हमारी कोशिश है एक ऐसी दुनिया में रचने बसने की जहाँ सत्य सबका साझा हो; और सभी इसकी अभिव्यक्ति में मित्रवत होकर सकारात्मक संसार की रचना करें।

Tuesday, June 21, 2011

मई के मजे, जून की जन्नत और जुलाई की जुदाई

 

इस बार की गर्मी बहुत अच्छे से गुजर गयी। 

  • विदर्भ क्षेत्र की गर्मी भयाक्रांत करने वाली होती है। इस साल भी वर्धा में पारा 49.5 डि.से. तक पहुँच गया था। हम जैसे तराई क्षेत्र वाले के लिए यह लगभग असह्य होता। इसलिए गर्मी तेज होने से पहले ही बच्चों को मार्च की परीक्षा के तत्काल बाद लखनऊ पहुँचा आया था।  पंद्रह मई के बाद अर्जित अवकाश लेकर खुद भी वर्धा से निकल गया।
  • लखनऊ के सुहाने मौसम और प्रायः निर्बाध विद्युत आपूर्ति के बीच ऊमस और गर्मी का प्रकोप अधिक नहीं झेलना पड़ा। बस घर के भीतर सत्यार्थ (४) और वागीशा (१०) यही वादा कराते रहे कि मैं अब उन्हें छोड़कर वर्धा नौकरी करने नहीं जाऊंगा। पत्नी का मन रखने के लिए शासन में जाकर अपने आला हाकिम से मिल आया और अर्जी डाल दी। इसी दौरान कुछ अधिकारी मित्रों से टुकड़े-टुकड़े चर्चा हुई और मोहन बाबू की कहानी की रचना हो गयी।
  • चचेरी बहन की शादी थी। २१ मई को। हम लड़की वाले बाराती बनकर लड़के वालों के शहर बनारस गये। उनलोगों ने ही सारा इन्तजाम कर रखा था। सभी मेहमानों की आव-भगत वर पक्ष ने की। हम लड़की वाले थे लेकिन चिंतामुक्त थे। वे लड़के वाले थे बस इस बात से खुश कि बारात सजाकर गोरखपुर जाने और आने का उनका समय बच गया। काम-धंधे में रुकावट कम होगी। अस्तु सज्जनतावश लड़की के बाप की तरह हाथ जोड़े सबकी कुशल क्षेम लेते रहे। हमने जमकर शादी का लुत्फ़ उठाया और अगले दिन घरवालों के साथ गोरखपुर लौट गये। डॉ.अरविंद मिश्र जी ने पहले ही बता दिया था कि उस दिन वे अन्यत्र किसी दूसरी शादी में व्यस्त रहेंगे इसलिए उनसे मुलाकात न हो सकी।
  • अगले सप्ताह २८ मई को ससुराल में साली की शादी थी। लद-फदकर सपरिवार पहुँचे। वरपक्ष भी हमारे पुराने रिश्ते में था। दोनो तरफ़ से आव-भगत हुई। सास, ससुर, साला, साली, सलहज, साढ़ू, सरपुत, मामा, मामी, मौसी, मौसा, फूआ, फूफा, चाचा, चाची, भैया, भाभी, भतीजा, भतीजी, भान्जा, भान्जी, बहन, बहनोई आदि ढेर सारे रिश्तेदारों व यार-दोस्तों से मिलना हुआ। ये शादी-ब्याह न पड़े तो इन सबसे मुलाकात कहाँ हो पाए...!
  • दोनो शादियों के बीच गाँव जाना हुआ। कई दिनों से बिजली नहीं आ रही थी। पिताजी के सान्निध्य में पाकड़ के पेड़ के नीचे खटिया डाले निखहरे लेटे रहे।  अचानक भंडार कोने (नैऋत्य कोण) से काले भूरे बादल उठे और अंधेरा सा छा गया। धूल भरी आँधी देख चप्पल निकालकर नंगे बदन बाग की ओर दौड़े। आम भदभदाकर गिर रहे थे। दौड़-दौड़कर बीनते रहे। देखते-देखते बोरा भर गया। फिर जोर की बारिश शुरू हुई। झूम-झूमकर भींगते रहे। मानो बचपन लौट आया। इतना भींगे कि ठंड से दाँत बजने लगे। घर लौटे तो अम्मा तौलिया और सूखे कपड़े लेकर खड़ी थीं।
  • एक दिन बाराबंकी जिले की रामनगर तहसील जाना हुआ। nice-फेम ‘सुमन जी’ ने बुला लिया था। डॉ.सुभाष राय और रवीन्द्र प्रभात जी का साथ मिला था। वहाँ तहसील परिसर के सभागार में सुमन जी ने महफिल जमा रखी थी। स्थानीय कविगण काव्यपाठ कर रहे थे। तहसील के तमाम वकील और मुवक्किल व दूसरे बुद्धिजीवी जमा थे। लोक संघर्ष पत्रिका के ताजे अंक का लोकार्पण होना था और रवीन्द्र प्रभात जी का सम्मान। सुभाष जी का भाषण कार्यक्रम की उपलब्धि रही। सुमन जी अपनी पत्रिका के सभी अंको का लोकार्पण हरबार इसी प्रकार किसी बड़े बुद्धिजीवी के हाथों कराते हैं। हमें भी फूलमाला और स्मृति चिह्न से नवाजा गया। nice.
  • लखन‍ऊ लौटकर बच्चों के साथ खूब मौज हुई। डाल के पके आमों की डाली सजाये साले साहब सपरिवार पधारे। घर में बच्चों की संख्या बढ़ गयी। सहारागंज, चिड़ियाघर, भूल-भुलैया, इमामबाड़ा और हजरत गंज की सैर में दिन तेजी से निकल गये। अचानक पता चला कि वर्धा की गाड़ी पकड़ने का दिन आ गया। वाटर-पार्क जाने का मौका ही नहीं मिला। तय हुआ कि उन्हें अगले दिन बच्चों के मामाजी ले जाएंगे।
  • जब बादशाहनगर स्टेशन पर राप्तीसागर एक्सप्रेस में बैठकर वर्धा फोन लगाया तो फरमाइश हुई कि लखन‍ऊ से आ रहे हैं तो आम जरुर लाइए। चारबाग स्टेशन पर गाड़ी से उतरकर मलीहाबादी दशहरी तलाशता रहा, बाहर सड़क तक गया लेकिन रेलवे परिसर के आस-पास से दुकानें नदारद थीं। दौड़ता-हाँफता खाली हाथ वापस अपने डिब्बे तक पहुँचा। गाड़ी चल पड़ी। आम मिले तो कैसे?
  • चलती गाड़ी में अपनी कन्फ़र्म बर्थ पर बैठते ही सबसे पहले यह ध्यान में आया कि यदि मैं ब्लॉगर न होता तो यात्रियों की जबरदस्त आवाजाही के इस व्यस्त सीजन में शायद  वह सीट भी नहीं मिली होती। इस बैठे-ठाले काम से जुड़कर हमें कितने भले लोगों से जुड़ने का मौका मिला यह बड़े सौभाग्य की बात है। हम अपने को गौरवान्वित महसूस कर ही रहे थे कि मन में आम न खरीद पाने की समस्या का समाधान भी कौंध गया। मैने झट फोन मिलाया और अगले स्टेशन पर पाँच किलो दशहरी  के साथ एक मूर्धन्य ब्लॉगर मेरे डिब्बे के सामने अवतरित हो गये। उनका नाम गोपनीय इसलिए रखना चाहता हूँ कि आगे से उनका बोझ न बढ़ जाय। Smile हमने दस मिनट के भीतर पूरी दुनिया की बातें की। कितनी ही त्वरित टिप्पणियाँ की गयीं और तमाम गुटों का हाल-चाल लिया-दिया गया। बातों की रौ में हमने आम का दाम भी पूछना मुनासिब न समझा। उनके स्नेह को मैं किसी प्रकार कम नहीं कर सकता था। 
  • अब वर्धा आ पहुँचा हूँ तो ध्यान आया कि यदि मैंने इस मौज मस्ती के बीच थोड़ा समय कम्प्यूटर पर दिया होता तो अनेक पोस्टें निकल आयी होतीं। लेकिन लम्बे प्रवास के बाद घर लौटने का सुख कुछ ऐसा डुबा देने वाला था कि इस ओर ध्यान ही नहीं गया। अब यह सब ब्लॉग पोस्ट की दृष्टि से कुछ पुराना हो गया है इसलिए उनका उल्लेख भर कर पा रहा हूँ।
  • वर्धा में बारिश का सुहाना मौसम शुरू हो चुका है लेकिन विश्वविद्यालय के गेस्ट हाउस के कमरे में अकेले पड़े रहना रास नही आ रहा है। अभी जुलाई नहीं आयी है लेकिन बच्चों से जुदाई शुरू हो गयी है। सोचता हूँ यहाँ से भाग जाऊँ।Open-mouthed smile

चलते-चलते लखनऊ के चिड़ियाघर से लिया गया यह चित्र लगाता हूँ जो मेरी अनुपस्थिति में रचना त्रिपाठी द्वारा लिया गया था। मैं वहाँ से अनुपस्थित इसलिए था कि वहाँ समीप ही जनसंदेश टाइम्स अखबार का दफ़्तर था ; उसके सम्पादक की कुर्सी पर डॉ. सुभाष राय बिराज रहे थे और वे स्वयं एक ब्लॉगर होने के नाते मुझे बतकही के लिए आमंत्रित कर चुके थे। जब दो ब्लॉगर मिल जाँय तो चिड़ियाघर की भला क्या बिसात...? Smile

तेज धूप में बरगद की छाँव तले आराम करते मृगशावक और बारहसिंगे

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

Wednesday, June 8, 2011

नयी कहानी - मोहन बाबू

मित्रों,

लम्बे अंतराल के बाद आना हुआ। कुछ संयोग ही ऐसा बन पड़ा कि कोलकाता यात्रा का फल अधर में अटक गया और हमारी ब्लॉगरी भी मद्धम पड़ गयी। फिल्म अभिनेता उत्तम कुमार जी की पत्नी सुप्रिया जी का जो मकान हम क्षेत्रीय केंद्र के लिए पसन्द कर आये थे उसे ज्यादा किराया देकर किसी बैंक ने हथिया लिया। हमारी मेहनत व्यर्थ हो गयी।

पिछली पोस्ट में जो चित्र पहेली पूछी गयी थी उसका सही जवाब कोलकाता वासी मनोज कुमार जी ने दे दिया था। उम्मीद के मुताबिक ही कुछ लोग गलत लेकिन बेहद रोचक जवाब के साथ भी आये। वैसे तो हम गर्मियों में काले पके हुए जामुन का फल सीधे पेड़ से तोड़कर खाने का मजा ले चुके हैं लेकिन मुझे यह फल इस रूप में पहली बार कोलकाता में ही देखने को मिला। कौतूहलवश मैने इसे सौ रूपये किलो की दर से खरीद तो लिया लेकिन इसे मेज पर सजाने और फोटू खींचने में ही अच्छा लगा। खाने में तो यह बिल्कुल बेस्वाद और फीका ही था। अलबत्ता इसमें बीज नहीं होने से इसे बुजुर्गों और बिना दाँत वालों को आसानी से खिलाया जा सकता है।

080520111145जी हाँ, यह जामुन का फल है जो मुझे कोलकाता में मिला 080520111146इसमें कोई बीज नहीं है, न ही कोई स्वाद या मिठास ही

 

पिछली रामकहानी को यहीं विराम देते हुए आज पेश कर रहा हूँ बिल्कुल ताजी लिखी कहानी। इतना बताता चलूँ कि इस कहानी के पात्र मेरी कल्पना की उपज हैं। यदि कोई वास्तविक घटना या किसी व्यक्ति की कहानी इससे मिलती-जुलती पायी जाय तो इसे मात्र संयोग समझा जाय।

कहानी
मोहन बाबू

राम मोहन सक्सेना के भाग्य को सराहने वालों की कमी नहीं थी। वे थे तो राज्य सरकार के आबकारी महकमें के एक अदने से मुलाजिम लेकिन इस छोटी सी नौकरी से उन्होंने काफी अच्छी हैसियत बना ली थी। उनके दोनो बेटे अपनी पढ़ाई में अव्वल रहे और इन्जीनियरिंग कॉलेज से निकलकर बड़ी कंपनियों में मोटा पैकेज पा चुके थे। बड़े बेटे ने तो अमेरिका जाकर एम.बी.ए. कोर्स पूरा किया और अपनी कंपनी का सी.ई.ओ. हो गया था। बेटियों ने मेडिकल की पढ़ाई की। एम.बी.बी.एस. पूरा कराने के बाद मोहन बाबू ने उनकी पसंद की शादी कर दी। बड़ा दामाद जर्मनी में सरकारी मेडिकल रिसर्च इन्स्टीट्यूट में ज्वाइंट डाइरेक्टर था और छोटा दामाद आस्ट्रेलिया में सिविल सर्जन था।

जब छोटे बेटे प्रशांत ने विदेशी नौकरी के बजाय भारत में ही विप्रो की नौकरी चुनी तो पूरे स्टाफ ने मोहन बाबू को बधाई दी। माँ-बाप की देख-भाल के लिए बेटे द्वारा किये गये इस त्याग की सर्वत्र सराहना हुई।

आबकारी दफ़्तर में मोहन बाबू बड़ा से बड़ा काम भी अपनी लगन और सूझ-बू्झ से आसान बना देते। उन्होंने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया। सबसे बड़ी विनम्रता से मिलते, उच्चाधिकारियों के आगे हाथ जोड़े रहते।  दफ़्तर में चारो ओर उनकी पूछ थी। मंत्री जी का दौरा हो या कलेक्टर साहब के घर होली की पार्टी हो, बड़े साहब लोगों के घर शादी-ब्याह में रंग जमाने का इन्तजाम करना हो या विभागीय समीक्षा बैठक में लक्ष्यों की पूर्ति का आँकड़ा तैयार करना हो, मोहन बाबू को ऐसा कोई भी काम सौंपकर अधिकारी आश्वस्त हो जाते कि विभाग की इज्जत रह जाएगी। वे हर काम इतनी चतुराई से करते कि विभाग की धाक तो जमती ही, खर्चा-पानी में से काफी कुछ बचा भी लेते। हर ठेकेदार मोहन बाबू के इशारे की ताक में रहता। रहे भी क्यों न, साहब लोग किसी भी फाइल का निपटारा उनकी राय के बिना नहीं करते थे। विभाग में नियुक्त आबकारी इन्स्पेक्टर मनचाहा हल्का पाने के लिए मोहन बाबू को ही खुश करने की जुगत भिड़ाते रहते। उनकी व्यवहार कुशलता और काबिलियत के कारण मंत्री जी भी उन्हें बखूबी पहचानने लगे थे। मोहन बाबू इस नजदीकी का फायदा भी मौके-बेमौके उठा लेते।

इन्ही जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए मोहन बाबू ने राजधानी के सबसे विकसित (पौश) इलाके में एक आलीशान महलनुमा घर खड़ा कर लिया था। शहर और गाँव में अनेक जमीनें खरीद डालीं। कितनों को नौकरी दिलवायी, ठेके में लगवाया। समृद्धि के सभी साधन जुटा लिए। जब मोहन बाबू की पत्नी कैंसर का शिकार होकर असमय चल बसीं तो उनके अंतिम संस्कार में पूरा शहर उमड़ पड़ा। जाने कितने मंत्री, विधायक, आइ.ए.एस. और पी.सी.एस. अफसर उनकी मातमपुर्सी में आये। बारह-तेरह दिन तक लाल-नीली बत्ती वाली गाड़ियों का आना-जाना लगा रहा। मोहन बाबू का संपर्क कितना विस्तृत और कितना प्रभावशाली था यह पहली बार सबके सामने प्रकट हो रहा था। विदेश से बड़ा बेटा सपरिवार आया था। अमेरिकन बहू और उसके सफ़ेद बालों वाले बच्चे सबकी विस्मृत निगाहों के केंद्र में थे। दोनो बेटियाँ भी अपने-अपने पति व बच्चों के साथ आयीं थीं। इन सबकी आव-भगत में दफ़्तर का अमला और छोटा बेटा प्रशांत लगा रहा। पहली बार पूरा घर भरा हुआ था। सबने खूब तस्वीरें खींचीं, वीडियो बनायी और तेरहवीं बीत जाने के बाद सभी अपने-अपने देश काम पर लौट गये।

मोहन बाबू ने भौतिक संसार की सभी सहूलियतें अपनी मेहनत और चतुराई से अर्जित कर ली थीं। यद्यपि मधुमेह, रक्तचाप और हृदयरोग की परेशानी नौकरी के अंतिम वर्षों में शुरू हो गयी थी, फिर भी वे सफलतापूर्वक सेवारत रहने के बाद अपनी अधिवर्षता आयु पूरी करके धूमधाम से सेवानिवृत्त हुए।

mohan babuविदाई समारोह में विभागीय सहकर्मियों ने मोहन बाबू को गुलाब और गेंदें की फूलमालाओं से लाद दिया। अधिकारियों ने इन्हें खूब सराहा और भविष्य का जीवन सुखमय और सानंद होने की शुभकामनाएँ दीं। जब सभी बोल चुके तो अंत में कार्यक्रम के संचालक और कर्मचारी संघ के अध्यक्ष ने मोहन बाबू से आशीर्वाद स्वरूप दो शब्द बोलने और अपने अनुभव के आधार पर छोटे भाइयों का मार्गदर्शन करने का अनुरोध किया। माइक पर मोहन बाबू ने भावुक भाषण दिया। सरकारी सेवा में अनुशासन, कर्तव्यपरायणता, सच्चाई, ईमानदारी, और विनम्रता के महत्व पर प्रकाश डाला और यह कहते हुए लगभग रो पड़े कि कल से जब मैं दफ़्तर आने के बजाय घर पर अकेला बैठ रहूँगा तो जीवन शायद बहुत कठिन हो जाएगा। लोगों ने उन्हें ढाँढस बँधाया और जरूरत पड़ने पर किसी को भी याद कर लेने की सलाह दी। मन बहलाने के लिए जब जी चाहे दफ़्तर आ जाने को कहा। चलते-चलते भेंट स्वरूप लाल कपड़े में लपेटकर गीता की पुस्तक व नक्काशीदार पॉलिश की हुई चमचमाती छड़ी दी गयी और रेशमी शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया गया। उन्हें विभागीय कार से घर तक छोड़ा गया। कार के बोनट पर सैकड़ों फूलमालाएँ लाद दी गयीं थी।

पिता की सेवानिवृत्ति की खबर पाकर बेटियों ने फोन पर ‘विश’ किया। बड़े बेटे को वीक-एंड में फुर्सत मिली तो अमेरिका से एक घंटे तक बात करता रहा। उसने अपनी पत्नी और बच्चों से भी बात कराया। सबने ‘कांग्रेट्स’ और ‘टेक-केयर’ कहा। प्रशांत ने भी बंगलुरू से लखनऊ का बिजनेस टूर बनाया और पिता को अपनी सेहत का ख्याल रखने और फोन पर बात करते रहने की ताकीद कर गया। कंपनी में रिसेसन की वजह से छँटनी की कार्यवाही की संभावना की चर्चा की और जल्दी ही इस बारे में डिटेल में बात करने का वादा करके वापस चला गया। मोहन बाबू अपने आलीशान बंगले में अकेले रह गये।

नौकरानी समय से आती और झाड़ू-बुहारू करके व खाना बनाकर ढककर चली जाती। मोहन बाबू सुबह उठकर पार्क में टहलने जाते और दिनभर बेटे-बेटियों के फोन का इन्तजार करते और अखबार पढ़ते। समय के साथ फोन काल्स की आवृत्ति घटती जाती। सबकी अपनी-अपनी व्यस्तता थी जो लगातार बढ़ती जा रही थी। इसी बीच एक दिन प्रशांत ने फोन पर बताया कि उसकी विप्रो से छुट्टी हो गयी है और वह कनाडा की एक कंपनी में सीनियर सॉफ़्टवेयर एनलिस्ट के बड़े पैकेज पर ज्वाइन करने के लिए टोरंटो की फ्लाइट पकड़ने जा रहा है। सबकुछ इतना जल्दी हुआ कि उसे सोचने और बताने का मौका ही नहीं मिला। अभी वह अकेले जा रहा है। सब कुछ ठीक रहा तो तीन महीने बाद पत्नी और बच्चे को भी ले जाएगा। तबतक वे बंगलुरू में कंपनी के फ़्लैट में ही रह लेंगे।

तीन महीने बाद प्रशांत एक दिन के लिए अपनी पत्नी और दो साल के बच्चे के साथ आया और पिता को ढाढस बँधाकर कनाडा चला गया। उसने यह कहा कि जब भी कोई जरूरत हो वे निस्संकोच उसे फोन करके बता दें। वह हर संभव कोशिश करके उनकी मदद करेगा। उधर प्रशांत कनाडा पहुँचा और इधर मोहन बाबू बीमार रहने लगे। इनके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी इसलिए इलाज कराते रहे। बेटों को इसकी खबर नहीं होने दी। फोन पर बातचीत का सिलसिला दैनिक से साप्ताहिक और फिर पाक्षिक स्तर पर चला गया। आत्मीयता का स्थान औपचारिकता लेती गयी। बड़े बेटे से तो महीने में एकाध बार ही बात हो पाती।

इसी बीच एक घटना ने मोहन बाबू को हिला दिया। उनके पड़ोस में अकेले रह रहे एक सेवानिवृत्त आई.ए.एस. अधिकारी की रहस्यमय मौत घर के भीतर हो गयी थी और इसका पता तब चला जब उनकी लाश की बदबू अड़ोस-पड़ोस तक फैलने लगी। इस बात की आशंका जतायी गयी कि उनकी हत्या घर के नौकर ने ही कर दी थी। विदेश में रह रहे बेटों को अपने पिता के अंतिम दर्शन का अवसर भी नहीं मिला था। एक एन.जी.ओ. द्वारा उनका अंतिम क्रिया-कर्म किया गया। बेटे उनका अस्थि-कलश लेने के लिए ही पहुँच सके थे। मोहन बाबू ने जब दबी जुबान से इस घटना की जानकारी अपने छोटे बेटे को दी तो उसने फौरन इंटरनेट से शहर में उपलब्ध ‘ओल्ड-एज-होम’ सर्च किया और ऑनलाइन बुकिंग करते हुए सबसे मंहगी सुविधाओं से लैस वृद्धाश्रम में मोहन बाबू को शिफ़्ट करा दिया।

अब मोहन बाबू की देखभाल प्रशिक्षित नर्सों के हाथ से होने लगी। विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ.मिश्रा रुटीन चेक-अप करते और खान-पान की व्यवस्था भी विशेषज्ञ परामर्श के अनुसार की जाने लगी। इन सबके बावजूद मोहन बाबू की सेहत सुधरने का नाम नहीं ले रही थी। वे फोन पर प्रशांत से अपनी तकलीफ़ बताने से परहेज करते। प्रशांत की कम्पनी पहले मुश्किल दौर से गुजर रही थी लेकिन इसके काम सम्भालने के बाद उसकी स्थिति सुधरने लगी थी। प्रबंध-तंत्र उसपर बहुत प्रसन्न था और तरक्की की लालच देकर उससे दोगुनी मेहनत करा रहा था। उसने दिन-रात मेहनत कर अपनी स्थिति मजबूत करने की धुन में पिता की बातों में छिपे दर्द को अनसुना कर दिया। उनकी देखभाल कर रहे डॉ.मिश्रा से पूछकर अच्छी से अच्छी दवाएँ चलाते रहने का अनुरोध करता और पैसे की चिन्ता न करने की बात कहता। पैसे की कमी तो वहाँ वैसे भी नहीं थी।

अंततः मोहन बाबू ने बिस्तर पकड़ लिया। साँस मद्धम पड़ने लगी। जीवन रक्षक उपकरण लगा दिए गये। वेन्टीलेटर लग गया। कृत्रिम ऑक्सीजन दी जाने लगी। नियमित डायलिसिस होती रही। प्रशांत लगातार डॉ.मिश्रा से हाल-चाल लेता रहा। एक दिन डॉ.मिश्रा ने बताया कि अब आखिरी समय नजदीक आ गया है। सभी उपाय आजमाये जा चुके हैं लेकिन सुधार नहीं हो रहा है। सभी इंद्रियाँ शिथिल पड़ गयी हैं। मोहन बाबू अधिक से अधिक दो सप्ताह के मेहमान हैं। प्रशांत ने अपने कंपनी मालिकों से बताया- पिता के जीवन के आखिरी पंद्रह दिन उनके साथ रहने के लिए और अगले पंद्रह दिन अंतिम क्रिया-कर्म के लिए चाहिए थे। प्रबंधन ने एक महीने की छुट्टी मंजूर कर दी। प्रशांत स्वदेश पिता को देखने चल दिए।

जूते बाहर निकाल आई.सी.यू. का दरवाजा खोलकर प्रशांत ने भीतर प्रवेश किया तो मोहन बाबू आँखें बंद किए बेसुध पड़े थे। इन्होंने धीरे से ‘पापा’ ‘पापा’ की आवाज लगायी। मोहन बाबू के हाथों में हरकत हुई। फिर उन्होंने धीरे से आँखे खोली। सामने बेटे को देखकर आँखों में अजीब चमक लौट आयी। उन्होंने आशीर्वाद में हाथ उठाने की चेष्टा की लेकिन ज्यादा सफल नहीं हुए। हाथ जरा सा उठने के बाद एक ओर लुढ़क गया। बेटे ने उनका हाथ थाम लिया। थोड़ी ही देर में उन्होंने इशारे से बैठने की इच्छा व्यक्त की। नर्स की मदद से प्रशांत ने बिस्तर में लगे हाइड्रॉलिक सिस्टम का प्रयोगकर बिस्तर एक ओर से उठा दिया। अब मोहन बाबू के शरीर में हरकत लौट आयी थी। वे बोल नहीं पा रहे थे लेकिन उनकी सजल आँखे चिल्ला-चिल्लाकर बता रही थीं कि बेटे के पास बैठना उनके लिए सबसे बड़ी दवा थी। डॉ. मिश्रा ने खिड़की से जब यह चमत्कार देखा तो सामने टंगे कैलेंडर पर सिर झुकाए बिना न रह सके।

एक सप्ताह बाद मोहन बाबू उठ खड़े हुए और दूसरे सप्ताह का अंत आते-आते बेटे के साथ पार्क तक टहलने लगे। दवाएँ अब अपना असर दिखाने लगीं थीं। प्रशांत को आये पच्चीस दिन हो गये थे। शाम को दोनो टहलने के बाद पार्क में लगी बेंच पर बैठकर आपस में बातें कर रहे थे। तभी मोबाइल की घंटी बजी। कनाडा से प्रशांत के बॉस का फोन था-

हेलो सर… गुड मॉर्निंग टु यू…

नो सर, हियर इट्ज़ इवनिंग, …वेरी गुड वेथर इन डीड

नो सर, दैट्स नॉट द केस… थिंग्स अर नॉट गोइंग माइ वे…

नो सर, आई मे नॉट बी फ्री बाई दिस वीक एन्ड… आई ऐम एक्ट्रीम्ली सॉरी सर…

नो, नो, ही इज़ स्टिल एलाइव सर, आइ कांट हेल्प… आइ ऐम सॉरी

येस सर, इ्ट हैज़ सरप्राइज़्ड मी टू सर… डॉ.मिश्रा इज़ आलसो परटर्ब्ड, ही सेड इट वाज़ ए गॉन केस बट…

येस सर, इट्ज़ अनफॉर्चुनेट फ़ॉर मी टू. आइ एम इक्वली कन्सर्न्ड विथ आवर कम्पनीज़ इन्टरेस्ट्स सर…

इसके बाद प्रशांत बेंच पर से उठकर थोड़ी दूर चला गया। अपने बॉस को समझाता रहा कि कैसे उसकी योजना फेल हो गयी। पिता के रोग ने उसे ‘धोखा’ दे दिया। यह भी कि वह उन्हें समझाने की कोशिश करेगा कि वह एक महीने से ज्यादा कतई नहीं रुक सकता। उसका हाव-भाव यह बता रहा था कि बॉस बेहद नाराज है और प्रशांत उससे गिड़गिड़ा रहा है।

बार-बार ‘सॉरी’ और ‘आइ विल ट्राई’ की आवाज मोहन बाबू के कानों तक पड़ती रही। अचानक उन्हें सीने में दर्द महसूस हुआ और जोर की हिचकी आयी। प्रशांत जब आधे घंटे बाद माथे पर पसीना पोंछते बेंच की ओर वापस लौटा तो मोहन बाबू का सिर एक ओर लुढक गया था और शरीर ठंडा पड़ चुका था।

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)