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Tuesday, May 28, 2013

औरतों को पूरा बदल देना चाहते हैं चेतन भगत

chetan bhagatचेतन भगत ने अपने उपन्यासों से नौजवानों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है। एक बिन्दास, साहसी, स्पष्ट सोच रखने वाला और बातों का धनी नौजवान लेखक। सामाजिक मसलों पर खुली राय रखने के लिए उन्हें टीवी चैनेलों पर भी देखा जा सकता है और यत्र-तत्र अंग्रेजी अखबारों में भी। कुछ नया सोचने और पेश करने का सलीका उन्हें खूब आता है। हाल ही में महिला दिवस के मौके पर लिखे अपने एक छोटे से आलेख (ब्लॉग पोस्ट) में उन्होंने पहले तो वे बिन्दु गिनाये हैं जो महिलाओं के प्रति पुरुषों के व्यवहार में परिवर्तन की अपेक्षा करते हैं। इसे ईमानदारी से उन्होंने स्वीकार भी कर लिया; लेकिन उनकी चर्चा फिर कभी। यहाँ यह बताना है कि उस आलेख में उन्होंने यह सलाह दे डाली कि सभी महिलाओं को अपने भीतर निम्नलिखित पाँच मौलिक परिवर्तन करने की आवश्यकता है :

  1. दूसरी महिलाओं की अनावश्यक आलोचना करना बन्द करें। वे हमेशा दूसरी महिलाओं के बारे में अपना फैसला सुनाने को आतुर रहती हैं। यह फैसला प्रायः कठोर ही रहता है। वे अपने प्रति भी कठोर होती हैं लेकिन महिलाएं एक-दूसरे के प्रति तो कुछ ज्यादा ही कठोर होती हैं। खराब फिटिंग के पहनावे से लेकर बिगड़ गये पकवान तक। वे टिप्पणी करने से नहीं चूकतीं। भले ही वे जानती हैं कि कोई भी सर्वगुणसंपन्न नहीं होता।
  2. झूठा व्यवहार करना बन्द करें। महिलाओं में यह आम प्रवृत्ति होती है कि अगले को खुश करने के लिए, खासकर पुरुष-अहम्‌ को तुष्ट करने के लिए ऐसा कुछ करती हैं जो उन्हें खुद ही सही नहीं लगता। जैसे किसी बचकाने चुटकुले पर भी जबरदस्ती हँसना, बॉस द्वारा नाजायज काम सौंपने पर भी खुशी-खुशी स्वीकर कर लेना, किसी बड़बोले की आत्मश्लाघा को चुपचाप सुनते हुए उसे अपने से श्रेष्ठतर समझने देना। यह सब खुद के साथ अच्छा व्यवहार नहीं है।
  3. अपने संपत्ति संबंधी अधिकारों के लिए खड़ी हों। भारत में असंख्य महिलाएँ अपनी संपत्ति का अधिकार अपने भाइयों, पुत्रों या पतियों के हाथों लुटा देती हैं। इसके लिए उन्हें आगे बढ़कर अपना अधिकार प्रकट करना चाहिए।
  4. महत्वाकांक्षी बनें और बड़े सपनें देखें। भारत के सभी नौजवानों के सीने में एक आग होनी चाहिए। भारतीय समाज की जो संरचना है उसमें लड़कियों के लिए जो सपने देखे जाते हैं वे लड़कों से अलग हैं। लड़कियाँ उतनी महत्वाकांक्षा नहीं रख पातीं जितना लड़के। लड़कियों को खुद ही इस स्थिति को बदलना होगा।
  5. रिश्तों के नाटक में ज्यादा मत उलझें। रिश्ते बहुत जरूरी हैं, लेकिन इतने भी नहीं। एक अच्छी माँ होना, पत्नी होना, बहन होना, बेटी होना, दोस्त होना या एक अच्छी प्रेमिका होना बहुत ही महत्वपूर्ण है, लेकिन इन रिश्तों में पूरी तरह खो जाना ठीक नहीं है। आपके जिम्मे एक और रिश्ता है- स्वयं से। रिश्तों के नाम पर इतना त्याग न करें कि आप अपने आप का ही बलिदान कर दें।

यह पाँचो सदुपदेश देखने में बहुत आकर्षक हैं और फॉलो करने लायक हैं। मैं अपनी बेटी को जरूर सिखाऊंगा। लेकिन इसपर पाठकों की जो राय आयी है वह भी बहुत रोचक है और मंथन को प्रेरित करती है।

मुम्बई की स्निग्धा इन पाँचों का जवाब यूँ देती हैं :

    1. क्या मर्द हमारी आलोचना नहीं करते हैं। हमने यह उन्हीं से सीखा है।
    2. क्या आप कभी मर्दों की ओछी हरकतों के शिकार हुए हैं- ‘वाह क्या बॉडी है’ वाली मानसिकता के? इनसे बचने के लिए झूठा व्यवहार करना ही पड़ता है।
    3. संपत्ति के अधिकार के बारे में अब जागरुकता बढ़ रही है। लेकिन अभी कितनी ग्रामीण औरतें इसका नाम भी जानती हैं?
    4. अपनी महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए पैसा कहाँ से लाएँ। अच्छा, खुद कमाकर?
    5. रिश्ते ! हिलैरी क्लिंटन को भी पहले बिल क्लिंटन की पत्नी कहा जाता है और बाद में अमेरिका की विदेश मंत्री।

टिप्पणियाँ तो और भी करारी हैं लेकिन यहाँ केरल निवासी जी.पिल्लई की बातें संक्षेप में रखना चाहूँगा :

चेतन भगत ने अपने आलेख में एक गहरी समस्या के सतह को ही छुआ है। …पुरुष महिलाओं के साथ क्या करते हैं यह तो विचारणीय है ही, एक महिला दूसरी महिला के साथ क्या-क्या और कैसे-कैसे व्यवहार करती है यह भी सोचना होगा। …यह दुश्मनी गर्भ में कन्या भ्रूण के आते ही शुरू हो जाती है। भारत की कौन स्त्री बेटी के बजाय बेटा पैदा करना ज्यादा पसन्द नहीं करती होगी? …घर के भीतर रोज ही बेटे और बेटी में फर्क करने का काम उसकी माँ ही करती है। …कौन माँ अपने बेटे के लिए बड़ा दहेज पाने की कामना नहीं करती? …गोरी-चिट्टी और सुन्दर बहू किस माँ को नहीं चाहिए, भले ही उसका बेटा कुरूप और नकारा हो? इन सबके पीछे आपको एक धूर्त, निष्ठुर, स्वार्थी और लालची महिला दिखायी देगी जिसके मन में एक दूसरी ‘महिला’ के प्रति तनिक भी सहानुभूति नहीं है। …इसके लिए आपको दूर जाने की जरूरत नहीं है, अपने घर के भीतर ही झाँकिए, दिख जाएगा। …दहेज हत्या के मामले ही देख लीजिए। वास्तव में किसी भी औरत के जीवन में मिले कुल कष्टों में से जितने कष्ट दूसरी औरतों से मिलते हैं उतने मर्दों से नहीं।

इस बहस की लंबी सृंखला मूल आलेख में देखी जा सकती हैं। गंभीर बहस तो होती ही रहती है, होनी भी चाहिए। लेकिन मैं यहाँ अपनी बात माहौल को थोड़ा हल्का रखने की इच्छा से यूँ कहना चाहता हूँ :

पहली राय तो इनकी प्रकृति-प्रदत्त विशिष्टता (यू.एस.पी.) को ही तहस-नहस करने वाली है। क्या इसके बिना महिलाओं की अपनी दुनिया उतनी मजेदार रह जाएगी। टाइम-पास का इतना बढ़िया साधन उनके हाथ से छीन लेना थोड़ी ज्यादती नहीं है क्या? ऐसे तो निन्दारस का आनन्द ही विलुप्त हो जाएगा इस धराधाम से। पतिदेव के ऑफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद जब कामवाली भी सब निपटाकर चली जाती है तो अकेले समय काटना कितना मुश्किल होता है! इस मुश्किल घड़ी में यही तो काम आता है। बालकनी से लटककर पड़ोसन से, या फोन पर अपनी दूर-दराज की दोस्त या बुआ-मौसी-दीदी से यह रसपान करने में घंटो का समय कम पड़ जाता है। सुनते हैं इसके बिना उनका खाना भी मुश्किल से पचता है।

झूठा व्यवहार मत कहिए इसे जी। यह तो दुनियादारी है। यह न करें तो क्या कदम-कदम पर आफ़त को न्यौता दें। रोज इन्हें एक से एक घामड़ और घोंचू भी मिलते हैं। उन्हें हल्का सा ‘फील-गुड’ करा देने से मैडम को सेफ़टी भी मिल जाती है और उस मूढ़ पर मन ही मन हँस लेने का मौका भी मिल जाता है। फालतू में बहादुरी दिखाने से तो टेंशन ही बढ़ता है।

संपत्ति के अधिकार ले तो लें लेकिन ससुराल और मायके को एक साथ सम्हालना कितना मुश्किल हो जाएगा। ऊपर से मायके से भाई-भाभी जो रोज हाल-चाल लेते हैं, कलेवा भेजते हैं, और अपने जीजाजी की दिल से जो आवभगत करते हैं वह सब बन्द न हो जाएगा। सावन का झूला झूलने और गृहस्थी के बोझ से थोड़ी राहत पाने वे किसके पास जाएंगी? बच्चों के लिए मामा-मामी का दुलार तो सपना हो जाएगा। दूसरी तरफ़ बुआ और फूफा जी तो फिल्मी खलनायक ही नजर आएंगे। जब बहन अपने भाई की जायदाद बाँट लेगी तो वह ससुराल में अपनी ननद को भी तो हिस्सा देगी। इस बाँट-बँटवार में हमारे रिश्ते तो बेमानी हो जाएंगे।

महत्वाकांक्षी बनने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इसके लिए खुद ही मेहनत भी करना होगा। एक फॉर्म भरकर रजिस्ट्री करने भर के लिए भैया या पापा का मुँह ताकने से काम नहीं चलेगा। निडर होकर बाहर निकलना पड़ेगा, मम्मी का कंधा छोड़ना होगा और कड़ी प्रतिस्पर्धा के लिए वह सब करना होगा जो लड़के कर रहे हैं। आरक्षण का भरोसा नहीं अपने उद्यम का सहारा लेना होगा। इसके लिए कितनी लड़कियाँ तैयार हैं? मुझे लगता है - बहुत कम। जो तैयार हैं उन्हें सलाम। लेकिन ज्यादा संख्या उनकी है जो सिर्फ़ इसलिए पढ़ रही हैं कि पापा को उनकी शादी के लिए अच्छे लड़के मिल सकें।

रिश्ते नाटक की चीज नहीं हैं। इनके बिना व्यक्ति का अस्तित्व किस प्रकार परिभाषित होगा? मैंने उन लोगों को पागल होते देखा है जिन लोगों ने सामाजिक व पारिवारिक रिश्तों की कद्र नहीं की। कुछ समय तो साहस और उत्साह बना रहता है लेकिन बाद में एक साथी की तलाश शुरू हो जाती है जिसमें विफलता व्यक्तित्व को मुरझा देती है। एकला चलो का नारा इन रिश्तों के बाहर नहीं भीतर ही प्रस्फुटित होना श्रेयस्कर है। अन्य  प्राणियों से मनुष्य भिन्न सिर्फ़ इसलिए है कि वह एक सामाजिक प्रामाणिक है। समाज का निर्माण ये रिश्ते ही करते हैं। इसमें महिलाएँ जानबूझकर उलझती नहीं हैं, बल्कि इनके बीच ही वे बड़ी होती हैं। रिश्तों का ख्याल महिलाएँ ज्यादा करती हैं तो इसके लिए उन्हें धन्यवाद दीजिए और उनका अधिक सम्मान करिए। हाँ, उन्हें इतनी जगह जरूर दीजिए कि वे अपने आप के साथ भी एक सुखी और गौरवशाली रिश्ता कायम कर सकें।

मैं तो ऐसा ही सोचता हूँ। आशा है आप अपने विचार यहाँ जरूर साझा करना चाहेंगे।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

13 comments:

  1. Kabhi kabhi ye buddhijeevi log lagta hai sirf buddhi se jeete hain. Vastavikta ke anna-jal grahan nahi karrte hain. Waise ine post pe hi reply karne ka man tha par usme message mila ki:
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  2. पाँचों सलाह आवश्यक है अपनी छवि में आमूलचूल परिवर्तन के लिये।

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  3. एकला चलो का नारा इन रिश्तों के बाहर नहीं भीतर ही प्रस्फुटित होना श्रेयस्कर है........बहुत सही लताड़ा है आपने नौसिखिई सोच को। बहुत बढ़िया विश्‍लेषण किया आपने।

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  4. आपने मुद्दे को गहरी समझ और ह्यूमर से टच किया है -सहमत हूँ!

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  5. काश इसे सब ध्यान से पढ़ें ...

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  6. उपदेश देना और बात है वास्‍तविकता में जीना और बात है। मुझे तो यह समझ नहीं आता कि हम दूसरों को ही कयों सलाह देते हैं। लेकिन आपने अच्‍छा उत्‍तर दिया है।

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    1. असल में लोकप्रियता प्राप्त हो जाने के बाद सर्वज्ञता की खुशफ़हमी आ जाती है और ‘बाबागीरी’ का शौक चढ़ ही जाता है। जैसे राजनेता चुनाव जीतने के बाद अपनी हर सही-गलत बात को जस्टिफाइड मान लेता है क्योंकि जनता ने उसे बहुमत दे दिया है। भले ही मार्जिन दो परसेन्ट का रहा हो।

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  7. एक बिन्दास, साहसी, स्पष्ट सोच रखने वाला और बातों का धनी नौजवान लेखक।
    इस बात से सहमत नहीं। मेरी समझ में चेतन भगत मुंह देखी और गोलमोल बाते करते हैं। मैनेजमेंट की पढ़ाई के अनुसार वह बात जिससे उनको नुकसान हो। :)

    बाकी लेख तीन दिन पहले ही पढ़ चुके हैं। बाकी बातों पर टिप्पणी एक बार फ़िर पढ़कर करेंगे।

    नियमित लिखते रहें हाकिम-ए-खजाना साहब!

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    1. आपसे सहमत।
      मेरा आशय यह था कि जिनको लक्ष्य करके वे लिखते हैं उनके बीच ऐसी ही छवि बना रखे हैं। पूरी बात यूँ है-

      “चेतन भगत ने अपने उपन्यासों से नौजवानों के बीच अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है। एक बिन्दास, साहसी, स्पष्ट सोच रखने वाला और बातों का धनी नौजवान लेखक।”

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  8. http://charwakshesh.blogspot.in/2013/04/blog-post.html

    भगत जी, किसी भी समाज से लेकर किसी दफ्तर में "पावर" और "पोजीशन" के संबंध और कार्य-व्यवहार पर उसके असर के बारे में आपने कभी सोचा है? अजी छोड़िए! ये भी क्या सवाल कर लिया आपसे! अगर आपने सोचा ही होता तो क्या बात थी! बहरहाल, भगत साहब, "पद" और "हैसियत" एक ऐसी "ताकत" है, जिसके बूते किसी भी मातहत या सहयोगी को मानसिक दबाव की स्थिति में लाया जा सकता है। खासतौर पर आपकी महान भारतीय परंपरा में केवल दफ्तरों में नहीं, बल्कि समाज में हर कदम पर "पद" और "हैसियत" आमतौर पर खुद से एक क्रम "नीचे" वाले को निगल कर ही अपनी सत्ता बचाए रखता है। वहां स्त्री हो या पुरुष, हर जतन से उसे तुष्ट करने की स्वाभाविक कोशिश करेंगे, ताकि खुद को ज्यादा से ज्यादा वक्त तक बचाए रख सकें।

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  9. सार्थक आलेख. महिलाओं में आत्मविश्वास जगाने के लिये सभी पांचों तत्व आवश्यक हैं.

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  10. महिलाएं जब तक खुद को इंसान न मान कर सिर्फ स्त्री मानती रहेंगी तब तक पुरुष भी उन्हें यही मानेंगे। हम ने खुद ही अपने मानसिक बंधन तोड़ने हैं।

    एक मुम्बईया मसाला फिल्म थी दिलीप कुमार जी की-राम और श्याम। जीवन भर प्राण जी से डरने वाला राम आखिर आखिर में कहता है - अब मैं तुमसे नहीं डरता। बस - यह नहीं डरना ही मुक्ति का मार्ग है हम में से हर एक के लिए।

    जब तक हम खुद को विभिन्न मापदंडों पर साबित करने के प्रयास करते रहें हम सम्पूर्ण हो ही नहीं सकते - फिर चाहे हम महिला हों या पुरुष। इन सब बातों से आत्मविश्वास नहीं आता। बल्कि आत्मविश्वास हो तो ये खुद को साबित करने का दबाव खुद ही हट जाता है। तब न अपनी ताकत से बढ़ कर वाहवाही के लिए कुछ करना आवश्यक होता है और न ही दुसरे की बुराई उजागर कर स्वयं को बेहतर सिद्ध करने के प्रयास करने पड़ते हैं।

    यह ऐसा है कि कमरे में अँधेरा है तो उसे बाहर फेंकने की नहीं बल्कि कमरे के भीतर दिया जलाने की आवश्यकता है -अँधेरा खुद ही मिट जाएगा।

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  11. महिलाएं जब तक खुद को इंसान न मान कर सिर्फ स्त्री मानती रहेंगी तब तक पुरुष भी उन्हें यही मानेंगे। हम ने खुद ही अपने मानसिक बंधन तोड़ने हैं।

    एक मुम्बईया मसाला फिल्म थी दिलीप कुमार जी की-राम और श्याम। जीवन भर प्राण जी से डरने वाला राम आखिर आखिर में कहता है - अब मैं तुमसे नहीं डरता। बस - यह नहीं डरना ही मुक्ति का मार्ग है हम में से हर एक के लिए।

    जब तक हम खुद को विभिन्न मापदंडों पर साबित करने के प्रयास करते रहें हम सम्पूर्ण हो ही नहीं सकते - फिर चाहे हम महिला हों या पुरुष। इन सब बातों से आत्मविश्वास नहीं आता। बल्कि आत्मविश्वास हो तो ये खुद को साबित करने का दबाव खुद ही हट जाता है। तब न अपनी ताकत से बढ़ कर वाहवाही के लिए कुछ करना आवश्यक होता है और न ही दुसरे की बुराई उजागर कर स्वयं को बेहतर सिद्ध करने के प्रयास करने पड़ते हैं।

    यह ऐसा है कि कमरे में अँधेरा है तो उसे बाहर फेंकने की नहीं बल्कि कमरे के भीतर दिया जलाने की आवश्यकता है -अँधेरा खुद ही मिट जाएगा।

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