हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Monday, December 9, 2013

निष्ठुर नियति…

उस दिन मैं ‘बिग बाजार’ में कुछ घरेलू सामानों की खरीदारी के लिए गया हुआ था। वहाँ मैंने देखा कि भुगतान काउंटर पर कैशियर एक बच्चे से उलझा हुआ था। बच्चा मुश्किल से छः-सात साल का रहा होगा। कैशियर ने कहा, “आय एम सॉरी, तुम्हारे पास यह गुड़िया खरीदने भर के पैसे नहीं हैं।” इसपर वह बच्चा मेरी ओर मुड़ा और आशा भरी निगाह से पूछने लगा, “अंकल, आप बताइए मेरे पैसे पूरे नहीं हैं क्या? मुझे यह गुड़िया जरूर लेनी है।”

मैंने उसके पैसे गिने और उसके सवाल का जवाब दे दिया, “प्यारे, यह तो तुम्हें भी पता है कि तुम्हारे पास गुड़िया खरीदने के लिए पूरे पैसे नहीं हैं।” इतना कहकर मैं आगे बढ़ गया था; लेकिन वह नन्हा बच्चा इसके बाद भी उस गुड़िया को अपने हाथ में थामे रहा। उसकी लालसा देखकर मैं वापस उसके पास तक गया और धीरे से पूछा कि यह गुड़िया वह किसे देना चाहता है।

“यह गुड़िया मेरी बहन को बहुत पसन्द थी, हर हाल में वह इसे पाना चाहती थी। मैं उसे यह उसके बर्थडे पर गिफ़्ट करना चाहता हूँ।” उसकी आवाज बेहद स्थिर और कोमल थी। “यह गुड़िया मैं अपनी मम्मी को दूंगा जिसे वह दीदी को दे देगी... क्योंकि वह दीदी के पास जाने वाली है।” यह कहते हुए उसकी आंखों में जो वेदना थी उसे देखकर मैं सिहर उठा।

“मेरी दीदी भगवान के पास रहने चली गयी है... डैडी कह रहे हैं कि मम्मी भी बहुत जल्दी भगवान से मिलने जाने वाली है, इसलिए मैंने सोचा कि मम्मी के साथ गुड़िया भेंज दूंगा तो दीदी पा जाएगी...।”

मेरा कलेजा तो थम ही गया। उस छोटे से बच्चे ने सिर ऊपर उठाकर मेरी ओर देखा और बोला, “मैं डैडी से बोलकर आया हूँ कि अभी मम्मी को जाने मत देना जबतक मैं मॉल से लौटकर नहीं आ जाऊँ।” उसके बाद उसने अपनी एक बेहद खूबसूरत तस्वीर दिखायी जिसमें वह हँस रहा था। फिर बोला, “मैं मम्मी के साथ अपनी यह फोटो भी भेजूंगा जिससे मेरी दीदी मुझे भुला न सके।” अब वह सुबकने लगा था, “मैं अपनी मम्मी को बहुत प्यार करता हूँ और नहीं चाहता कि वह मुझे छोड़कर जाये, लेकिन डैडी कहते हैं कि उसे दीदी के पास रहने के लिए जाना ही पड़ेगा।” इसके बाद उसने फिर उस गुड़िया की ओर कातर दृष्टि से देखा, बहुत शान्त होकर...।

मैंने बच्चे से छिपाकर अपना बटुआ निकाला और उस बच्चे से बोला, “चलो, क्यों न एक बार फिर तुम्हारे पैसे गिन लिये जाय; कहीं ऐसा न हो कि सच में तुम्हारे पैसे गुड़िया की कीमत भर के हों?”

“ठीक है!” वह बोला, “मुझे लगता है कि मेरे पैसे उतने जरूर हैं।” मैंने उसको दिखाये बिना उसके पैसों में अपने पास से कुछ मिला दिये और फिर हम उसे गिनने लगे। अब गुड़िया के लिए पर्याप्त पैसे हो गये थे; बल्कि कुछ बच भी रहे थे। नन्हे बच्चे ने कहा, “भगवान, आपको ‘थैंक्यू’! आपने मुझे काम भर का पैसा दे दिया!”

फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और बताने लगा, “मैंने कल रात सोने से पहले भगवान से कहा था कि मुझे यह गुड़िया खरीदने भर का पैसा दे देना, ताकि मेरी मम्मी इसे मेरी दीदी तक पहुँचा सके। उसने मेरी सुन ली”

“मैं तो यह भी चाहता था कि काश मेरे पास इतने पैसे होते कि मम्मी के लिए भी एक सफेद गुलाब खरीद सकूँ; लेकिन भगवान से इतना मांगने की हिम्मत नहीं हुई। फिर भी देखिए, भगवान ने मुझे इतना दे दिया कि अब मैं इस गुड़िया के साथ एक सफेद गुलाब भी खरीद लूंगा। मेरी मम्मी को सफेद गुलाब बहुत अच्छे लगते हैं।” मैं वहाँ अब और नहीं ठहर सकता था।

मैंने अपनी खरीदारी बहुत अन्यमनस्क भाव से की। उस बच्चे की बातें मेरे दिमाग से निकलने का नाम नहीं ले रही थीं। तभी मुझे ध्यान आया कि दो दिन पहले स्थानीय अखबार में एक खबर छपी थी कि शराब पीकर ट्रक चला रहे ड्राइवर ने एक कार को टक्कर मार दी थी जिसमें एक युवती और एक छोटी बच्ची सवार थे। छोटी बच्ची तत्काल मर गयी थी और उसकी माँ गंभीर चोट की हालत में अस्पताल में भर्ती करायी गयी थी। खबर यह थी कि अब उस परिवार को यह निर्णय लेना था कि कोमा में जा चुकी महिला को मशीनों के बल पर कृत्रिम रूप से जिन्दा रखा जाय कि मशीनें बन्द कर दी जाय। यह पक्का हो चुका था कि अब वह कोमा से वापस नहीं आ सकेगी। मेरा कलेजा धक्क से रह गया- कहीं यह परिवार इसी बच्चे का तो नहीं है?

बच्चे से मुलाकात के दो दिन बाद अखबार में खबर छपी कि उस महिला की मौत हो गयी। मैं अपने आप को रोक नहीं सका। मैंने सफेद गुलाबों का एक गुच्छा खरीदा और अंतिम संस्कार वाली जगह पर पहुँच गया। वहाँ उस युवती का पार्थिव शरीर परिजनों, मित्रों और अन्य लोगों के लिए अंतिम दर्शन और श्रद्धांजलि अर्पित करने को रखा गया था। ताबूत में वह लेटी हुई थी जिसके हाथों में सफेद गुलाब पकड़ाया गया था, और उसके सीने पर वही गुड़िया और उस बच्चे की तस्वीर सजाकर रखी गयी थी। मैं वहाँ खड़ा नहीं रह सका। आखें पोंछते हुए वहाँ से फौरन चल पड़ा। ऐसा महसूस हो रहा था कि अब मेरी जिन्दगी हमेशा के लिए बदल गयी...

उस छोटे से बच्चे के मन में अपनी माँ और अपनी बहन के लिए जैसा प्यार था, आज भी उसकी कल्पना करना बहुत कठिन है; और मात्र एक क्षण में उस शराबी ड्राइवर ने वह सब छीन लिया उससे।

[वैसे तो नियति पर किसी का कोई वश नहीं होता; लेकिन ऐसी मानवजनित घटनाएँ तो रोकी ही जा सकती हैं। क्या हम शराब पीने और शराब पीकर गाड़ी चलाने पर पूरी तरह रोक नहीं लगा सकते?]

(usefulinformation के संदेश से अनूदित)

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

www.satyarthmitra.com

11 comments:

  1. अच्‍छी कहानी को यहां देने के लिए आभार।

    ReplyDelete
  2. मैंने इतनी छोटी टिप्पणियों की उम्मीद नहीं की थी।
    :(

    ReplyDelete
  3. बहुत बधाई एक अच्छी कहानी के लिए। अत्यन्त मर्मस्पर्शी कहानी है जो आज के युग में अत्यधिक प्रासंगिक है। बालमन का चित्रण करने में आप सहज ही समर्थ हैं। इस मनोवैज्ञानिक कहानी के लिए एक बार फिर बधाई।

    ReplyDelete
  4. मन द्रवित करता पूरा घटनाक्रम।

    ReplyDelete
  5. अपने बायोडाटा में श्रेष्ठ अनुवादक होना भी जोड़िये

    ReplyDelete
  6. ये आप थे या मूलभाषा का लेखक, जिसने बाल-भावना का मर्म जाना, पर दोनों के सृजन पर किंकर्त्‍तव्‍यविमूढ़वाली स्थिति तो बन ही गई। कोमा में जाकर अस्‍पताल में मरी नन्‍हे बालक की मां, दुर्घटना स्‍थल पर ही निर्जीव हुई उसकी बहन और उसके बाद उन्‍हें देख द्रवित जीवित सांसे लेते मानव सभी के लिए घटना पढ़ते हुए मन में अश्रु-अनुराग उत्‍पन्‍न हो गया।

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)