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Thursday, September 19, 2013

वर्धा परिसर में अद्‌भुत बदलाव…

दो साल पहले जब केन्द्रीय विश्वविद्यालय- वर्धा छोड़कर उत्तर प्रदेश सरकार की नौकरी पर वापस गया था तो इसका परिसर अभी निर्माणाधीन था। सीमेन्ट की सड़कें तब बन ही रही थीं। पथरीली पहाड़ियों को तराशकर और काट-छीलकर भवन खड़े करने के लिए समतल किया जा रहा था और अनेक संकायों की इमारत खड़ी की जा रही थी। आज जब दो साल बाद यहाँ दो दिन के लिए आना हुआ तो परिसर की साज-सज्जा और तैयार खड़ी इमारतों को देखकर मुग्ध हो गया।

नागार्जुन सराय का भवन तो अभी बनना शुरू ही हुआ था। आज हमें इसी गेस्ट हाउस में ठहराया गया है। सबकुछ इतना बढ़िया है कि मुझे अपने ब्लॉगर मेहमानों के आराम की अब कोई चिन्ता ही नहीं रह गयी। यहाँ का स्टाफ भी आये दिन होने वाले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों व गोष्ठियों में आने वाले मेहमानों की आव-भगत करने में इतना दक्ष हो चुका है कि मुझे कुछ बताने की जरूरत ही नहीं रह गयी है। उसपर से कुलपति जी की प्रशासनिक सजगता और छोटी-छोटी बातों पर सतर्क दृष्टि और सदाशयता ने मेरा काम बिल्कुल आसान कर दिया है। इस सहजता से संगोष्ठी की सभी तैयारियाँ हो गयी हैं कि मुझे भी अन्य मेहमानों की तरह घूमने-फिरने और फोटू खिंचाने का पूरा मौका मिल गया है। तो लीजिए आज दिन भर की कुछ झाँकी आप भी देखिए मोबाइल कैमरे की नज़र से:

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बाबा नागार्जुन की प्रतिमा बनाने वाले ने उनका फोटो देखकर नहीं बल्कि अपनी आदर्श कल्पना का सहारा लेकर यह मूर्ति बनायी होगी। अब आगे की पीढ़ियाँ नागार्जुन के रूप में इसी चेहरे को पहचानेंगी। बस किसी मनुष्य की आहट मिलते ही यह शीशे का दरवाजा अपने आप खुलता और बन्द होता है।
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आज तीन महान विभूतियों का विदाई समारोह था जिसे फैकल्टी और ऑफीसर्स क्लब में आयोजित किया गया। (बाएँ से)  प्रो. बी. एम. मुखर्जी - मानवशास्त्र, प्रो. रामशरण जोशी - जन संचार, कुलपति जी व राजकिशोर – हिंदीसमय

जोशी जी ने अपना अनुभव अविरल सुनाया तो राजकिशोर जी ने अपना लिखित भाषण पढ़ा। बोले- विदाई समारोह में कही गयी बातें झूठ का ज्वालामुखी होती हैं। साथ ही सफाई दे गये कि मैं कभी किसी के हरम में नहीं रहा।

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मुझे खबर मिली कि तीन चार ब्लॉगरों ने एक वयोवृद्ध साहित्यकार के कमरे पर धावा बोल दिया है। बेचारे सोने की जुगत कर रहे थे कि इन लोगों ने उन्हें कुर्सी पर बिठा दिया और उनसे ‘आशीर्वाद’ मांगने के बहाने घेरकर बैठ गये।
पता चलने पर मैं भागा-भागा आया और हाथ जोड़कर मैंने अपना परिचय दिया- महोदय, ये लोग इस समय सो जाने के बजाय आपको तंग करने का जो दुस्साहस कर रहे हैं उसके लिए जिम्मेदार मैं हूँ क्योंकि इन लोगों को यहाँ बुलाने की गलती  मैंने की है।
बाद में जब फोटो खींचने का उपक्रम हुआ तो हर्ष जी अपना कैमरा लाने चले गये और शैलेश भारतवासी अपनी काठमांडू की कथा सुनाने के बाद विनोद कुमार शुक्ल जी के पीछे खड़े हो गये। डॉ प्रवीण चोपड़ा कैमरे का बटन दबाने लगे।  डॉ. अरविंद मिश्र जी अपनी कुर्सी से तनिक नहीं हिले। मुझे तो आप देख ही रहे हैं Smile

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(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

9 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बुधवार (20-09-2013) "हिन्दी पखवाड़ा" : चर्चा - 1374 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. दक्षता का पक्ष बहुत पसंद आया। बेहतरता के लिए दक्षता के साथ पक्षपात अवश्‍य किया जाना चाहिए। पर यह पक्षपात राजनीतिक दलों से इतर सकारात्‍मक रहता है। अभी कार्य चालू हैं। बेहतरता की ओर दमदार कदम सदा बढ़ते रहते हैं। बढ़ते रहने भी चाहिए।

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  3. अरे वाह नुक्क्ड़ जी आप यहां चलिये कहीं तो ट्क्कर हुई :)

    बहुत सुंदर !

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  4. आज हम आकर नागार्जुन बाबा की सराय में ठहर गये।

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  5. सुंदर प्रस्तुति ... सभी फोटो बेहद उपर्युक्त दिखीं... आप की इस पोस्ट से लोग इस विश्वविद्यालय में आ रहे अद्भुत बदलावों के बारे में घर बैठे देख पाएंगे.. सभी फोटो भी सुंदर एवं उपर्युक्त हैं।

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  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!

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  7. आशा है कि यह संस्‍थान बदलते समय के साथ अपना मूल स्‍वरूप नहीं बदलेगा.

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  8. बेहतरीन चित्र । प्राञ्जल प्रस्तुति । हम सबको को आपस में मिलवा कर आपने इस ब्लॉग सेमिनार को ब्लॉग-कुंभ बना दिया है । अविस्मरणीय,अनिवर्चनीय ।

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