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Sunday, July 11, 2010

हाय, मैं फुटबॉल का दीवाना न हुआ… पर हिंदी का हूँ !!

 

इलाहाबाद से वर्धा आकर नये घर में गृहस्थी जमाने के दौरान फुटबॉल विश्वकप के मैच न देख पाने का अफ़सोस तो मुझे था लेकिन जब मैने इसका प्रसारण समय जाना तो मन को थोड़ी राहत मिल गयी। यदि मेरा टीवी चालू रहता और केबल वाला कनेक्शन भी जोड़ चुका होता तबभी देर रात जागकर मैच देखना मेरे वश की बात नहीं होती। इस खेल के लिए मेरे मन में वैसा जुनून कभी नहीं रहा कि अपनी दिनचर्या को बुरी तरह बिगाड़ लूँ। जैसे-जैसे टुर्नामेण्ट आगे बढ़ता गया इसकी चर्चा का दायरा भी फैलता गया। ऑफ़िस से लेकर कैंटीन तक और गेस्ट हाउस से लेकर घर के नुक्कड़ तक जहाँ देखिए वहीं चर्चा फुटबॉल की। मैं इसमें सक्रिय रूप से शामिल नहीं हो पाता क्योंकि मैं कोई मैच देख ही नहीं पा रहा था।कांस्य पदक के साथ जर्मन खिलाड़ी

हमारे कुलपति जी रात में मैच भी देखते और सुबह हम लोगों के साथ साढ़े पाँच बजे टहलने के लिए भी निकल पड़ते। आदरणीय दिनेश जी ने तो रतजगा करने के बाद मैच की रिपोर्ट ठेलना भी शुरू कर दिया। मैने अखबारों से लेकर न्यूज चैनेलों तक जब इस खेल का बुखार चढ़ा हुआ देखा तो मुझे अपने भीतर कुछ कमी नजर आने लगी। कैसा मूढ़ हूँ कि दुनिया के सबसे बड़े उत्सव के प्रति उदासीन हूँ। मैंने तुरन्त टीवी सेट तैयार किया और केबल वाले को आनन-फानन में ढूँढकर कनेक्शन ले लिया। यह सब होने तक क्वार्टर फाइनल मैच पूरे हो चुके थे। नेट पर देखकर पता चला कि सेमी फाइनल मैच सात और आठ जुलाई को खेले जाने हैं। मैंने रतजगे की तैयारी कर ली।

शाम को ऑफिस से आया तो पता चला कि दोपहर की बारिश के बाद टीवी बन्द पड़ा है। ऑन ही नहीं हो रहा है। मैने देखा तो टीवी का पावर इन्डीकेटर जल ही नहीं रहा है। मैने बिजली का तार चेक किया। इसमें एक छोटी सी खरोंच पर सन्देह करते हुए नया तार लगा दिया। फिर भी लाइट नहीं जली। मैने टीवी का पिछला ढक्कन खोलकर चेक किया तो इनपुट प्वाइण्ट पर बिजली थी लेकिन उसके अन्दरूनी हिस्से में कहीं कोई गड़बड़ थी। यह सब करने में पसीना भी बहा। सुबह तो अच्छा भला चलता छोड़कर गया था… फिर यह अचानक खराब कैसे हो गयी?

श्रीमती जी बताया कि दोपहर में बारिश के समय जोर की गर्जना हुई थी। कहीं आसपास ही बिजली गिरी होगी शायद। मुझे सन्देह हुआ कि केबल के रास्ते बिद्युत तड़ित की उर्जा टीवी में जा समायी होगी और किसी पुर्जे का सत्यानाश हो गया होगा। मैंने फौरन इसे गाड़ी में लादा और दुकान पर ले गया। वहाँ बिजली से आहत कुछ और टीवी सेट रखे हुए थे। दुकानदार ने बताया कि नागपुर से मिस्त्री आएगा तब चेक करके बताएगा कि क्या खराबी है? मैने पूछा कि कितना समय और पैसा लगेगा तो उसने मेरा मोबाइल नम्बर मांग लिया। बोला कि मिस्त्री के चेक करने के बाद ही बता पाऊंगा। यदि जला हुआ स्पेयर पार्ट यहाँ मिल गया तब तो तत्काल ठीक करा लूंगा नहीं तो उसे नागपुर से मंगाने में दो-तीन दिन लग जाएंगे।

मुझे न चाहते हुए भी इलाहाबाद छोड़ने का पछतावा होने लगा। श्रीमती जी कि फब्तियाँ सुनना तो तय जान पड़ा- अच्छा भला शहर और काम छोड़कर इस वीराने में यही पाने के लिए आये थे- बच्चों का स्कूल सात किलोमीटर, सब्जी बाजार आठ किलोमीटर, किराना स्टोर पाँच किलोमीटर, दूध की डेयरी छः किलोमीटर… हद है, नजदीक के नाम पर है तो बस ईंट पत्थर और सूखा- ठिगना पहाड़… ले देकर एक पार्क है तो वह भी पहाड़ी पर चढ़ाई करने के बाद मिलता है। वहाँ भी रोज नहीं जा सकते…

मैं अपने को यह सब पुनः सुनने के लिए तैयार करता हुआ घर लौट आया। यह भी पक्का हो गया कि अब दोनो सेमी फाइनल भी नहीं देख पाऊंगा। मन मसोस कर रह गया। आखिरकार अगले दिन मिस्त्री ने खबर दी कि सामान नागपुर से आएगा औए साढ़े नौ सौ रूपए लगेंगे। मरता क्या न करता। मैने फौरन हामी भरी। टीवी बनकर आ गयी। मैने पता किया कि तीसरे-चौथे स्थान का मैच १०-११ की रात में होगा। मैने शनिवार की छुट्टी को दिन में सोकर बिताया ताकि रात में जागकर मैच देख सकूँ। दस बजे रात को परिवार के अन्य सदस्य सोने चले गये और मैं बारह बजने का इन्तजार करता रहा। इस दौरान टीवी पर कुछ फालतू कार्यक्रम भी देखने पड़े। स्टार प्लस पर ‘जरा नच के दिखा’ का ग्रैण्ड फ़िनाले चल रहा था जिसमें नाच से ज्यादा नखरा और उससे भी ज्यादा विज्ञापन देखना पड़ा।

नींद के डर से प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठा रहा लेकिन जब पहलू में कष्ट हुआ तो भारी भरकम सोफ़ा उठाकर टीवी के सामने ले आया। गावतकिया लगाकर आराम से देखने का इन्तजाम हो गया। मैच शुरू हुआ। जर्मनी ने पहला गोल दागा और जब बोर्ड पर यह स्कोर लिख कर आया तब मैंने पक्के तौर पर जाना कि काली जर्सी वाले खिलाड़ी जर्मन टीम के हैं। इसके बाद युरुग्वे ने गोल उतारा फिर बढ़त ले ली। अब मुझे ऑक्टोपस पॉल की जान सांसत में नजर आने लगी। तभी जर्मनी ने बराबरी कर ली। मैच में जोश आया हुआ था लेकिन सोफ़े पर आराम से पसरा हुआ मैं जाने कब सो गया। जब नींद खुली तो खिलाड़ियो को मैदान से बाहर जाते देखा और चट से विज्ञापन शुरू हो गया। अन्तिम परिणाम देखने के लिए न्यूज चैनेल पर जाना पड़ा। वहाँ की हेडलाइन थी- ऑक्टोपस पॉल की भविष्यवाणी एक बार फिर सही साबित हुई। जर्मनी तीसरे स्थान पर। युरुग्वे को ३-२ से हराया।

***

अफ़सोस है कि मैं दूसरों की तरह फुटबॉल का दीवाना नहीं बन पाया। कुछ लोग मुझे जरूर कोसेंगे कि कैसा अहमक है। चलिए कोई बात नहीं…। मेरी दीवानगी कहीं और तो है। आज स्वप्नलोक पर विवेक जी ने एक कविता ठेल दी लेकिन कविता अंग्रेजी में देखकर मुझे ताव आ गया। मैने आनन-फानन में उसका हिन्दी तर्जुमा करके टिप्पणी में पेश कर दिया है। मेरी दीवानगी का आलम यहीं देख लीजिए। स्वप्नलोक तक बाद में जाइएगा :)

“Though I have done no mistake,
Excuse me for God’s sake.
I am poor, you are great.
You are master of my fate.

गलती मेरी नहीं है काफी

प्रभुजी दे दो फिर भी माफी

मैं गरीब तू बड़ा महान

भाग्यविधाता लूँ मैं मान

But remember always that,
human, lion, dog or cat,
all creatures are same for God.
No sound is, in his rod.

पर इतना तुम रखना ध्यान

नर नाहर बिल्ली और श्वान

सबको समझे एक समान

मौन प्रहार करे भगवान

He, who will afflict others,
will be facing horrid curse.
Killing weak is not correct.
This is universal fact.”

जिसने परपीड़ा पहुँचाई

वह अभिशप्त रहेगा भाई

निर्बल को मारन है पाप

दुनिया कहती सुन लो आप

Listening this the hunter said,
“Don’t teach me good and bad.”
Gun fire ! but no scream ?
Thank God it was a dream !

सुन उपदेश शिकारी भड़का

ले बन्दूक जोर से कड़का

धाँय-धाँय... पर नहीं तड़पना

शुक्र खुदा का यह था सपना

(सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी)

24 comments:

  1. बढ़िया है आपबीती !!
    वास्तव में अब खेलों के प्रति इतना दीवानापन अब नहीं महसूस करता हूँ .....पर दिनेश जी के रिपोर्ट से तो हम भी अपने को चुका मानने लगे थे ....आप की पोस्ट पढ़ कर कुछ सुकून मिला !!


    शुभ रात्रि !!

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  2. अरे भाया, आज का मैच तो जाग कर देख लो। 11:20 से शकीरा का भी शो है :)
    क्या कहा? नींद नहीं आ रही? ठीक है - 11:20 से टी वी के सामने आसन जमाओ।

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  3. बहुत सुंदर लगा जी दिवाने तो हम भी नही किसी खेल के लेकिन यह फ़ुटबाल का बुखार चार साल मै एक बार आता है तो हम भी दिवानॊ मै जा बेठते है, वेसे टी वी मै एक फ़्युज होता है जो दो चार रुपये मै आ जायेगा ओर ९०% वही उड जाता है, ओर यह फ़्युज वही होता है जहां तार अंदर जाती है, टि वी क्या आज कल सभी ईलेक्ट्रोनिक चीजो मै होता है बस हमे पता नही होता इस लिये ठगे जाते है, मेने कार के लिये भी पेसे खराब किये तब जा कर पता चला कि बस फ़्युज ही खराब था

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  4. यार गिरिजेश,

    11.20 पर शकीरा का डांस देखने की उत्कंठा....?

    ऑक्टोपसवा से विश्वास उठ गया लगता है जो समूची मीडिया को नचा रहा है :)


    सिद्धार्थ जी,

    अब तो गिरिजेश भाई ने जागने का नुस्खा भी बता दिया है.....जगे रहिएगा :)

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  5. शानदार पोस्ट

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  6. - यह भी खूब रही!

    - वर्धा से दो चार होने के लक्षण उभरने शुरु गए हैं।

    - अनुवाद चकाचक है, दीवानगी सलामत रहे।

    राय साहब तो आजकल यहाँ लन्दन आए हुए हैं। तीन चार दिन पहले हाई कमीशन में सम्पन्न एक मीटिंग में भेंट हुई, बतियाहट भी। आपको स्मरण किया गया। :)

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  7. मैच तो एक्स्ट्रा टाइम में चला गया ।

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  8. अभी फायनल देख कर फुरसत हुए...आनन्द आ गया देखकर.

    कविता का अनुवाद भी मस्त लगा और यह भी सोचने को मजबूर हुआ कि इलाहाबद से वर्धा जाकर आप कैसा महसूस कर रहे हैं.

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  9. गिरिजेश भ‍इया, शकीरा का डान्स ११:२० पर नहीं था। आपकी सलाह के बाद मैं गया तो जरूर लेकिन पता चला कि मोहतरमा १० बजे ही अपना जलवा बिखेर कर जा चुकी हैं। मुझे दस बजे का समय पता था लेकिन उस समय यह पोस्ट ठेलने में लगा हुआ था। दीवानगी तो इधर ही है न...!!

    आदरणीया कविता जी, हमारे कुलपति जी से क्या बात हुई बताइएगा। मुझे उम्मीद थी कि आप जरूर मिलेंगी उनसे। लन्दन में कोई साहित्यिक आयोजन हो तो आपका पहुँचना लाजिमी है। उन्होंने ब्लॉगर गोष्ठी की तारीख तय कर दी है। कुछ चर्चा हुई क्या? आप सितम्बर में भारत आने का कार्यक्रम बना सकती हैं क्या? इस बार गोष्ठी को नयी ऊँचाइयों तक ले जाना है।

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  10. इस ब्लॉग के माध्यम से यह अपील जारी की जा रही है कि शकीरा के शो का वीडियो डाउनलोड करने का लिंक यदि किसी को पता हो तो यहाँ बतायें।
    भाई, हम भी देख नहीं पाए :)

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  11. ये रहा लिंक-
    http://www.youtube.com/watch?v=pRpeEdMmmQ0&feature=player_embedded

    एक लिंक यहाँ भी है-
    http://www.youtube.com/watch?v=dzsuE5ugxf4&feature=channel

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  12. आधुनिक नृत्य और जिम्नास्टिक या सर्कस कहा जाना ज्यादा ठीक है ..!

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  13. समापन समारोह में शकीरा
    http://www.youtube.com/watch?v=dEBnKpZlp0M&feature=player_embedded#!

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  14. बढिया रही मशक्‍कत। खेल में तो तभी मजा आता है जब अपना खिलाडी खेल रहा हो।

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  15. आपका हिंदी भाषा के प्रति लगन और भाषाप्रेम सराहनीय है. ... बढ़िया भावपूर्ण संस्मरण और रोचक अभिव्यक्ति ...आभार

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  16. छुपे रुस्तम हैं ,सकीरा वाला लिंक धरे बैठे हैं -कल से ही गिरिजेश जी विचलित थे-चलिए आपके सौजन्य से मुझे भी मिल गया -शुक्रिया !

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  17. वर्धा में ऐसे ही आनन-फ़ानन में खूब सारे काम कर डालिये।


    सम्मेलन के लिये अगर हमको बुलायें तो पहले मच्छरदानी, कछुआ छाप अगरबत्ती और ताजमहल चाय ,चीनी की खरीद हालिया खरीद की रसीद की फोटोकापी भेजिये।

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  18. मैंने भी सोचा था शकीरा का डांस देखूंगा, पर पत्नी ने टीवी ही नहीं खोलने दिया। कहने लगी, ये टाइम टीवी का नहीं, बीवी का है।
    --------
    पॉल बाबा की जादुई शक्ति के राज़।
    सावधान, आपकी प्रोफाइल आपके कमेंट्स खा रही है।

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  19. पुनश्च :
    उस दिन कविता के उत्कृष्ट भावानुवाद की बधाई देना तो भूल ही गया था
    सकीरा के चक्कर में ..
    और हाँ ये शुकुल महराज क्या उचार रहे हैं -
    अभी से लिस्ट में नाम डलवाने की जुगाड़ में लग गए...
    अब आप उन्हें मना भी नहीं कर सकते ..
    संकोची स्वभाव के हैं न आप !
    एक काम करियेगा -निमन्त्रितों का एक अविवादित मानदंड अपनायियेगा
    और गुरु घंटालों से दूर रहिएगा ...नहीं तो वर्धा पहले से ही भयंकर विवादों को झेल रहा है ....
    अपनी ओर से बढ़ोत्तरी मत कीजिएगा. स्वभाव से मजबूर लोग इसी तरह विवाद का शिलान्यास कर देगें .
    (अनुरोध है कि यह टिप्पणी न मिटायें ,मिटायें तो ऊपर की भी मिटायें )

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  20. भाई सिद्धार्थ, मिसिरजी की टिप्पणी और उनके ऊपर वाली टिप्पणी अभी तक आपने मिटाई नहीं। क्या भाई आपको टिप्पणी कर्ता की जरा सा इच्छा का मान तो रख लेना चाहिये। वैसे जाकिर अली जी की टिप्पणी मिटाने के लिये क्यों कह रहे हैं मिसिर जी। कुछ समझ में आया नहीं। :)

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  21. हमने तो न तो इस दौर मे फुटबॉल का मैच देख और न ही क्रिकेट का कैच, आज हम नयी ही दुनिया मे विचरण कर रहे है। :) वैसे फुटवाल मे एकेन का गाना मस्‍त है।

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