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Tuesday, July 30, 2013

वर्धा में फिर होगा महामंथन

हिंदी विश्वविद्यालय की अनूठी पहल से हिंदी ब्लॉगिंग को मिलेगी नयी ऊर्जा 

mgahvwardhaहिंदी ब्लॉगिंग का एक दशक पूरा हुआ। अब इसके लिए शैशव काल का विशेषण बेमानी हुआ। अब इसकी अनगढ़ न्यूनताओं, चिरकुट गुटबाजियों और हास्यास्पद कलाबाजियों को बालसुलभ गलतियों का नाम देकर संदेह का लाभ देना नहीं जमेगा। साथ ही तमाम होनहार और प्रतिभासंपन्न ब्लॉग-लेखकों के उपयोगी उत्पाद रूपी मोती को इस महासागर से छानकर आकर्षक ढंग से सजाना होगा ताकि जो गुणग्राही हैं वे इसकी सही कीमत लगा सकें। वे जिसके पात्र है उन्हें वैसी गरिमा दिलानी होगी। अब इस माध्यम की औकात और नियति पर कुछ ठोस निष्कर्ष निकालने होंगे।

आज सोशल-मीडिया के रूप में तमाम मंच हमारे कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर हमें लुभा रहे हैं, हमारा समय खा रहे हैं और प्रायः चु्टकुलों, गपबाजी, चैटिंग, गाली-गलौज और मानसिक कुंठा को बाहर करने का जरिया बन रहे हैं। इनके बीच कभी-कभी बहुत अच्छी और गंभीर बातें भी सामने आती हैं लेकिन इन मंचों पर शब्दों के आने और चले जाने की गति इतनी तेज है कि इसपर कोई गंभीर बात करने और उसे सहेजकर रखने का सुभीता नहीं रह जाता। फेसबुक का स्टेटस और ट्विटर के ट्वीट कितने क्षणजीवी हैं यह किसी से छिपा नहीं है। खाने में चटनी जैसे। लेकिन जिन्हें थोड़ा आराम से कुछ कहना है, सुव्यवस्थित होकर लिखना और पढ़ना है तथा आगे के लिए बहुत कुछ सहेज कर रखना है उन्हें तो ब्लॉग का आशियाना ही भाएगा।

ब्लॉग-जगत  में जो कुछ श्रेष्ठ और उत्कृष्ट है उसको साधारण और चलताऊ किस्म की सामग्रियों की भारी भीड़ से अलग पहचान देने  की कोई कारगर तकनीक खोजनी होगी। लाखों की संख्या में लिखी जा रही छोटी-बड़ी पोस्टों के आवागमन के लिए कोई एक ऐसा गोल चौराहा तैयार करना होगा जहाँ खड़ा होकर इस साइबरगंज में टहलने वाले अधिकांश रचनाकर्मियों की छटा निहारी जा सके। कोई एक नजर में भा जाय तो उसे दोस्ती का पैग़ाम दिया जा सके। एक दूसरे के यहाँ सहजता से आना जाना हो सके और इस वैचारिक दुनिया की तासीर अधिक से अधिक लोगों तक करीने से पहुँचायी जा सके। कोई नवागन्तुक यहाँ आकर आसानी से यह समझ सके कि इस दुनिया में उसके पसन्द की सामग्री कहाँ मिलेगी और उसकी विशेषज्ञता का मान कहाँ रखा जाएगा।

ब्लॉगवाणी और चिठ्ठाजगत के निष्क्रिय हो जाने के बाद एक ऐसे जंक्शन या डिपो का निर्माण बहुत जरूरी हो गया है जहाँ से इस बहुरंगी दुनिया की सैर को निकला जा सके और इसकी तमाम गलियों की नब्ज टटोली जा सके। इस माध्यम में जो लोग श्रेष्ठ और वरिष्ठ है, जो पूरी दक्षता और निष्ठा से लगे हुए हैं और जो अपना समय और श्रम देकर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं उनके कार्य को दूसरों के लिए एक प्रतिदर्श के रूप में रखा जा सके। इस उत्पाद को विशुद्ध रूप से मांग और आपूर्ति के सिद्धान्त के भरोसे छोड़ देना अब शायद हमारी उदासीनता का परिचय देगा। अच्छी से अच्छी सामग्री भी बाजार में तभी स्थापित हो पाती है जब उसके लिए अच्छे प्रोमोशन अभियान चलाये जाते हैं। अपनी भाषा के ब्लॉग को समुन्नत बनाने के लिए हमें गंभीर प्रयास करने ही होंगे। जब एक केन्द्रीय विश्वविद्यालय हमें जरूरी संसाधन उपलब्ध कराने के लिए पहल करे तब तो यह और भी जरूरी हो जाता है।

सौभाग्य से हिंदी ब्लॉगिंग के प्रोमोशन के लिए एक गंभीर कदम उठाने का निर्णय वर्धा विश्वविद्यालय ने लिया है। जी हाँ, महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा द्वारा एक बार फिर से इन सभी जरूरतों को पूरा करने के उद्देश्य से आगे बढ़कर पहल की गयी है। कुलपति श्री विभूति नारायण राय ने एक बार फिरसे मुझे यह चुनौती दी है कि हिंदी ब्लॉगिंग के दशम्‌ वर्ष में एक बार फिर महामंथन का संयोजन करूँ। एक वृहद्‌ मंच सजाकर इसकी दशा और दिशा की न सिर्फ़ पड़ताल की जाय बल्कि इसे एक सकारात्मक मोड़ देते हुए इस माध्यम की गरिमा को एक नयी उँचाई देने का प्रयास किया जाय। इसे अराजकता के झंझावात से निकालकर एक सुव्यवस्थित, परिमार्जित और उद्देश्यपरक चिन्तन का सकारात्मक वातावरण दिया जाय। मुझे यह लोभ है कि उनके इस औदार्य का सदुपयोग ब्लॉगवाणी या चिठ्ठाजगत की कमी पूरी करने और हिंदी ब्लॉग्स के लिए उससे भी अधुनातन प्लेटफ़ॉर्म बनाने के लिए किया जाय।

“एक बार फिर से” का अर्थ वे लोग तो समझ ही रहे होंगे जिन्होंने 2009 में इलाहाबाद और 2010 में वर्धा में आयोजित राष्ट्रीय सेमिनारों में प्रत्यक्ष या परोक्षा हिस्सा लिया था। ये दोनो ही कार्यक्रम हिंदी ब्लॉगिंग की यात्रा में मील के पत्थर साबित हुए थे। जो लोग बाद में इस माध्यम से जुड़े हैं उन्हें समय निकालकर इस ऐतिहासिक समागम का हाल जानना चाहिए।

Wardha2011कुलपति जी ने जब पहली बार इलाहाबाद में इस सिलसिले की दागबेल डाली थी तब किसे पता था कि चन्द जुनूनी लोगों के नितान्त निजी प्रयासों से शुरू हुआ हिंदी ब्लॉगरी का कारवाँ आगे चलकर सार्वजनिक प्रतिष्ठानों, सरकारी संस्थाओं और लोक कल्याणकारी राज्य के प्रायः सभी घटकों का ध्यान आकर्षित करने में सफल होगा। लगभग सभी समाचारपत्र समूह, न्यूज चैनेल और बड़े वेबसाइट्स में ब्लॉग के लिए अनिवार्य रूप से एक मंच बनाया गया है।

तो मित्रों, अब इस महामंथन की तिथियाँ नोट कर लीजिए :

तिथि : 20-21 सितंबर, 2013 (शुक्रवार-शनिवार)
स्थान : महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा (महाराष्ट्र)

आप इस वैचारिक सम्मेलन में जिन-जिन बातों पर चर्चा कराना चाहते हों उनकी सूची बनाकर मुझे एक सप्ताह के भीतर बता दीजिए। अपना ठोस प्रस्ताव तथ्यपरक तर्कों के साथ प्रस्तुत कीजिए। विश्वविद्यालय द्वारा इनपर विचार किया जाएगा। प्रथमदृष्टया जिनके प्रस्ताव महामंथन में सम्मिलित किये जाने हेतु चुने जाएंगे उन्हें वहाँ सादर आमंत्रित किया जाएगा।  कोशिश होगी कि वहाँ देश के शीर्ष कोटि के पैनेल को बुलाया जाय और उनसे आपका साक्षात्कार हो। आप स्वयं उसका हिस्सा बनें। इस बीच आप चाहें तो अपना रेल टिकट बुक करा सकते हैं। निजी जोखिम पर। क्योंकि देर हो जाने पर कन्फ़र्म बर्थ मिलने में कठिनाई हो सकती है।  हाँ, विश्वविद्यालय केवल उनका व्यय भार ही वहन कर सकेगा जिन्हें औपचारिक आमन्त्रण भेजकर बुलाएगा। हार्दिक स्वागत उन सबका होगा जो इस अवसर पर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष या आभासी तौर पर उपस्थित रहेंगे।

अभी बस इतना ही। शेष बातें टिप्पणियों के माध्यम से अथवा अगली पोस्ट में। इस कार्यक्रम से संबंधित संदेश इस पोस्ट के टिप्पणी बक्से के अतिरिक्त मेरे दूसरे ई-मेल पते (sstwardha@gmail.com) पर प्रेषित कीजिए। प्रतीक्षा रहेगी।

सादर !

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

46 comments:

  1. आह्लादित करती, स्वागत योग्य खबर! एक चिर प्रतीक्षित प्रस्ताव!
    साहित्य और चिट्ठाकारिता की सिमटती / फैलती खाईं के बीच यह वर्धा -सेतु कुछ ठोस समाधान लेकर आये!
    आपने एक मौलिक शब्द दिया - साइबरगंज! साधुवाद!

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    1. इस बार आपको बड़ी जिम्मेदारी निभानी है। पहले से तैयारी कर लीजिए।

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    2. सभी को रूट के लिए गाईड करें -नागपुर से वर्धा के मार्ग विकल्प ..हम पिछली बार नहीं पहुँच पाए थे सो इस बार पहुंचना है ! और आज कल में ही रिजर्वेशन नहीं हुआ तो मुश्किल हो जायेगी

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  2. अहा, स्मृतियाँ जग आयीं। २१ को तो कानपुर में रहना है, २० को सोचा जा सकता है।

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    1. वर्धा तो नागपुर के पास ही है और नाकपुर से कानपुर की दूरी बस चार-छः अंगुल ही तो है।
      बीस को वर्धा में और इक्कीस को कानपुर में दर्शन दीजिए :)

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  3. वाह, जय हो!
    बड़ी चकाचक पोस्ट लिखी।
    उत्सुकता से सम्मेलन का इंतजार है।

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    1. पैनेल में ब्लॉगवाणी और चिठ्ठाजगत चलाने वालों को बुलाने का विचार है। उनसे संपर्क का रास्ता बताइए और उन्हें हमारा संदेश भी दीजिए।

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  4. जय हो:)
    हम तो बिना निमन्त्रण के ही पधारेंगे।

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  5. आपका प्रयास सफल हो। शुभकामनाएं।

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  6. अच्छा प्रयास है ..
    बधाई आपको !

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  7. ऐसे ही किसी उत्थान प्रयास की आवश्यकता महसुस की जा रही थी.
    इस महामंथन से निश्चित ही यथेष्ट निकल कर आएगा!!
    सद्प्रयास की संस्तुति करते है.
    बधाई सहित ढेरों शुभकामनाएँ

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  8. blog-pathak ke liye 'ahladit' karne wali khabar........'hum sath sath hain'............


    pranam.

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  9. उत्साह जगाने वाला आयोजन है। बधाई।

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  10. बहुत बढ़िया। पुन: महती आयोजन पर शुभकामनाएं।

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  11. वाह! ब्लॉगिंग जिंदाबाद।

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  12. खबर अच्छी है। आने के लिए अपनी दैनिक कार्यसूची में स्थान बनाता हूँ।

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  13. अच्छी खबर, शुभकामनायें

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  14. अच्‍छा और सराहनीय प्रयास है महात्‍मा गांधी अन्‍तर्राष्‍ट्रीय हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय का। इस हेतु आपकी प्रस्‍तावना व जानकारी भी काफी अहम है। शुभकामनाएं।

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  15. आपके प्रयास स्‍तुत्‍य हैं।

    हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की आंच सुलगती रहनी चाहिए। इसकी आंच में समय की सच्‍चाईयां पक कर सामने आएंगी। पर जो इससे छेड़छाड़ और इसे अंडरएस्‍टीमेट करेंगे, वे इस आंच में भुन जाएंगे और जो इसका सार्थक उपयोग करेंगे, वे एक नई ऊर्जा से परिपूर्ण होंगे। हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की यह विधा सभी तुरंत फुरंत सोशल मीडिया को पीछे छोड़ती जाएगी और अपना एक पुख्‍ता स्‍थान बना लेगी। बस इसमें हम सबको अपने प्राणपण से अपने प्राण रहने तक जुटे रहना होगा।
    मैंने एक विचार श्री बालेन्‍दु शर्मा 'दाधीच' जी और श्री संतोष त्रिवेदी जी के समक्ष एक कच्‍चे खाके के रूप में पेश किया था कि 'हिन्‍दी ब्‍लॉगबुक' जैसा एक मंच बनाया जाए जो कि ब्‍लॉगवाणी और चिट्ठाजगत की पूर्ति करे तथा 'फेसबुक' की तरह सदैव प्रवाहमान हो। इसमें हिंदी के सभी ब्‍लॉग जड़े हों और उनकी पोस्‍टें क्रम से सामने से गुजरती रहें और जिसे जिसको पढ़ना व अपनी राय देनी है, वह इसमें बिना अलग से लॉगिन किए दे सके। इससे इस मंच को आगे विस्‍तारित होने से कोई नहीं रोक सकता। इसके लिए तकनीकी और धन-संसाधन की व्‍यवस्‍था किसी विश्‍वविद्यालय से ही की जा सकती है और इसे अमली जामा पहनाया जा सकता है।
    मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि इसके बाद हिन्‍दी प्रेमी जनों को न किसी फेसबुक, न ट्विटर, पिन्‍टरेस्‍ट सरीखे किसी मंच की जरूरत होगी। अपितु वे ही हिन्‍दी ब्‍लॉग बुक से जुड़ेंगे। यह हमारी सफलता होगी। इसे पाने के लिए अनथक प्रयास करने के लिए हम सब और हमारे साथी हाजिर हैं।
    इस संबंध में विद्वत्‍जन और आप सब सुधीजन अपनी राय प्रकट कीजिए और अपनी-अपनी जिज्ञासाओं तथा सुझावों को अपनी अपनी ब्‍लॉग पोस्‍टों पर साझा कीजिए। जिससे निष्‍कर्ष निकल कर सामने आए। हां, इसमें आने वाली कठिनाईयों के बारे में ब्‍लॉगवाणी के संचालकद्वय श्री मैथिली गुप्‍त और उनके सुपुत्र श्री सिरिल गुप्‍त तथा हिन्‍दी चिट्ठाजगत के विपुल जैन जी का सहयोग अवश्‍य लिया जाए। मिलकर काम करने से मिलने वाली सफलता सदैव स्‍थायी होती है और उसे कोई रोक नहीं सकता है।
    जब हम मिलकर लड़ते हैं तब भी संख्‍या और शक्ति में अधिक वाले जीतते हैं परंतु मानस को सक्रिय कर नकारात्‍मक टीमवर्क को भी धता बतलाकर अपने उद्देश्‍यों को पाया जा सकता है।
    जय ब्‍लॉगिंग
    जय जय हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग।

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  16. औगढ़ के औकात की, सुगढ़ होयगी जाँच |
    ब्लॉगिंग के ये वर्ष दस, परखे पावन आँच |
    परखे पावन आँच , बड़े व्याख्यान कराये |
    वर्धा को आभार, विश्वविद्यालय आये |
    बीता शैशव काल, रही दुनिया खुब लिख पढ़ |
    हित साधे साहित्य, सुधरते रविकर औगढ़ ||

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  17. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।। त्वरित टिप्पणियों का ब्लॉग ॥

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  18. ब्लॉगिंग दौर अब ढलान पर है, काफ़ी चिट्ठे सुसुप्तावस्था में दिखाई देते हैं। कुछ लोग हैं जो निरंतर इस इस मंच पर सक्रीय हैं ऐसी अवस्था में उनमें नई उर्जा का संचार करने के लिए किसी सार्थक कार्यक्रम की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। आपका प्रयास स्तुत्य है। पहले के कार्यक्रमों की सूचना न मिलने के कारण उपस्थित नहीं हो सके। अगर आपका आमंत्रण मिला तो उपस्थित होने का पुरजोर प्रयास किया जाएगा। कार्यक्रम की सफ़लता के लिए अग्रिम शुभकामनाएँ

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  19. राय साहब को बधाई कि उन्होंने जोखिम के बजाय आजमाए फॉर्मूले (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)का ही प्रयोग करना ज्यादा बेहतर समझा। सोशल मीडिया के कुछ एकदम से अतिरेकी चरित्रों को भी इस बार जगह दी जाए तो बेहतर होगा।

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    1. कुछ अतिरेकी महानुभावों का नाम गुपचुप तरीके से बता दीजिए :)

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    2. बतला दीजिए हम नहीं सुन रहे हैं क्‍योंकि आप हमें तो पहले ही बतला चुके हैं और हम तो आपके मन के वासी हैं हर्षवर्धन जी। जहां हो हर्ष हम रहते हैं वही पूरा वर्ष।

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  20. अच्छी पहल... शुभकामनाएँ...

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  21. महामंथन ??
    अमृत कलश का इंतजार रहेगा ...
    और इसमें देव दानवों की लडाई भी न हो ..
    शुभकामनाएं !!

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    1. जहां पर सब हों बुद्ध
      काहे होगा वहां युद्ध।

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  22. संस्मरण ताज़ा हो आए :)

    पिछले ब्लॉग सम्मेलन का वीडियो भी है यू ट्यूब और एक्टिव इंडिया की साईट पर। ये दो लिंक देखे जा सकते हैं -

    - http://activeindiatv.com/videos/viewvideo/26/news-a-politics/exclusive-interview-with-international-blogger-kavita-vachaknavee

    - http://activeindiatv.com/videos/viewvideo/25/news-a-politics/seminar

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  24. उद्देश्य अच्छा हो और इच्छाशक्ति जागृत रहे तो निष्कर्ष भी उत्कृष्ट ही होंगे, हार्दिक शुभकामनायें इस महाप्रयास के लिये। मंथनोपरांत विस्तृत रिपोर्ट्स की प्रतीक्षा रहेगी।

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  25. बधाई शुभकामनाएं

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  26. हार्दिक शुभकामनायें!

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  27. बधाई शुभकामनाएं

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  28. यह जानकर बहुत खुशी हुई कि हिंदी ब्लॉगिंग के प्रोमोशन के लिए एक गंभीर कदम उठाने का निर्णय महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा ने लिया है

    प्रकृति में एकमात्र मानव मस्तिष्कर ही है , जहां सतत् चितन चलता रहता है, भले ही इसका स्तर भिन्न भिन्न हो, अपने अपने स्तार के अनुरूप कोई व्यक्तिगत तो कोई सामाजिक तो कोई राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों के लिए चिंतन किया करते हैं , स्वार्थी या दुष्ट लोग अपने चिंतन को अभिव्यीक्त नहीं करते , जल्द से जल्द अंजाम देते हैं , पर सकारात्मक विचार वाले खुद जिस राह पर चलना चाहते हैं , उसी राह पर चलने के लिए औरों को प्रेरित भी करते हैं। इसलिए वे अपने विचारों को अभिव्यहक्त करते रहते हैं, यह वर्ग समाज के विकास के लिए सर्वार्धिक चिंतनशील माना जा सकता है और इसी वर्ग के द्वारा देश का विकास संभव है। ब्‍लॉगिंग से पहले इतने बडे पैमाने पर विचारों को अभिव्यकक्ति देने की स्वततंत्रता किसी को नहीं थी , आज अलग अलग भाषाओं में लोग विचारों को अभिव्यक्ति देने में समर्थ हैं, हिंदी भाषा में ब्लॉगिंग करने वाले पूरे देश के हालात , समस्या ओं और उसके विकास से संबंधित उपायों पर दृष्टि रखते हैं , इसलिए उनकी एकता की बातें सबसे पहले होनी चाहिए , किसी भी धर्म , जाति , राजनीतिक दल से परे हम एक होकर ही अपने या किसी अन्य मामलों में हो रही किसी भी गलत बात का विरोध कर सकते हैं। विद्वानों को व्यक्ति से नहीं , मुद्दों से दोस्ती दुश्मनी होनी चाहिए। एकता के लिए देशभर के ब्लोगरों का एक बडा मंच बनना चाहिए , जिसमें समय समय पर क्षेत्रीय स्तर पर भी क्रियाकलाप चलता रहे। इसके लिए कुछ सहयोग राशि भी ली जानी चाहिए , बेरोजगार या विद्यार्थियों के लिए कुछ छूट दी जा सकती है।
    उस मंच के ब्लोगरों के लिए लिखने के दायरे तय किए जाने चाहिए , टिप्पणी वगैरह में भी आपत्तिजनक बातों का विरोध होना चाहिए। कुछ के द्वारा लिखे जाने वाले लेख को एक जगह रखने के लिए एग्रीगेटर आवश्य‍क है , सारे लेख वहां अपडेट होते रहें , ताकि सारे हिंदी ब्लोगरों के द्वारा लिखे जाने वाले विचारों को लोग पढ सकें। इसके एक कॉलम में फेसबुक , ट्विटर आदि के अपडेट भी आते रहें तो बहुत बढिया हो , क्यों कि ब्लॉग लिखने में समय अधिक लगता है औार कभी कभी समयाभाव में लोग छोटी छोटी बाते इन सोशल साइट्स में ही डाल देते हैं। एग्रीगेटर में प्रतिदिन किसी सामाजिक , राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों को लेकर व्यापक चर्चा हो , महीने में कम से कम 5 मुद्दों में विचार देना सबके लिए आवश्यक किया जाए , ताकि उसके तमाम पहलू खुलकर सामने आए , उससे जुडे समस्याओं के समाधान के लिए काम किया जा सके। ब्लॉगरों में खास प्रतिभाशाली लोगों जैसे लेखक , चित्रकार, कलाकार के विकास के लिए , जो सरकार की ओर से उपेक्षित हैं , आगे लाने के लिए मिलजुलकर प्रयास करना भी आवश्यक है।
    देश के कोने कोने से प्रतिनिधित्व करने वाले सारे हिंदी ब्लॉगर्स एकत्रित हो जाएं , तो हममें काफी मजबूती आ सकती है , हम आज की तरह लाचार होकर सिर्फ कलम ही नहीं चलाएंगे , आनेवाले समय में देशभर में आंदोलन कर देश की दशा और दिशा दोनो बदल सकते हैं। बस शुरूआत में ही दो चार होते हैं , धीरे धीरे कारवां बन जाता है। आपको और वर्धा विश्वोविद्यालय के कुलपति दोनो को शुभकामनाएं!!!!!

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  29. कुछ समकालीन मुद्दे जिनपर विमर्श किया जाना चाहिये-

    १. ब्लॉगिंग की नैतिकता क्या हो..? इसका पैमाना क्या हो..? या हो भी कि न हो..? अगर हो, तो तय कौन करे..? प्राय: हर क्षेत्र अपने लिये स्व-नियमन के मानदण्ड तय करता है। पत्रकारिता और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में इसके नियम पहले से तय हैं लेकिन सोशल मीडिया ने इस क्षेत्र में अभी तक अन्यमनस्कता दर्शाई है। किसी की अनुचित टिप्पणी/पोस्ट पर मिलजुलकर कोसने या बच्चों की तरह गूगल-फेसबुक मास्टर से शिकायत करने की बजाय क्यों न हिन्दी ब्लॉगिंग आगे बढ़कर अपने लिये एक आचारसंहिता तय करे। निस्संदेह यह सबपर बाध्यकारी नहीं होगी परन्तु नैतिकता तय करने का एक विनम्र प्रयास तो हो..

    २. 66-A और अन्य समकालीन विवाद क्या निश्चित रूप से अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात हैं..? क्या हम दावे के साथ कह सकते हैं कि इन कानूनों का मंतव्य पवित्र है..? कहीं ये पिछले दरवाजे से सेंसरशिप का भूत घुसाने की कोशिश तो नहीं..?

    ३. हिंदी ब्लॉगिंग सर्वसमावेशी हो रही है या नहीं..? कहीं इसमें केवल एक ही मत के मानने वालों का जमावड़ा तो नहीं..? अगर विभिन्न मत स्थान पाते हैं, तो क्या केवल वाद-विवाद तक ही सीमित रह जाते हैं या कोई संवाद भी निकलकर सामने आ पाता है..?

    ४. ‘हेट ब्लॉग्स’ का क्या किया जाय..? इन्हें स्वतंत्र छोड़ देना श्रेयस्कर होगा या नहीं..?

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  30. सेमिनार के सफल आयोजन हेतु शुभकामनाएं।

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  31. पिछले वर्धा सम्मेलन में नहीं आ पाया था।
    इस बार भी तय नहीं।
    खबर लेते रहेंगे।
    शुभकामनाएँ

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  32. इमेल से इस सुचना तक पहुचना हुआ, काफ़ी दिनों बाद कोई ब्लॉग लेख पूरा पढ़ा अच्छा लगा, हम तो पूर्व हो गए, कार्यक्रम को आयोजित करने और उसकी सफ़लता के लिए बधाई व शुभकामनाएं..

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  33. vaah - wonderful concept. reached here from dr mishra's link. very very good idea , particularly this - ब्लॉग-जगत में जो कुछ श्रेष्ठ और उत्कृष्ट है उसको साधारण और चलताऊ किस्म की सामग्रियों की भारी भीड़ से अलग पहचान देने की कोई कारगर तकनीक खोजनी होगी। लाखों की संख्या में लिखी जा रही छोटी-बड़ी पोस्टों के आवागमन के लिए कोई एक ऐसा गोल चौराहा तैयार करना होगा जहाँ खड़ा होकर इस साइबरगंज में टहलने वाले अधिकांश रचनाकर्मियों की छटा निहारी जा सके।

    all the best wishes for the success of this endeavor
    sincerely
    shilpa mehta

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  34. हर्षवर्धन जी का यह सुझाव जरूर माने .....अतिरेकी चरित्रों को भी इस बार जगह दी जाए तो बेहतर होगा।

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  35. पिछले कार्यक्रमों के बारे में और आयोजन में शामिल लोगों के बारे में रुचिकर और अरुचिकर बातें विस्तार से पढ़ने को मिली अब उन गलतियों की पुनरावृत्ति न हो तो मिठास बनी रहेगी हम तो आपके कार्यक्रम में शामिल होंगे दीर्घा में ताकि अच्छे लोगों से मुलाक़ात कर सकें शुभकामनाओं सहित

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आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)