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Monday, November 18, 2013

ध्यानचंद को भारतरत्न क्यो?

Dhyan-chandजबसे सचिन तेन्दुलकर को भारतरत्न का सर्वोच्च सम्मान देने की घोषणा हुई है तबसे ध्यानचंद का नाम ऐसे लिया जा रहा है जैसे किसी स्कूली वाद-विवाद प्रतियोगिता में लगभग एक जैसा प्रदर्शन करने वाले दो बच्चों में से एक के जीत जाने पर दूसरे के लिए सहानुभूति व्यक्त करने वालों की होड़ लग जाती है। यहाँ तक कि उसे सहविजेता घोषित कर देने की मांग कर दी जाती है; इसलिए कि दोनो में से किसी बच्चे को अपनी मेहनत व्यर्थ जाने का मलाल न रहे। कई बार निर्णायक मंडल ऐसे फैसले कर भी लेता है। लेकिन हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद का केस भी क्या ऐसा ही है?

भारतरत्न पुरस्कार की शुरुआत आजाद भारत में पहली संवैधानिक सरकार गठित हो जाने के बाद 1954 में हुई थी। सम्प्रभु देश की लोकतांत्रिक सरकार ने जब इन पुरस्कारों की परिकल्पना की थी तो ये पुरस्कार कला, साहित्य, विज्ञान और लोकसेवा के क्षेत्र में असाधारण/ विशिष्ट योगदान के लिए ही दिये जाने का प्रस्ताव किया गया था। भारतवर्ष की आजादी के बाद जिन लोगों ने इन क्षेत्रों में देश का नाम रौशन किया उन्हें ही स्वाभाविक रूप से इन पुरस्कारों के लिए योग्य माना गया। शुरुआत में ऐसे महापुरुष ही इसकी सूची में आये जिन्होंने आजादी की लड़ाई में खास योगदान दिया था और/ या आजाद भारत के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। सी.राजगोपालाचारी, सी,वी,रमन, राधाकृष्णन, भगवान दास, विश्वैश्वरैया, नेहरू, जी,बी.पन्त, डी.के. कर्वे, बी.सी.रॉय, पी.डी.टंडन, राजेन्द्र प्रसाद, जाकिर हुसेन,पी.वी.काने, लाल बहादुर शास्त्री इत्यादि जो भी नाम आये वे स्वंतंत्रता के बाद भी सक्रिय थे।

आजादी से पहले जिन महापुरुषों ने भारत का नाम उज्ज्वल किया उनमें अनेक अद्भुत व्यक्तित्व के स्वामी थे जिनका परिश्रम, त्याग और बलिदान अप्रतिम रहा; लेकिन जिनका जीवन आजाद भारत के लिए नींव की ईंट बनकर रह गया। विवेकानंद, दयानंद सरस्वती, बालगंगाधर तिलक, चंद्रशेखर आजाद, भगतसिंह या स्वयं महात्मा गांधी के लिए यदि भारत रत्न की मांग नहीं की गयी तो गुलाम भारत की ब्रिटिश इंडियन फौज में काम करते हुए वर्ष 1928, 1932, और 1936 के ओलंपिक खेलों में अनेक अंग्रेज खिलाड़ियों के साथ भाग लेने वाले ध्यानचंद को भारतरत्न देने की चीत्कार अब क्यों मच रही है? मेजर ध्यानचंद का जन्म 1905  में हुआ था। उनका खेल कैरियर 1921 में अंग्रेजों की इंडियन आर्मी की टीम से शुरू हुआ और 1948 में पूरी तरह समाप्त हो चुका था।

tendulkerध्यानचंद की विलक्षण प्रतिभा को लेकर किसी प्रकार का संशय नहीं है; लेकिन जिस कालखंड में उन्होंने अपना प्रदर्शन किया उस कालखंड के लिए भारतरत्न की परिकल्पना नहीं की गयी थी। यदि इतिहास के महापुरुषों को पुरस्कृत करने का दौर शुरू हो जाता तो यह श्रृंखला कितने पीछे ले जायी जाय यह विवाद का विषय बन जाता। इतना ही नहीं, खेल के लिए भारतरत्न देने की बात तो तब शुरू हुई जब आजादी के साठ से अधिक साल बीत चुके थे, ध्यानचंद का स्वर्गवास (1979) हो चुका था और खेलजगत में सचिन तेन्दुलकर नाम के एक ऐसे विलक्षण सितारे की चमक बिखर चुकी थी जिसकी तुलना किसी पूर्व के खिलाड़ी से की ही नहीं जा सकती थी। बल्कि वर्ष 2011 में जब खेलों को भी एक श्रेणी के रूप में स्वीकार किया गया तो इसके अभीष्ठ सचिन तेन्दुलकर ही थे।

ध्यानचंद का युग तो काफी पहले बीत चुका था और तबकी पीढ़ी के लोग भी इस धरा-धाम से जा चुके थे। पुरस्कार मिलने से जिसे सबसे ज्यादा खुशी होती है वह स्वयं पुरस्कृत व्यक्ति होता है, उसके बाद उसके परिवार वाले, फिर इष्टमित्र जिन्हें वह जानता हो उसके बाद उन लोगों को जो उसे पसन्द करते हों और उसे जानते हों। आज ध्यानचंद को पुरस्कार दे भी दिया जाय तो इस सम्मान की खुशी का सर्वाधिक अनुभव कौन करेगा? किसकी आंखें भर आएंगी? राष्ट्रपति के हाथों ट्रॉफी लेने कौन खड़ा होगा? तालियों की गड़गड़ाहट किसके कानों को रोमांचित करेगी? स्वर्गीय ध्यानचंद की तो कतई नहीं। इसपर एक नीरस अकादमिक चर्चा के अलावा कुछ भी नहीं हाथ लगेगा। तब कौन होगा जो भावुक होकर यह पुरस्कार अपनी माँ को समर्पित कर देगा, या आश्चर्य में डूबकर खुशी से रो पड़ेगा और अपने विद्यार्थियों और सहकर्मियों को गले लगाकर उसका श्रेय सबमें बाँटेगा जैसा सी.एन.आर. राव ने किया? पुरस्कार की खुशी का असली हकदार जब नहीं रहा तो इस टोकनबाजी का क्या मतलब है?  PTI11_16_2013_000026B

आज पूरा देश एक सच्चे भारतीय खिलाड़ी को भगवान का रुतबा देकर रोमांचित और उल्लसित है। आंकड़े बयान कर रहे हैं कि जो चालीस साल का व्यक्ति भावुक होकर देश के क्रिकेट फैन्स को संबोधित कर रहा है उसके जैसा शायद भविष्य में कोई दूसरा नहीं आने वाला। मुझे याद नहीं कि इससे पहले किसी दूसरे व्यक्ति को यह पुरस्कार मिलने पर एक साथ इतने लोगों ने ऐसा जश्न मनाया हो। ऐसे में तेन्दुलकर के सामने ध्यानचंद का नाम खड़ा कर देने का काम एक खास मानसिकता का परिचायक है। यह वही सोच है जो हर मामले में सोशल इन्जीनियरिंग, जेंडर बायस, या दूसरे भेद-भाव की गुंजाइश सूंघती रहती है और सही परिप्रेक्ष्य में स्थिति का मूल्यांकन करने के बजाय हर जगह राजनीति घुसेड़ने के चक्कर में रहती है। पुरस्कार तो वैसे भी राजनीति का अखाड़ा बनने के लिए सबसे आसान शिकार होते जा रहे हैं।

राजसत्ता द्वारा पुरस्कार और दंड का प्रयोग अपनी धाक और प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए किया ही जाता है। लोकतांत्रिक सरकारों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे इसमें यथासंभव पारदर्शिता और वस्तुनिष्ठता रखें लेकिन व्यवहार में यह संभव नहीं है। इस पुरस्कार के  नियम इतने लचीले हैं कि यह प्रधानमंत्री (न कि मंत्रिपरिषद) की संस्तुति पर राष्ट्रपति द्वारा प्रदान किया जाता हैं। इसके लिए किसी औपचारिक संस्तुति की आवश्यकता नहीं होती। सत्ता की असली बागडोर जिसके हाथ में है वह किसी को भी यह माला पहना सकता है। अबतक के सभी भारतरत्न पुरस्कृत विभूतियों की सूची देखिए, आंख खुल जाएगी।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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Sunday, November 10, 2013

अपनी औरतों के प्रति अपराधी हमारा समाज

आज इतवार की सुबह अखबार खोलकर लखनऊ की स्थानीय खबरों का जायजा लेते हुए मन दुखी हो गया। राजनीति की खबरें तो निराशाजनक हैं ही लेकिन आज अपने समाज में औरत की जो तस्वीर अखबारों से उभरती है वह मन को अशान्त कर देती है। एक सांसद की डॉक्टर पत्नी द्वारा अपनी नौकरानी पर बरती गयी क्रूरता की खबरें दिल दहलाने वाली तो हैं ही; लेकिन यह मुख-पृष्ठ पर इसलिए छपी है कि इसमें एक ‘माननीय’ का नाम है। सच्चाई यह है कि  अखबार के भीतरी पन्नों पर स्थानीय स्तर पर घटित होने वाली इस तरह की घटनाओं की खबरें रोज ही छपती रहती है।

दैनिक जागरण के इस भीतरी पृष्ठ की बानगी देखिए। विज्ञापनों के अतिरिक्त इसमें कुल छः खबरे छपी हैं जिसमें तीन समाचार की मोटे शीर्षक वाले हैं: १- गरीबी से तंग विधवा ने दो बच्चों संग दी जान। २- विवाहिता ने बच्चियों के साथ दी जान ३-छात्रा से दुष्कर्म के बाद गला दबाकर हत्या।

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इन तीनों घटनाओं में जिन औरतों की जान गयी उनकी पीड़ा भी किसी निर्भया से कम नहीं है। लेकिन इनका उल्लेख एक अखबारी कतरन और लोकल थाने की डायरी में होकर रह जाएगा। कल किसी और की बारी आ जाएगी। अकाल मृत्यु की शिकार ये औरतें हमारे समाज के चरित्र के बारे में बहुत कुछ बताती हैं। (पूरी खबर पढ़ने के लिए चित्रों पर क्लिक करें।)

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पहले मामले में गरीबी का मुकाबला नहीं कर पाने से उसके पति ने आत्महत्या कर ली थी और अपनी पत्नी और बच्चों को बेसहारा छोड़ गया था। इस समाज और सरकारी तंत्र को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा और दो महीने ठोकर खाने के बाद अन्ततः उसे भी अपने बच्चों के साथ इस निर्मम दुनिया को छोड़ देने के अलावा कोई विकल्प नहीं सूझा। आत्महत्या का किसी भी प्रकार से समर्थन या महिमा मंडन नहीं किया जा सकता; लेकिन इस सैद्धान्तिक बात के साथ हमारा विमर्श पूरा नहीं हो जाता। क्या ऐसी परिस्थितियों से निजात दिलाने की कोई मुकम्मल व्यवस्था हमारी सरकारें नहीं कर सकती। क्या हमारा समाज ऐसे बेसहारा महिलाओं के लिए कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं दे सकता?  शायद हम अभी इतना सभ्य नहीं हो पाये हैं।

दूसरे मामले में यौन कुंठा से ग्रस्त दो लड़कों ने उस किशोरी से दुष्कर्म किया और उसकी हत्या भी कर दी। हो सकता है पुलिस उन्हें पकड़ ले और जेल में भी डाल दे। लेकिन इसकी गारंटी तो फिर भी नहीं रही कि अगले दिन यह बीभत्स घटना हमारे या आपके साथ नहीं हो सकती। फिर भी हम क्यों सुस्त पड़े हैं? क्यों आज भी ऐसे वहशी बेधड़क निडर होकर यह सब कर जाते हैं? हमने बेहद कमजोर सामाजिक सुरक्षा का तंत्र  बना रखा है। शायद ऐसा कोई तंत्र है ही नहीं।

तीसरे मामले पर दहेज से संबंधित होने का संदेह व्यक्त किया गया है। दहेज हत्या की घटनाएं भी बदस्तूर जारी हैं। इक्का-दुक्का नहीं, थोक के भाव से बहुएं जलायी जा रही हैं, शादी के तीन-चार साल बाद तक भी प्रताड़ना सहते हुए जान गँवाने का सिलसिला थम नहीं रहा। अब इसे अखबार के भीतरी पन्नों में छोटी सी जगह कभी-कभार मिल जाती है। आम जनता कभी इससे विचलित नहीं होती। यह घटना बस एक छोटी सी अखबारी कतरन बनके रह जाती है जो उस अभागिन के मायके वाले कुछ दिनों तक सम्हाल कर रखते हैं।

आखिर हम कैसे समाज का हिस्सा बनकर रह रहे हैं? जैसा चरित्र इस समाज का है वैसा इसे मिला कहाँ से? हमारी शिक्षा व्यवस्था, हमारे सामाजिक रीति-रिवाज, हमारे सांस्कृतिक मूल्य, हमारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, और सबसे बढ़कर इंटरनेट का निर्बाध प्रयोग जहाँ सबसे ज्यादा देखी जाने वाली सामग्री पोर्नोग्राफी है। इन सभी पहलुओं पर गंभीर चिन्तन करने और प्रभावी कदम उठाने के लिए क्या बाहर से कोई आएगा? कदाचित्‌ हमें किसी दूसरे ग्रह से आने वाले एलिएन कि प्रतीक्षा है।

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(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

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Saturday, November 2, 2013

कोंख में धरती के सोना है बहुत (ग़जल)

सेवानिवृत्त कर्मचारी की पेंशन शुरू करने के लिए जो गवाही होती है उसी के लिए नरेन्द्र जी मेरे पास दफ़्तर में आये। सरकारी काम खत्म होने के बाद मैंने उनसे पूछ लिया - जीवन भर अध्यापक के तौर पर बच्चों से बातें करने के बाद सेवानिवृत्ति की शांति कैसे कटती है? बोले – मैं थोड़ा-बहुत  लिखने का शौक रखता हूँ। कवि-सम्मेलनों में बुलाया जाता हूँ। उसके लिए लगातार रचनायें तैयार करने और समानधर्मी मित्रों के साथ सुनने-सुनाने में समय कटता  रहता है।

मैंने जब बताया कि कुछ लिखने पढ़ने का शौक मैं भी रखता हूँ तो उन्होंने मुझसे पूछकर बाहर खड़े अपने साथी को भी अन्दर बुला लिया। फिर उन्होंने बताया कि उनकी एक साहित्यिक मंडली है जो नियमित अन्तराल पर कविगोष्ठी करती रहती है। इसमें “तरही मुशायरा” भी किया जाता है। मैंने पहले कहीं यह शब्द सुना तो था लेकिन मेरे लिए यह अभी भी अबूझ पहेली सा था। सो मैंने पूछ लिया कि इसमें दर‍असल होता क्या है?  उन्होंने बताया कि हम सबको एक लाइन दे देते हैं जिसे ग़जल के मक्ते में प्रयोग करके पूरी ग़जल कहनी होती है। “अच्छा, तो इस बार आप लोग किस लाइन पर ग़जल कह रहे हैं?”, मैंने पूछा।

“कोंख में धरती के सोना है बहुत” । मुझे यह लाइन सुनते ही संत शोभन सरकार के सपनों का स्वर्णकोष याद आ गया जिसकी खुदाई का कार्यक्रम बहुत चर्चा में रहा है। पुरातत्व विभाग वाले अब अपना काम समेटने लगे हैं लेकिन स्वर्णकोष है कि बाहर आने का नाम नहीं ले रहा। लगता है यह लाइन तब तय की गयी होगी जब देश की सारी मीडिया इस तमाशे को पीपली लाइव बनाकर उन्नाव जिले के उस डोंडियाखेड़ा गाँव में जम चुकी थी।

बहरहाल फुरसतिया जी के शब्दों में कहें तो इस लाइन को लेकर बहुत सी तुकबन्दी मेरे दिमाग में खदबदाती रही और आज सबकुछ उफनकर बाहर आ गया है। अब जब यह बाहर आ ही गया है तो आपसब के लिए पेश भी कर देता हूँ:

कोंख में धरती के सोना है बहुत

खोजने का हुनर होना है बहुत
कोंख में धरती के सोना है बहुत

दफ़्तरों में काम कैसे हो भला
बेबसी का रोना-धोना है बहुत

मांगता हमदम से मैं कुछ भी नहीं
उनके दिल का एक कोना है बहुत

कैसे कह दें होशियारी आ गयी
गाँव में तो जादू - टोना है बहुत

क्यों शराबी हो रहा है आदमी
इसमें पाना कम है खोना है बहुत

सरहदों पर जागता था यह शहीद
अब लिटा दो इसको सोना है बहुत

शाहजादे को न यूँ धिक्कारिए
कितना भोला है सलोना है बहुत

जप रहे माला नमो के मंत्र से
मज़हबी दंगा जो होना है बहुत

भागता वह जा रहा है चीरघर
आज उसको लाश ढोना है बहुत

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)
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