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Monday, December 16, 2013

दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर (तरही ग़जल)

इस मिसरे को तरही ग़जल के लिए तय करने वाले उस्ताद शायर ने इसके मीटर की कई बारीकियाँ नोट करायी थीं, जो मुझे भूल गयीं। सच कहूँ तो वह सब मुझे समझ में ही नहीं आया था। मुशायरे की तय तारीख नजदीक आने की याद दिलायी गयी तो मैंने अपनी फेसबुक टाइमलाइन खोलकर देखा और यह ग़जलनुमा कविता/ तुकबन्दी रच डाली। प्यार-मोहब्बत की ‘बातें करने’ में थोड़ा कमजोर हूँ; बल्कि प्यार मोहब्बत ही कर लेना बेहतर समझता हूँ इसलिए मुझे पूरा शक है कि उस मुशायरे में पता नहीं दाद मिले या न मिले। ऐसी स्थिति में यहाँ इस पृष्ठ का नियंत्रक होने का लाभ तो उठा ही सकता हूँ; तो पेश है मेरी ताजा रचना :

(पुनश्च : बड़े भाई सतीश सक्सेना जी और नवगीतकार ओमधीरज जी की सलाह  पर संशोधित/ संपादित/ परिवर्द्धित।)

दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर

(१)

लो बोल गया काग भी मुंडेर पे आकर
परदेस से लौटेगा कोई आज कमाकर

गौरैया चहकती रही अब सांझ ढल गयी
दहलीज़ पे बैठा है कोई दीप जलाकर

बेफिक्र हुए सो रहे अपने घरों में हम
मुस्तैद है सरहद पे कोई जान लगाकर

मासूम ने आंचल का किनारा पकड़ लिया 
वह लोरियाँ सुनाये प्रेम गीत भुलाकर

दस्तक हुई वो आ गये माँ ने बिठा लिया
तहज़ीब से रुक जाय सिमट जाय लजाकर

बस चंद रोज़ फैलेगी जीवन में चाँदनी
बस चंद रोज़ चमकेगा आंगन में दिवाकर

रह जाएगी फिर साथ में बैरन सी अमावस
उस नौकरी सौतन के साथ बैठ न जाकर

(२)

दंगों में मुलव्विस रहे जो लोग मुसल्सल
अब सुर्खियाँ बटोरते इमदाद दिलाकर

क्या खूब तमाशा किया जनता के वोट ने
वो फर्श पे अब आ गये हैं अर्स गँवाकर

जब आप को सरकार बनाना ही नहीं था
नाहक में लिया वोट बेवकूफ़ बनाकर

ये शर्त है या गर्त में जाने का है पैग़ाम
वो पूछ रहे आप की चिठ्ठी को दिखाकर

वो दिन हवा हुए जो बिकाऊ थे रहनुमा
उलटी बही बयार है इस दौर में आकर

इस गहरी मोहब्बत से यूँ न देख मेरे यार
रोका है अदालत ने इसे जुर्म बताकर

हर एक ने अपना अलग बनाया लोकपाल
“सत्यार्थमित्र” देख रहे आस लगाकर

 

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी 
www.satyarthmitra.com

11 comments:

  1. हम भी आस लगाये बैठे,
    वे हैं, प्यास छिपाये बैठे।

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  2. क्या बात है हजूर के इस अंदाजे बयां में
    कर दिया है लाजवाब इक आईना दिखा कर

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  3. तरही की आपकी बरही की शुभकामनाएं भी

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  4. बधाई खूबसूरत ग़ज़ल के लिए !
    दो हिस्सों में होती तो और अच्छा होता !१,२,३,५ अलग कर दें , ये खूबसूरत शेर , आप के साथ क्यों ? :)

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    1. आपकी सलाह सर माथे। अलगा दिया, कुछ और जोड़कर।

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  5. सीधे ह्रदय में उतरी. बहुत अच्छे है शेर .. और उनका कथ्य.

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  6. मासूम ने आंचल का किनारा पकड़ लिया
    वह लोरियाँ सुनाये प्रेम गीत भुलाकर

    दस्तक हुई वो आ गये माँ ने बिठा लिया
    तहज़ीब से रुक जाय सिमट जाय लजाकर

    कमाल की अभिव्यक्ति है भाई जी , यह मोती चुनने आसान नहीं, यह सामान्य नहीं है . . . .
    आपकी काव्य प्रतिभा को ह्रदय से नमन ! अनुरोध है कि काव्य सृजन जारी रखेंगे !
    आपका आभार !

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  7. दंगों में मुलव्विस रहे जो लोग मुसल्सल
    अब सुर्खियाँ बटोरते इमदाद दिलाकर

    क्या खूब तमाशा किया जनता के वोट ने
    वो फर्श पे अब आ गये हैं अर्स गँवाकर !

    हकीकत बयान की है आपने , मगर काश लोग ध्यान से पढ़ना और सीख लें , साहित्य रचनाओं के संक्रमण काल में लोगों को पढ़ने का शौक नहीं है, ऐसे में मजबूत कलम का रोल महत्वपूर्ण है ! आपको मंगलकामनाएं आदरणीय !!
    सिद्धार्थ ने तो सिर्फ हकीकत, बयान की
    फिर भी न दिखायी पड़े चश्में भी लगाकर !

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  8. बहुत अच्छा प्रयास आप का !

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  9. बहुत खूब..। पहली कालजयी दूसरी समसामयिक।

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