हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Monday, September 30, 2013

चलो सितंबर सायोनारा…

सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा
अर्थनीति ने राजनीति का विकट नकाब उतारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

चढ़ी जा रही प्याज अर्श पर, रुपया गिरता रहा फर्श पर
अर्थशास्त्र के बड़े धुरन्धर जमे रहे डालर विमर्श पर
डीजल और पेट्रोल ने मिलकर सबका पॉकेट मारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

अब चुनाव की आहट होली, राजनीति में लगती बोली
कौड़ी में अब अन्न मिलेगा, वादों की खुल गयी झपोली
भ्रष्टतंत्र पर लोकतंत्र के प्रहरी करें प्रहार करारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

पी.एम. इन वेटिंग बौराये, नेह निमंत्रण पर ना आये
नमो-नमो का गर्जन-तर्जन, सुनकर मनमोहन घबराये
जनसंघी सक्रियता से सेकुलर मोर्चा का चढ़ता पारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

छेड़छाड़ ने पकड़ा तूल, शांति नष्ट हो गयी समूल
ढेर हुए कर्फ़्यू में तीस, नेता रहे निपोरे खींस
हुआ प्रशासन पंगु जिसे सेना ने दौड़ उबारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

हिंदी दिवस मनाये बहुधा, फिर ब्‍लॉगर पहुँचे सब वर्धा
सोशल मीडिया की प्रभुताई, ब्‍लॉगिंग पर जमने ना पायी
हुई बहस घनघोर जिसे कुलपति ने खूब सँवारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

सबसे बड़ी अदालत बोली, बाहर हो अब दागी टोली
पी.एम. अध्यादेश बनाये, महामहिम के पास पठाये
सहजादे की आँख खुल गयी, सेल्फ़-गोल दे मारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

करे अदालत और कमाल, बैलट में दी NOTA डाल
अब वोटर कर लें संकल्प, अंतिम वाला चुने विकल्प
जाति-धर्म का खेल चुनावी हमको नहीं गँवारा
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

अंतिम दिवस तुम्हारा आया, उनपर बनकर काली छाया
सत्रह साल न्याय की देर, फिर भी नहीं हुई अंधेर
गोबर बनकर निकल रहा जो छककर खाया चारा 
सायोनारा सायोनारा, चलो सितंबर सायोनारा…

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)     

Friday, September 27, 2013

वर्धा संगोष्ठी पर कहाँ क्या लिखा गया…!

 

कुलगीत गायनवर्धा से लौटकर अपनी नौकरी के दायित्वों को सम्हाल चुका हूँ; लेकिन ध्यान उन पोस्टों पर लगा हुआ है जो हमारे प्रतिभागियों ने  वर्धा से लौटकर लिखी हैं या लिखने वाले हैं। यदि आप किसी कारणवश वर्धा नहीं आ सके तो आपके मन में वहाँ जो कुछ हुआ उसे जानने की जिज्ञासा होगी। मैं तो वहाँ गया था और जो कुछ हुआ उसका साक्षी भी था; लेकिन अंतर्जाल पर इस सेमिनार के बारे में जो कुछ लिखा जा रहा है उसे शब्द-शब्द पढ़ने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ। जिन नये लोगों से परिचय हुआ उन्हें भी हम बहुत नहीं जान पाये। अपने मतलब की बात की, संयोजकीय दायित्वों की परिधि में पड़ने वाले अनिवार्य प्रश्नों से आगे कहाँ बढ़ पाये हम। समय ही कहाँ था उस दौरान। इसलिए अब उन्हे थोड़ा और जानने का मन है। इसका माध्यम तो यह पन्ना ही है।

आप जब वहाँ से लौटे होंगे तो कम से कम एक ब्लॉग पोस्ट भर का चिन्तन तो कर ही चुके होंगे। उसे यदि अभी तक पोस्ट नहीं कर पाये हैं तो तत्काल कर दीजिए। कुछ आदरणीय लिख्खाड़ ब्लॉगर्स ने तो शृंखला ही चला रखी है। अहा…!

एक और बात उन सभी प्रतिभागियों से कहना है कि इस विचारगोष्ठी में यथासंभव सबको अपनी बात कहने का अवसर देने का प्रयास किया गया था; लेकिन संभव है कि आप अपनी पूरी बात वहाँ न कह पाये हों। मन में एक कसक रह गयी हो कि फलाँ प्वाइंट तो रह ही गया। जो कुछ कहा भी, हो सकता है जनता ने उसपर उतना ध्यान न दिया हो, या बहसबाजी के शोर में कहीं खो गया हो। ऐसी सभी बातें मैं ऑन-रिकार्ड लाना चाहता हूँ। यह बहुत ही आसानी से हो सकता है। आप थोड़ा सा समय निकालकर अपनी बात को व्यवस्थित करके अपने ब्लॉग पर पोस्ट कर दीजिए। ध्यान रहे यह सामग्री वर्धा प्रवास के आपके ‘संस्मरण’ से अलग होगी। वर्धा संगोष्ठी में आपने जो विचार प्रस्तुत किये, या पर्याप्त समय मिलने पर आप जो प्रस्तुत करते उसे अलग पोस्ट बनाकर डालिए। मुझे विश्वास है कि यह एक शानदार संकलन होगा।

मुझे अनिल जी की एक मजेदार बात याद है। उन्होंने बताया कि जब एक बालक गाय पर निबन्ध तैयार करके गया था और उसे पेड़ पर निबन्ध लिखने को कह दिया गया तो उसने लिखा- एक पेड़ था जिसके नीचे एक गाय बँधी थी। वह गाय…आदि-आदि। अनिल जी के अलावा वर्धा संगोष्ठी में कुछ अन्य लोगों के साथ भी ऐसा मजाक हुआ होगा। दर‍असल सबने विषय अपनी पसन्द से तैयार किया था लेकिन सत्र विभाजन में उनकी भूमिका मैंने तय की थी। सभी सत्रों में बराबर लोग हो सकें इसके लिए मैंने उनकी पसन्द को पीछे करके उनकी क्षमता पर ज्यादा भरोसा किया। मुझे विश्वास था कि अनिल जी जैसे लोग किसी भी मुद्दे पर बोल सकते हैं। यद्यपि उन्होंने समय से मुझे अपना शानदार आलेख भेज दिया था लेकिन मैंने उन्हें किसी अन्य सत्र में मंचासीन कर दिया। अब अनिल जी मेरे अनुरोध के अनुसार अपना पसन्दीदा आलेख पोस्ट कर दें तो आनंद आ जाय।

अतः मैं अबतक ज्ञात उन पोस्टों का लिंक यहाँ लगा रहा हूँ जो इस सेमिनार के बारे में लिखी गयी हैं। जो छूट गयी हैं या आगे आने वाली हैं उनका लिंक टिप्पणियों के माध्यम से दीजिए। क्रमशः उन्हें जोड़ता जाऊँगा और भविष्य के पाठकों के लिए सारा मसाला एक ही स्थान पर उपलब्ध हो जाएगा:

  1. वर्धा में फिर होगा महामंथन : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र

  2. राष्ट्रीय सेमिनार व कार्यशाला : रूपरेखा, फेसबुक पर सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी

  3. आपकी प्रविष्टियों की प्रतीक्षा है : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र

  4. हाय रे हिंदी ब्लॉगर पट्टी!: डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि

  5. हिंदी की छवि बदलनी होगी : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र

  6. सेमिनार फिजूल है: विनीत कुमार : सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र

  7. भारतीय राजनीति को बदल रहा है सोशल मीडिया : हर्षवर्धन त्रिपाठी, बतंगड़

  8. वर्धा परिसर में अद्‌भुत बदलाव: सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र

  9. वर्धा राष्ट्रीय संगोष्ठी कुछ यादें : अनूप शुक्ल, फुरसतिया

  10. ब्लॉगर सम्मेलनों की बहार में वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन : डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि

  11. हिंदी ब्लॉगिंग का भविष्य बहुत अच्छा है: विभूति नारायन राय सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, सत्यार्थमित्र

  12. अविस्मरणीय वर्धा-यात्रा: वंदना अवस्थी दुबे, अपनी बात

  13. हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में ब्लॉग सेमिनार: डॉ.शकुन्तला शर्मा, शाकुन्तलम्‌

  14. मेरी रणनीति कामयाब रही, अनूप जी दूसरे कक्ष में धरे गये: डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि

  15. ब्लॉग में उबाऊ लेखन से बचना चाहिए: राजेश यादव, विश्वविद्यालय का ब्लॉग

  16. हिंदी विश्वविद्यालय में हिंदी ब्लॉगिंग व सोशल मीडिया पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्‍घाटन: राजेश यादव, विश्वविद्यालय का ब्लॉग

  17. वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन जो किसी ने नहीं लिखा!: डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि

  18. हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में शुरू हुई ब्लॉगरों की अड्डेबाजी सुनीता भास्कर, भड़ास4मीडिया

  19. ब्लॉग, फ़ेसबुक, टिव्टर की तिकड़ी-विकल्प या पूरक : अनूप शुक्ल, फुरसतिया

  20. वर्धा ब्लॉग सेमिनार 2013 : फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग की जंग में जीत किसकी? रविशंकर श्रीवास्तव (रवि रतलामी) छींटे और बौछार

  21. 15 अक्टूबर,2013 को ‘चिट्ठा समय’ एग्रीगेटर का जन्म हो रहा है: वर्धा हिंदी ब्लॉगर सेमिनार की उपलब्धि : आओ जश्न मनाएं ; अविनाश वाचस्पति, नुक्कड़

  22. वर्धा में जेएनयू ! : हर्षवर्धन त्रिपाठी, बतंगड़

  23. हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा में ब्लॉग सेमिनार डॉ. शकुन्तला शर्मा, शाकुन्तलम्‌

  24. वर्धा सम्मेलन के सबक : संतोष त्रिवेदी, बैसवारी

  25. ‘हिंदी ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया’ राष्ट्रीय गोष्ठी संपन्न: वंदना अवस्थी दुबे, अपनी बात

  26. उद्देश्य ब्लॉगिंग का- सतीश सक्सेना, मेरे गीत

  27. सोशल मीडिया और हिंदी ब्लॉगिंग : वर्धा में सत्य के प्रयोग, संजीव तिवारी- आरंभ

  28. वर्धा सम्मेलन पार्ट-4… कुछ और अबतक अनकहा!: डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि

  29. हिंदी चिठ्ठाकारिता को मिला नवजीवन, संजीव कुमार सिन्हा, प्रवक्ता.कॉम

  30. वर्धा में जो हमने देखा: रचना त्रिपाठी, टूटी-फूटी

  31. इति श्री वर्धा ब्लॉगर एवं सोशल मीडिया सम्मेलन : अनूप शुक्ल, फुरसतिया

  32. ब्लॉगरस से ब्लॉग ब्लॉग हृदय : वर्धा से लौटकर : ब्लॉ.ललित शर्मा, ललित डॉट कॉम

  33. मोहिं वर्धा विसरत नाहीं!  : डॉ. अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि

  34. अभिव्यक्ति का आकार – ब्लॉग, फेसबुक व ट्विटर, प्रवीण पांडेय, न दैन्यं न पलायनम्‌

  35. वर्धा सम्मेलन: कुछ बचा खुचा, द लास्ट सपर और क्वचिदन्योऽपि (समापन किश्त): डॉ.अरविन्द मिश्र, क्वचिदन्यतोऽपि

  36. वर्धा में ब्लॉग पर महामंथन से निकले विचार कलश: डॉ. अशोक प्रियरंजन, अशोक विचार

  37. वर्धा संगोष्ठी: दूसरा दिन : वंदना अवस्थी दुबे, अपनी बात

  38. वर्धा में उठा प्रश्न-सोशल मीडिया : विधा बनाम माध्यम : डॉ.मनीष कुमार मिश्र, फेसबुक नोट ऑनलाइनहिंदीजर्नल

  39. वर्धा में आभासी मित्रों से साक्षात्कार : संजीव तिवारी, आरंभ

  40. चंद तस्वीरें : वंदना अवस्थी दुबे, अपनी बात

  41. वर्चुअल दुनिया के रीयल दोस्त : इष्टदेव सांकृत्यायन, इयत्ता

  42. आयाम से विधा की ओर : इष्टदेव सांकृत्यायन, इयत्ता

  43. ब्लॉग बनाम माइक्रोब्लॉगिंग : इष्टदेव सांकृत्यायन, इयत्ता

  44. बाबा की सराय में बबुए :  इष्टदेव सांकृत्यायन, इयत्ता

  45. फ्रेम तोड़कर सतह से निकलता चिठ्ठा-समय: अनिल सिंह ‘रघुराज’ - एक हिंदुस्तानी की डायरी

 

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Tuesday, September 24, 2013

हिंदी ब्लॉगिंग का भविष्य बहुत अच्छा है: विभूति नारायण राय

आपलोग भले ही यहाँ इस चर्चा में फेसबुक और ट्विटर के आने से ब्लॉगिंग के पिछड़ जाने की चिन्ता कर रहे हैं लेकिन मुझे लगता है कि यह माध्यम कभी खत्म नहीं हो सकता। ऐसी आशंकाएँ पहले भी व्यक्त की गयी हैं। जब भी अभिव्यक्ति का कोई नया माध्यम आया है तो पुराने माध्यम के बारे में ऐसी भविष्यवाणी की जाती है। लेकिन इतिहास गवाह है कि कोई माध्यम हमेशा के लिए समाप्त नहीं होता। अठारहवीं शताब्दि में जब अखबार आया तो लोगों ने कहना शुरु किया कि अब फिक्शन के दिन लद गये। हमारे जीवन के आसपास की घटनाएँ जब अखबारों के माध्यम से हमारे पढ़ने के लिए रोज उपलब्ध होंगी तो कोई गल्प की ओर क्यों जाएगा जो प्रकारान्तर से मनुष्य के जीवन के इर्द-गिर्द ही बुना जाता है। लेकिन यह आशंका निर्मूल बनी रही। अखबार के साथ-साथ फिक्शन भी खूब लिखा गया। इसी प्रकार इलेक्टॉनिक माध्यम (टेलीविजन)  के आने के बाद अखबारों के समाप्त हो जाने की बात की गयी। पत्र-पत्रिकाओं के इतिहास बन जाने की बात की गयी लेकिन स्थिति यह है कि आज देश में जितनी साहित्यिक पत्र-पत्रिकाएँ छप रही हैं उतनी हमारे इतिहास में पहले कभी नहीं छपी होंगी। यही हाल हिंदी ब्लॉगिंग का है। फेसबुक और ट्विटर के आ जाने से ब्लॉग का कोई नुकसान नहीं होने वाला…।

जब सेमिनार के समापन सत्र में कुलपति जी ने ये बाते कहीं तो हमारा मन सुख, संतुष्टि और प्रसन्नता से बल्लियों उछलने लगा। कारण यह नहीं कि पहले मुझे इस बात पर कोई शक था बल्कि इस लिए कि हिंदी ब्लॉगिंग और सोशल मीडिया पर चर्चा कराने के लिए राष्ट्रीय संगोष्ठी के आयोजन की जो चुनौती मुझे कुलपति जी ने दी थी उसका उपसंहार वे स्वयं कर रहे थे और बिल्कुल उसी रूप में जिस रूप की कल्पना मैंने की थी। एक के बाद एक वक्ताओं द्वारा दो दिनों तक जिस बेबाकी से इस विषय के विभिन्न पहलुओं पर अपनी बात रखी और विश्वविद्यालय के सजग विद्यार्थियों ने जिस प्रकार पूरी बहस को जीवन्त बनाये रखा वह देखकर मुझे यह मलाल नहीं रह गया कि इस सेमिनार के लिए मैंने कुछ बड़े लोगों को बुलाने की कोशिश की थी और वे अपने-अपने ज्ञात-अज्ञात कारणों से नहीं आये। जिन लोगों ने अपनी कठिनाइयों, व्यस्तताओं और किंचित पूर्वाग्रहों को धता बताकर वर्धा का रुख कर लिया और सेमिनार के मंच तक आ गये उनका योगदान ही हमारे लिए पर्याप्त खुशियाँ दे गया।

जिन ब्लॉगर मित्रों ने मेरा अनुरोध स्वीकारा और अपना अमूल्य समय इस गोष्ठी के लिए दिया उनका हम तहे दिल से शुक्रिया करते हैं। यद्यपि यहाँ प्रतिभाग के लिए सबको अवसर दिया गया था। उन्हें भी जिन्हें मैं पहले से बिल्कुल नहीं जानता था, और उन्हें भी जो मुझे पहले से बिल्कुल नहीं जानते थे। इन दोनो श्रेणियों के लोग इस अवसर पर आये और मेल-जोल का मेरा दायरा बढ़ा कर गये। वे मुझे खुश होने का पूरा मसाला दे गये। मुझे जो कुछ निराशा हुई वह ऐसे लोगों से जिन्हें मैं भली-भाँति जानता था और जो मुझे भली-भाँति जानते थे। मुझे जिनपर पूरा भरोसा था कि वे मेरे संयोजक के दायित्व को बहुत आसान बना देंगे उन्होंने ही अंतिम समय पर मेरी कठिनाइयाँ बढ़ा दीं। कुछलोगों ने तो एकदम अंतिम समय में अचानक पल्ला पटक दिया। मेरे धैर्य की परीक्षा ही ले डाली। लेकिन भगवान जब एक रास्ता बन्द कर देता है तो दूसरे तमाम रास्ते खोल भी देता है। अन्ततः सबकुछ अच्छा ही रहा। कुलपति जी का वरद्‍-हस्त मेरी सभी परेशानियों को समूल नष्ट करने वाला था। विश्वविद्यालय परिवार से दूर रहकर भी मुझे सबका अपार स्नेह और सहयोग मिला। आभारी हूँ उन सबका।

इस सेमिनार में जो चर्चा हुई उन्हें रिकार्ड में लाना जरूरी है। सभी ब्लॉगर मित्र अपनी स्मरण शक्ति का परिचय दें और लिख डाले जो कुछ वहाँ सार्थक कहा गया। रोचक यात्रा वृत्तान्त तो आयेंगे ही।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Thursday, September 19, 2013

वर्धा परिसर में अद्‌भुत बदलाव…

दो साल पहले जब केन्द्रीय विश्वविद्यालय- वर्धा छोड़कर उत्तर प्रदेश सरकार की नौकरी पर वापस गया था तो इसका परिसर अभी निर्माणाधीन था। सीमेन्ट की सड़कें तब बन ही रही थीं। पथरीली पहाड़ियों को तराशकर और काट-छीलकर भवन खड़े करने के लिए समतल किया जा रहा था और अनेक संकायों की इमारत खड़ी की जा रही थी। आज जब दो साल बाद यहाँ दो दिन के लिए आना हुआ तो परिसर की साज-सज्जा और तैयार खड़ी इमारतों को देखकर मुग्ध हो गया।

नागार्जुन सराय का भवन तो अभी बनना शुरू ही हुआ था। आज हमें इसी गेस्ट हाउस में ठहराया गया है। सबकुछ इतना बढ़िया है कि मुझे अपने ब्लॉगर मेहमानों के आराम की अब कोई चिन्ता ही नहीं रह गयी। यहाँ का स्टाफ भी आये दिन होने वाले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों व गोष्ठियों में आने वाले मेहमानों की आव-भगत करने में इतना दक्ष हो चुका है कि मुझे कुछ बताने की जरूरत ही नहीं रह गयी है। उसपर से कुलपति जी की प्रशासनिक सजगता और छोटी-छोटी बातों पर सतर्क दृष्टि और सदाशयता ने मेरा काम बिल्कुल आसान कर दिया है। इस सहजता से संगोष्ठी की सभी तैयारियाँ हो गयी हैं कि मुझे भी अन्य मेहमानों की तरह घूमने-फिरने और फोटू खिंचाने का पूरा मौका मिल गया है। तो लीजिए आज दिन भर की कुछ झाँकी आप भी देखिए मोबाइल कैमरे की नज़र से:

2013-09-19 07.48.31 2013-09-19 07.49.37
बाबा नागार्जुन की प्रतिमा बनाने वाले ने उनका फोटो देखकर नहीं बल्कि अपनी आदर्श कल्पना का सहारा लेकर यह मूर्ति बनायी होगी। अब आगे की पीढ़ियाँ नागार्जुन के रूप में इसी चेहरे को पहचानेंगी। बस किसी मनुष्य की आहट मिलते ही यह शीशे का दरवाजा अपने आप खुलता और बन्द होता है।
2013-09-19 19.24.52 2013-09-19 19.13.16

आज तीन महान विभूतियों का विदाई समारोह था जिसे फैकल्टी और ऑफीसर्स क्लब में आयोजित किया गया। (बाएँ से)  प्रो. बी. एम. मुखर्जी - मानवशास्त्र, प्रो. रामशरण जोशी - जन संचार, कुलपति जी व राजकिशोर – हिंदीसमय

जोशी जी ने अपना अनुभव अविरल सुनाया तो राजकिशोर जी ने अपना लिखित भाषण पढ़ा। बोले- विदाई समारोह में कही गयी बातें झूठ का ज्वालामुखी होती हैं। साथ ही सफाई दे गये कि मैं कभी किसी के हरम में नहीं रहा।

2013-09-19 22.08.59(1) 2013-09-19 22.09.52

मुझे खबर मिली कि तीन चार ब्लॉगरों ने एक वयोवृद्ध साहित्यकार के कमरे पर धावा बोल दिया है। बेचारे सोने की जुगत कर रहे थे कि इन लोगों ने उन्हें कुर्सी पर बिठा दिया और उनसे ‘आशीर्वाद’ मांगने के बहाने घेरकर बैठ गये।
पता चलने पर मैं भागा-भागा आया और हाथ जोड़कर मैंने अपना परिचय दिया- महोदय, ये लोग इस समय सो जाने के बजाय आपको तंग करने का जो दुस्साहस कर रहे हैं उसके लिए जिम्मेदार मैं हूँ क्योंकि इन लोगों को यहाँ बुलाने की गलती  मैंने की है।
बाद में जब फोटो खींचने का उपक्रम हुआ तो हर्ष जी अपना कैमरा लाने चले गये और शैलेश भारतवासी अपनी काठमांडू की कथा सुनाने के बाद विनोद कुमार शुक्ल जी के पीछे खड़े हो गये। डॉ प्रवीण चोपड़ा कैमरे का बटन दबाने लगे।  डॉ. अरविंद मिश्र जी अपनी कुर्सी से तनिक नहीं हिले। मुझे तो आप देख ही रहे हैं Smile

2013-09-19 22.12.29

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)