Friday, October 15, 2010

प्रयाग का पाठ वर्धा में काम आया… शुक्रिया।

 

वर्धा में जो कुछ हुआ वह आप ब्लॉगजगत की रिपोर्टों से जान चुके हैं। मैं भी अपने ब्लॉगर अतिथियों को विदा करने के बाद लगातार उनकी पोस्टें ही पढ़ रहा हूँ। उनकी स्नेहिल भाव-धारा में डूब-उतरा रहा हूँ। कृतज्ञता ज्ञापन के लिए शब्दों की मेरी झोली रिक्त हो चुकी है। मेरे लिए जैसी सद्‍भावनापूर्ण टिप्पणियाँ और उत्साहवर्द्धक बातें लिखीं गयी हैं उसके बाद तो मन में नयी ऊर्जा का संचार हो गया है। लगता है कि मौका मिले तो बार-बार उन अविस्मरणीय क्षणों को जीवन में उतारना चाहूँगा।

बीच-बीच में एक-दो महानुभावों की टिप्पणियाँ देखकर मन विचलित होता है तो पिछले साल के इलाहाबाद महासम्मेलन की याद ताजा कर अपना आत्मविश्वास मजबूत कर लेता हूँ।

पहला सम्मेलन विश्वविद्यालय के वर्धा मुख्यालय से दूर इलाहाबाद में था, यहाँ जैसा संसाधन व ‘लॉजिस्टिक सपोर्ट’ वहाँ उपलब्ध न था, अनुभव की कमी थी और ब्लॉग जगत का स्वभाव प्रायः अपरिचित था। लेकिन वहाँ भी जमावड़ा अच्छा हुआ था। खूब सार्थक बहस हुई। गरमा-गरमी भी हुई। एक जीवंत गोष्ठी का सफलता पूर्वक समापन कराकर जब हम घर लौटे तो अंतर्जाल पर हमारे प्रयत्नों को तार-तार करती कुछ पोस्टें हमारा स्वागत (काले झंडे से) करती मिलीं। हमने धैर्य से सबकुछ पढ़ा। …इसे बुलाया, उसे छोड़ दिया, इन्हें ये मिला, उन्हें वो नहीं मिला, यहाँ ये कमी वहाँ वो कमी। पब्लिक का पैसा बहा दिया गया,  …पारदर्शिता नहीं बरती गयी, आदि-आदि।

इन सब के बीच मेरा सौभाग्य यह रहा कि उस समय भी नकारात्मक आलोचनाओं से अधिक मात्रा में सम्मेलन की सकारात्मक बातों ने अन्तर्जाल पर स्थान बनाया। दुनिया को सही तस्वीर का पता चल गया। अंततः मेरा विश्वास पक्का हो गया कि हिंदी ब्लॉगिंग को प्रत्येक पढ़े-लिखे व्यक्ति से जोड़ने और इस अनूठे माध्यम की स्वतंत्रता और सहजता से सबको परिचित कराने के लिए इस आभासी दुनिया के स्थापित हस्ताक्षरों को सेमिनारों, गोष्ठियों व सम्मेलनों के माध्यम से एक दूसरे से व अन्य विद्यार्थियों और बुद्धिजीवियों से मिलने-मिलाने का सिलसिला चलते रहना चाहिए।

मैंने वर्धा में संपन्न इस कार्यक्रम की तैयारी के समय आदरणीय अरविंद जी द्वारा वर्ष पर्यन्त दी गयी सलाह के आधार पर कुछ मोटी-मोटी बातें नोट करके रख ली थीं लेकिन ऐन वक्त पर वह नोट ही गायब हो गया। अब जैसा कि सभी लोग कार्यक्रम को सफल बता रहे हैं तो स्मृति के आधार पर उन बातों को लिखने की कोशिश करता हूँ -

  1. आमंत्रितों की सूची अपने निजी संपर्क के आधार पर नहीं बल्कि ऐसी रीति से तैयार की जाय जिसमें इस माध्यम से गंभीरता पूर्वक जुड़ने वाले प्रत्येक ब्लॉगर को अपनी पहल पर यहाँ आने का मौका मिल सके।
  2. बजट की सीमा के अनुसार अतिथियों की जो भी सीमा तय हो उसको पूरा करने के लिए ‘प्रथम आगत-प्रथम स्वागत’ का नियम अपनाया जाय।
  3. आमंत्रित अतिथियों के लिए समान शिष्टाचार व उपलब्धता के आलोक में यथासम्भव समान संसाधन व सुविधाएँ उपलब्ध कराये जाय।
  4. सभाकक्ष में समय-प्रबंधन के उद्देश्य से बोलने वालों की संख्या नियंत्रित करने के लिए समूह-चर्चा की विधि अपनायी जाय जिसमें अलग-अलग मुद्दों पर चर्चा करने के लिए छोटे-छोटे समूह बनाकर गहनता से अलग-अलग चर्चा करा ली जाय और समूह के निष्कर्षों को उनके द्वारा नामित प्रतिनिधि द्वारा सभाकक्ष में प्रस्तुत किया जाय।
  5. अतिथियों के आवागमन, सुबह की चाय, नाश्ता, भोजन व शयन को निर्बाध बनाने के लिए अलग-अलग कर्मचारियों की लिखित ड्यूटी लगाकर उनका अनुश्रवण किया जाय।
  6. सभाकक्ष में परिचय-पत्र, कलम-कागज, कम्प्यूटर, इंटरनेट, माइक, ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग, फोटोग्राफी, प्रेस-रिपोर्ट इत्यादि की जिम्मेदारी दूसरे कुशल विशेषज्ञों के हाथ में दे दिया जाय।
  7. प्रत्येक सत्र में संपन्न कराये जाने वाले कार्यक्रम की रूपरेखा पहले ही तय कर ली जाय और उसका समयबद्ध अनुपालन प्रत्येक दशा में किया जाय।
  8. किसी भी ब्लॉगर को अपने मन से बक-बक करने की इजाजत न दी जाय। विषय से इतर न कुछ कहने दिया जाय और न ही कुछ करने दिया जाय। इधर-उधर घूमने और टंकी इत्यादि खोजने का मौका तो कतई नहीं।:)

इस प्रकार सारे काम दूसरों के सुपुर्द कर मैने अपना कैमरा उठाया और एक विचित्र संयोजक बनकर अनूप जी को एक बार फिर शिकायत का मौका देता हुआ गेस्ट हाउस पहुँच गया। शिकायत यह कि मैं एक संयोजक की तरह परेशान हाल, सिर खुजाता हुआ और बेचैनी से टहलता हुआ क्यों नहीं दिखायी दे रहा था।

जब पंचों की यही राय है कि संगोष्ठी सफल रही तो मैं यह क्यों बताऊँ कि ऊपर गिनाये गये किसी भी बिन्दु का अनुपालन ठीक-ठीक नहीं हो पाया? साथ ही कुछ दूसरी कमियाँ भी अपना मुँह लटकाये इधर-उधर ताकती रहीं तो उन्हें चर्चा का विषय मैं क्यों बनाऊँ? …लेकिन एक भारी समस्या है। यह बात लिखकर मैं आफ़त मोल ले रहा हूँ। शुचिता और पारदर्शिता के रखवाले मुझे जीने नहीं देंगे। यदि कमियाँ थीं तो उन्हें सामने आना चाहिए। अनूप जी ने यह कई बार कहा कि सिद्धार्थ अपना नमक खिला-खिलाकर लोगों को सेट कर रहा है। तो क्या मानूँ कि नमक अपना असर कर रहा है? छी-छी मैं भी कैसा अहमक  हूँ… अनूप जी की बात पर जा रहा हूँ जो खुले आम यह कहते हुए पाये गये कि आओ एक दूसरे की झूठी तारीफ़ें करें…।

तो मित्रों, मैं पूरे होशो-हवाश में पारदर्शिता के तकाजे से यह बताना चाहता हूँ कि ऊपर तय की गयी पॉलिसी शुरुआत से ही फेल होती रही, और मैं अपने को जबरिया पास करता रहा। उद्‍घाटन सत्र में ही अनूप जी ने स्पष्ट भी कर दिया कि सिद्धार्थ के ‘साहस’ की दाद देनी पड़ेगी कि इलाहाबाद सम्मेलन पर इतनी गालियाँ खाने के बाद भी साल भर के भीतर ही फिर से सबको दुबारा बुला लिया। इस कथन को भी मैने सकारात्मक मान लिया है जबकि आप इसका अर्थ समझ ही रहे होंगे। बहरहाल ऊपर गिनाये गये नियमों पर बिंदुवार आख्या निम्नवत है:

  1. मैने अपने ब्लॉग सत्यार्थमित्र व विश्वविद्यालय की दोनो साइट्स पर यह सूचना पोस्ट कर दी कि अमुक तिथियों को संगोष्ठी होगी। उसमें जो भी सज्जन शामिल होना चाहें वे ‘ब्लॉगिंग इथिक्स’ की थीम पर एक आलेख लिखकर उसे अपनी प्रविष्टि के रूप में हमें भेजें। चयनित होने पर उन्हें प्रतिभाग हेतु आमंत्रण पत्र भेजा जाएगा। कार्यशाला में प्रशिक्षण प्राप्त करने के इच्छुक अभ्यर्थियों से  निर्धारित प्रारूप पर आवेदन/पंजीकरण प्रपत्र भरने का अनुरोध किया गया था। सुरेश चिपलूनकर जी के एक टिप्पणी रूपी प्रश्न के जवाब में ‘प्रतिभागी’ और ‘अभ्यर्थी’ का अंतर भी बताया गया। इस सूचना के आधार पर जिस किसी ने अपनी प्रविष्टि भेजी उसको आमंत्रण पत्र भेज दिए गये। कोई आलेख अस्वीकृत नहीं हुआ। लेकिन हमारी उम्मीद के उलट यह संख्या बहुत कम थी। इस खुले आमंत्रण से संख्या पूरी न होते देखकर हमें सामूहिक चर्चा से कुछ नाम तय करने पड़े। करीब पचास बड़े और अनुभवी ब्लॉगर्स से संपर्क किया गया। इनमें से अनेक अपनी निजी व्यस्तता के कारण असमर्थता व्यक्त करते गये। अंततः करीब पैतीस लोगों ने आने की सहमति जतायी। अंतिम क्षण तक आकस्मिक कारणों से लोगों की यात्राएँ रद्द होती रहीं। प्रमुख कारणों में स्वयं अथवा किसी परिजन की तबियत खराब होना, अथवा नौकरी से छुट्टी न मिल पाना रहा। इस प्रकार हमने अवसर सबको दिया लेकिन उसे लपक लेने का ख्याल कम ही लोगों के मन में आया। जो आ गये उन्हें ही पाकर हम धन्य हो गये। जिन्होंने न बुलाने का स्पष्टीकरण मांगा उन्होंने अपनी भाषा और शैली से जतला भी दिया कि उन्हें न बुलाकार इस कार्यक्रम का कोई नुकसान नहीं हुआ।
  2. अंतिम समय तक लोगों के नाम कटते रहे इसलिए दूसरे नियम के पालन की आवश्यकता ही नहीं पड़ी। जिसने भी चाहा उसे आने दिया गया। हम सभी आने वालों से उनके आलेख अंतिम समय तक माँगते रहे। जिन्हें नहीं देना था उन्होंने नहीं ही दिया। कुछ लोगों का ‘न आना’ तय था लेकिन उन्होंने आलेख पाबंदी से भेज दिया। इसमें इस बात की पुष्टि हुई कि ब्लॉगर अपने मन का राजा है। जब मूड होगा तभी लिखेगा। किसी के कहने से नहीं।
  3. संसाधनों-सुविधाओं की समानता के बजाय उनकी उपलब्धता ने तीसरे नियम को ज्यादा प्रभावित किया। ए.सी.-नॉन-ए.सी., उत्तर-दक्षिण, ऊपर-नीचे, सिंगल-डबल इत्यादि मानकों के कमरों की उपलब्धता सीमित थी इसलिए जिसे जैसा बन पड़ा उसे वैसा टिका दिया गया। लेकिन सौभाग्य से इस बार कोई ब्लॉगर ऐसा नहीं निकला जो इन बातों की तुलना करके अपना दिन खराब करे। सबने हमारी वाह-वाह की और हम सच्ची में खुश होते रहे।
  4. समूहों का गठन भी हुआ, चर्चा भी हुई और प्रतिनिधियों का प्रस्तुतिकरण भी हुआ। लेकिन इस चक्कर में कई अच्छे वक्ता बोलने से रह गये। तकनीकी रूप से उनके विचार उनके समूह प्रतिनिधि ने व्यक्त कर दिए, लेकिन कलकत्ता से आये प्रियंकर जी, मुम्बई से आयी अनीता जी, रायपुर से आये संजीत जी अपने समूह के बाहर बोलने का मौका ही नहीं पा सके। इनको सुनना निश्चित रूप से बहुत लाभकारी होता, लेकिन समय-प्रबंधन की नयी तकनीक के आगे यह नुकसान हो गया।
  5. पाँचवें नियम के आलोक में ड्य़ूटी तो लगा दी गयी लेकिन कर्मचारियों ने यदि कोई ढिलाई बरती होगी तो उसका पता नहीं चल पाया। हमारे अतिथि इतने अच्छे थे कि उन्होंने मुझे खुश देखने के लिए किसी कमी की ओर इशारा ही नहीं किया। खुद आगे बढ़कर चाय माँगकर पीते रहे और लाइव रिपोर्ट में हमारा नाम रौशन करते रहे। एक बाथरूम में पानी ही नहीं आ रहा था। अविनाश जी गमछा कन्धे पर डालकर दूसरे ब्लॉगर के बाथरूम में हो लिए। किसी कर्मचारी ने एक दिन पहले टंकी का ओवरफ़्लो रोकने के उद्देश्य से गेटवाल की चकरी बंद करने के बाद उसे दुबारा खोलना जरूरी नहीं समझा था। पहले दिन रात के दस बजे ‘आल-आउट’ का जुगाड़ हो सका लेकिन सुनते हैं कि मच्छरों ने पहले ही अपना प्लान पोस्टपोन कर दिया था।
  6. सभाकक्ष में लॉजिस्टिक सपोर्ट निश्चित ही अच्छा रहा होगा लेकिन इसका प्रमुख कारण यह है कि उसमें मेरा कोई हाथ नहीं था। विश्वविद्यालय के कर्मचारियों, पत्रकारिता विभाग के विद्यार्थियों व तकनीकी विशेषज्ञों ने कोई कसर नहीं रखी। जिससे काम बिगड़ने का डर था वह अपने निजी कैमरे से ब्लॉगर्स की फोटो खींचने में व्यस्त था। बाद में पता चला कि कैमरे की सेटिंग ऐसी हो रखी थी कि सभी तस्वीरें सबसे कम (AVG) क्वालिटी की ही आ सकीं। केवल नेट पर चढ़ाने लायक।:(
  7. कार्यक्रम की रूपरेखा ऐसी तय हुई कि पहले सत्र को छोड़कर बाकी सत्रों में मंच पर कुर्सियाँ खाली ही रह गयीं। प्रत्येक सत्र के लिए औपचारिक अध्यक्ष और वार्ताकार तय कर मंच पर नहीं बैठाये गये। ब्लॉगर्स मंच के सामने लगी दर्शक-दीर्घा की कुर्सियों पर ही आसीन रहे और पवन दुग्गल को छोड़कर शेष वक्ता नीचे से सीधे पोडियम पर आते रहे। बाद में श्रीमती रचना त्रिपाठी ने बताया कि मंच खाली-खाली लग रहा था। लेकिन कार्यक्रम के दौरान किसी ने इस ओर इशारा नहीं किया। वहाँ उपस्थित कुलपति जी ने भी नहीं। बाद में उन्होंने बताया कि आप संचालक कम और हेडमास्टर ज्यादा लग रहे थे। ईल्ल्यौ… :(
  8. यदि यशवंत जी की भड़ास का अपवाद जबरिया निकाल दें तो विषय से हटकर बिना इजाजत बोलने वालों को मौका न देने का नतीजा यह हुआ कि चर्चा घूम-फिरकर इसी मुद्दे पर केंद्रित रही कि ब्लॉग लिखने वाले किसी आचार-संहिता के बारे में न सोचें तो ही ठीक है। किसी ने सामान्य सामाजिक नियमों को पर्याप्त बताया तो किसी ने स्व- नियंत्रण की बात की, कोई संहिता को गोली मारने के लिए ललकार रहा था तो कोई साइबर कानून की सीमाएँ बता रहा था। कुलपति जी ने भी अपनी लक्ष्मण रेखा खुद खींचने की ही सलाह दी। कुछ लोगों ने ब्लॉगर के उचित आचरण गिनाये तो किसी ने इसे उद्यमिता के परिप्रेक्ष्य में जोड़ते हुए यह कहा कि जो जिम्मेदार नहीं बनेगा वह यहाँ ज्यादा दिन नहीं टिकेगा। लफ़्फ़ाजी और घटिया प्रपंच की मार्केटिंग बहुत दिनों तक नहीं चलने वाली है। ब्लॉगरों को थोड़ा घूमने का मौका क्या दिया वे बस लेकर गांधी जी के आश्रम के बाद विनोबा जी के द्वार तक चले गये। वहाँ पवनार नदी की उजली धारा देखकर उसमें कुछ लोग कूदने को उतारू थे। लेकिन जिस विधाता ने गोष्ठी की सफलता  का वरदान दे रखा था उसी ने उन लोगों को कूदने से रोक लिया और सभी सकुशल ठीक समय से सभाकक्ष तक लौट आये। 

कहीं यह निष्कर्ष निकाला गया है कि “और जो कुछ भी हुआ हो मगर प्रवर्तित विषय ही भलीभांति विवेचित नहीं हो सका सारी रिपोर्टें यही बताती हैं ......बस छिछला सा निर्वाह .....बस जुमले दागे गए .....” हजार किलोमीटर दूर पंचायत चुनाव कराते हुए भी इतना गहरा अध्ययन करके तुरत-फुरत निष्कर्ष प्रस्तुत करने की क्षमता वाला कोई दूसरा ब्लॉगर यहाँ था ही नहीं जो गहराई तक निर्वाह कर सके और जुमलों से बाहर निकल सके। पवन दुग्गल भी वह गहराई नहीं पा सके। हैरत है कि फिर भी चारो ओर जय-जयकार मची है इस संगोष्ठी की। मन चकरा रहा है।

मुझे तो लग रहा था कि निम्न चार विषयों पर उनके समूहों द्वारा जो चर्चा की गयी वह गहन भी थी और सार्थक भी लेकिन कदाचित्‌ इसका संदेश सभाकक्ष के बाहर अंतर्जाल पर पूरा नहीं गया।

१- ब्लॉगिंग में नैतिकता व सभ्याचरण (etiquettes)

श्री सुरेश चिपलूनकर, श्री विवेक सिंह, श्री संजीत त्रिपाठी, डॉ.महेश सिन्हा, डॉ. (श्रीमती) अजित गुप्ता,

२- हिंदी ब्लॉग और उद्यमिता (व्यावसायिकता)

श्री हर्षवर्धन त्रिपाठी, श्री शैलेश भारतवासी, श्री संजय वेंगाणी, श्री अविनाश वाचस्पति, श्री अशोक कुमार मिश्र, श्रीमती रचना त्रिपाठी, श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी, श्री विनोद शुक्ल

३-आचार संहिता क्यों व किसके लिए?

- श्री रवीन्द्र प्रभात, श्रीमती अनिता कुमार, श्री प्रवीण पांडेय, प्रो. ऋषभदेव शर्मा, डॉ कविता वाचक्नवी, डॉ. प्रियंकर पालीवाल

४- हिंदी ब्लॉग और सामाजिक सरोकार

-श्री जय कुमार झा, श्री यशवंत सिंह, श्री अनूप शुक्ल, श्री जाकिर अली रजनीश, सुश्री गायत्री शर्मा

अब समूह के प्रतिनिधि अपनी लाज रखने के लिए पूरी बात अपने ब्लॉग पर लिखकर सबको लिंक भेजें तब शायद बात बने। 

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि मेरी लाख न्यूनताओं के बावजूद ईश्वर ने मुझसे एक जानदार, शानदार और अविस्मरणीय कार्यक्रम करा दिया तो यह निश्चित रूप से मेरे पूर्व जन्म के सद‌कर्मों का पल रहा होगा जिससे मुझे इस बार अत्यंत सुलझे हुए और सकारात्मक दृ्ष्टि के सम्मानित ब्लॉगर्स के साथ संगोष्ठी के आयोजन का सुअवसर मिला। कुलपति श्री विभूति नारायण राय जी ने बड़ी सहजता से पूरे कार्यक्रम के दौरान मेरी गलतियों को नजर अंदाज कर मेरा हौसला बढ़ाये रखा, पूरा विश्वविद्यालय परिवार मुझे हर प्रकार से सहयोग करता रहा, और ब्लॉगजगत में मेरे शुभेच्छुओं की दुआओं ने ऐसा रंग दिखाया कि कुछ खल शक्तियाँ अपने आप किनारे हो गयीं वर्ना बुलावा तो सबके लिए था। इसे भाग्य न मानूँ तो क्या?

एक बात जरूर कहूँगा कि प्रयाग के सम्मेलन से जो सीखा था वह वर्धा में काम आया। यहाँ भी अपनी गलतियों से कुछ सीखने को मिला है। निश्चित ही वे आगे मार्गदर्शन करेंगी।

शेष बातें जानने के लिए इन लिंक्स पर जाना उपयोगी होगा-

  1. कई अनुत्तरित प्रश्नों को छोड़ गयी वर्धा में आयोजित संगोष्ठी (रवीन्द्र प्रभात)
  2. कैमरे में कैद वर्धा में आयोजित संगोष्ठी की सच्चाई (रवीन्द्र प्रभात)
  3. अविस्मरणीय रहा वर्धा में आयोजित संगोष्ठी का दूसरा दिन (रवीन्द्र प्रभात)
  4. वर्धा में केवल विचार मंथन ही नहीं मस्ती की पाठशाला भी (रवीन्द्र प्रभात)
  5. हिन्दी ब्लॉगिंग पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला और संगोष्ठी पूरी भव्यता के साथ संपन्न (रवीन्द्र प्रभात)
  6. वर्धा सम्मेलन: कुछ खट्टा कुछ मीठा (जाकिर अली रजनीश)
  7. वर्धा यात्रा ने बना दिया गाय, वर्ना आदमी तो हम भी थे काम के.(अनीता कुमार)
  8. बर्धा ब्लॉगर सम्मेलन की रिपोर्ट “जरा हटके” (सुरेश चिपलूनकर)
  9. स्वतंत्र वार्ता हैदराबाद: ब्लॉगरों को अपनी लक्ष्मण रेखा खुद बनानी पड़ेगी- विभूति नारायण राय
  10. वी.एन.राय, ब्लॉगिंग और मेरी वर्धा यात्रा (भड़ास पर यशवंत)
  11. वर्धा की शानदार तस्वीरें (पिकासा पर सुरेश चिपलूनकर)
  12. वर्धा में दो दिवसीय राष्‍ट्रीय कार्यशाला एवं संगोष्‍ठी संपन्न (डॉ.कविता वाचक्नवी)
  13. वर्धा ब्लॉगर मिलन से वापसी, बाल बाल बचे (डॉ. महेश सिन्हा)
  14. ब्लोगिंग के जरिये गणतंत्र को आगे बढाने का एक अभूतपूर्व आयोजन का सार्थक प्रयास..(जय कुमार झा)
  15. ब्लोगर संगोष्ठी वर्धा चित्रों क़ी नजर से ..(जय कुमार झा)
  16. वर्धा संगोष्ठी और कुछ अभूतपूर्व अनुभव व मुलाकातें ....(जय कुमार झा)
  17. ब्लोगिंग का उपयोग सामाजिक सरोकार तथा मानवीय मूल्यों को सार्थकता क़ी ओर ले जाने केलिए किये जाने क़ी संभावनाएं बढ़ गयी है .....(जय कुमार झा)
  18. वर्धा में मिले ब्लॉगर (विवेक सिंह)
  19. वर्धा के गलियारों से (कुछ झूठ कुछ सच ) (विवेक सिंह)
  20. "ब्‍लोगिंग की कार्यशाला – अभी छाछ को बिलौना बाकी है – डॉ. (श्रीमती)अजित गुप्‍ता
  21. वर्धा सम्‍मेलन की तीन अविस्‍मरणीय बातें (संजय बेंगाणी)
  22. साला न कहें भाई साहब कहें चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  23. ब्लॉगिंग सबसे कम पाखंड वाली विधा है चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  24. ब्लॉगिंग की आचार संहिता की बात खामख्याली है चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  25. वर्धा में भाषण जारी चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  26. वर्धा में ब्लागर सम्मेलन चर्चाकारः अनूप शुक्ल
  27. नदी उदास नहीं थी  (डॉ. कविता वाचक्नवी)
  28. गांधी जी सफलतम ब्लॉगर हुए होते : वर्धा आयोजन का भरत वाक्य  (डॉ.ऋषभदेव शर्मा)
  29. "वर्धति सर्वम् स वर्धा – 1 (प्रवीण पांडेय)
  30. वर्धा ब्लोगर संगोष्ठी के पर्दे के पीछे के असल हीरो ... (जय कुमार झा)
  31. वर्धा संगोष्ठी में उपस्थित थे गांधी, निराला, शमशेर और अज्ञेय भी ... (रवीन्द्र प्रभात)
  32. हिंदी ब्लॉगिंग-आचार संहिता-देश के ब्लॉगर और कुछ बातें, एक रपट जैसा कुछ (संजीत त्रिपाठी)
  33. महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय,वर्धा से लौटकर .... हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की एक महारैली का आयोजन देश की राजधानी दिल्‍ली के इंडिया गेट पर करें (अविनाश वाचस्पति)
  34. ब्‍लागिंग में आना और कार्यशाला में पहचाना एक-दूसरे को डॉ.(श्रीमती) अजित गुप्ता
  35. तनिक रुको भाई, आ रहे हैं बताते हैं बताते हैं (अनीता कुमार)
  36. महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में... (गायत्री शर्मा)
  37. वर्धा और बिरयानी घर (राम त्यागी)
  38. वर्धा से आप लोग क्यों चले गये… ? (मास्टर सत्यार्थ)
  39. …अथ वर्धा ब्लॉगर सम्मेलन कथा (अनूप शुक्ल)
  40. वर्धा – कंचन मृग जैसा वाई-फ़ाई (अनूप शुक्ल)

अभी इतना ही। कुछ लिंक्स छूट गये हों तो टिप्पणियों के माध्यम से या मेल से बताएँ। (हम कोशिश करेंगे कि इस सूची को समय-समय पर आगे बढ़ाते रहें)

    (सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी) 

42 comments:

  1. वर्धा सम्मेलन से लव हो गया मुझे ।

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  2. अच्छे आयोजन के लिए बधाई और शुभकामनाये,,,,
    जय माँ भगवती ...

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  3. मुझे पूरा विशवास है कि आपके ऊपर कोई यह आरोप ना लगा पायेगा कि आपने मौज लेने की कोई जुर्रत की है ?

    अच्छा है ! जो आपने कई बातें स्पष्ट कर दी हैं ...अगले सम्मलेन में हम जैसे आलसी के काम आयेंगी !...वैसे अगले आयोजन की क्या तिथि है ?

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  4. एक बात जरूर कहूँगा कि प्रयाग के सम्मेलन से जो सीखा था वह वर्धा में काम आया

    -बस, गुर सारे जिन्दा रहने के, यह जीवन ही सिखलाता है.

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  5. मानव की वैचारिकता के इतिहास में ऐसे प्रयास सदैव मील के पत्थर हुए हैं निसंदेह आप बधाई के पात्र हैं
    किन्तु ऐसे अवसर तो अभी और आगे आते रहेगें और इन सफलताओं को निर्लिप्त /प्रोफेसनल भाव (गीता का निष्काम योग ) से लेते रहने की जरूरत है ...आपके ये अनुभव अन्तराष्ट्रीय विश्वविद्यालय परिसर में ही नहीं सचमुच अंतर्राष्ट्रीय सम्मलेन के आयोजन में काम आयेगें बशर्ते आयोजक अपनी इन देशी उपलब्धियों पर फूल कर कुप्पा होने की प्रवृत्ति से बचें ...यह क्षण भंगुर हैं अगले हप्ते से इसे भूलने लगेगें लोग ...अब अगली तैयारी में लगिए ...
    हाँ मैं भौतिक रूप से भले यहाँ चुनाव की ड्यूटी पर था मगर आत्मा से वहीं था ..एक सज्जन को इस कार्यक्रम में भाग लेंने के लिहाज से इसी शर्त पर छोड़ा भी कि वे वहां सार्थक प्रतिभाग करें मगर वे छुट्टी पाते ही गोल हो लिए ..न यहाँ ही रहे न वहां ही पहुंचे ..विषय के अनुरूप न तो विषय प्रवर्तन ठीक से होने का कहीं दस्तावेज मिला है और न ही दुग्गल जी के साईबर कानूनों के परिप्रेक्ष्य में विषय पर विमर्ष /उपसंहार -उल्लिखित कानूनी प्रावधानों के सापेक्ष यह कैसी बचकानी बात लगती है कि आचार संहिता की जरूरत ही नहीं है .....जब लोग जेल जाना शुरू करेगें तो तब क्या ये आचार संहिताएँ बनेगी ? मगर यह आपकी कोई रिक्तता नहीं ...प्रतिभागी ही विषय से भटकते रहे -इसलिए ही मुझे और अमेरिका में रह रहे रामत्यागी जी को भी एक बड़ी कमी खटकती रही ..,..
    लाजिस्टिक्स प्रबंध इस बार अच्छा रहा ....मच्छर निषेध और चाय का इंतजाम ....मुझे आपको धन्यवाद देना ही होगा और अभी हाल में आपने लखनऊ के सबाई आयोजन से भी अनुभव प्राप्त किये उसका जिक्र नहीं किये ....नाट फेयर . :)
    आत्ममुग्धता से शीघ्र उबारिये ..लोग सरकारी नमक को आपका नमक क्यों कह रहे हैं ! यह नमक भारत की असंख्य टैक्स पेयर के सवद बिन्दुओं का नमक है -खाने वाले इसे पता नहीं क्यों भूल जा रहे हैं ... :(
    जो वापसी का लंच पैकेट था वह शायद घर का रहा हो :)

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  6. सफल आयोजन की पुन: शुभकामनाएँ.

    दो लिंक और जोड़े जा सकें तो -

    http://hindibharat.blogspot.com/2010/10/blog-post_13.html

    http://vaagartha.blogspot.com/2010/10/blog-post.html

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  7. आपको मुझे धन्यवाद देना ही होगा :)

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  8. आदरणीया कविता जी, आपके बताये लिंक्स भी जोड़ दिए हैं। धन्यवाद।

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  9. इतने बड़े और सफल आयोजन द्वारा आपने अपनी जिस प्रबंधन क्षमता का मुज़ाहिरा किया है, वह गौर तलब और क़ाबिले तारीफ़ है. अभिनंदन.

    हम यह मानने को तैयार नहीं हैं कि' प्रवर्तित विषय ही भलीभांति विवेचित नहीं हो सका'.
    कहना तो यह चाहिए कि सारी चर्चा प्रस्तावित थीम पर ही केंद्रित रही.

    खैर.

    पुनः बधाई.

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  10. निश्पक्ष रिपोर्ट । बहुत अच्छी जानकारी। आप इस आयोजन के लिये बधाई के पात्र हैं। शुभकामनायें

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  11. आपकी वजह से कई ब्लॉगरों से मिलने का सुअवसर प्राप्त हुआ… जैसा कि मैं अपने पोस्ट में लिख ही चुका हूं कि आपका प्रबन्धन और समयबद्धता अचूक और अनुकरणीय थी…। यह लेख भी कुछ-कुछ वैसा ही है…

    आगामी आयोजनों हेतु अग्रिम शुभकामनाएं…

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  12. हमने आपसे बहुत कुछ सीखा है.

    आपके टिप्स हम भी नोट कर रहे है. जाने कब काम आ जाए.

    एक बात और सूची में डाल लें, फस्ट-एड बॉक्स तैयार रखें. कमी नहीं गीना रहा जी. मुझे आपको एक गोली के लिए दौड़ाना पड़ा इसका दुख अभी भी है.

    तमाम शुभकामनाएं.

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  13. मानव की वैचारिकता के इतिहास में ऐसे प्रयास सदैव मील के पत्थर हुए हैं निसंदेह आप बधाई के पात्र हैं....

    इतने बड़े और सफल आयोजन द्वारा आपने अपनी जिस प्रबंधन क्षमता का मुज़ाहिरा किया है, वह गौर तलब और क़ाबिले तारीफ़ है. अभिनंदन....


    सफल आयोजन की पुन: शुभकामनाएँ......

    आपकी वजह से कई ब्लॉगरों से मिलने का सुअवसर प्राप्त हुआ… जैसा कि मैं अपने पोस्ट में लिख ही चुका हूं कि आपका प्रबन्धन और समयबद्धता अचूक और अनुकरणीय थी…। यह लेख भी कुछ-कुछ वैसा ही है…


    हमने आपसे बहुत कुछ सीखा है. ....

    उपर्युक्त टिप्पणियां आपकी कार्यप्रणाली के गुणों को दर्शा रही है और मैं भी इन टिप्पणियों के साथ हार्दिक रूप से जुरा हुं ...आपने तथा श्री बिभूति नारायण रॉय जी ने मिलकर सरकारी साधन के सार्थक प्रयोग की दिशा में पूरे देश के लिए एक दिशा निर्देश जारी करने का प्रयास किया है और ब्लोगिंग को एक सामानांतर मिडिया के रूप में स्थापित करने की दिशा में भी अभूतपूर्व प्रयास किया है | आपके पूरी टीम को मेरा हार्दिक आभार ...

    एक लिंक और जोड़ दें इस पोस्ट में ...
    http://honestyprojectrealdemocracy.blogspot.com/2010/10/blog-post_12.html

    (वर्धा ब्लोगर संगोष्ठी के पर्दे के पीछे के असल हीरो ...)

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  14. विष्णुक्रान्ता के ताजे फूलों की तरह तरोताजा दिखा आपका यह कार्यक्रम, कुंद सी सुगन्धित रही संपूर्ण गतिविधियाँ और हिंदी ब्लोगिंग के लिए एक नयी दिशा-दृष्टि देने का काम किया यह दो दिवसीय कार्यक्रम, आपका यह भागीरथ प्रयास निश्चित रूप से आने वाले समय में अनुकरणीय भूमिका अदा करेगा ....आपका आभार इस ब्लोगर कुंभ को आयोजित करने के लिए और कृतज्ञता इस महत्वपूर्ण क्षण का साक्षी मुझे भी बनाने के लिए ! रवि रतलामी जी की अनुपस्थिति अवश्य खली, किन्तु अंतिम सत्र में तकनीकी की सहायता से जीवंत प्रसारण करके आपने इस कमी को भी पूरा कर दिया !
    =========================
    वर्धा संगोष्ठी से संवंधित आखिरी पोस्ट पढ़ें -

    वर्धा संगोष्ठी में उपस्थित थे गांधी, निराला, शमशेर और अज्ञेय भी ....

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  15. सिद्धार्थ जी, मैंने अपने कार्यकाल में कई सफलतम कार्यक्रम कराए हैं। लेकिन जैसे ही आप सफल कार्यक्रम कराते हैं आपके ऊपर अधिक तीव्रता से वार होने लगते हैं। लोगों को लगता है कि यह व्‍यक्ति स्‍थापित ना हो जाए। मैं तो आज तक भुगत रही हूँ, आप भी बचकर ही रहिए। स्‍थापित होने का भय ही लोगों को जीने नहीं देता और आपको उखाड़ने में तन-मन-धन से लग जाते हैं। रचनाजी से मिलकर अच्‍छा लगा बस समय नहीं मिला ज्‍यादा बातचीत का। आपने एक प्‍लेटफार्म दिया, हम सबने उसका सदुपयोग किया बस। लेकिन ऐसे में किसी दुरुपयोग करने वाले को भी बुला ही लेना चाहिए जिससे सारा ध्‍यान वहीं केन्द्रित हो जाए। पुस्‍तक लोकार्पण की फोटो हो तो अवश्‍य भेज दें।

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  16. आयोजन सुव्यवस्थित था, अब साथ मिल बैठने का उत्साह और बढ़ गया।

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  17. सबसे पहले तो आपको और विश्वविद्यालय परिवार को इस महती और सफल आयोजन के लिए बधाई और शुक्रिया.
    समूचा आयोजन बेहतर सपन्न हुआ, कहीं कोई झोल झाल नहीं और ना ही शिकायत का मौक़ा. रही बात रहने-खाने जैसी शिकायतों की तो ऐसी शिकायतें वे ही कर सकते होंगे जो ऐसा सोचकर जाएँ की खामी ढूँढना ही है. क्योंकि मुख्य बाद उद्देश्य की है. उद्देश्य कार्यशाला और गोष्ठी थी, वहां की सुविधायें नहीं,
    खैर, समूह प्रतिनिधियों वाली व्यवस्था कार्यक्रम के समय को देखते हुए सही रही भले ही इस से हर वक्ता को बोलने का मौक़ा नहीं मिला, बात फिर उसी उद्देश्य की है और समय सीमा की है.

    वैसे शायद आपसे यह लिंक छूट गया है कृपया एक नज़र डालें, इसमे संस्मरण तो नहीं है सिर्फ कार्यक्रम की रिपोर्ट है.

    " हिंदी ब्लॉगिंग-आचार संहिता-देश के ब्लॉगर और कुछ बातें, एक रपट जैसा कुछ"

    http://sanjeettripathi.blogspot.com/2010/10/blog-post.html

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  18. आप इसी तरह सार्थक सम्मेलन आयोजित करवाते रहें, और अपना नमक खिलाते रहें :) शुभकामनाएं.

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  19. अरे!!!! ये तो white paper हो गया :)

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  20. सफल आयोजन के लिए बधाई। किन्तु कितना सफल रहा यह जानना सुखद तो है किन्तु चर्चा क्या हुई, किसने क्या कहा , शायद मिनट्स या श्वेतपत्र या कोई अन्य शब्द होगा, जो मुझ जैसे अकामकाजी लोग नहीं जानते,सो जो भी उचित शब्द हो उसका उपयोग कर वहाँ क्या हुआ, किसने क्या पढ़ा आदि की जानकारी दीजिए।
    वहाँ भाग लेने वालों ने जो आलेख भेजे वे भी हमारा ज्ञानवर्धन करेंगे। सो वे भी पोस्ट कीजिए। जो पेपर आदि पढ़े वे भी एक स्थान पर संकलित होंगे। शायद यह सब आपके निजी ब्लौग में न होकर वि वि के ब्लौग पर होगा। कृपया लिंक दीजिए।
    बधाई व आभार।
    घुघूती बासूती

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  21. मैं दूसरे बाथरूम क्‍या नहाने गया,
    आपने तो मेरी ही पोस्‍ट छोड़ दी।
    वैसे आपने लिखा अच्‍छा और बिल्‍कुल सच्‍चा
    ब्‍लॉगिंग का कोई बच्‍चा कह नहीं सकता कच्‍चा।

    लिंक मैं ही दे देता हूं, आपकी गलती नहीं है, आप लिंक देते-देते थक गए होंगे

    महात्‍मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्‍वविद्यालय,वर्धा से लौटकर .... हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की एक महारैली का आयोजन देश की राजधानी दिल्‍ली के इंडिया गेट पर करें

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  22. आप के इस लेख से हम ने भी काफ़ी बाते सीखी, इस सुंदर आयोजन के लिए बधाई और शुभकामनाये, धन्यवाद

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  23. आपने तो फिर कर दिखाया .

    अफ़सोस पिछली बार की तरह फिर एक बार अभागे रह गए . हाज़िर न हो सके .गालियों से न डरें.ज्यादा हो जाएँ तो उन्हें मेरे ' तड़का ' का लिंक दे दें ...........

    ' उनसे आया ना गया हमसे बुलाया न गया .' डटे रहें .

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  24. सर्वप्रथम आपको इस आयोजन के लिए बधाई !
    निश्चित ही ये मील का पत्थर साबित होगा और इतने लोगों का हुजूम खड़ा करना कोई आसान बात नहीं है, शायद आपकी काफी उर्जा और समय इसमें लगा होगा , आशा है कि परिणाम ऐसे निकलेंगे कि आपकी उर्जा और समय और सरकारी पैसा सबकुछ सार्थक काम में लगा समझा जाएगा !

    आपने नकारात्मक या इसके विरोध को विपक्ष जैसी संज्ञा दी है, पर मेरा मानना है कि आलोचना के लिए एक ब्लॉगर या साहित्यकार या मनुष्य को सदैव तैयार रहना चाहिए और आलोचना को खुद को सही सिद्ध करने के उत्प्रेरक के रूप में लेना चाहिए !

    आपके इस लेख ने कई अनुत्तरित प्रश्नों का हल दे दिया है ! मैंने भी कई सवाल उठाये थे, जैसे पारदर्शिता का ....हो सकता है ये मेरा अल्पज्ञान या फिर आपके ब्लॉग पर नियमित न आना रहा हो , पर मुझे ऐसा लगा कि इतने बड़े आयोजन का बड़े स्तर पर कुछ पता ही नहीं था , और आपके इष्ट मित्र जो आपसे रेगुलर टच में है - कोई ही इस कार्यक्रम की सूचना थी, इसमें मेरा कोई आने का या निमन्त्रन ना पाने का लोभं नहीं था क्यूंकि मेरा शिकागो से आना संभव ही नहीं था बल्कि मैंने तो ये सब प्रश्न आपकी प्रतिष्ठा और इस कार्यक्रम कि पारदर्शिता को लेकर उठाये थे, जिनका कुश हद तक आपने उत्तर दे दिया है !

    सफल होने के लिए बहुमत की आवश्यकता नहीं, बल्कि गोष्ठी से आने वाले परिणाम होने चाहिए ! अनूप शुक्ल कि रोज आ रही पोस्टों पर मैंने पुछा था की साहब ये रोज रोज कि रपट और फोटो से हटकर कुछ ऐसा बताएं जहाँ पर विस्तार से इस कार्यक्रम के परिणामों का विश्लेषण किया गया हो !

    मैं अगर ब्लॉग्गिंग में भी बंदिश रखूँ तो कैसे काम चलेगा , मैं तो वही लिखता हूँ जो मुझे फील होता है !

    वैसे मैंने बहुत पहले आपके ब्लॉग पर लिखा था कि मैं आपकी लेखनी को पसंद करता हूँ और ये बात अब भी है , पर इसका मतलब ये नहीं कि मैं आपकी आलोचना न करूँ , विशेषकर जब आप हिंदी ब्लोग्गिंग के प्रतिनिधि बन रहे हों तो आपकी इमेज सार्वजनिक हो जाती है और आपकी जिम्मेदारी बनती है कि आप सभी प्रश्नों का उत्तर दें , सिर्फ प्रशंषको को ही स्थान न देकर , हर बहस में अपने आलोचकों को भी स्थान दें और उन्हें सुने एवं उनका उत्तर दें ! शायद अपने मेरा और मेरे प्रश्न का जिक्र कहें करना मुनासिब नहीं समझा पर मेरे लिए ये आवश्यक है कि में आपके द्वारा दिए गये उपरोक्त स्पष्टीकरण की सराहना करूँ !

    चलिए काफी लम्बा हो गया , एक विद्वान कुछ ही शब्दों में अपनी बात कह देता पर मुझे इतनी पंक्तियों का सहारा लेना पड़ा ! आशा है कि आप ऐसे आयोजन इतनी ही सक्रियता एवं और अधिक पारदर्शी होकर करते रहेंगे ! आपके ये प्रयास हिंदी ब्लोग्गिग में मील का पत्थर साबित हों, ऐसी मेरी कामना है !!

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  25. आदरणीय राम त्यागी जी,
    आपने पूरी बात जानकर अपनी प्रतिक्रिया दी और अपनी धारणा को संशोधित किया, इसके लिए हम आभारी हैं।

    जिन मित्रों ने इस संगोष्ठी पर आधारित पोस्टें लिखीं हैं उन्हें बहुत-बहुत धन्यवाद। मैनें यथासम्भव उनके लिंक जोड़ने का प्रयास किया है। आगे भी सूचना देते रहें ताकि सूची को पूरा किया जा सके। इसका लाभ भविष्य में पूरी सामग्री एक स्थान पर संकलित करने के लिए उठाया जा सकेगा।

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  26. बधाई के पात्र तो आप हैं ही, इतने मेहमानों को संभालना नाकों चने चबाना ही था, आप के सहयोगी विद्धार्थियों की भी तारीफ़ किए बिना नहीं रह सकते, दोनों विद्धार्थियों ने हमारा मन जीत लिया और हम उम्मीद कर रहे हैं कि ये बच्चे नवोदित ब्लोगर और हमारे दोस्त बने रहेगें।
    सब बातों की एक बात्…अगला आयोजन कब है…:)
    वैसे तो आयोजन संचालन पर आप को मांगी/बिनमांगी बहुत सी सीख मिली है, हमारी सिर्फ़ एक ही विनती है कि अगली बार ऐसा कोई आयोजन करें तो सिर्फ़ अपने ब्लोग पर या वेबसाइट पर ही सूचना सीमित न रखें। एक छात्रों की कमेटी के जिम्मे ये काम भी डाल दें कि वो जितना हो सके लोगों को ई-मेल से सूचित कर सकें। मेरा ई मेल आई डी तो है न आप की लिस्ट में। और हाँ, अगली बात हमारा पेपर पढ़ने का मौका हम किसी अनुज को उपहार में नहीं देगें…।:)इजाजत है न?

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  27. आदरणीय सिद्धार्थ जी
    आयोजन के लिए बधाई स्वीकारिये आयोजन की आधिकारिक तथा स्नेह युक्त पोस्ट देख कर महसूस हुआ कि वाक़ई उम्दा आयोजन रहा होगा .
    अच्छा लगा लेकिन मामला यहीं आकर अटका हुआ है कि किन वज़हों से नकारात्मक पोस्ट आ रहीं हैं इस पर विचार ज़रूरी है. ब्लागर्स को आपके द्वारा प्रेषित आमंत्रण की बात समझ में नहीं आ पा रही है. खुले तौर पर सूचना थी कि आमंत्रण नही भेजे जा रहे किंतु कुछेक लोगों ने बताया कि आमंत्रण भेजे गये हैं. हो सकता है इस भ्रम को समाप्त कर दिया जावे. दूसरी बात यह है कि मीट में उन स्थानों(शहरों)के जहां हिंदी ब्लागर हैं से यथोचित प्रतिनिधित्व का अभाव रहा. जो समझने योग्य बात है. इसकी प्रतिक्रिया अवश्यम्भावी थी और रहेगी ये अलग बात है आप ने सभी प्रदेशों को बुलावा भेजा .
    तीसरा और अंतिम तथ्य कि आप को सफ़ल आयोजन के लिये बधाईयां कुछ चिंतन योग्य बिन्दुओं सहित.

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  28. वैसे मुझे पूरी उम्मीद है कि आपने संगोष्ठी के दौरान मेरा ये विश्लेषण अभी तक नहीं पढ़ा होगा -
    http://meriawaaj-ramtyagi.blogspot.com/2010/10/blog-post_10.html

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  29. आदरणीय राम त्यागी जी,

    आपने बिल्कुल सही फरमाया। आपका कथित विश्लेशण नहीं देख पाया था। अभी पढ़कर आया हूँ।

    हिंदी ब्लॉगिंग के बारे में सोचने का समय आपने ठेले पर बिरयानी खाते-खाते निकाल लिया। बड़ा उपकार किया। दूसरा कोई समय ही कहाँ है इसके बारे में सोचने के लिए।

    घर बैठे एक ऐसा साधन मिल गया है कि जब जैसे चाहो प्रयोग कर लो। जिसकी चाहो पल में ऐसी-तैसी कर दो। न किसी गहराई में जाने की जरूरत है, न किसी से विचार-विनिमय की जरूरत है। बस, ज्यों ही प्रेशर महसूस हो हाजत से निबट लो। आराम से घर में बैठकर वेस्टर्न स्टाइल कमोड पर।

    इस सुविधाजनक काम से अलग यदि कोई चार लोगों को जोड़ने का काम करता है, पचास पढ़े-लिखे विद्यार्थियों को कार्यशाला में बुलाकर उन्हें ब्लॉग बनाने और चलाने की तकनीकी जानकारी दिलाता है, इस माध्यम को सकारात्मक दिशा में सामाजिक परिवर्तन के लिए कैसे प्रयोग किया जा सकता है इसपर चर्चा कराता है, आभासी दुनिया के चेहरों को एक-दूसरे के सामने लाकर मिलवाता है, तो इससे उस आराम में खलल पड़ता है।

    फिर तो आपकी शिकायत जायज ही है।

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  30. पूरी उम्मीद थी कि आपने नहीं देखा होगा क्यूंकि शायद में कथित जो लिखता हूँ :)

    वैसे ये विश्लेषण उस समय का है जब ये संगोष्ठी चल रही थी और मुझे इस बारे में सिर्फ ये पता था कि ये 'किस विषय पर हो रही है' और 'लोगों को इसके बारे में पता नहीं है'- उसके बाद आपकी पोस्ट पर आकर आप मेरी प्रतिक्रिया ऊपर पढ़ ही चुके हैं !

    आपके द्वारा उठाये कुछ प्रश्नों के जबाब देना चाहूँगा !!

    धन्यवाद कि आप मेरे ब्लॉग पर आये !

    मुझे कतई बुरा नहीं लगा आपकी प्रतिक्रिया पर क्यूंकि ये आपके विचार है और आपकी सोच के अनुरूप ही होंगे, पर आपके विचारों को में सकारात्मक दिशा में लेकर उन पर अपनी प्रतिक्रिया जरूर दूंगा शालीनता से !

    अगर आपकी सोच व्यापक होती तो आप मेरे ब्लॉग पर पहले जरूर आते, पर आप सिर्फ कुछ ही ब्लोगों पर जाते हैं और यही मेरी शिकायत थी कि जब आप अपने आप को ब्लॉग्गिंग का प्रतिनिधि बताते हैं तो सोच का और अपने पढने का दायरा बढाईये, इससे पारदर्शिता अपने आप आएगी ! खैर हर किसी का अपना एक समूह होता है और पढने का विषय का शौक भी !!

    पहली बात मैं बिरयानी खाने लंच के समय गया था और उस आम आदमी के ठेले को यहाँ डिस्कस करते हुए मुझे कोई हिचक नहीं , अगर हर कोई आचार संहिता की बात करने लगेगा तो विभिन्न विषयों पर अपने विचार कौन व्यक्त करेगा ! पुलिसिया काम तो जमींदार लोग करते हैं !

    अगर आपने मेरा ब्लॉग पहले पढ़ा होता या इस पोस्ट के साथ साथ और भी लेख पढ़े होते तो शायद आप मेरी सोच को एक कमरे का नजरिया नहीं देते ! में एक गाँव से पढकर - जब मेरे ज्यादार साथी कॉन्वेंट में पड़ रहे होंगे - अभी कुछ ही साल पहले यहाँ की तरफ अपनी मेहनत से कुछ समय के लिए आय हुआ हूँ , उससे मेरी सोच कतई प्रभावित नहीं हुई है , हो सकता कंगूरे ऐसे हों पर नीव तो अभी ग्रामीण भारत में ही है और शायद वो आप देखते जब और मुझे पढते !

    रही बात स्वच्छंदता से लिखने की तो , ब्लॉग क्या आप सिर्फ वाहवाही के लिए लिखते हैं ? ये कोई ससुराल नहीं जहाँ पर सब वाहवाही में कुश शब्द लिखते मिले , ये सार्वजनिक मंच है जहाँ पर हर कोई एक मौलिक दायरे में अपने मन के बात रखता है !

    आपने सिर्फ हिंदी के हस्ताक्षरों को बुलाकर भारत की राजनितिक दलों वाली मानसिकता का परिचय दिया , साथ ही इस आयोजन को एक व्यक्तिगत आयोजन मान कर आप चले और आलोचना आपको मिर्ची कि तरह लगी , -- जैसे कि कल मैंने आपको आपके ब्लॉग पर लिखा था कि चलो अच्छा हुआ आपने स्पष्टीकरण दिया , एक सार्वजनिक काम की जिम्मेदारी आपको और भी जिम्मेदारी देती है और आपको हर तरह के प्रश्नों के जबाब के लिए तैयार रहना चाहिए - खैर आप खुद पढ़े लिखे प्रबुद्ध समझदार हैं ! पर यकीन मानिए कि गहराई में जाने का ठेका सिर्फ इस आयोजन के जरिये आपने ही नहीं ले रखा या आपके दायरे के अन्य लोगों ने - हर किसी का अपना अपना सोचने का तरीका है और उस हिसाब से ही हर कोई अपनी बात रखता है !

    एक बात बस समझ में नहीं आती कि आप इतना इस बात को इतनी नकारात्मक सोच से क्यों सोच रहे हो ? कोई भी आदमी सम्पूर्ण नहीं इसलिए कोई कमी है तो अगली बार उसको ना दुहराया जाए - ऐसा भी तो सोचा जा सकता है - अपने आलोचकों को हीँन बताकर क्या आप कमियों को छुपा दोगे !

    मेरे लिए अभी आप एक प्रबुद्ध इंसान हैं , कमी किसमें नहीं होती ! आशा है आप मेरी अन्य पोस्टों , मेरी प्रतिक्रिया अपने ब्लॉग पर और इस प्रतिक्रिया को पढकर फिर से ठन्डे दिमाग से मेरे उठाये प्रश्नों को तरजीह देंगे ना कि इससे अपने रक्तचाप को बढायेंगे !

    आशा है कि आप ब्लॉग पर आते रहेंगे और अपनी फीडबैक से मेरे लेखन को उत्कृष्ट करने में मेरी मदद करेंगे ! और मैं भी कोशिश करूँगा कि जो स्वच्छंद चिचार मौलिक दायरे में लिखता रहूँ !

    विचारों की टकराहट और मुद्दों कि सुलगाहट में - आराम का खलल , या प्रेसर आने से हाजत में जाना - पता नहीं कैसे आपको सूझे !

    संयम और विवेक से अगर बहस हो तो उसे सार्थक बहस कहते हैं ! कुतर्क प्रबुद्धों को शोभा नहीं देते !!

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  31. आपको आपके प्रयास के लिए ढेरों बधाई. हर सम्मलेन से कुछ न कुछ निकलता ही है. प्रश्न यह है कि कौन उसे कैसे देखता है. इस तरह के आयोजन जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे ढेर सारी बातें अपने आप निकल कर सामने आएँगी. विवाद वगैरह तो होते रहेंगे. कौन रोक सका है उन्हें?

    वर्धा सम्मलेन में शामिल न हो पाने का पछतावा हमेशा रहेगा.

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  32. सिद्धार्थ जी
    "निन्दक नियरे राखिये"। आलोचना सुनते रहिये। काम करते रहिये। वैसे आलोचकों को आलोचना करने के बजाय अपने अपने ढंग से ब्लोगिंग पर आयोजन करना चाहिये। जॊ लोग वर्धा के आयोजन से नाखुश हैं उन्हें अपने यहां एक आयोजन इससे बेहतर ढंग से कराना चाहिये।
    लगता है, अब आपको अगला आयोजन और जल्दी कराना पडेगा। अगले आयोजन के लिये अग्रिम शुभकामनायें।

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  33. समझदार व्यक्ति हमेशा अनुभवों से सीखता है। यह प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए।

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  34. अभी देखा और उपर उपर से पढ़ा. इतना ही कह सकता हूं कि हिंदी पट्टी के बदमाश से बदमाश लोग भी बहुत अच्छे होते हैं दिल के. और, वर्धा में तो सब अच्छे, स्नेहिल, शानदार लोग मिले. वहां जो कुछ हुआ दिखा सुना जिया, निजी जिंदगी के अनुभवों की पूंजी के लिहाज से, कम से कम मेरे लिए, शानदार रहा.
    सिद्धार्थ भाई, इतना ही कहूंगा, आप भावुक इन्सान हैं, दिलदार हैं इसलिए छोटी छोटी चीजों को सीने से लगाकर चल रहे हैं, वरना आज के जमाने में कौन परवाह करता है किसी का.
    सारे दोस्तों, कमेंट करने वाले साथियों-साथिनों को मेरा प्रणाम.
    आभार
    यशवंत

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  35. यह तो अच्छा हुआ कि हमारी तरह का इक नन्हा ब्लागर भी वहाँ था...


    ______________________
    'पाखी की दुनिया' में पाखी की इक और ड्राइंग...

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  36. आज बहुत दिन बाद ब्लॉग पे आने का मौका मिला. परीक्षाये ख़त्म हुई तो सोचा चले ब्लॉग पे कुछ पढ़ कर जी हल्का किया जाय, लेकिन यहाँ आकर तो????????????
    बातें समझ से परे लग रही हैं!!!!!!!! अधिकतर लोग तो अखाडा खोले बैठे नजर आ रहे हैं. ज्यादा बोल गया तो कही मेरे लिये भी सामत न आ जाए. बस यही कहना चाहूँगा की जल्दी से कोई नई पोस्ट ठेल दीजिये ताकि अगली बार जब ब्लॉग पे आयें तो इस खींचातानी से दूर कुछ नया मिले.

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  37. बहुत ही सुंदर.
    http://sudhirraghav.blogspot.com/

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  38. आइये बंधुओं जल्‍दी से आइये । वर्धा सेमिनार के हथियारों का जायजा लीजिए और बतलाइये, कौन सा हथियार किसका है और किसके हाथ में है
    हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के एक सेमिनार में शामिल ब्‍लॉगरों के हथियारों की झलक

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  39. सिद्धार्थ जी, सच कहूँ तो किसी भी कार्य में खामियाँ निकालना बहुत आसान है पर उसे सफल बना पाना बेहद ही मुश्किल। इस ब्लॉगर सम्मेलन से पहले मैं बहुत से ब्लॉगरों से अपरीचित थी पर अब आपकी मेहरबानी से सुपरीचित हो चुकी हूँ। आपसे भी मेरी केवल टेलीफोन पर ही चर्चा हुई थी लेकिन आपसे वर्धा में मिलना मेरे लिए बहुत ही सुखद अनुभव रहा। मुझे इस ब्लॉगर सम्मेलन में वहाँ पधारे ब्लॉगरों से ब्लॉगिंग के बारे में बहुत कुछ सीखने को मिला। आपके द्वारा किए गए इस बेहतर आयोजन के लिए आप निसंदेह ही बधाई के पात्र है।

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आपकी टिप्पणी हमारे लिए लेखकीय ऊर्जा का स्रोत है। कृपया सार्थक संवाद कायम रखें... सादर!(सिद्धार्थ)