान इन बच्चियों की लेन-देन के हुक्म से होता है जिनकी बलपूर्वक शादी दुश्मन के घर में कर दी जाती है। मुख्य रूप से यह स्वात घाटी के पश्तूनों के बीच प्रचलित है। स्वार को स्थानीय बोलियों में साक (Sak), वानी(Vani) और संगचत्ती (Sangchatti) के नाम से भी जाना जाता है।

कुछ विद्वान बताते हैं कि यह प्रथा तब शुरू हुई जब 400 साल पहले उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान के दो पश्तून कबीलों के बीच खूनी संघर्ष हुआ। इस लड़ाई में सैकड़ो मारे गये थे। वहाँ के नवाब ने उन कबीलों के बुजुर्गों की बैठक (जिर्गा) बुलायी। जिर्गा ने फैसला किया कि जिन मर्दों ने हत्या का अपराध किया है उसकी सजा के तौर पर उन्हे अपनी लड़कियाँ विपक्षी कबीले को देनी होंगी। तभी से यह कुप्रथा चल निकली जिसमें इन कबीलों और देहाती जिर्गा द्वारा चार से चौदह साल तक की कुँवारी (Virgin) लड़कियों का इस्तेमाल उनके घर के मर्दों द्वारा हत्या और खून-खराबा जैसे अपराध की सजा चुकाने के लिए किया जाने लगा। खून के बदले खून की यह न्याय व्यवस्था पाकिस्तान के पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, सरहद और कबायली इलाकों में यत्र-तत्र प्रचलित है। कुछ दूसरे विद्वानों का कहना है कि 1979 में पाकिस्तानी सरकार ने जो हुदूद अध्यादेश जारी कर कानून का मुख्य स्रोत शरियत को बना दिया उसी ने स्वार और वानी जैसी अमानवीय प्रथाओं को प्रोत्साहित कर दिया।

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि प्राकृतिक सौन्दर्य से भरी हुई स्वात घाटी में चार साल पहले जब एक सैनिक कार्यवाही द्वारा दो साल के हिंसक तालिबान शासन का अंत हुआ तबसे इस प्रथा में उभार आया है। वर्ष २०१३ में ऐसे नौ मामले दर्ज किये गये जबकि २०१२ में सिर्फ़ एक ही मामला दर्ज हुआ था। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि ऐसी कुरीति के वास्तविक आंकड़े इससे बहुत अधिक होंगे क्योंकि सरकारी स्तर पर इसके विस्तृत आँकड़े इकठ्ठे नहीं किये जाते हैं। मानवाधिकार कार्यकर्ता समर मिनल्ला ने इस कुरीति पर एक डॉक्युमेन्ट्री बनायी थी जिसे खूब सराहा गया। समर बताती हैं कि उन्होंने केवल वर्ष १९१२ में पाकिस्तान में घूम-घूमकर ऐसे १३२ मामलों को चिह्नित किया था।

Swara Custom2मानवाधिकार कार्यकर्ता अहद बताते हैं कि सरकार द्वारा बताये जा रहे नौ मामले तो केवल एक झलक है- बहुत बड़ी और भयानक सच्चाई की । अलबत्ता अब इससे पीड़ित लड़कियाँ और उनके परिवार खुलकर सामने आने लगे हैं। मीडिया के प्रसार से लोग यह समझने लगे हैं कि यह बहुत बुरी प्रथा है जिसे २०११ से गैरकानूनी घोषित किया जा चुका है। पुलिस कहती है कि कुछ मामले दर्ज तो हो जाते हैं लेकिन अभी भी इसमें गवाही देने के लिए लोग आगे नहीं आते जिससे दोषियों को सजा दिलाने में कठिनाई आती है। एक साथ एक ही गाँव में कबीलों में रहने वाले लोग एक दूसरे के विरुद्ध गवाही देने से बचते हैं। वर्ष २०१२ में जो एकमात्र मामला दर्ज किया गया था उसमें आरोपित सभी बारह मुजरिम सबूतों और गवाहों के अभाव में छोड़ दिये गये थे जबकि घटना की सच्चाई सबको पता थी।

हमारे देश की खाप पंचायते जिस प्रकार अमानवीय फैसले सुनाकर उसका क्रियान्वयन भी फौरी तरीके से कर डालती हैं और कानून ताकता रह जाता उसी प्रकार हमारे पड़ोसी देश में जिर्गा के हुक्म की नाफ़रमानी करना बहुत कठिन है। लोग जुबान खोलने से डरते हैं। हमारे समाज में यह रोटी-बेटी का मामला ऐसा जघन्य क्यों है?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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