हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Wednesday, February 29, 2012

नन्हे हाथों का कमाल…

स्कूली बच्चों की हस्तकला प्रदर्शनी ने मन मोह लिया
लखनऊ का सिटी मॉंटेसरी स्कूल अपनी सभी शाखाओं को मिलाकर भारत के किसी भी एक शहर में स्थित सबसे बड़ा स्कूल माना जाता है। विशाल स्कूल भवन और बड़े भव्य प्रांगण इस स्कूल की पहचान हैं। लेकिन इसकी सबसे बड़ी खूबी है इसके छात्रों की पाठ्येतर गतिविधियाँ। इसके संस्थापक प्रबन्धक जगदीश गांधी जी का सपना है पूरे विश्व को एकता के सूत्र में पिरो देना और विश्वशांति का संदेश चारो ओर फैलाने का अहर्निश प्रयास करना। इस स्कूल के बच्चों को ‘विश्व-नागरिक’ के रूप में विकसित करने के उद्देश्य से तमाम गतिविधियाँ चलती रहती हैं। प्रांगण में ‘जय जगत’ का अभिवादन इसी की निरन्तर याद दिलाता है। यहाँ बच्चों के व्यक्तित्व के बहुमुखी विकास के लिए क्लासरूम में पाठ्यक्रम के शिक्षण के अलावा हस्तकला, संगीत, नृत्य, गायन, रंगमंच, खेलकूद, सेमिनार, मेला, देशाटन इत्यादि के वृहद आयोजन किये जाते हैं और इसमें प्रायः सभी बच्चों का प्रतिभाग यथासम्भव सुनिश्चित किया जाता है। पारंपरिक शिक्षण के बजाय इसे कार्पोरेट पद्धति का शिक्षण बताया जाता है। इस सारे उपक्रम में अभिभावकों को न सिर्फ़ आर्थिक योगदान करना पड़ता है बल्कि उन्हें अपने पाल्य के उत्साहवर्द्धन के लिए बहुधा स्कूली कार्यक्रमों में उपस्थिति भी देनी होती है।

हाल ही में मेरे सुपुत्र ‘सत्यार्थ’ (५वर्ष) ने जब अपनी डायरी खोलकर मुझे दिखाया और बताया कि उसमें उनकी मैम द्वारा लिखा गया निम्नलिखित वाक्य उन्हें फर्राटे से याद कर लेना है तो मुझे कुछ खास समझ में नहीं आया :

Welcome to the funland…! We made jokers with ball and chart-paper and in fun we learned different shapes. We decorated it by paper folding, bindi pasting and wool sticking.

फिलहाल अपनी दीदी की मदद से उन्होंने यह याद भी कर लिया और सुबह स्कूल जाते समय पूरी रफ़्तार से मुझे सुना भी दिया। इस बीच हम अभिभावकों के नाम से एक आमंत्रण पत्र भी आ गया जिसमें नर्सरी और के.जी. के बच्चों की हस्तकला से निर्मित मॉडल्स की प्रदर्शनी देखने हेतु बुलाया गया था। मेरी जिज्ञासा इतनी बढ़ गयी थी कि मैं नियत समय से कुछ पहले ही स्कूल की ओर सपत्नीक पहुँच गया।

वहाँ करीब दस हालनुमा कमरों और बड़ी सी लॉबी को बेहतरीन कलाकृतियों से सजाया गया था। निश्चित रूप से चार-पाँच साल के बच्चों के हाथ से इतनी शानदार कलाकृतियाँ और वह भी इतनी बड़ी मात्रा में नहीं बनायी जा सकती। जाहिर है सबके अभिभावकों और शिक्षकों का श्रम भी इसमें लगा था। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में नन्हें-नन्हें बच्चों ने बहुत कुछ सीखा भी होगा। यह अनुमान और पुख्ता होता गया जब हमने एक-एक कक्ष में जाकर सभी मॉडल्स को नजदीक से देखा और उनका परिचय देने के लिए खड़े छोटे-छोटे बच्चों की बातें सुनीं। ये बातें पहले से सभी बच्चों को रटा दी गयी थीं जिनमें संबंधित मॉडल या कलाकृति का परिचय और उसको तैयार करने की संक्षिप्त विधि बतायी गयी थी। मेरे बेटे ने जो वाक्य रटा था उसका रहस्य अब समझ में आ गया।

यद्यपि सभी बच्चों ने तैयारी अच्छी कर रखी थी लेकिन कभी-कभी उन्हें यह समझ में नहीं आता था कि उन्हें अपनी रटी हुई बात कब दुहरानी है। उनके मार्गदर्शन के लिए उनकी शिक्षिकाएँ उपस्थित थी जो उन्हें बोलने का संकेत करती रहती थीं। बिल्कुल जैसे रंगमंच पर कभी-कभी नेपथ्य से संवादों की प्रॉम्प्टिंग (prompting) की जाती है। फिर भी सबकुछ बहुत रोचक और सुरुचिपूर्ण लगा।

Fun Land of Jokersसबसे पहले तो सत्यार्थ की कक्षा से ही शुरुआत हुई। जनाब अपने जोकर्स के साथ मुस्तैदी से बैठे थे। किसी के आ जाने पर खड़े  होकर स्वागत करने और उन जोकर्स के बारे में बताने का पूरा रिहर्सल कर चुके थे लेकिन अचानक मम्मी-डैडी को देखकर रटा हुआ पाठ बोलना भूल गये। उनकी मैम ने जब उन्हें प्रॉम्प्ट किया तो भी झिझकते रहे। शायद यह सोचकर कि जो बोलना है वह तो हमें सुबह से कई बार सुना ही चुके थे, फिर क्या दुहराना। उनकी मैम ही शायद अपने शिष्य के चुप रह जाने पर झेंप गयीं।

yuvrajहमने उनकी क्लास के युवराज मिश्रा और स्नेहा का मॉडल भी देखा जिन्होंने पूरी दक्षता से अपना वाक्य बोला। बड़ा मनोहारी था वहाँ का दृश्य। फिर तो हम अपना कैमरा लिए सभी कमरों में जाते रहे और मॉडल्स के साथ-साथ भगवान के बनाये अद्‍भुत मॉडल्स (बच्चों) को उनकी तैयारी के साथ देखते रहे।

sneha

सबकुछ इतना भव्य और सुरुचिपूर्ण था कि मन इस भाव से आह्लादित हो गया कि मेरे बच्चों को एक अच्छा सा माहौल उनके विद्यालय में मिल रहा है। बच्चों के भीतर छिपी प्रतिभा को उभारने,एक निश्चित स्वरूप देने और तराशने का कार्य यहाँ की शिक्षिकाओं द्वारा पूरे मनोयोग और उत्साह से किया जा रहा है। कुशल प्रबन्धन का बेजोड़ उदाहरण इस प्रांगण में देखा जा सकता था।

इस अभिनव प्रयास को हमारा सलाम।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Monday, February 27, 2012

शिवचर्चा के बहाने एक सामाजिक ध्रुवीकरण…

इस बार महाशिवरात्रि की छुट्टी सोमवार के दिन हुई थी इसके पीछे रविवार और शनिवार की साप्ताहिक छुट्टी मिलाकर लगातार तीन दिन कार्यालय से अवकाश मिला। मैंने इसका सदुपयोग अपने गाँव घूमकर आने में किया। प्रायः पूरा गाँव सोमवार के दिन भोर में ही उठकर बगल के शिवमंदिर में ‘जल चढ़ाने’ के लिए चल पड़ा था। पूरे साल प्रायः निर्जन और धूल धूसरित रहने वाला पुराना शिवमंदिर इस अवसर पर देहात की भीड़ से आप्लावित हो जाता है। लाउडस्पीकर लगाकर भजन-कीर्तन होता है और ठेले-खोमचे वाले भी आ जुटते हैं। शंकर जी की अराधना के बहाने गाँव क्षेत्र के लोग एक दूसरे से मिलने और हाल-चाल जानने का काम भी निपटा लेते हैं। भक्तिमय माहौल के बीच छोटे-बड़े ऊँच-नीच का भेद भी मिटा हुआ दिखायी देता है। ऐसे लोग जिनकी दैनिक दिनचर्या में पूजा-पाठ का कोई विशेष स्थान नहीं है वे भी इस वार्षिक आयोजन में धर्म-कर्म का कोटा पूरा कर लेते हैं। शंकर जी ऐसे देवता हैं जो झटपट प्रसन्न हो जाते हैं। इन्हें (शिवलिंग को) एक लोटा जल से स्नान करा देना ही पर्याप्त है। चाहें तो इसके साथ सर्वसुलभ झाड़-झंखाड़ से लाकर भांग-धतूरा-बेलपत्र इत्यादि चढ़ा दें तो कहना ही क्या…! आशुतोष अवघड़दानी प्रसन्न होकर मनचाही इच्छा पूरी कर देंगे - इसी विश्वास के साथ सबलोग मंदिर से घर लौटते हैं।

कुँवारी लड़कियाँ इस जलाभिषेक से अपने लिए मनचाहा वर भी पा जाती हैं। इस विश्वास का नमूना गाँव में ही नहीं, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास से निकलकर भारद्वाज आश्रम की ओर जाती तमाम पढ़ाकू लड़कियों की कतार में भी देखा है मैंने।

अपने गाँव-जवार के शिवभक्तों को तो मैंने बचपन से देखा है। ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र, चारों वर्णों को एक साथ एक ही मंदिर में जल चढ़ाते हुए। यह बात दीगर है कि इनकी तुलनात्मक संख्या बराबर नहीं होती बल्कि प्रायः इसी क्रम में क्रमशः घटती हुई होती। शिवरात्रि के मौके पर जुटने वाली भीड़ में सवर्ण, दलित और पिछड़े का विभाजन कभी मेरे दिमाग में आया ही नहीं था। इसबार भी गाँव में लगभग वैसा ही वातावरण देखने को मिला। लेकिन जब मैंने वापसी यात्रा हेतु गाँव से प्रस्थान किया तो रास्ते में एक ऐसा नजारा देखने को मिला कि मैं दंग रह गया।

कुशीनगर जिले में कप्तानगंज एक छोटा सा कस्बा है। इससे करीब बारह किलोमीटर पश्चिम परतावल भी एक छोटी सी बाजार है। इन दोनो को जोड़ने वाली टूटी-फूटी सड़क के दोनो ओर पसरा है शुद्ध देहात : उर्वर जमीन में लहलहाती फसलें, चकरोड और कच्ची-पक्की देहाती सड़कों से जुड़े घनी आबादी के गाँव और आधी-अधूरी सरकारी विकास योजनाओं की हकीकत बयान करती लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति। इन दिनों इस इलाके में गेहूँ और सरसो की फसल लगी हुई है। दूर-दूर तक खेत गहरे हरे रंग में या पीले रंग में पेंण्ट किये हुए दिखायी देते हैं। क्षेत्र में नहरों का जाल बिछा हुआ है। सिंचाई की सुविधा अच्छी होने से फसल का उत्पादन बहुत अच्छा हो रहा है। इधर कोई जमीन वर्ष में कभी खाली नहीं रहती। सालोसाल फसलें बोई और काटी जाती हैं।

मैं जब कप्तानगंज से परतावल की ओर बढ़ा तो इन्नरपुर के पास से गुजरने वाली बड़ी नहर के पास जमा भीड़ को देखकर ठिठक गया। हाल ही में गेंहूँ की सिंचाई बीत जाने के बाद नहर में पानी बन्द कर दिया गया था लेकिन थोड़ा बहुत पानी यत्र-तत्र अभी भी रुका हुआ था। इसी पानी में बड़ी संख्या में औरतों को नहाते देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। नहर की दोनो पटरियों पर भारी भीड़ जमा थी। औरतें और मर्द, बूढ़े और बच्चे अपनी-अपनी गठरी खोलकर फैलाए हुए थे। कुछ लोग अभी नहाने की तैयारी में थे। जो लोग नहा चुके थे वे अपनी गठरी से निकालकर कुछ चना-चबेना खा रहे थे। आसपास कुछ अस्थायी दुकाने भी जमा हो गयीं थीं जिनपर चाट-पकौड़ी, जलेबी, खुरमा, गट्टा, पेठा इत्यादि पारम्परिक खाद्य सामग्री बिक रही थी। यह स्पष्ट हो रहा था कि ये स्थानीय लोग नहीं हैं बल्कि काफी दूर से आये हुए तीर्थयात्री हैं। पतली सी सड़क के किनारे खड़े हुए वाहन और उनपर लदे सामान भी यही संकेत दे रहे थे। मेरे ड्राइवर ने गाड़ी रोकी नहीं बल्कि भीड़ के बीच से निकल जाने का प्रयास करने लगा।सड़क जाम२

करीब दो सौ मीटर आगे बढ़ने पर भीड़ का रेला बहुत घना हो गया था और सड़क पर आने-जाने वाले वाहन जाम में फँस गये थे। सामने से एक मोटरसाइकिल पर लदकर आ रहे तीन युवकों ने इशारे से बताया कि आगे बहुत भीड़ है और हमारी गाड़ी उसपार कम से कम दो-तीन घंटे तक निकल नहीं पाएगी। हम फँस चुके थे। पीछे दूसरी गाड़ियाँ आ चुकी थीं। वापस भी नहीं हो सकते थे। सड़क पतली थी और किनारे तीर्थयात्रियों को लाने वाली जीपों, ट्रैक्टर ट्रॉलियों, मोटरसाइकिलों इत्यादि से अटे पड़े थे। बीच-बीच में खोमचे, रेहड़ी, ठेले लगाने वालों ने भी घुसपैठ कर रखी थी। एक लाउडस्पीकर पर कोई व्यक्ति तमाम तरह की उद्घोषणाएँ कर रहा था जो स्पष्ट नहीं हो रही थीं। टीं-टीं की आवाज ज्यादा मुखर थी।

मेरा ब्लॉगर मन अब सक्रिय हो गया। मैंने अपना कैमरा निकाल लिया लेकिन गाड़ी से बाहर निकलने की गुंजाइश नहीं थी। खिड़की का शीशा उतारकर जहाँतक पहुँच बन सकी वहाँतक फोटो खींचता रहा। संयोग से जाम की समस्या के निपटारे के लिए एक-दो सिपाही आ गये थे जिनकी बेंत का असर चमत्कारिक ढंग से हुआ। बीच सड़क में गुत्थमगुत्था लोग अचानक किनारे भागने लगे। ट्रकों और बसों की कतार धीरे-धीरे रेंगने लगी। सड़क के किनारे जमा गढ्ढों का पानी मानव स्पर्श पाकर गंदला हो गया था। एक सिंचाई का नाला लोगों की प्राकृतिक जरूरतों के लिए आवश्यक पानी की आपूर्ति करते-करते मटियामेट होने की कगार पर था।शिवचर्चा

 

मैंने खिड़की से सिर निकालकर एक व्यक्ति से पूछा- भाई, यह भीड़ कैसी है? उसने मुझे दोगुने आश्चर्य से देखा और थोड़ी देर तक मुझे लज्जित करने के बाद बोला – आगे शिवचर्चा हो रही है। मैं शिवचर्चा की कोई काल्पनिक छवि इस स्थान पर नहीं बना सका। मैं इस रास्ते से कई बार गुजर चुका था लेकिन किसी सुप्रसिद्ध या कम प्रसिद्ध शिवमंदिर के यहाँ होने की जानकारी मुझे नहीं थी। मेरी गाड़ी भीड़ के बीच से जगह बनाती हुई थोड़ा आगे बढ़ी तो एक तम्बू दिखायी दिया जो एक खेत में खड़ा किया गया था। चारो ओर गेहूँ और सरसो के लहलहाते खेत थे। बीच में कोई हाल ही में खाली हुआ गन्ने का खेत रहा होगा जहाँ कोई गुरूजी प्रवचन करने वाले थे। शायद यही शिवचर्चा थी।

लाउस्पीकर पर आवाज अब साफ आ रही थी। कोई बता रहा था कि एक बैग मेले में लावारिस पड़ा हुआ मिला है। इसमें नगदी और जेवर रखे हैं। जिस किसी का हो वह आकर जितना रुपया है सही-सही बताकर ले जाय। मैं सोचने लगा कि यदि मेरा पर्स इस प्रकार खो जाय तो क्या मैं उसमें रखे रूपयों की सही मात्रा बता पाऊँगा। शायद नहीं। अलबत्ता उसमें रखे पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेन्स मेरी मदद कर देंगे।

इस भीड़ में जो चेहरे शिवचर्चा में शामिल होने आये थे उन्हें देखकर मुझे एक अजीब उलझन होने लगी। ये तमाम चेहरे एक खास सामाजिक-आर्थिक वर्ग से सम्बंधित लग रहे थे। अत्यन्त गरीब और सामाजिक रूप से पिछड़े हुए। हमारे  समाज की अग्रिम पंक्ति में खड़ा कोई चेहरा इस भीड़ में दिखायी नहीं दिया। यह एक अलग तरह का सामाजिक ध्रुवीकरण आकार लेता दिखायी दे रहा था। धार्मिक आस्था के ऐसे  प्रदर्शन को देखना एक विलक्षण अनुभव था मेरे लिए। आप भी देखिए - इन तस्वीरों में क्या वही नजर नहीं आता जो मुझे महसूस हुआ?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

Friday, February 17, 2012

बसंत में निकला चुनाव गीत…

india_electionsआजकल राज्यों के चुनाव अपने उत्स पर हैं। शुरुआती दौर के आँकड़े बताते हैं कि इस बार मतदाताओं ने जोर-शोर से वोटिंग में हिस्सा लिया है और मतदान प्रतिशत का रिकॉर्ड बना दिया है। इस दौर में उत्साहजनक बात यह भी है कि महिला मतदाताओं ने अधिक बढ़-चढ़कर वोट डाले हैं। जानकारों की राय है कि इस कारण चुनाव परिणाम अचंभित करने वाले हो सकते हैं।

मैं यहाँ लखनऊ में सरकारी नौकरी की सीमाओं में बँधकर प्रायः मताधिकार का प्रयोग करने से वंचित रह जाता हूँ। मेरा नाम अपने पैतृक गाँव की मतदाता सूची में सम्मिलित है। वहाँ से नाम कटाने और लखनऊ में जुड़वाने की बात चलती है तो मैं गाँव में अपनी पहचान को लेकर भावुक हो जाता हूँ इसलिए स्थिति यथावत्‌ बनी रहती है। बहरहाल इस बार भी जब गाँव में वोट पड़ रहे थे और मैं लखनऊ में मन मसोसकर सरकारी काम निपटा रहा था तो बेचैनी के बीच एक रचना का अंकुर फूट पड़ा। दिल तो मेरा गाँव में ही भटक रहा था; इसलिए वहाँ का चुनावी माहौल वहीं की बोली में शब्दों के बीच उभर आया। आज वह अंकुर विकसित होकर एक पूरा गीत बन गया है। आप भी सुनिए बसन्ती माहौल में मेरे गाँव का आँखों देखा हाल जो शायद आपके गाँव का भी हो :

 चुनाव गीत

   धानी रंग चुनरी में लाले-लाल गोटवा
   जा ताड़ी गोरी देखऽ डारे आजु वोटवा

   धाँधली के राज रऽहल
   खर्ची अकाज रऽहल
   राशन के दुकानी से
   ग़ायब अनाज रऽहल
   नेता-ठेकेदार सगरी लूटि लिहलें कोटवा
   जा ताड़ी गोरी देखऽ डारे आजु वोटवा

   नेता गाँव-गाँव घूमें
   गरीबन के पाँव चूमें
   जाति के, बिरादरी के
   लेके नाँव नाचें झूमें
   दारू बाँटें, साड़ी बाँटें, अ‍उरी बाँटें नोटवा
   जा ताड़ी गोरी देखऽ डारे आजु वोटवा

   शेषन कमीशन भ‍इलें
   वोट-चोरी बन्द क‍इलें 
   बूथे पर मशीन लागल
   वोट पड़े बटन दब‍इले
   फ़र्जी मतदान के अब घटल बा रिपोटवा
   जा ताड़ी गोरी देखऽ डारे आजु वोटवा

   पाँच बरिस ठाट क‍इलें
   लूट-चोरी-घाट क‍इले
   मंत्री जी खजाना से
   खूब बंदर-बाँट कइलें
   कोर्ट-सी.बी.आई. के अब पड़ऽताटे सोटवा
   जा ताड़ी गोरी देखऽ डारे आजु वोटवा

   हाथी से पंजा लऽड़ल
   फूले पर सैकिल चऽढ़ल
   धरम के आरक्षण पर
   बहुतै तकरार बढ़ल
   बाबा रामदेव कूदें बान्हि के लंगोटवा
   जा ताड़ी गोरी देखऽ डारे आजु वोटवा

   धानी रंग चुनरी में लाले-लाल गोटवा
   जा ताड़ी गोरी देखऽ डारे आजु वोटवा

(सिद्धार्थ)         

Sunday, February 12, 2012

आशा जगाती एक सार्थक पहल (KGBV)

भारत सरकार या उत्तर प्रदेश सरकार की चर्चा आजकल अच्छे संदर्भ में कम ही हो रही है। टू-जी स्पेक्ट्रम से लेकर काले धन की चर्चा हो या भ्रष्ट मंत्रियों के चुनाव से पूर्व बर्खास्तगी से लेकर एन.आर.एच.एम. घोटाले की जाँच का मामला हो; रोज ही हम सरकारी महकमे की एक खराब छवि ही देखते-गुनते रहते हैं। ऐसे में तमाम अच्छी बातें लोगों तक नहीं पहुँच पाती जो सरकार के माध्यम से चलाये जा रहे कार्यक्रमों से संभव हो रही हैं। कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय (KGBV)  की योजना एक ऐसी ही लाभकारी योजना है जो अनेक परिवारों में फैली गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा और पिछड़ेपन की व्याधियों से ग्रस्त लड़कियों के जीवन का अंधकार एक साथ दूर करने में चमत्कारिक रूप से सक्षम है।

प्राथमिक शिक्षा को संविधान में मौलिक अधिकार का दर्जा मिल जाने के क्रम में भारत सरकार द्वारा सबके लिए अनिवार्य शिक्षा का अधिनियम पारित कर दिये जाने के बाद इस योजना के अंतर्गत अधिकाधिक आवासीय विद्यालय खोले जाने का काम किया जा रहा है। दस से चौदह वर्ष की गरीब निराश्रित लड़कियों को स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी सरकार द्वारा उठायी जा रही है। उन्हें स्कूल के हॉस्टेल में सरकारी खर्चे पर रखा जाता है। उनका भोजन, कपड़ा, बिस्तर, साबुन, तेल, टूथब्रश, मंजन सबकुछ सरकार के खर्चे पर उपलब्ध कराया जाता है। प्रशिक्षित वार्डेन और शिक्षिकाओं द्वारा न सिर्फ़ उनको उनकी कक्षा का पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता है बल्कि उनके व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास के लिए खेल-कूद, गीत-संगीत, कला-संस्कृति, रोजगारपरक प्रशिक्षण इत्यादि की व्यवस्था भी सरकार द्वारा की जाती है।

यह सबकुछ होता है भारत सरकार द्वारा वित्त पोषित और प्रदेश सरकारों द्वारा चलाये जा रहे ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के अंतर्गत। सर्व शिक्षा अभियान परियोजना पर यूँ तो हजारो करोड़ रूपये खर्च हो रहे हैं जिनसे प्राथमिक शिक्षा का ढाँचा विकसित करने, शिक्षकों व शिक्षामित्रों की नियुक्ति करने, स्कूलों के भवन बनवाने व अन्य स्थापना सुविधाएँ जुटाने का काम हो रहा है, लेकिन समाज के सबसे पिछड़े वर्ग के लिए जो उपादेयता ‘कस्तूरबा विद्यालय’ की है वह कहीं और नहीं। एक लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा इस विद्यालय मे आकर साकार रूप लेती दिखती है।

हाल ही में मैं भारत सरकार की ओर से गठित एक अध्ययन टीम के सदस्य के रूप में राजस्थान के एक ऐसे ही कस्तूरबा विद्यालय (KGBV) को देखने गया। वहाँ रहने वाली बच्चियों को देखकर लगा कि सरकार ने वास्तव में बहुत ही सार्थक योजना का प्रारम्भ किया है।

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हमने स्कूल और छात्रावास के सम्मिलित प्रांगण में लगभग दो घंटे बिताया। वहाँ की छात्राओं, शिक्षिकाओं व अन्य कर्मचारियों से बात की। निश्चित रूप से हमारे वहाँ जाने की पूर्व सूचना उन्हें थी; और उन्होंने इस बावत विस्तृत तैयारी भी कर रखी थी; लेकिन हमने सच्चाई जानने के लिए छात्राओं से अलग से भी बात किया। कर्मचारियों से सवाल पूछे। सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए प्रांगण के कोने-कोने में गये। रसोई घर से लेकर क्लासरूम तक और हॉस्टल के हॉलनुमा कमरों से लेकर आँगन में बने छोटे से मंदिर तक। कम संसाधनों के बावजूद सबकुछ यथासम्भव सुरुचिपूर्वक ढंग से व्यवस्थित किया गया था। सामान्य मानवीय कमजोरियाँ तो सबजगह होती हैं लेकिन उनके बावजूद वहाँ जाकर हमें बड़ा संतोष मिला। प्रायः निराश्रित लायी गयी उन लड़कियों को इस शिक्षा मंदिर के प्रांगण में हँसते-खिलखिलाते, उछलते-कूदते, जीवन के पाठ सीखते और शिक्षा का प्रकाश बटोरते देखकर हम धन्य हुए।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)