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Sunday, September 30, 2012

भ्रष्टाचार की संजीवनी तो जरूरी है

Corruptionलखनऊ से इलाहाबाद के लिए गंगा-गोमती एक्सप्रेस की यात्रा इस बार बहुत रोचक रही। लम्बी प्रतीक्षा के बाद पदोन्नति मिली तो उत्साह वश अपनी सेवा पुस्तिका पूरी कराकर मुख्यालय से संबंधित उस दफ़्तर तक इसे स्वयं पहुँचाने चल पड़ा था जहाँ से मेरी सेवा के क्लास-वन ऑफीसर्स की वेतन पर्ची जारी होती है। इसी बहाने इलाहाबाद के अपने कुछ मित्रों व सहकर्मियों से मिलने-जुलने की इच्छा भी पूरी हो जाती।

संयोग से अगले दिन इलाहाबाद में प्रदेश के सरकारी डिग्री कालेजों में प्रवक्ता पद की कोई परीक्षा होनी थी इसलिए पूरी गाड़ी के साथ-साथ उस ए.सी. चेयरकार में बहुत से परीक्षार्थी भी बैठे हुए थे। इनमें अधिकांश पी-एच.डी. कर चुके होंगे या कर रहे होंगे। यू.जी.सी. की नेट परीक्षा (National Eligibility Test)  तो सबने पास की ही होगी। ये बड़ी उम्र के लड़के-लड़कियाँ उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपना कैरियर बनाने का सपना लिये एक स्क्रीनिंग टेस्ट देने जा रहे थे। अधिकांश के हाथ में नोटबुक या कोई गाइडबुक थी जिसे वे अंतिम समय तक पढ़ने वाले थे। कुछ शादी-शुदा लड़कियाँ अपने पति, भाई या पिता के साथ जा रहीं थीं। इस टेस्ट में जो पास हो जाएंगे उनका साक्षात्कार होगा। साक्षात्कार में सफलता का जो मंत्र इन लोगों की चर्चा में सुनने को आया वह एक ऐसे तंत्र के बारे में था जो अभ्यर्थी की मेरिट और विषय में योग्यता के बजाय दूसरी क्षमताओं को चयन का आधार बनाता था। पैसा और पहुँच के बिना सफलता की आशा करने वाले न के बराबर थे। मुझे झटका लगा। चकित भाव से मैंने उन्हें अपने अनुभव के बारे में बताया कि कैसे एक साधारण परिवार से आकर बगैर किसी उत्कोच या सिफारिश के लोक सेवा आयोग द्वारा मैं एक राजपत्रित सेवा के लिए चयनित कर लिया गया था। इसपर उन्होंने यह माना कि आयोग में पी.सी.एस. की मुख्य परीक्षा तो लिखित होती है और साक्षात्कार पर सबकुछ निर्भर नहीं होता। इसलिए वहाँ अभी गनीमत है, लेकिन जहाँ सबकुछ इण्टरव्यू पर निर्भर है वहाँ हालत बहुत खराब है।

मैंने अशासकीय विद्यालयों के शिक्षकों के चयन के लिए माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड और  उच्च शिक्षा सेवा आयोग में धाँधली की बातें सुन रखी थीं लेकिन लोक सेवा आयोग में भी इस बीमारी ने पैर पसार रखे हैं यह सुनकर चिन्ता हुई। मैं सोचने लगा कि क्या इस संवैधानिक संस्था से भी अब मेहनतकश होनहार अभ्यर्थियों को निराशा ही हाथ लगेगी। आयोग के माननीय सदस्य क्या हमारे पतनोन्मुख समाज की प्रतिच्छाया बनते जा रहे हैं?

एक तरफ कुछ सरकारी महकमें के लोग बैठे थे जो सरकारी अफसरों की अलग-अलग श्रेणियों का बखान कर रहे थे। वे इन परीक्षार्थियों को यह समझा रहे थे कि केजरीवाल जैसे लोगों के बहकावे में मत आयें। सरकारी नौकरी करनी है तो प्रैक्टिकल एप्रोच अपनाएँ। नौकरी पाने के लिए आपको जो रास्ता अपनाना पड़ रहा है वही आगे भी काम आएगा। अन्तर यह है कि अभी आप बेरोजगार हो और मजबूर हो। नौकरी पाने के बाद आप प्रिविलेज्ड क्लास में शामिल हो जाओगे। …अन्ना जी आन्दोलन तो कर सकते हैं, भ्रष्टाचार के खिलाफ जनभावना भी  उभार सकते हैं लेकिन जब इसको मिटाने के लिए सही आदमी तलाशने जाओगे तो कोई नहीं मिलेगा।  …सरकारी सिस्टम में रहते हुए जो ईमानदारी की कोशिश करता है उसको इतनी अधिक समस्याएँ झेलनी पड़ती हैं कि वह अन्ततः टूटकर सरेन्डर कर देता है या समाज में उपेक्षित होकर डिप्रेसन का शिकार हो जाता है। कुछ नौजवान इस बात पर अविश्वास में सिर हिला रहे थे।

इसपर मुझे पिछले दिनों लखनऊ की एक घटना याद आ गयी जिसमें एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने अचानक अपने ऑफिस में मीडिया को बुलाकर कैमरे के सामने अपनी दर्द भरी दास्ताँ सुना दी थी कि कैसे उनके ऊपर उच्चाधिकारियों द्वारा गलत काम करने का दबाव बनाया जा रहा है और इन्कार करने पर भयंकर उत्पीड़न किया जा रहा है। मीडिया ने जब उस उच्चाधिकारी से दरियाफ़्त की तो पता चला कि उन्होंने इन्हें मानसिक अवसाद का शिकार बता दिया और उनको अस्पताल भेजने की सलाह दे डाली।

“भाई साहब यह प्रैक्टिकल एप्रोच क्या होता है?” पीछे से एक उम्रदराज दढ़ियल अभ्यर्थी ने अपनी कॉपी में से सिर उठाकर पूछा। महौल में ठहाके की आवाजें भर गयीं।

रिटायरमेन्ट के करीब लग रहे एक बुजुर्गवार ने अपने अनुभव की टोपी उतारते हुए मुड़कर देखा और बताने लगे- देखो भाई जब सरकारी नौकरी करोगे तो इसकी हर रोज जरूरत पड़ेगी। इसके बिना नौकरी कर ही नहीं पाओगे। प्रैक्टिकल एप्रोच नहीं रखोगे तो चारो ओर से परेशान रहोगे।

प्रश्नकर्ता अपनी सीट से उठकर इनके पास आ गया। इन्होंने आगे समझाया- एक सरकारी कर्मचारी को लोकसेवक कहा जाता है और उसके आचरण की एक नियमावली बनायी गयी है। इस नियमावली का पालन नहीं करने पर आपको चेतावनी से लेकर निन्दा प्रविष्टि तक दी जा सकती है और डिमोशन से लेकर बर्खास्तगी तक की जा सकती है। इससे बचने के लिए आपको आदर्श आचरण का पालन करना होता है; लेकिन केवल कागज में, क्योंकि असल व्यवहार में तो यह संभव ही नहीं है। जो असल में कोशिश करता है वह असल में ‘सस्पेन्ड’ हो जाता है। कारण यह है कि नियम से काम करने पर और अपने पद की सारी जिम्मेदारी पूरा करने पर आप बाकी सबलोगों के लिए परेशानी खड़ी कर देते हैं। दूसरों की लूट-खसोट पर ब्रेक लगाकर आप ज्यादा समय तक टिक नहीं सकते। इनका तगड़ा गिरोह आपको हिला देगा…।

इस प्रवचन के श्रोताओं की संख्या बढ़ती जा रही थी।

…आप बहुत अच्छा काम करेंगे तो बाकी नक्कारों की कलई खुलने लगेगी और वे आप के ऊपर नाराज हो जाएंगे। आपके ईमानदार होने से सिस्टम में थोड़ी बहुत हलचल तो हो सकती है लेकिन कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हो पाएगा। …यह समाज भ्रष्टाचार का इतना आदती हो चुका है कि आपको ‘एलियन’ समझकर किनारे कर देगा। …आप जिनका खेल बिगाड़ेंगे वे आपको यूँही नहीं छोड़ देंगे। आपकी कुर्बानी ले ली जाएगी। …आपके बीबी-बच्चे आपको नकारा समझेंगे। आप उनके लिए महंगे खिलौने, कीमती कपड़े और भारी गहने नहीं खरीद पाएंगे तो आपको वे आदर्श पिता या पति नहीं समझेंगे। दूसरे रिश्तेदार भी आपको किसी काम लायक नहीं देखेंगे तो मुँह मोड़ लेंगे। …मैं यह नहीं कह रहा कि आप आकंठ भ्रष्टाचार में डूब जाएँ। लेकिन इससे बचकर रहना बहुत मुश्किल है। इसलिए आप भले ही किसी का गला न काटें, गबन और घोटाला न करें, गरीबों का हक न छीनें लेकिन सिस्टम के खिलाफ उल्टी धारा बहाने की कोशिश भी न करें। आपको चोरी नहीं करनी है तो न करें लेकिन दूसरों की राह का रोड़ा भी न बनें।

लेकिन प्रैक्टिकल एप्रोच क्या है श्रीमन्‍, यह तो क्लीयर कीजिए…! एक किशोर ने चुहल की।

आप अभी भी नहीं समझे? तो साफ-साफ जान लीजिए कि प्रैक्टिकल एप्रोच इस बात में विश्वास करना है कि बिना भ्रष्टाचार के यह वास्तविक दुनिया चलने वाली नहीं है। व्यावहारिक रूप से किसी न किसी रूप में भ्रष्टाचार को स्वीकारना पड़ेगा। इसके बिना जीवन चलाना असम्भव है। यह एक ऐसी संजीवनी है जो आदमी को जीने की राह दिखाती है, निराश व्यक्ति को सफलता के सूत्र पकड़ाती है, बेमौत मरने वाले को नया जीवन देती है और साधारण को असाधारण बना देती है। आप देखिए न एक साधारण सी कुरूप दलित स्त्री को महल की महारानी बनाकर तमाम ऐश्वर्य और सुख साधन की स्वामिनी बना दिया इस शक्ति ने।

वहाँ की चर्चा रोचक होती जा रही थी। एक विशेषज्ञ ने तो यहाँ तक कह दिया कि जो अधिकारी सुविधा शुल्क लेकर समय से सही काम कर दे वह उस कथित ईमानदार से बेहतर है जो पैसा तो नहीं लेता है लेकिन काम का निपटारा करने में भी कोई रुचि नहीं लेता है। इसपर लगभग एक राय बनती दिखी। इसपर एक गणित के विद्यार्थी ने अधिकारियों की ग्रेडिंग के लिए एक चार्ट बनाना शुरू कर दिया। पैसा लेने वाले, पैसा न लेने वाले, सही काम करने वाले या न करने वाले तथा गलत काम करने वाले या न करने वाले अधिकारियों के क्रमचय-संचय (permutation-combination) के द्वारा निम्न श्रेणियाँ निकलकर आयीं :

क्र.

पैसा लेना

सही काम करना

गलत काम करना

श्रेणी

1

N

Y

N

उत्कृष्ट

2

Y

Y

N

उत्तम

3

Y

Y

Y

भ्रष्ट/लोभी

4

Y

N

N

धुर्त/लतखोर

5

Y

N

Y

महाभ्रष्ट

6

N

Y

Y

मूर्ख

7

N

N

Y

महामूर्ख

8

N

N

N

निकृष्ट

इस प्रकार श्रेणियों की चर्चा में प्रत्येक श्रेणी के अधिकारियों के उदाहरण पेश किये जाने लगे। मैं सहमा सा चुपचाप सुनता रहा; और अपने आसपास के अधिकारियों में भी ऐसे उदाहरण खोजता रहा। मेरे पन्द्रह साल के सरकारी अनुभव में लगभग सभी प्रकार के अधिकारी और कर्मचारी देखने-सुनने को मिले हैं। इसी विचार मंथन में डूबा था कि अचानक प्रयाग स्टेशन पर गाड़ी रुकी और मैंने हड़बड़ाकर अपना बैग उठा लिया और बोगी से बाहर आ गया…।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)