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Saturday, September 11, 2010

पोला पर्व की धूम और विदर्भ पर इन्द्रदेव का कोप

 

भारत का विदर्भ क्षेत्र खेती-बाड़ी के प्रयोजन से बहुत उर्वर और लाभकारी नहीं माना जाता। कपास, सोयाबीन इत्यादि की खेती करने वाले किसान अनेक समस्याओं से जूझते रहते हैं। मौसम की मार से फसल बर्बाद होने का सिलसिला लगातार चलता रहता है। कर्ज और बदहाली से तंग आकर उनके आत्महत्या कर लेने तक की घटनाएँ सुनायी देती रहती हैं। वर्धा विश्वविद्यालय के प्रांगण में रहते हुए मुझे दो माह से अधिक हो गये हैं। यहाँ के बरसाती मौसम में इस बार खूब जलवृष्टि हुई है। चारो ओर से बाढ़ और फसल की बर्बादी की खबरें आ रही हैं। ऐसे में जब पिछली शाम को अचानक पूर्वी आकाश में इन्द्रधनुष दिखायी दिया तो बारिश बंद होने की आशा जगी। लगातार होती बारिश ने हम जैसे अकिसान की नाक में भी दम कर रखा था।

    घर के पीछे पूर्वी क्षितिज पर उगा इंद्रधनुष    ठीक उसी समय पश्चिमी क्षितिज पर सूर्यास्त

अगले दिन बुधवार की सुबह जब सोकर उठा तो  इंद्रधनुष और मेरे अनुमान को धता बताते हुए बादल फिर से छा गये थे। बारिश बेखौफ़ सबकी छाती पर मूंग दल रही थी। लेकिन जब मैं स्टेडियम जा रहा था तो रास्ते में एक नया नज़ारा मिला। तमाम लोग ऐसे मिले जो बारिश की परवाह किए बिना सड़क किनारे बंजर जमीन में उगे पलाश की झाड़ियों से टहनियाँ और पत्ते तोड़कर ले जा रहे थे। जब मैं चौराहे पर पहुँचा तो एक ठेले पर यही पलाश बिक्री के लिए लदा हुआ दिखायी पड़ा। साइकिल पर पलाश की टहनियाँ दबाकर ले जाते एक दूधवाले से मैने पूछा  कि ये पलाश क्या करोगे। वह हिंदी भाषी नहीं था। मुझे उसने उचटती निगाह से देखा और कठिनाई से इतना बता सका- “परस बोले तो …पोला वास्ते” उसने पलाश को परस कहा यह तो स्पष्ट था लेकिन पोला? मैं समझ न सका।

शाम के वक्त बारिश की रिमझिम के बीच आर्वी नाका (चौराहा जहाँ से आर्वी जाने वाली सड़क निकलती है) की ओर जा रहा था तो अनेक जोड़ी बैल पूरी सजधज के साथ एक ही दिशा से आते मिले। सींगे रंगी हुई, गले में घण्टी लगी माला और मस्तक पर कलापूर्ण श्रृंगार, पीठ पर रंगीन ओढ़नी और नयी रस्सी से बना पगहा (बागडोर)। इनकी डोर इनके मालिक के हाथ में थी। टुन-टुन की आवाज करते, अपने मालिक के साथ लगभग दौड़ते हुए ये किसी एक मेला स्थल से वापस आ रहे थे। मैं मन मसोस कर रह गया कि काश इनकी तस्वीरें ले पाता। शुक्र है इसकी कुछ क्षतिपूर्ति गूगल सर्च से और कुछ सुबह के अखबार से हो गयी।

अगले दिन सुबह अखबार खोलकर देखा तो मुखपृष्ठ पर सजे-धजे बैल की पूजा करते किसान परिवार की रंगीन तस्वीर छपी थी। लेकिन उसके बगल में यह दिल दहला देने वाली खबर भी थी कि विदर्भ क्षेत्र के पाँच किसानों ने पिछले चौबीस घण्टे में आत्महत्या कर ली जिसमें एक वर्धा के निकट ही किसी किसान ने कुँए में कूदकर जान दे दी थी। खबर के अनुसार पिछले कई दिनों से जारी घनघोर बारिश के कारण उनकी कपास की फसल घुटने तक पानी में पूरा डूब गयी थी। जब वे खेत से यह बर्बादी का नज़ारा देखकर आये तो आगे आने वाली तक़लीफ़ों की कल्पना से इतना तनावग्रस्त हो गये कि आत्महत्या का रास्ता चुन लिया। समाचार पढ़कर मुझे इस उत्सव की उमंग फीकी लगने लगी। मैंने शहर की ओर जाते समय देखा कि आर्वी नाके पर पलाश की टहनियों का ढेर जमा हो चुका था और उसमें आग लगा दी गयी थी। pola 004हाई-वे बाई-पास से शहर की ओर जाने वाली सड़क के नुक्कड़ पर सुबह-सुबह अस्थायी कसाईबाड़ा देककर मुझे हैरत हुई। बहुत से बकरे काटे जा रहे थे, और ग्राहकों की भीड़ इकठ्ठा होने लगी थी। मैंने स्टेडियम में अपने एक साथी खिलाड़ी से इस पर्व के बारे में पूछा तो उन्होंने बहुत रोचक बातें बतायी जो आपसे बाँट लेता हूँ। 

भादो महीने की अमावस्या के दिन शुरू होने वाला दो दिवसीय पोला-पर्व मराठी संस्कृति का एक बहुत महत्वपूर्ण अंग है। यह कृषक वर्ग द्वारा मनाया जाने वाला खेती का उत्सव है। पारंपरिक रूप से बैल किसान का सबसे बड़ा सहयोगी रहा है। भादो महीने के मध्य जब खेतों में जुताई इत्यादि का कार्य नहीं हो रहा होता है तब गृहस्थ किसान अपने बैलों को सजा-सवाँरकर उनकी पूजा व सत्कार करता है। दरवाजे पर पलाश की डालियाँ सजायी जाती है और उनकी पूजा होती है। अच्छी फसल के लिए मंगल कामना की जाती है। वह अपने हलवाहे को नया वस्त्र देता है, उसके पूरे परिवार को अपने घर पर भोजन कराता है। हलवाहा उन सजे-धजे बैलों की जोड़ी लेकर गाँव के ऐसे घरों के दरवाजे पर भी जाता है जहाँ बैल नहीं पाले गये होते हैं। pola 003ऐसे प्रत्येक घर से बैलों की पूजा होती है, और सभी लोग हलवाहे को कुछ न कुछ दक्षिणा या बख्शीश भेंट करते हैं। शाम को गाँव के सभी बैलों की जोड़ियाँ एक नियत स्थान पर जमा होती हैं। इस स्थान को रंगीन झंडियों और पत्तों से बने तोरण द्वार से सजाया जाता है। यहाँ बैलों की सामूहिक पूजा होती है और उनकी दौड़ जैसी प्रतियोगिता होती है। इसमें विजेता बैल के मालिक को समाज के प्रतिष्ठित लोगों द्वारा ईनाम भी दिए जाते हैं।

मेले से प्रसाद के साथ लौटकर आने के बाद किसान के घर में उत्सव का माहौल छा जाता है जो रात भर चलता है। यह पर्व खाने-पीने के शौकीन लोगों को अपना शौक पूरा करने का अच्छा बहाना देता है। श्रावण मास में मांसाहार से परहेज करने वाले लोग भादो माह के इस पर्व की बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। गरीब हलवाहा भी इसदिन लोगों की बख्शीश पाकर कम खुश नहीं होता। इस खुशी का इजहार प्रायः वह शराब पीकर करता है। मांस खाने और दारू पीने का यह दौर दूसरे दिन तक चलता है। रात को जिस पलाश की पूजा होती है अगले दिन सुबह उसे एकत्र कर जलाया जाता है। मान्यता है कि इसके जलने से वातावरण में कीड़े-मकोड़ों और मच्छरों की संख्या कम हो जाती है।

भाद्रपद शुक्ल पक्ष के तीसरे दिन महिलाओं का तीज व्रत आ जाता है जिसे यहाँ  ‘कजरातीज’ कहा जाता है। आज दिनभर इस व्रत-त्यौहार संबंधी सामग्री से बाजार अटा हुआ था। केले के हरे पौधे, नंदी के खिलौने, फल-मूल और सुहागिन औरतों के श्रृंगार के साजो-सामान लिए एक महिला की दुकान की तस्वीर लेने के लिए जब मैं आगे बढ़ा तो वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी। गरीबी की दुहाई देने लगी। उसे लगा कि मैं कोई सरकारी आदमी हूँ जो सड़क पर दुकान लगाने के खिलाफ़ कार्यवाही करने वाला हूँ। मैंने उसे आश्वस्त किया लेकिन उसका चेहरा किसी अन्जानी आशंका से ग्रस्त होता देख मैं वापस मुड़ गया। हाँ, एक फोटो खींच लेने का लोभ-संवरण मैं फिर भी नहीं कर पाया।

आप जानते ही हैं कि भाद्रपद शुक्लपक्ष चतुर्थी के दिन महाराष्ट्र में गणपति की स्थापना होती है। उसके बाद महालक्ष्मी और दुर्गा के त्यौहार आ जाते हैं। इसप्रकार यहाँ त्यौहारों का मौसम पूरे उफ़ान पर है। ऐसे में इंद्रदेव की वक्रदृष्टि के शिकार विदर्भ के अधिकांश किसान विपरीत परिस्थितियों में भी पोला का पर्व धूमधाम से मना रहे हैं। लेकिन कुछ ने हिम्मत छोड़ दी और मौत को गले लगा लिया। यह विडम्बना देखकर मन परेशान है। क्या करे?

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

14 comments:

  1. यह पूरा पखवाड़ा जो अमावस्या के एक दिन पहले की चतुर्दशी से आरंभ हो कर अनंत चतुर्दशी तक चलता है पूरी तरह से कृषि को समर्पित है। ये त्योहार पूरे भारत में विभिन्न रूपों में मनाए जाते हैं। पोला की रिपोर्ट पहली बार पढ़ रहा हूँ।

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  2. किसान की आत्महत्या की खबर पर अफसोस हुआ ।

    बाकी आपने पोला की पोल खूब अच्छी तरह खोल दी । पोला के बारे में पहली बार जानकर अच्छा लगा ।

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  3. पलाश को कृमिनाशक माना जाता है इसलिए वहाँ उसे जलाने की परम्‍परा प्रारम्‍भ हुई होगी। भारतीय परम्‍परा में कभी भी किसी किसान ने आत्‍महत्‍या नहीं की होगी लेकिन आधुनिकता की देन ने उसे कर्ज के तले दबा दिया और आज वह आत्‍महत्‍या करने पर मजबूर हो गया है, बहुत ही दुखद है। एक नये पर्व की जानकारी मिली, बहुत अच्‍छा लगा।

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  4. चित्र बहुत अच्छे हैं। आत्महत्या का संदर्भ मन दुखी कर गया।

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  5. पोला के बारे में काफी कुछ जाना पर किसानों द्वारा आत्महत्या को गले लगाए जाने का समाचार निसंदेह दुखद है .... आभार

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  6. गणेश चतुर्थी पर्व अवसर पर बधाई और शुभकामनाएं...

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  7. जब भी मै किसान की आत्महत्या की खबर पढता हुं तो सोचता हुं कि हम लोगो का पेट भरने वाला खुद कितना मजबुर है, क्या यही विकास है, यह मोबाईल फ़ोन यह लेपटाप यह मेट्रो क्या हमारा पेट भी भर देगी???

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  8. अच्छा लगा पोला के बारे में पढ़कर और जानकर. किसानों की आत्महत्या के बारे में क्या कहें??????????
    अजीब विडम्बना है कि हमारा अन्न दाता ही घुट-घुट कर मरने के लिए बाध्य है और उसके द्वारा उपार्जित अन्न और फल से अपनी पेट पूजा कर हम सब पल बढ़ रहे हैं.

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  9. हाय किसान तेरी यही कहानी
    हाथों में हल और आंखों में पानी :(

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  10. इस त्यौहार के बारे में जानकर अच्छा लगा।
    पांच किसान आत्महत्या कर लिये। जानकर मन दुखी हो गया।

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  11. सार्थक और सराहनीय जानकारी देती पोस्ट ...

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  12. सारगर्भित आलेख।

    आपको और आपके परिवार को तीज, गणेश चतुर्थी और ईद की हार्दिक शुभकामनाएं!
    फ़ुरसत से फ़ुरसत में … अमृता प्रीतम जी की आत्मकथा, “मनोज” पर, मनोज कुमार की प्रस्तुति पढिए!

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  13. jaisa ki maine 3 sal pahle hi apne blog par chhattisgarh me bhi manaye jaane wale is Pola parv ke baare me ullekh kiya tha

    http://sanjeettripathi.blogspot.com/2007/09/blog-post_11.html

    uske bare me aur bhi jankari paa kar accha lagaa lekin jis sandarbh me aap ne yah baat kahi ki tyoharo ke mausam me indradev ki vakradrishti ke shikaar sirf vidarbh hi nahi desh ke aur bhi bahut hisse hain. aapko shayad yakin nahi hoga ki chhattisgarh me jahan bastar aur anya kai ilaake baadh grast ghoshhit na hone k baad bhi vahi vibhishhika jhel rahe hai jo ghoshhna hone par jhelte. aur isi chhattisgarh ke 3-4 jile( talluke) aise hain jahan alpvarshha ghoshhit ho chuki hai matlab ki vahan Sukha.

    jis kajli teej ki baat aap ne kahi hai use haritalika teej kaha jata hai aur chhattisgarh me ise Teeja ke naam se ullekhit kiya jata hai..

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  14. क्या कहा जाय...एक तरह अतिवृष्टि तबाही मचा रही है तो दूसरी तरफ अनावृष्टि...
    तीन मास से झारखंडी जनता आसमान की और टकटकी लगाये हुए है,पर उसके हाथ केवल बदल ही आ रहे हैं...बदल आते हैं,आस जागते हैं और फिर चिढ़ाकर न जाने कहाँ चले जाते हैं...

    पोला पर्व की बढ़िया जानकारी दी आपने...हमने भी ग्यारह को तीज मनाई...
    ये तीन महीने तो होते ही हैं त्योहारों के...पर रीते हाथों के लिए क्या ईद क्या दीवाली...

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